• Hindi News
  • International
  • Abida Parveen & Naseebo Lal’s Warm Interaction Wins Hearts On Internet Iconic Track Tu Jhoom

पाकिस्तान की दो महिलाओं ने YouTube पर काटा गदर:आबिदा-नसीबो का गाना 1 हफ्ते में 1 करोड़ व्यूज पार, हिंदुस्तानी भी हुए फिदा

नई दिल्ली7 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

जानीमानी पाकिस्तानी सिंगर आबिदा परवीन और नसीबो लाल का अभी रिलीज हुआ 'तू झूम' ट्रैक म्यूजिक लवर्स के बीच छाया हुआ है। ऐसा लगता है, जैसे आप किसी की आगोश में हैं, उसकी गर्माहट की खुमारी तारी है। कोक स्टूडियो के नए ट्रैक की ओपनिंग लाइन 'पीड़ा नू मैं देखे लावां, ते माई हंस्दी जावां'। यह लाइन कहती है अपनी मुश्किलों को हवा में उड़ाता चल। यह लाइन ऐसी खुशनुमा फील देती है जैसे सर्दियों की शाम में कोई गर्म कॉपी के प्याले के साथ आपकी मेजबानी करे। इन दोनों गायिकाओं ने इस गाने में इसी तरह के अहसासों के साथ अपनी आवाज का जादू बिखेरा है।

आबिदा और नसीबो की सबसे शानदार जुगलबंदी

इस गाने के कलाम अदनान धूल ने लिखे हैं। जुल्फिकार ने इसे कम्पोज और को-प्रोड्यूस किया है। 'तू झूम' ट्रैक को कुछ दिन पहले ही कोक स्टूडियो के यूट्यूब पेज पर रिलीज़ किया गया, और अब तक इसे 40 लाख से अधिक बार देखा जा चुका है। यह आबिदा परवीन और नसीबो लाल की अब तक की सबसे शानदार जुगलबंदी है। उनकी आवाज एक-दूसरे के साथ मिस्री की तरह घुल रही है। इस गीत की हरेक लाइन एक नई उम्मीद देती है। 'सारी खुशियां मिल जावं ते पिचे की रे जाना'- यह लाइन कहती है कि जो आपका है वह आपको हमेशा मिलेगा..आपको झूमते रहना है। "तू झूम"।

आबिदा परवीन और नसीबो लाल की अब तक की सबसे शानदार जुगलबंदी मानी जा रही है। दुनियाभर के संगीत प्रेमियों के बीच इनका गीत पसंद किया जा रहा है। (फोटो-कोक स्टूडियो)
आबिदा परवीन और नसीबो लाल की अब तक की सबसे शानदार जुगलबंदी मानी जा रही है। दुनियाभर के संगीत प्रेमियों के बीच इनका गीत पसंद किया जा रहा है। (फोटो-कोक स्टूडियो)

हम दोनों पुराने जमाने के, जुल्फी साहब ने भी डाल दी जान

इस गीत का जिक्र 67 साल की पाकिस्तानी गायिका ने द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के साथ बातचीत में भी किया। आबिदा परवीन कहती हैं, "अगर इसे सुनेंगे तो आप पर धीरे-धीरे सुरूर चढ़ता जाएगा। ज़ुल्फी साहब ने इसमें जान डाल दी है। उन्होंने इसकी धुन मधुरता के साथ तैयार की है। नसीबो लाल के साथ मेरी जुंगलबंदी का आइडिया शानदार था। वह भी, मेरी तरह पुराने जमाने की है और यकीनन अच्छा गाती है।'

आबिदा परवीन को ‘सूफी संगीत की मल्लिका’ कहा जाता है। दुनियाभर में सूफी संगीत को लोकप्रिय बनाने में भी उनकी बड़ी भूमिका है।
आबिदा परवीन को ‘सूफी संगीत की मल्लिका’ कहा जाता है। दुनियाभर में सूफी संगीत को लोकप्रिय बनाने में भी उनकी बड़ी भूमिका है।

जुल्फी का स्टाइल सबसे अलग, दिल से निकालते हैं धुन

आबिदा परवीन को ‘सूफी संगीत की मल्लिका’ कहा जाता है। दुनियाभर में सूफी संगीत को लोकप्रिय बनाने में भी उनकी भूमिका नकारी नहीं जा सकती है। वह कहती हैं, अपने अंदर झांके बिना हम कुछ नहीं कर सकते। कोक स्टूडियो के निर्माता उनके संगीत को सबसे अच्छे से जानते हैं। आबिदा परवीन कहती हैं, ‘सब को साथ लेकर चलने वाला शख्स समाज की खूबसूरती को जानता है। हर संगीत निर्देशक की अपनी दृष्टि होती है। उनके दिल में एक धुन होती है जिसे वे सामने लाना चाहते हैं, और जब वे ऐसा करने के लिए इतने सारे लोगों को एक साथ लाते हैं, तो एक खूबसूरती का निर्माण करते हैं। जुल्फी की स्टाइल, उनकी आवाज अद्भुत है, यह आपको बांधे रखती है।'

