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ब्रेस्ट कैंसर पर होगा 'मॉलिक्यूल अटैक':देश में हर 29वीं महिला जूझ रही है इस जानलेवा बीमारी से, नई दवा देगी जिंदगी की आस

नई दिल्ली3 महीने पहले
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  • दुनिया में 6.85 लाख महिलाओं को गंवानी पड़ी है जान
  • इस साल ब्रेस्ट कैंसर के 23 लाख मामले आए सामने
  • 78 लाख महिलाएं बीते पांच साल से ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित

ब्रिटेन में कैंसर डिटेक्ट करने का रिवॉल्यूशनरी ब्लड टेस्ट का ट्रायल शुरू हो गया है। यह टेस्ट ब्रेस्ट कैंसर समेत 50 तरह के कैंसर को अर्ली स्टेज में पहचान सकता है। दो साल के ट्रायल के बाद इसके भारत आने की उम्मीद है। यह उम्मीद इसलिए भी है कि भारत में हर 29 महिलाओं में से एक ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रही है। द नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम इन इंडिया की एक रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है।

वहीं, एक भारतीय-अमेरिकी समेत कुछ वैज्ञानिकों की एक टीम ने ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में नई उम्मीद जगाई है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसे मॉलिक्यूल की पहचान की है, जो ब्रेस्ट कैंसर को तेजी से फैलने से रोक सकता है। इस मॉलिक्यूल से ऐसी दवाएं बनाई जा सकेंगी, जो ब्रेस्ट कैंसर से लड़ रहीं महिलाओं के लिए वरदान साबित होंगी।

भारत में पिछले कुछ समय से ब्रेस्ट कैंसर को लेकर जागरुकता बढ़ी है
भारत में पिछले कुछ समय से ब्रेस्ट कैंसर को लेकर जागरुकता बढ़ी है

ब्रेस्ट कैंसर को बढ़ाने वाले प्रोटीन पर करता है वार
रिसर्चर का कहना है कि ईआरएक्स-11 नाम का यह मॉलिक्यूल ओस्ट्रेजन सेंसिटिव ब्रेस्ट कैंसर की रफ्तार थामेगा। यह बेहद खास तरीके से काम करता है। यह टयूमर सेल्स के ओस्ट्रेजन रिसेप्टर के प्रोटीन को निशाना बनाता है। इस मॉलिक्यूल वाले ड्रग से उन मरीजों को फायदा पहुंच सकता है, जिनके ब्रेस्ट कैंसर पर परंपरागत इलाज बेअसर रहता है। सिमंस कैंसर सेंटर में यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस साउथवेस्टर्न में प्रोफेसर गणेश राज के मुताबिक, यह बेहद अनोखा है, जाे ओस्ट्रेजन रिसेप्टर पर लगाम लगाता है। जो अभी इलाज चल रहे हैं, उनमें यह बेहतरीन है। सभी ब्रेस्ट कैंसर में से करीब 80 फीसदी ओस्ट्रेजन सेंसेटिव होते हैं। यही वजह है कि यह आगे चलकर घातक हो जाती है।

अक्सर दी जाने वाली हॉर्मोन थेरेपी भी कारगर नहीं
रिसर्चरों का कहना है कि ब्रेस्ट कैंसर का वैसे तो हॉर्मोन थेरेपी से इलाज किया जाता है। जैसे कि टैमोक्सीफेन से भी इलाज होता है। मगर, इनमें से एक तिहाई पर इस दवा का भी कोई असर नहीं होता है और मर्ज बढ़ता चला जाता है।

अभी दी जा रही दवाएं इस फॉर्मूले पर करती हैं काम
प्रोफेसर गणेश राज कहते हैं कि नया कंपाउंड बेहद कारगर है। मरीजों के इलाज में मील का पत्थर बनेगा। टैमोक्सीफेन जैसी परंपरागत हॉर्मोनल दवाएं कैंसर सेल्स में मौजूद ओस्ट्रेजन रिसेप्टर मॉलिक्यूल से जुड़ती हैं। फिर ये ओस्ट्रेजन को रिसेप्टर से अलग करने की कोशिश करती हैं, ताकि कैंसर सेल्स और न बंटें। हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान ओस्ट्रेजन रिसेप्टर इतना चालाक होता है कि यह खुद को बदल लेता है, ऐसे में दी गई दवा फिर बेअसर हो जाती है। इसके बाद कैंसर सेल्स फिर से बंटने लग जाते हैं, यानी टयूमर बढ़ने लग जाता है।

पहले से कितनी अलग है नई दवा, कितनी होगी कारगर
यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सस साउथवेस्टर्न के ही एक और प्रोफेसर डेविड मैंगल्सडोर्फ का कहना है कि जो दवा विकसित की जा रही है, उसमें ओस्ट्रेजन रिसेप्टर की चकमा देने की काबिलियत को ब्लॉक करने की क्षमता है। वह इसके अंदर के प्रोटीन को ही निशाना बनाती है, जिसमें कैंसर सेल्स के तेजी से बढ़ाने की जिम्मेदार है। इस मॉलिक्यूल को ईआरएक्स-11 नाम दिया गया है, जो कि एक पेप्टाइड है। यह प्रोटीन बनाने में अहम भूमिका निभाती है।

क्या कहते हैं डब्ल्यूएचओ के आंकड़े, महिलाओं की जान पर आफत
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में 6.85 लाख महिलाओं को जान गंवानी पड़ी है। इस साल करीब 23 लाख ब्रेस्ट कैंसर के मामले सामने आए हैं। वहीं, 78 लाख महिलाएं बीते पांच साल से ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित रही हैं। भारतीय महिलाओं में होने वाले कैंसर में 14 फीसदी ब्रेस्ट कैंसर है। 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में ब्रेस्ट कैंसर के 1.62 लाख नए केस दर्ज किए गए जबकि 87 हजार महिलाओं को जान गंवानी पड़ी।

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