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मुंबई हमले से अमेरिका ने सीखा सबक:न्यूयॉर्क में चप्पे-चप्पे पर तैनात प्राइवेट गार्ड्स; भारत में 1 लाख लोगों पर बस 155 पुलिसकर्मी

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: मनीष तिवारी
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14 साल पहले, ठीक आज ही के दिन लश्कर-ए-तैयबा से प्रशिक्षण और हथियार लेकर आए आतंकियों ने मुंबई में हमला कर दिया। 4 दिन तक हमलावर मुंबई के साथ ही पूरी दुनिया को दहलाते रहे। सुरक्षाकर्मियों ने जब आतंकियों के आखिरी गुट को होटल ताज में खत्म किया, तब तक 160 से ज्यादा जानें जा चुकी थीं, सैकड़ों लोग घायल हो चुके थे।

1 महीने बाद जब भारत-पाकिस्तान में मुंबई हमले को लेकर जुबानी जंग चल रही थी, ठीक उसी समय अमेरिका ने इस पर एक रिपोर्ट बना ली। यूनाइटेड स्टेट्स सीनेट की 'होमलैंड सिक्योरिटी एंड गवर्नमेंटल अफेयर्स' की कमेटी के सामने जनवरी, 2009 में दो हिस्सों में पेश की गई इस रिपोर्ट का नाम था- 'लेसन्स फ्रॉम मुंबई टेररिस्ट अटैक्स।'

जैसा कि इस नाम से जाहिर है, अमेरिका ने मुंबई हमलों से सबक सीखने के लिए यह रिपोर्ट तैयार करवाई थी, ताकि ऐसे आतंकी हमलों से बचाव के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें।

यह रिपोर्ट कैसे बनी और अमेरिका ने क्या कदम उठाए, इसकी कहानी हॉलीवुड फिल्मों से कम रोमांचक नहीं है, लेकिन उससे पहले जानें कितना बड़ा था यह आतंकी हमला:

हमला खत्म होते ही अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों ने शुरू कर दी जांच

हमला खत्म होने के 3 दिन बाद, 2 दिसंबर को अमेरिकी इंटेलिजेंस एजेंसियों के लिए काम करने वाला एक शख्स मुंबई पहुंचा। 5 दिसंबर को अमेरिका की इंटेलिजेंस डिविजन ने एक रिपोर्ट तैयार की, जिसे FBI के साथ शेयर किया गया। फिर उसी सुबह न्यूयॉर्क पुलिस के एक खास प्रोग्राम 'शील्ड' (स्ट्रैटिजिक होम इंटरवेंशन एंड अर्ली लीडरशिप डिवेलपमेंट प्रोग्राम- SHIELD) की स्पेशल मीटिंग बुलाई गई।

प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसियों से मजबूत हुई न्यूयॉर्क पुलिस की SHIELD

SHIELD के तहत न्यूयॉर्क में काम करने वाले 3000 प्राइवेट सिक्योरिटी मैनेजर्स और पुलिस एक साथ काम करते हैं। इस मीटिंग के दौरान मुंबई में मौजूद अमेरिकी इंटेलिजेंस टीम के लीडर से बात की गई, जिसने उन्हें उन सभी लोकेशन के फोटो, मैप की डिटेल्स मुहैया करवाईं, ताकि अमेरिका में बैठे एक्सपर्ट्स आतंकी हमले के पूरे सीन को समझ सकें और लूप होल्स का पता लगा सकें।

होटलों में लगे सुरक्षा उपकरण इस्तेमाल करना नहीं जानते थे गार्ड

इस रिपोर्ट में बताया गया कि आतंकी किसी भी देश में घुसपैठ करने के लिए हमेशा सबसे कमजोर पॉइंट खोजते हैं। लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इसीलिए भारत में पानी के रास्ते घुसने का विकल्प चुना, जहां की सुरक्षा सबसे कमजोर थी। 2008 में ही मुंबई के कई होटलों ने सिक्योरिटी स्कैनिंग डिवाइस लगवाई थीं, लेकिन हमले के वक्त न तो वे मशीनें काम कर रही थीं और न ही वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों को उन्हें चलाना आता था।

अमेरिका में सीनेट की कमेटी के सामने 8 जनवरी और 28 जनवरी, 2009 को इंटेलिजेंस रिपोर्ट पेश की गई थी:

