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देश पर बोझ गगनचुंबी इमारतें:40% कार्बन-30% कूड़ा देती हैं, 25% लग रही लकड़ी; 40% बिजली और 20% पानी होता खर्च

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: मनीष तिवारी
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नोएडा के ट्विन टावर के ढहते ही एक तरफ धूल का गुबार उठा, तो दूसरी तरफ जमींदोज होती इमारत देखने के लिए लोगों में उतना ही उत्साह था। पीछे रह गए तमाम सवाल और चिंताएं। चिंता इस बात की कि देशभर में तेजी से बनती हाईराइज इमारतों को, जिन्हें विकास का मीटर समझा जा रहा है, क्या ये इमारतें हमसे बहुत कुछ छीन तो नहीं रहीं?

ये इमारतें जहां प्रदूषण और तापमान बढ़ा रही हैं, वहीं बिजली और पानी का बड़ा हिस्सा पी भी रही हैं। बदले में देश को रोज मिलता है लाखों टन मलबा। रियल एस्टेट सेक्टर में बूम आने के बाद करीब एक दशक से देशभर में ऐसी बहुत सारी इमारतें बनकर खड़ी हुई हैं और आगे भी होंगी। सोचकर देखिए, ये सभी इमारतें एक ही वक्त में एक साथ बूढ़ी भी होंगी। अभी इन्हें बनाने का दौर चल रहा है, तब मिटाने का सिलसिला भी एक साथ शुरू होगा।

अभी ट्विन टावर से निकले 80 हजार टन मलबे में से 50 हजार टन को उसी के बेसमेंट में भर दिया गया है। 30 हजार टन मलबा अगले 3 महीने में नोएडा के सेक्टर-80 के ‘सी एंड डी वेस्ट रिसाइकलिंग प्लांट’ में रिसाइकल किया जाएगा, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हर तरफ इमारतें तोड़ी जा रही होंगी, तब उनसे निकलने वाला मलबा कहां जाएगा?

46 साल में ही गिरा दिया गया था पहला स्काईस्क्रेपर

शिकागो में 1969 में एक गैर-लाभकारी संगठन की स्थापना हुई। जिसे काउंसिल ऑन टॉल बिल्डिंग्स एंड अर्बन हैबिटाट (CTBUH) नाम दिया गया। यह संगठन दुनिया भर में बन रहे स्काईस्क्रेपर, यानी गगनचुंबी इमारतों का लेखा-जोखा रखता है। दुनिया के किस हिस्से में कितने स्काईस्क्रेपर्स बन रहे हैं, उनकी ऊंचाई कितनी है और कहां-कितने टूट रहे हैं।

इसी संगठन ने दुनिया भर की इमारतों की ऊंचाई दर्ज करने के लिए कायदे-कानून भी बनाए। CTBUH ने ही दुबई के 828 मीटर ऊंचे बुर्ज खलीफा को दुनिया की सबसे ऊंची इमारत घोषित किया है। बता दें कि दुनिया का पहला स्काईस्क्रेपर ‘होम इंश्योरेंस बिल्डिंग’ 46 साल के बाद गिरा दिया गया था।

बीते 20 साल में सबसे ज्यादा स्काईस्क्रेपर तोड़े गए

दुनिया भर में साल 2000 से 2019 के बीच सबसे ज्यादा बिल्डिंग्स जमींदोज की गईं, जो अपने समय में आसमान छू रही थीं। इनमें से करीब आधी इमारतें दूसरी बिल्डिंग्स को रास्ता देने या किसी और कंस्ट्रक्शन के लिए तोड़ी गईं।

सिंगापुर में 234.7 मीटर के एक्सा टावर को ढहाने का काम चल रहा है, यह अब तक जमींदोज की गई दुनिया की सबसे ऊंची इमारत होगी। इसका निर्माण 1986 में हुआ था।

मुंबई में हैं सबसे ज्यादा स्काईस्क्रेपर्स और हाईराइज बिल्डिंग्स

हमारे देश में सबसे ज्यादा बहुमंजिला इमारतें मुंबई में हैं। मुंबई दुनिया के सबसे ज्यादा हाईराइज बिल्डिंग्स वाले शहरों में 7वें नंबर पर है। एम्पोरिस डॉट कॉम के मुताबिक मुंबई में करीब 200 स्काईस्क्रेपर्स और साढ़े 5 हजार हाईराइज बिल्डिंग हैं। दिल्ली NCR में भी 5 हजार से ज्यादा हाईराइज इमारतें बन चुकी हैं।

