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एक विवाह ऐसा भी:लिव-इन रिलेशनशिप का चलन आदिवासियों में पहले से, शादी के टाइम पर भरना पड़ता है जुर्माना

नई दिल्ली8 दिन पहलेलेखक: सुनाक्षी गुप्ता
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  • गांव को दावत खिलाने के नहीं होते पैसे, इसलिए लिव-इन में रहने को मजबूर
  • शादी करने के लिए देना पड़ता है जुर्माना, 70 की उम्र तक करते हैं ब्याह

प्यार करने वाले शादी के बंधंन में बंधे बिना ही साथ रहने का फैसला लेते हैं, उसे लिव-इन रिलेशनशिप कहते हैं। कहा जाता है कि ये कल्चर पश्चिमी देशों से भारत आया है, लेकिन हकीकत यह है कि देश के कई आदिवासी इलाकों में 'ढुकू' के नाम से लिव-इन की प्रथा पहले से चली आ रही है। ढुकू कपल्स 70 की उम्र में भी शादी करते हैं। ये प्रथा सबसे ज्यादा झारखंड के गुमला, खूंटी, बसिया, घाघरा, पालकोट, चटकपुर, तोरपा, सिमडेगा और मनातू आदि जिलों और यहां के गांवों में देखी गई है। साल 2019 की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन जिलों के गांवों में कुल 358 कपल्स लिव-इन में रहते थे। पूरे झारखंड में करीब 2 लाख कपल्स लिव-इन में रहते हैं। आदिवासियों में ढुकू प्रथा प्यार ही नहीं बल्कि मजबूरी की वजह से भी कायम है।

दैनिक भास्कर की वुमन टीम ने झारखंड के गुमला और खूंटी जिले के आदिवासी ढुकू कपल्स से बात की। आइए जानें कि क्यों कपल्स बिना शादी के साथ रहते हैं? ये पूरे साल सामूहिक विवाह कार्यक्रम की आस में क्यों रहते हैं?

गरीबी के कारण गांव वालों को नहीं दे सकते दावत, इसलिए इनकी शादी नहीं होती।
गरीबी के कारण गांव वालों को नहीं दे सकते दावत, इसलिए इनकी शादी नहीं होती।

कहां से आया ये ढुकू शब्द?
'ढुकू' शब्द 'ढुकना' से जन्मा है। इसका मतलब है घर में प्रवेश करना। अगर कोई महिला बिना शादी के किसी के घर में रहती है तो उसे 'ढुकू' या ढुकनी महिला कहा जाता हैं। यानी वो महिला जो किसी के घर में दाखिल हो चुकी है या घुस आई है। लिव-इन में रहने वाले कपल्स को 'ढुकू' कपल्स कहते हैं।

शादी के लिए खिलानी पड़ती है पूरे गांव को दावत, इसलिए बनते हैं ढुकू कपल
दरअसल, झारखंड के इन गांवों में शादी को लेकर रस्में काफी अलग हैं। जिन कपल्स को शादी करनी होती है, उनके परिवार को पूरे गांव वालों को दावत देनी होती है। लड़की वाले अपने गांव में लोगों को खाना खिलाते हैं और लड़के के गांव में अलग दावत होती है। गांव के लोगों को मीट, चावल खिलाने के साथ ही हड़िया का भी इंतजाम करना होता है। इसमें करीब 1 से 1.5 लाख रुपये तक का खर्च आता है। दिन के 200-250 रुपये कमाने वाले परिवारों के लिए इतनी बड़ी रकम इकट्ठी करना काफी मुश्किल होता है। ऐसे में प्यार करने वाले जोड़े बिना शादी के ही साथ रहना शुरू कर देते हैं। इसलिए ये महिलाएं ढुकू कहलाती हैं। इन्हें समाज में इज्जत नहीं मिलती और न ही ढुकू कपल्स के बच्चों को कानूनी अधिकार मिलता है।

गांव की पंचायत को 5 हजार रुपये जुर्माना भरने के बाद रवीना और बजरंग ने 2016 में सामूहिक विवाह कार्यक्रम में की शादी थी।
गांव की पंचायत को 5 हजार रुपये जुर्माना भरने के बाद रवीना और बजरंग ने 2016 में सामूहिक विवाह कार्यक्रम में की शादी थी।