आबिदा परवीन कहती हैं कि नसीबो लाल के साथ मेरी जुंगलबंदी का आइडिया शानदार था। वह भी, मेरी तरह पुराने जमाने की है और यकीनन अच्छा गाती है।
आबिदा परवीन कहती हैं कि नसीबो लाल के साथ मेरी जुंगलबंदी का आइडिया शानदार था। वह भी, मेरी तरह पुराने जमाने की है और यकीनन अच्छा गाती है।

कलाम देता है कॉर्पोरेट स्टूडियो में भी दरगाह जैसा फील

हालांकि, कॉरपोरेट शो और पाकिस्तान में सूफी संगीत के बीच तालमेल की संभावना पर आबिदा परवीन के पास कहने के लिए बहुत कुछ है। स्टूडियो, महफिल और दरगाह में परफॉर्म करने के बीच वह अंतर महसूस नहीं करती हैं। वह कहती हैं, "बुजुर्गन ए दीन का कलाम जहां भी पड़ जाए, वो जगह दरगाह ही बन जाती है। वो हर दिल में हैं; हमें उससे या उनके बारे में बात करने के लिए किसी खास जगह की जरूरत नहीं। औपचारिकताओं की कोई आवश्यकता नहीं है।'

लालच और सूफीवाद एक साथ नहीं आ सकता

सूफीवाद को एक औजार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है या नहीं, आबिदा परवीन को इसकी परवाह नहीं। लेकिन वह इस बात से सहमत हैं कि सूफीवाद और लालच कभी भी एक साथ नहीं हो सकते। वह कहती हैं, "पैसा मेरे दिमाग में नहीं आता है। किसी भी मंच पर होने का मकसद ईश्वर के पैगाम को फैलाना है। टेलीविजन की सबसे अच्छी बात यह है कि यह हर घर में है। सच कहूं तो इन कलामों को किसी माध्यम की जरूरत नहीं है। लेकिन यह सिलसिला लोगों के लिए चीजों को आसान बनाने की खातिर है, इसलिए पैगाम उनके लिए आसानी से उपलब्ध है।'

आबिदा परवीन खुद को औरत-मर्द से इतर मानती हैं। वह कहती हैं कि सभी ईश्वर के दूत हैं। जब आप दूत बन जाते हैं, तो स्त्री और पुरुष की अवधारणा महत्वहीन हो जाती है, तो जेंडर को लेकर विवाद क्यों?
आबिदा परवीन खुद को औरत-मर्द से इतर मानती हैं। वह कहती हैं कि सभी ईश्वर के दूत हैं। जब आप दूत बन जाते हैं, तो स्त्री और पुरुष की अवधारणा महत्वहीन हो जाती है, तो जेंडर को लेकर विवाद क्यों?

मैं औरत या आदमी की हद से ऊपर

ब्रिटिश अखबार द गार्जियन के साथ 2013 में एक इंटरव्यू में आबिदा परवीन ने बताया था कि वह खुद किसी महिला या पुरुष के तौर पर नहीं देखती हैं। उनमें सूफीवाद एक तरह का जुनून है। वह कहती हैं जेंडर ऐसी कोई चीज नहीं जो उन्हें परेशान करे।

वह कहती हैं, "हम अपनी मुश्किलें खुद बनाते हैं। एक आदमी वह है जो भगवान से प्यार करता है, मानवता की रक्षा करता है और अपना पैगाम देता है। कुल-मिलाकर हम सभी दूत हैं। जब पुरुष दूत बन जाता है, तो स्त्री और पुरुष की अवधारणा महत्वहीन हो जाती है, तो जेंडर को लेकर विवाद क्यों?’

आबिदा परवीन को लगता है कि दुनिया से हिंसा और नफरत को मिटाने के लिए सभी को मानवता और तसव्वुफ (सूफीवाद) पर फोकस करना चाहिए। वह कहती हैं, "मानवता मनुष्य को धार्मिक, जेंडर, राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठने में मदद करती है। वह भी परमेश्वर का मार्ग है; ईश्वर उन्हें भी दो वक्त की रोटी देता है जिन्हें उनमें विश्वास नहीं है। वह निष्पक्षता को बनाए रखता है। अल्लाह ने खुद मानवता की मिसाल कायम की है।’