कोलकाता, बेंगलुरू और पुणे जैसे शहरों में भी हाईराइज बिल्डिंग्स तेजी से बन रही हैं। इंडिया ब्रांड इक्विटी फाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार इस साल भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कंस्ट्रक्शन मार्केट बनने जा रहा है।

30 से 40 साल में ही जर्जर होने लगती हैं इमारतें

हाईराइज अपार्टमेंट का चलन भले ही तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन इनकी उम्र को लेकर भी सवाल बने हुए हैं। पहले जब लोग अपना खुद का घर बनाते थे, तो वह दो-तीन पीढ़ियों तक खड़ा रहता था। वहीं, हाईराइज बिल्डिंग्स की उम्र 70 से 80 साल तक बताई जाती है, लेकिन असल में ये 30 से 40 साल में ही जर्जर होने लगती हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि बड़ी इमारतों को ज्यादा समय तक अच्छी हालत में बनाए रखने के लिए लगातार मरम्मत और देखरेख की जरूरत पड़ती है, लेकिन भारत जैसे देशों में यह आसान काम नहीं है। ऐसे में यह इमारतें सिर्फ उनके लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए बोझ बन सकती हैं।

बिजली, पानी, लकड़ी का बड़ा हिस्सा खप रहा है इन इमारतों में

'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट’ (CSE) की एक रिसर्च रिपोर्ट के मुताबिक इन बिल्डिंग्स को बनाने में ही देश का 40 फीसदी कार्बन उत्सर्जन होता है, 30 फीसदी सॉलिड वेस्ट निकलता है और करीब 20 फीसदी पानी की खपत होती है। देश की 40 फीसदी बिजली इन इमारतों में खप जाती है।

सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड ने हरियाणा के जिन इलाकों को डार्क जोन घोषित कर दिया है, वहां भी हाईराइज इमारतों का निर्माण धड़ल्ले से जारी है। यह भी बता दें कि दुनिया की 25 फीसदी लकड़ी सिर्फ कंस्ट्रक्शन सेक्टर में खप रही है।

हर साल निकलता है लाखों टन मलबा लेकिन रिसाइकलिंग नहीं के बराबर

नोएडा के ट्विन टावर को तोड़ने से करीब 80 हजार टन मलबा निकला है। पूरे देश में लगातार बिल्डिंग बनाई और तोड़ी जा रही हैं। इमारतों के बनाने और बिगाड़ने के इस फेर में लाखों टन मलबा पैदा होता है। इस मलबे को कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन वेस्ट कहते हैं। यही मलबा हमारे पर्यावरण और हमारी सेहत के लिए बड़ी मुसीबत बन जाता रहा है।

पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था CSE ने साल 2020 में इस मलबे पर एक रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट में ‘बिल्डिंग मैटीरियल प्रमोशन काउंसिल’ ने बताया कि भारत में इमारतों के बनने और उन्हें तोड़ने से हर साल करीब 1500 लाख टन मलबा निकलता है।

लेकिन, इस मलबे को रिसाइकल करने की हमारी क्षमता महज 6,500 टन है। यानी सिर्फ एक फीसदी मलबा। बाकी 99 फीसदी मलबा लैंडफिल, खुले मैदान में जहां-तहां ठिकाने लगा दिया जाता है। फिर इस मलबे में मौजूद धूल, हवा और पानी में घुलकर प्रदूषण फैलाती है। यह तो सरकारी आंकड़े हैं, रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पूरे देश में इससे 3 से 5 गुना तक ज्यादा मलबा निकलता है।

दिल्ली में बना था कंस्ट्रक्शन वेस्ट को रिसाइकल करने वाला देश का पहला प्लांट

इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने 2016 में ‘सी एंड डी वेस्ट मैनेजमेंट रूल’ लागू किया। इसके जरिए नियम बना दिया गया कि घर बनाते या तोड़ते समय जो मलबा निकलेगा, उसका निस्तारण करना जरूरी होगा। चाहे बिल्डर हो, आम आदमी हो या फिर कोई सरकारी विभाग, सबके लिए इस नियम को मानना अनिवार्य कर दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि मलबे को रिसाइकल कर उसका फिर से इस्तेमाल हो सके और साथ ही उसकी वजह से हो रहा प्रदूषण भी रुके।

नियम का पालन हो, इसके लिए देशभर में ‘सी एंड डी वेस्ट रिसाइकलिंग प्लांट’ भी बनाने थे। इस प्लांट में कंक्रीट के मलबे को बालू और बजरी में बदल दिया जाता है। 2017 तक देश के 53 शहरों में ऐसे प्लांट बनने थे, लेकिन 2020 तक सिर्फ 13 शहरों में ही प्लांट शुरू हो पाए।