सबसे पहले होटल के गार्ड से हुआ था आतंकियों का सामना

इसी तरह, फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 26/11 हमले के बाद पहली बार प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स की जरूरत पर ध्यान गया। जब आतंकियों ने होटल ताज पर हमला किया, तो वहां सबसे पहले उनका मुकाबला ताज में तैनात गार्ड्स से हुआ, लेकिन प्रशिक्षित आतंकियों के सामने वह टिक नहीं सके।

हमले के बाद एक्सपर्ट्स ने कहा कि अगर गार्ड्स को पहले से ट्रेनिंग मिली होती और उनके पास जरूरी हथियार होते, तो वो आतंकियों को कुछ देर रोकने और लोगों को अलर्ट करने का काम करते। इससे इतनी जानें नहीं जातीं और न ही इतना ज्यादा नुकसान होता।

देश की सुरक्षा के लिए प्राइवेट एजेंसियों का साथ जरूरी

अमेरिका की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसियों के गार्ड्स को ट्रेनिंग देना बहुत जरूरी है, क्योंकि किसी भी खतरे का सामना सबसे पहले उन्हें ही करना होता है। इन गार्ड्स को ट्रेनिंग देश की सुरक्षा के लिए भी जरूरी बताई गई। रिपोर्ट में अमेरिका की सुरक्षा के लिए प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसियों के साथ पार्टनरशिप पर काफी फोकस किया गया।

जासूसों ने न्यूयॉर्क के चप्पे-चप्पे की जांच कर खोजे खतरे के निशान

SHIELD की स्पेशल मीटिंग के बाद न्यूयॉर्क पुलिस के जासूसों ने वहां की कंपनियों, होटलों समेत उन सारी जगहों पर हजारों बार दौरे किए, जहां आतंकी हमला कर सकते थे। इन जासूसों ने हर लोकेशन के चप्पे-चप्पे पर मौजूद कमियों का पता लगाया। संदिग्धों को पहचानने, हमले को रोकने से लेकर बंधकों को छुड़ाने तक के लिए जरूरी कदम उठाने के लिए वहां के कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी गई।

अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसियों का रोल अहम है।

अमेरिका ने सुरक्षा तंत्र के बूते 1 महीने में मजबूत कर ली अपनी सुरक्षा व्यवस्था

इस एक्सरसाइज में अमेरिका की खुफिया एजेंसियों और पुलिस ने प्राइवेट सुरक्षा एजेंसियों के साथ जी-तोड़ मेहनत की। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि SHIELD की तरह ही दूसरे प्रोग्राम्स के जरिए प्राइवेट एजेंसियों के साथ पुलिस पहले से काम कर रही है। प्राइवेट एजेंसियों के CCTV कैमरों तक पुलिस का सीधा एक्सेस है, जिससे जरूरत के समय अपराधियों और संदिग्धों की निगरानी में मदद मिलती है।

अपने इसी मजबूत तंत्र के बूते अमेरिका ने मुंबई हमले के बाद 1 महीने में हमले से जुड़ी सारी डिटेल्स जुटा लीं, कमजोर कड़ियों का पता लगा लिया, फिर अमेरिका में भी उन सभी लूप होल्स को खोजकर लोगों को ट्रेनिंग देने के साथ इस पूरी एक्सरसाइज की रिपोर्ट भी तैयार कर ली।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर अमेरिका जैसे ताकतवर देश में पुलिस से लेकर खुफिया एजेंसियों तक को प्राइवेट गार्ड्स की मदद क्यों लेनी पड़ रही है।

भारत में 1 लाख लोगों की रक्षा के लिए सिर्फ 155 पुलिसकर्मी

इस सवाल का जवाब है पुलिस और दूसरे सुरक्षा बलों की कमी। अमेरिका से लेकर भारत तक प्राइवेट गार्ड्स की संख्या पुलिसकर्मियों से कहीं ज्यादा है। भारत में तो 1 लाख लोगों की सुरक्षा के लिए करीब 155 पुलिसकर्मी ही नियुक्त हैं। इनमें से भी ढेरों पुलिसकर्मी VVIP सुरक्षा और ऐसे ही दूसरे कामों में लगाए गए हैं। यह कमी निजी सुरक्षाकर्मियों को बेहतर ट्रेनिंग देकर पूरी की जा सकती है।

देश में पुलिस फोर्स कम होने के कारण सुरक्षा व शांति व्यवस्था बनाए रखना कठिन हो गया है:

40 से अधिक देशों में पुलिस से ज्यादा प्राइवेट गार्ड्स

द गार्जियन की एक रिसर्च के मुताबिक धरती की आधी आबादी ऐसे देशों में रह रही है, जहां प्राइवेट सिक्योरिटी वर्कर्स की संख्या पुलिसकर्मियों की संख्या से ज्यादा है। 2017 में पूरी दुनिया में 2 करोड़ से ज्यादा प्राइवेट गार्ड्स थे। अमेरिका, चीन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे 40 से अधिक देशों में लोगों और जगहों की सुरक्षा के लिए पुलिस से ज्यादा निजी सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति की जाती है।

भारत सहित इन सभी देशों में प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स की संख्या पुलिस फोर्स से कहीं ज्यादा है। द गार्जियन की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में चीन में कुल 26,90,000 पुलिसकर्मी थे, जबकि वहां 50 लाख से ज्यादा प्राइवेट गार्ड तैनात थे। इसी तरह, ब्रिटेन में प्राइवेट गार्ड्स की संख्या पुलिस से दोगुनी थी।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक देश में प्राइवेट गार्ड्स की संख्या लगातार बढ़ रही है:

स्पेन, इटली में पुलिस की तरह पहनते हैं वर्दी, रखते हैं पिस्टल

स्पेन, इटली जैसे कई देशों में प्राइवेट गार्ड्स पुलिस की तरह वर्दी पहनने से लेकर पिस्टल तक रखते हैं। उनके ऊपर सिलेब्रिटीज और महत्वपूर्ण इमारतों से लेकर सार्वजनिक सड़कों, शॉपिंग मॉल्स तक की सुरक्षा का जिम्मा होता है।

भारत की तरह ही अल सल्वाडोर, वियतनाम जैसे तमाम देशों में पॉश रिहायशी बिल्डिंग्स 24 घंटे गार्ड के पहरे में रहती हैं। अरबपतियों की गेटेड सोसाइटी में एंट्री-एग्जिट बिना इन गार्ड्स की परमिशन के संभव नहीं है। खतरों को सूंघ लेने वाले स्निफर डॉग्स, मेटल डिटेक्टर और दूसरे हाईटेक सुरक्षा उपकरणों से लैस प्राइवेट गार्ड्स लग्जरी होटेल्स की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखते हैं।

अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों में लोग रात के समय पेट्रोलिंग के लिए सिक्योरिटी एजेंसियां रखने लगे हैं, ताकि पुलिस के न होने पर भी उनका इलाका सुरक्षित रहे। सिक्योरिटी फर्म इसके लिए 20 से 25 डॉलर प्रति घंटे तक चार्ज करती हैं।

यही वजह है कि दुनिया भर में प्राइवेट सिक्योरिटी मार्केट तेजी से बढ़ता जा रहा है:

हेल्थ इंश्योरेंस की तरह लोग खरीदते हैं प्रोटेक्शन पैकेज

विकसित देशों में प्राइवेट हेल्थ इंश्योरेंस की तरह लोग सेफ्टी के लिए प्राइवेट एजेंसियों की सर्विस सब्सक्राइब कर रहे हैं। यही वजह है कि वहां सुरक्षा मुहैया कराने वाली कंपनियां सुपर रिच लोगों को पर्सनल प्रोटेक्शन पैकेज भी बेचती हैं।

उदाहरण के तौर पर, लंदन की एक कंपनी वेस्टमिन्स्टर सिक्योरिटी अपने हाई नेटवर्थ वाली कंपनियों, धनकुबेरों और उनके परिवारों को सेफ्टी के साथ लाइफस्टाइल मैनेजमेंट का ऑफर भी देती हैं, अपने विज्ञापनों में इस बात पर जोर देती हैं कि उसके कर्मचारियों में पुलिस और मिलिट्री बैकग्राउंड वाले लोग शामिल हैं।

इसी तरह, 170 साल से ज्यादा पुरानी अमेरिकी कंपनी पिंकर्टन के तेज तर्रार एजेंट्स 'फॉर्च्यून 100' में शामिल CEO और उनकी कंपनियों के साथ ही खेल और मनोरंजन की दुनिया के कई सिलेब्रिटीज, शाही परिवारों और डिप्लोमैट्स की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। पिंकर्टन का मोटो है- "we never sleep"।