'सिंदूर तो लगा लेती थी, लेकिन घर की पूजा में शामिल होने की नहीं मिलती थी इजाजत'
गुमला जिले के चैनपुर गांव की रहने वाली रवीना देवी बताती हैं कि उनकी शादी को पांच साल हो गए हैं लेकिन पति बजरंग कुमार राम के साथ वे पिछले नौ सालों से रह रही हैं। शुरू के चार साल वे ढुकनी बनकर ससुराल रहीं। शुरुआत का समय उनके लिए काफी दर्दनाक था, क्योंकि लोग उन्हें अछूता मानते थे। हालांकि, उन्हें शादीशुदा महिलाओं की तरह माथे पर सिंदूर लगाने की इजाजत तो मिल गई थी, लेकिन घर की किसी भी पूजा में शामिल नहीं किया जाता था और न ही कभी प्रसाद नसीब होता था। यहां तक की छठ पूजा में शामिल होने की अनुमति नहीं मिलती थी।

'शादी से पहले थीं ईसाई, ढुकू बनने के लिए बदला धर्म, लोग मेरे हाथ का छुआ पानी भी नहीं पीते थे'
रवीना ने बताया, गांव में शादीशुदा और ढुकू महिला के लिए रिवाज अलग-अलग हैं, लेकिन उन्हें ढुकू बनने से पहले भी एक परीक्षा पास करनी पड़ी। रवीना जन्म से ईसाई धर्म की थी और अपना नाम रवीना इक्का लिखती थीं। जब वे बजरंग के घर आईं तो उन्हें सबसे पहले अपना धर्म बदलना पड़ा। दो महीने के अंदर उन्हें पंचायत के सामने पेश किया गया। इसके बाद घर में विशेष पूजा कर उन्होंने अपने पति का धर्म अपनाया। तब जाकर उन्हें रसोई में जाने की इजाजत मिली।
रवीना कहती हैं, 'गांव में बाकी महिलाएं मेरे से बात नहीं करती थी क्योंकि मैं ढुकनी थी। यहां तक कि हमारे परिवार से पूरे गांव में कोई संबंध नहीं रखता था। गांव के नल से घर के लिए पानी लाना भी किसी जंग से कम नहीं था। कोई जल्दी लाइन में लगने नहीं देता था और अगर वे पहले पानी भर लें तो बाकी महिलाएं उस नल को साफ करने के बाद ही छूती थीं। ये भेदभाव आज भी कई तरह से होता है। हमें लोहे के कड़े पहनने की इजाजत नहीं होती। इसी तरह परेशानी झेलने की वजह से कुछ समय बाद मैंने घर से बाहर निकलना ही बंद कर दिया था।'

'माइके में मां-पिता शराब पीते थे और ससुराल में थे खाने के लाले, इसलिए मैं और छोटी बहन 'ढुकनी' बन गए'
रवीना बताती हैं, 'मेरे मायके में मां और पिता दोनों को शराब पीने की लत थी। इस वजह से मैं कभी स्कूल की शक्ल नहीं देख सकी। उनके पास खाने और शादी के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए मैंने और छोटी बहन ने ढुकनी बनने का फैसला लिया। ससुराल की हालत ये थी कि पति खेत में ट्रैक्टर चलाने का काम करते हैं और सास आंगनबाड़ी में खाना बनाती हैं। ससुर नहीं है और घर में करीब 6 से 7 सदस्य हैं, बड़ी मुश्किल से खाने का इंतजाम होता इसलिए ससुराल में भी उनके पति के पास शादी के पैसे नहीं थे।'

ढुकू महिला के नहीं होते कोई अधिकार, एक ढुकू के साथ रहते भी पुरुष दूसरी शादी कर लेते हैं।
ढुकू महिला के नहीं होते कोई अधिकार, एक ढुकू के साथ रहते भी पुरुष दूसरी शादी कर लेते हैं।

'शादी के लिए दिया 5 हजार जुर्माना, तब लिए सात फेरे'
ढुकू कपल को शादी करने के लिए गांव वालों को दावत देने के साथ ही पंचायत को जुर्माने की रकम भी देनी पड़ती है। हालांकि ये नियम हर गांव में अलग-अलग है। ऐसा माना जाता है ढुकू कपल समाज की परंपरा को तोड़कर साथ में रहते हैं, इसलिए उन्हें शादी करने से पहले एक आर्थिक दंड के रूप में जुर्माना गांव की पंचायत को देना होगा। रवीना बताती हैं कि 2016 में सामूहिक विवाह में उनकी शादी हुई थी। उस समय पति के गांव के लोग दावत के लिए विवाह में शामिल हुए थे। वहीं मायके में पांच हजार रुपये का जुर्माना देने के लिए उन्होंने दोस्तों से पैसे उधार लिए थे। जोकि कुछ समय पहले ही वे भर सकी हैं।