भारत का पहला ‘सी एंड डी वेस्ट रिसाइकलिंग प्लांट’ 2009 में दिल्ली के बुराड़ी में बना था। सुप्रीम कोर्ट की बिल्डिंग के नए हिस्से को बनाने में ऐसी 18 लाख ईंटों का इस्तेमाल किया गया है, जो बुराड़ी रिसाइकलिंग प्लांट में तैयार हुई हैं।

बर्बाद हो रहे पानी के स्रोत, खत्म हो रही हरियाली

अब जब मलबे को रिसाइकिल करने के लिए कोई प्लांट ही नहीं है, तो नियम का पालन होता भी कैसे। जिन शहरों में प्लांट चालू हो गए हैं, वहां के लोगों को भी प्लांट के बारे में नहीं पता है, न ही इसके नियमों के बारे में कोई जानकारी है।

CSE ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि कंक्रीट, ईंट और मेटल के मलबे से हरियाली और पानी के स्रोत बर्बाद हो रहे हैं। दिल्ली-NCR में तो चोरी-छुपे कंस्ट्रक्शन का मलबा अरावली की पहाड़ियों से लेकर दूसरे कचरे के साथ लैंडफिल में फेंकने की शिकायतें आती रही हैं।

20 साल में घरों को तोड़कर बिल्डिंग बनाने की रफ्तार बढ़ी

भारत में बीते 2 दशक में रियल एस्टेट सेक्टर में बूम आया है। खासकर हाईराइज बिल्डिंग्स तेजी से बनाई जा रही हैं। इसके लिए दिल्ली, मुंबई से लेकर देश के हर हिस्से में इमारतें तोड़ी जा रही हैं। फिर भले ही उनकी हालत ठीक हो। पुराने घरों को तोड़कर उनकी जगह बहुमंजिला इमारतें बन रही हैं।

पुरानी इमारतें तोड़ने और नई बनाने के सिलसिले में बेहिसाब मलबा भी निकल रहा है। कचरा कैसा भी हो, उसे इधर-उधर ठिकाने लगाया जाएगा, वहां मुसीबत आएगी ही। कुछ ऐसा ही हाल मुंबई का है।

मुंबई में वेटलैंड में ही डंप हो रहा मलबा

मुंबई के बाहरी हिस्से में एक डंपिंग ग्राउंड है। नाम है देवनार। 2008 में वहां आए दिन आग लगने लगी। जून 2019 में डाउन टु अर्थ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी घटनाएं देख हाई कोर्ट सख्त हो गया। कोर्ट ने देखा कि BMC वहां मलबे के निस्तारण के नियमों का पालन नहीं कर रही थी। हाई कोर्ट ने उस इलाके में नए कंस्ट्रक्शन पर रोक लगा दी। इसके बाद वसई और ठाणे के आसपास वेटलैंड में लोगों ने कंक्रीट का मलबा फेंकना शुरू कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ कंस्ट्रक्शन से बैन हटाया तो सरकार ने वेटलैंड वाले इलाकों में मलबा डंप करने के लिए एक तरह से कानूनी अनुमति दे दी। अब शहर में 10 डंपिंग साइट्स हैं और सारी की सारी वेटलैंड वाले इलाके में ही हैं। जिसका बुरा असर वहां पड़ रहा है। वेटलैंड भूगर्भ जलस्तर बनाए रखने, धरती की उवर्रता बनाए रखने में मदद करता है। कंक्रीट का मलबा फेंकने से वेटलैंड के साथ ही वहां का ईकोसिस्टम भी तबाह हो जाता है, जिसमें ढेरों जीवों व वनस्पतियों को पनाह मिलती है।

पर्यावरण के साथ ही सेहत के लिए भी है घातक

कंस्ट्रक्शन वेस्ट से निकलने वाले मलबे में कुछ घातक चीजें भी होती हैं। जो पानी और मिट्‌टी के जरिए पर्यावरण के साथ ही स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए इसकी रिसाइकिलिंग में की गई लापरवाही भारी पड़ सकती है। शीशा, एस्बेटस, पेंट और घुलनशील केमिकल, ग्लू, और टार जैसी तमाम चीजें इस मलबे में होती हैं।

खाली ड्रम, शीशे वाला सामान, लैंप और लाइट बल्ब में मौजूद मर्करी, थिनर, सिलिका, क्रोमियम, कैडमियम के साथ ही कई ऐसी हैं, जिन्हें मलबे से अलग करना जरूरी होता है। इनके संपर्क में आने से त्वचा और सांस से जुड़ी परेशानियां, पैरालिसिस, एनीमिया, डरमेटाइटिस जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इनमें सिलिका, आर्सेनिक, क्रोमियम सबसे घातक हैं।