भारत में हवाई अड्‌डों की सुरक्षा व्यवस्था संभाल रहे प्राइवेट गार्ड

गृह मंत्रालय और इंटेलिजेंस एजेंसियों की बैठक के बाद देश के कई हवाई अड्‌डों पर अब CISF के साथ प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड भी तैनात किए जाने लगे हैं। इसके लिए इंटेलिजेंट गार्ड ही चुने जाते हैं। एविएशन सिक्योरिटी के लिए जिम्मेदार नोडल एजेंसी ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन सिक्योरिटी (BCAS) ने इसी साल अगस्त में इसके लिए निर्देश जारी किए हैं।

CISF के जवान कोर एरिया की सुरक्षा संभाल रहे हैं, तो प्राइवेट गार्ड्स को नॉन-कोर एरिया में तैनात किया जा रहा है। नई दिल्ली स्थित हवाई अड्‌डे पर भी इन गार्ड्स को कार्गो टर्मिनल और टर्मिनल-1 व 2 पर यात्रियों की भीड़ को मैनेज करने की जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन, तैनाती से पहले CISF की देखरेख में इन्हें भी CISF जवानों की तरह ही कड़ी ट्रेनिंग दी जा रही है। देश में CISF जवानों की कमी के चलते यह कदम उठाया गया है।

बात प्राइवेट गार्ड्स की हो रही है, तो क्या आपको यह पता है कि सबसे ज्यादा प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसियां किस राज्य में हैं:

खुद की और दूसरों की जान बचाने के लिए दी जाती है ट्रेनिंग

सेंट्रल एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट सिक्योरिटी इंडस्ट्री (CAPSI) के चेयरमैन कुंवर विक्रम सिंह ने बताया कि गार्ड फायर फाइटिंग में ट्रेंड होते हैं। आग लगने पर लोगों की जान बचाने, आग बुझाने और सिचुएशन को कंट्रोल करने में मदद करते हैं। पेट्रोलिंग से लेकर लोगों और सामान की जांच करने, सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने, निगरानी करने जैसे कामों के लिए ट्रेंड होते हैं।

गृह मंत्रालय, सुरक्षा व इंटेलिजेंस एजेंसियां भी प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसियों से सहयोग और इनपुट्स लेती हैं।

गार्ड बनने के लिए क्या हैं नियम

प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसीज रेगुलेशन एक्ट, 2005 के तहत इन एजेंसियों की निगरानी की जाती है। इस एक्ट के अनुसार 18 से 65 साल की उम्र तक के लोग प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड बन सकते हैं। हर गार्ड के लिए 160 घंटे की ट्रेनिंग जरूरी है। 100 घंटे की ट्रेनिंग में क्लासरूम लर्निंग और 60 घंटे ऑन जॉब ट्रेनिंग जरूरी होती है। ट्रेनिंग का सिलेबस भारत सरकार ने तय कर रखा है।

पूरी छानबीन के बाद एजेंसियों को मिलता है लाइसेंस

प्राइवेट एजेंसियों के लिए हर राज्य सरकार अपने प्रदेश में एक कंट्रोलिंग अथॉरिटी नियुक्त करती है। आमतौर पर यह कंट्रोलिंग अथॉरिटी उस प्रदेश का ज्वाइंट सेक्रेटरी होता है या फिर एडीजीपी लॉ एंड ऑर्डर। सिक्योरिटी एजेंसी, उसे चलाने वाले लोगों और उनके बैकग्राउंड की पूरी छानबीन के बाद लाइसेंस जारी किया जाता है।

निजी सुरक्षा एजेंसियों के लिए रजिस्ट्रेशन कराना और लाइसेंस लेना अनिवार्य है:

हॉलमार्क की तरह BIS ने बनाया 'सिक्योरिटी मार्क'

CAPSI के चेयरमैन कुंवर विक्रम सिंह ने बताया कि अभी तक ट्रेनिंग के लिए मानक तय नहीं थे। इसलिए प्रशिक्षण के स्टैंडर्ड में कमी रह जाती थी। इसे देखते हुए भारत सरकार ने ‘द ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स’ (BIS) को प्राइवेट सिक्योरिटी गार्ड्स और अफसरों की ट्रेनिंग के लिए स्टैंडर्ड्स तय करे।

BIS ने देश की सभी प्राइवेट सुरक्षा एजेंसियों और उनकी सर्विस लेने वालों के साथ मिलकर इंटरनेशनल स्टैंडर्ड IS-ISO 18788 के आधार पर भारत के लिए मानक तय किए। भारत सरकार की तरफ से जल्द ही इसे लागू किया जाएगा।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक नए स्टैंडर्ड लागू होने के बाद न सिर्फ गार्ड्स को बेहतर प्रशिक्षण मिल सकेगा, बल्कि इस सेक्टर में भी बूम आएगा:

ट्रेनिंग के बाद युवाओं के पास होंगे विदेश जाकर जॉब करने के मौके:

BIS की तरफ से तय स्टैंडर्ड के मुताबिक ट्रेनिंग लेने वाले गार्ड हर परिस्थिति से निपटने में दक्ष होंगे। उन्हें सर्टिफिकेट भी दिया जाएगा। इस सर्टिफिकेट के जरिए प्रशिक्षित युवा विदेश में भी नौकरी पा सकेंगे। दुनिया भर में सिक्योरिटी गार्ड्स की बहुत जरूरत है। ट्रेनिंग की नई व्यवस्था प्राइवेट सिक्योरिटी सेक्टर में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली साबित होगी। इससे सिक्योरिटी गार्ड्स की सैलरी भी बढ़ेगी और स्किल्स भी।

महाराष्ट्र और राजस्थान में सबसे ज्यादा ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट

प्राइवेट सिक्योरिटी वर्कर्स को ट्रेनिंग देने के लिए देशभर में कुल 121 ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट चल रहे हैं। सबसे ज्यादा 20-20 इंस्टीट्यूट महाराष्ट्र और राजस्थान में हैं। PSARA के मुताबिक सबसे पहले ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट का रजिस्ट्रेशन 1 जनवरी 2010 को हुआ था, जो अब बंद हो चुका है।

दमन-दीव के इस इंस्टीट्यूट से लेकर अब तक कुल 1009 संस्थान रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। जिनमें से 674 संस्थान अकेले तमिलनाडु से थे और अब इन सभी का रजिस्ट्रेशन एक्सपायर हो चुका है।

अभी तक कुल 888 प्रशिक्षण संस्थानों का रजिस्ट्रेशन एक्सपायर हो चुका है:

जम्मू कश्मीर, लद्दाख, लक्षद्वीप, नगालैंड में एक भी एजेंसी के पास लाइसेंस नहीं

गृह मंत्रालय के प्राइवेट सिक्योरिटी एजेंसी लाइसेंसिंग पोर्टल (PSARA) के मुताबिक जम्मू कश्मीर, लद्दाख और लक्षद्वीप में एक भी निजी सुरक्षा एजेंसी को लाइसेंस नहीं मिला है। जबकि, नगालैंड में रजिस्ट्रेशन कराने वाली सभी 8 एजेंसियों के लाइसेंस एक्सपायर हो चुके हैं। वहीं, ओडिशा और मणिपुर में एक भी एजेंसी का लाइसेंस एक्सपायर नहीं हुआ है। ओडिशा में 498 और मणिपुर में 13 एजेंसियों ने लाइसेंस लिए थे और सभी के लाइसेंस एक्टिव हैं।

गुजरात में सबसे ज्यादा प्राइवेट एजेंसियों के लाइसेंस एक्सपायर हो चुके हैं:

बिना लाइसेंस चलने वाली एजेंसियों से खराब होती है इमेज

रिहायशी कॉलोनियों के RWA पैसा बचाने के लिए सबसे खराब सिक्योरिटी एजेंसी को हायर करते हैं, जिनके गार्ड्स को कोई ट्रेनिंग नहीं मिली होती। वर्दी पहनाकर डंडा थमा देने से कोई सिक्योरिटी गार्ड नहीं बन जाता। ऐसे गार्ड्स को सैलरी भी बहुत कम मिलती है और शोषण का भी शिकार होना पड़ता है। इन एजेंसियों को भी लाइसेंस नहीं मिला होता है। इससे पूरे प्राइवेट सिक्योरिटी सेक्टर की इमेज खराब होती है।

बड़ी कंपनियां, होटल्स, कॉलेज, हॉस्पिटल, कॉरपोरेट सेक्टर में हमेशा ट्रेंड गार्ड ही रखे जाते हैं। वे मापदंड के हिसाब से ही चुने जाते हैं और जहां उन्हें तैनात किया जाता है, उस जगह के हिसाब से अलग से स्पेशल ट्रेनिंग भी दी जाती है। इन जगहों पर सिक्योरिटी मैनेजर्स भी आर्मी और पुलिस से रिटायर्ड हाई लेवल ऑफिसर होते हैं, जो हर स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था का ध्यान रखते हैं।

ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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