'ससुराल वाले कहते थे पति की करा देंगे दूसरी शादी, गांव वाले नहीं करते थे बात'
खूंटी जिले की रहने वाली 39 वर्ष की सलेश्वरी देवी बताती हैं पढ़े लिखे होने के बाद भी उन्हें काफी लोगों ने दबाने की कोशिश की। 2001 में वे ढुकू बनकर गांव आई थी और 2002 में उनकी शादी पीतांबर से हुई थी। सुलेश्वरी बताती हैं कि उनके पति के घरवाले शादी के खिलाफ थे इसलिए शुरुआत के एक साल उन्हें काफी दिक्कत झेलनी पड़ी। उनके होते हुए ससुराल वाले पति के लिए दूसरे रिश्ते देखते थे। ये सब इसलिए क्योंकि वे पढ़ी-लिखी थी, उन्होंने इंटर पास किया था और स्कूल में पढ़ाने भी जाती थी। ढुकू होने के कारण उन्हें रसोई में प्रवेश करने की इजाजत नहीं थी, न ही कोई उनके हाथ का छुआ पानी पीता था। इसके बाद वे अपने पति के साथ घर छोड़कर चली गई थी और फिर शादी के आठ साल बाद ससुराल वापस आई। अब सलेश्वरी गांव के सेल्फ हेल्प ग्रुप में काम करती हैं और घर में आर्थिक मदद करती हैं इसलिए अब ससुराल के लोगों ने उन्हें अपना लिया है।

यहां लड़के वाले देते हैं दहेज
सलेश्वरी बताती हैं कि वे ढुकू इसलिए भी बनी क्योंकि दोनों परिवार आर्थिक रूप से बहुत कमजोर थे। गांव की दावत के लिए पैसे नहीं थे। गांव वालों को खिलाने के लिए करीब 1.5 लाख तक का खर्च आता है, इतने पैसे किसी के पास नहीं थे। जब वे शादी करने गई तब गांव वालों ने उनके ऊपर 64 हजार का जुर्माना भी लगाया था।
वे बताती हैं कि उनके गांव में अलग दहेज प्रथा चलती है। लड़के के घरवाले लड़की के घरवालों को पैसे देकर बहू लाते हैं, इसे दहेज का नाम भी दिया गया है। रस्म के अनुसार इसकी रकम 5 से 65 रुपये होती है, लेकिन कई लोग ज्यादा पैसे की मांग भी करते हैं।

ढुकनी महिला की कान छेदनी नहीं होती, इन्हें लोहे और लाख के कंगन पहनने का भी अधिकार नहीं
ढुकनी महिला की कान छेदनी नहीं होती, इन्हें लोहे और लाख के कंगन पहनने का भी अधिकार नहीं

​​​ढुकू महिला के बच्चों को नहीं मिलता पिता का नाम और संपत्ति, लड़कियों की नहीं होती कान छेदनी
सलेश्वरी बताती हैं कि उनके दो बेटे हैं एक की उम्र 18 साल है और दूसरे की 13 साल। हालांकि उनके दोनों ही बेटे शादी के बाद जन्मे हैं, लेकिन जिन ढुकू कपल के बच्चे होते हैं उन्हें समाज और कागजों में पहचान नहीं मिलती। बच्चों को पिता का नाम नहीं मिल पाता है। बच्चों के आधार कार्ड तो बनाते हैं लेकिन उसमें पिता का नाम नहीं लिखा जाता। यही दिक्कत राशन कार्ड और स्कूल में दाखिले के समय आती है। इन बच्चों को पिता की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। आदिवासी इलाके में महिलाओं के कान और नाक छिदवाने को बहुत अहमियत दी गई है, लेकिन ढुकू महिला की बेटियों की कान छेदनी नहीं होती और न ही उनका विवाह होता है।

एक ही मंडप पर सास-ससुर और बेटा - बहू करते हैं विवाह
झारखंड के इन गांवों में ढुकू कपल का विवाह कराने वाली सामाजिक संस्था निमित्त की संस्थापक सदस्य निकिता सिन्हा बताती हैं कि 2016 में सामूहिक विवाह की पहल शुरू की थी। अब तक वे 629 ढुकू कपल्स की शादी करा चुकी हैं। पैसे की तंगी के कारण ये कपल शादी नहीं कर पाते थे, इनमें से कुछ की हालत तो ऐसी भी होती थी कि उनके ढुकू होने के कारण बच्चों के भी रिश्ते नहीं हो पा रहे थे। ऐसे में सामूहिक विवाह कार्यक्रम कराने पर 70 साल तक के कपल शादी के लिए रजिस्टर कराते देखे गए। आलम ये होता है कि एक ही मंडप में एक तरफ सास-ससुर फेरे लेते हैं और दूसरी ओर बेटा-बहू।