सिलिका के संपर्क में आने से लाइलाज रोगों के होने का खतरा रहता है। अकेले अमेरिका में ही 20 लाख से ज्यादा वर्कर काम के दौरान सिलिका की चपेट में आ चुके हैं। अनुमान है कि भारत में एक करोड़ से ज्यादा मजदूर सिलिका के संपर्क में आकर बीमार हैं। इनमें से हजारों मजदूर हर साल टीबी और कैंसर जैसी बीमारियों से जान गंवा देते हैं।

ऊंची इमारतें हवा का बहाव रोक लेती हैं। इनसे तापमान और प्रदूषण भी बढ़ता है। जानते हैं कैसे…

CSE में ‘सस्टेनेबल बिल्डिंग एंड हैबिटाट प्रोग्राम’के प्रोग्राम डायरेक्टर रजनीश सरीन ने बताया कि आमतौर पर हाईराइज बिल्डिंग को ज्यादा बेहतर माना जाता है। दूसरे विकल्पों पर ध्यान दिए बिना सबका फोकस इसी बात पर आकर ठहर गया है। जबकि, हाईराइज बिल्डिंग्स से पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचता है। हाईराइज बिल्डिंग्स में ‘एयर लॉक’ हो जाती है। हवा का बहाव थम सा जाता है। इससे प्रदूषण बढ़ाने वाले तत्व दूर नहीं जा पाते और प्रदूषण स्तर बढ़ता है। हवा थमने का असर तापमान पर भी पड़ता है और तापमान बढ़ता है। ऐसी स्थिति में लोग एयरकंडीशनर का सहारा लेने तो को मजबूर होते हैं या फिर उनकी तबीयत खराब होती है।

हाईराइज इमारतों के साथ दूसरी सबसे बड़ी समस्या है कि ‘एयर लॉक’ की तरह ही इनके अंदर हीट भी लॉक हो जाती है। पहले जब लो राइज यानी एक-दो फ्लोर वाले मकान होते थे, तब रात में छत पर सोते समय ठंडक महसूस होती थी। ऐसा इसलिए होता था, क्योंकि रात में आसमान आसपास की गर्मी को सोख लेता था। आसमान एक तरह से ‘यूनिवर्सल हीट ऑब्जॉर्बर’ का काम करता है। अब 24-30 मंजिल की बिल्डिंग्स बन गई हैं। नीचे की मंजिलों और आसमान के बीच संपर्क कम हो गया है। ऐसे में नीचे के फ्लोर पर हीट लॉक हो जाती है। जिससे गर्मी बढ़ती है।

तीसरी मुख्य बात यह है कि ऐसा माना जाता है कि हाईराइज बनाने से जगह की बचत होगी, लेकिन कई रिसर्च में यह बात साफतौर पर सामने आई है कि जैसे-जैसे बिल्डिंग की ऊंचाई बढ़ती है, वैसे-वैसे जगह की जरूरत भी बढ़ती जाती है। यह सोच गलत है कि हाईराइज से जगह की बचत होती है।

चौथी समस्या ऊर्जा की खपत से जुड़ी है। ज्यादा बड़ी बिल्डिंग बनाने के लिए बड़ी मशीनों की जरूरत होती है। उन्हें चलाने के लिए उतनी ही ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ती है। उतना ही ज्यादा कार्बन उत्सर्जन भी होता है। ऊपर की मंजिलों तक पानी पहुंचाने के लिए पंपिंग मशीनों को भी ज्यादा पावर चाहिए। लिफ्ट में भी बिजली की ज्यादा खपत होती है। इस तरह, हाईराइज में बिजली की खपत कई गुना बढ़ जाती है।

जब एकसाथ बूढ़ी होंगी बहुत सी इमारतें...

अभी दिल्ली-NCR, मुंबई से लेकर देश के हर बड़े शहर में बड़े पैमाने पर हाईराइज बिल्डिंग्स बनाई जा रही हैं। चिंता का विषय यह है कि एक ही समय में बनी बिल्डिंग्स एक साथ बूढ़ी होंगी, और तब जब उन्हें तोड़ने की बारी आएगी, तो एक बड़ी चुनौती देश के सामने खड़ी हो जाएगी। इस मलबे को कैसे और कौन निपटाएगा?

आपने हाइराइज बिल्डिंग्स के बारे में पढ़ा। इस पोल में वोट देकर जाते-जाते हमसे अपनी राय भी साझा करते जाइए...

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