किसी गांव में पंचायत भगा देती थी, तो कहीं खुद बुलाकर बोलते थे ढुकू की शादी करा दो
किसी गांव में पंचायत भगा देती थी, तो कहीं खुद बुलाकर बोलते थे ढुकू की शादी करा दो

10 साल के बच्चे का पिता बोला 'मैडम मेरी शादी करा दो'
निकिता बताती हैं कि कुछ साल पहले वे खूंटी गांव में स्वास्थ्य विभाग के एक कार्यक्रम में शामिल होने गई थीं कि करीब 40 वर्ष का एक आदमी उनके पास आया और बोला 'मैडम मेरी शादी करा दो बहुत मेहरबानी होगी'। शुरुआत में उन्हें ये मजाक लगा लेकिन जब वे उस व्यक्ति के घर पहुंचीं तो देखा उसके साथ एक महिला रहती है और करीब 10 साल का एक बेटा भी है लेकिन उनकी शादी नहीं हो सकी है। पता लगाने पर ऐसे कई कपल सामने आए। हर गांव में इस तरह करीब 5 से 6 ढुकू कपल रहते थे, जो शादी के लिए परेशान थे। निकिता ने इनकी शादी कराने का जिम्मा उठाया। सामूहिक विवाह में इन कपल्स के गांव से पांच लोगों को बुलाने की इजाजत दी गई ताकि उसे सामाजिक तौर पर भी मान्यता मिल सके साथ ही इनकी शादी को रजिस्टर भी कराया जाता है।

ढुकू महिला की मौत पर गांव में नहीं होता अंतिम संस्कार
लिव-इन में रहने वाले इन ढुकू कपल को गांव इस कदर सामाजिक बहिष्कार होता है कि अगर कोई ढुकू महिला की मौत हो जाए तो उसे गांव के कब्रिस्तान में दफन नहीं किया जाता और न ही गांव में अंतिम संस्कार होता है। महिला चाहे किसी भी धर्म की हो उसे अंतिम विदाई गांव की जमीन पर नहीं दी जाती। हर गांव में इसको लेकर अलग-अलग परंपरा है। कुछ गांव में ढुकू पुरुष के साथ भी यही सलूक होता है।

अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही ढुकू प्रथा
गुमला जिले के एसएस हाई स्कूल के प्रधान लिपिक और साहित्यकार अजय किशोर नाथ पांडेय बताते हैं कि वे बचपन से अपने गांव में ढुकू कपल देखते आ रहे हैं और आज भी यहां इसका काफी चलन है। लड़का और लड़की प्यार करते हैं और अपनी मर्जी के साथ रहते हैं घर बसाते हैं, लेकिन बाद में शादी भी करते हैं। मेट्रो शहर में चलने वाले लिव-इन रिलेशनशिप को यहां आदिवासी इलाकों में बहुत पहले से अपनाया जा रहा है, यहां तक की 90-95 की उम्र में भी लोग ढुकू ही रहते हैं।

90 वर्ष के आदिवासी ढुकू कपल भी देखे हैं और आज भी गांव में यही परंपरा चलती है
90 वर्ष के आदिवासी ढुकू कपल भी देखे हैं और आज भी गांव में यही परंपरा चलती है

हालांकि इस प्रथा के बारे में किताबों में ज्यादा नहीं लिखा गया है, लेकिन गांव के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि आजादी से पहले से भी आदिवासी इलाकों में ढुकू प्रथा चलती आ रही है। इसको लेकर कोई विरोध नहीं है, लेकिन सामाजिक तौर पर इसे खुले दिल से नहीं स्वीकारा जाता। ढुकू महिला को समाज में वो सम्मान नहीं मिलता जो शादीशुदा महिला को मिलता है। बिना विवाह के साथ रहने पर अगर उनके साथी की जान चली जाती है तो इन महिलाओं का कोई साथ नहीं देता।

ईसाई धर्म में ढुकू कपल के बच्चों का नहीं होता पवित्र स्नान
एसएस हाई स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक पुनीत मिंज बताते हैं कि वे मूलरूप से गुमला जिले के पतराटोली गांव के रहने वाले हैं। उनके गांव में ईसाई धर्म के सबसे ज्यादा परिवार हैं। इसी के साथ उरांव आदिवासी जाति के लोग भी अच्छी संख्या में हैं। यहां ढुकू कपल्स को काफी अलग नजर से देखा जाता है। उन्हें गांव में रहने की मनाही नहीं है, लेकिन सामाजिक तौर पर अपनाया नहीं जाता। ईसाई धर्म के ढुकू कपल्स के बच्चे को पवित्र स्नान का अधिकार नहीं मिलता है।

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