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CJI की चिंता, न्यायपालिका में कम क्यों हैं महिलाएं:जानिए-देश की तीन सबसे ताकतवर संस्थाओं- ज्युडिशियरी, पार्लियामेंट और ब्यूरोक्रेसी में कितनी हैं महिलाएं

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: दिनेश मिश्र
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लोकतंत्र के तीनों स्तंभ में मह - Dainik Bhaskar
लोकतंत्र के तीनों स्तंभ में मह
  • देश की निचली अदालतों में 30 फीसदी से कम महिला जज, लंबित केस 3.9 करोड़
  • 17वीं लोकसभा में 78 महिलाएं संसद पहुंचीं, चुनाव मैदान में उतरी थीं 700 महिलाएं
  • UPSC परीक्षा में इस बार करीब 28 फीसदी महिलाएं सफल, बीते चार साल में ज्यादा

सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश (CJI) एनवी रमना ने महिलाओं को न्यायपालिका में 50 फीसदी रिजर्वेशन की उनकी मांग को जायज ठहराया है और उनका समर्थन करने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि देश में 17 लाख वकील हैं, मगर उनमें से महज 15 फीसदी ही महिला वकील हैं। वहीं, राज्यों की बार काउंसिल में चुने गए प्रतिनिधियों में से केवल 2 फीसदी ही महिलाएं हैं। सीजेआई रमना की यह चिंता बताती है कि आजादी के 70 साल बाद भी देश को चलाने वाली तीन सबसे अहम संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बेहतर नहीं हो पाई है। आज हम आपको बता रहे हैं कि देश की सबसे ताकतवर संस्थाओं यानी न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका में महिलाओं की भागीदारी कितनी है।

न्यायपालिका: करीब 4.5 करोड़ केस का बोझ, जितनी बड़ी कोर्ट- उतनी कम भागीदारी
देश की सर्वोच्च अदालत में कुल 33 जजों में से महज 4 ही महिलाएं हैं, जो करीब 11 फीसदी ठहरता है। वहीं, देश के सभी हाईकोर्ट में 11.5 फीसदी, जबकि निचली अदालतों में 30 फीसदी से भी कम महिला जज हैं। नेशनल ज्युडिशियल डाटा ग्रिड के मुताबिक, जिला और सबऑर्डिनेट्स कोर्ट में 3.9 करोड़ केस लंबित हैं। वहीं, हाईकोर्टों के समक्ष 58.5 लाख केस लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट की बात करें तो वहां पर 69,000 मामले लंबित हैं।

केस का बोझ ज्यादा तो इंसाफ में भी होगी देरी।
केस का बोझ ज्यादा तो इंसाफ में भी होगी देरी।

विधायिका: 33 फीसदी आरक्षण की मांग, 15 फीसदी भी नहीं है महिला सांसद
न्यायपालिका की तरह ही विधायिका में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बेहद कम है। आजादी के बाद संसद में जरूर महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, मगर आधी आबादी के लिहाज से बराबरी की हिस्सेदारी अब भी दूर की कौड़ी है। यह विधायिका में अभी 33 फीसदी आरक्षण की मांग से भी काफी कम है। मौजूदा 17वीं लोकसभा के लिए 8,000 से ज्यादा उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे थे, उनमें से 700 से ज्यादा महिलाएं थीं। इनमें से 78 महिलाएं ही संसद पहुंच पाईं। यह करीब 14.39 फीसदी है। यह 2014 के लोकसभा चुनाव से थोड़ा ज्यादा है, जब 62 महिलाएं यानी 12.5 फीसदी सांसद बनी थीं। वहीं, राज्यसभा में भी इस समय अभी 25 महिलाएं हैं, जो 10.2 फीसदी है। 2014 में उच्च सदन में रिकॉर्ड 31 महिलाएं यानी 12.7 फीसदी पहुंची थीं।

17वीं लोकसभा में महिलाओं की दमदार मौजूदगी।
17वीं लोकसभा में महिलाओं की दमदार मौजूदगी।

कार्यपालिका: UPSC में लड़कियों का परचम, मगर टॉप ब्यूरोक्रेसी में भागीदारी केवल 19 फीसदी
लोकतंत्र के बाकी दोनों पिलर्स की तरह ही कार्यपालिका में भी महिलाओं की भागीदारी बेहद मामूली है। संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा 2020 के हाल ही में आए नतीजों के मुताबिक, इस बार सभी कामयाब उम्मीदवारों में से 28.3 फीसदी महिलाएं हैं। यानी सफल उम्मीदवारों में से 545 पुरुष और 216 महिलाएं हैं। यह पिछले तीन वर्षों की तुलना में बेहतर है। 2017 में 24.2 फीसदी, 2018 में 23.9 और 2019 में 23.7 फीसदी महिलाएं यूपीएससी परीक्षा में सफल हुई थीं। 2019 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र सरकार में ज्वाइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर की ब्यूरोक्रेसी में 700 अफसर थे। इनमें से केवल 134 ही महिलाएं थीं, जो कुल का 19.14 फीसदी है।

सिविल सेवा महिलाओं का पसंदीदा क्षेत्र बन रहा है।
सिविल सेवा महिलाओं का पसंदीदा क्षेत्र बन रहा है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ...लड़ाई लंबी है, लोगों का माइंडसेट बदलने में लगेगा वक्त
दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर राजीव रंजन गिरि कहते हैं कि डेमोक्रेसी के तीनों पिलर्स में महिलाओं की भागीदारी बेहद कम होने के पीछे मौजूदा सामाजिक ढांचा है, जिससे समाज अभी उबर नहीं पाया है। अब भी समाज में पुरुषों की ही चलती है। विधायिका में देखें तो पार्टियां अब भी महिला उम्मीदवारों को कम टिकट देती हैं। वहीं, न्यायपालिका की बात करें तो समाज में वकालत की पढ़ाई से ज्यादा तवज्जो अब भी डॉक्टरी और इंजीनियरिंग की पढ़ाई को दी जाती है। अभी लड़ाई बहुत लंबी है, लोगों का माइंडसेट बदलने में वक्त लगेगा। वहीं, दिल्ली में वरिष्ठ वकील अनिल कुमार सिंह श्रीनेत कहते हैं कि ज्युडिशियरी में महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह एक अच्छा संकेत है। महिलाओं के आने से ज्युडिशियरी महिलाओं को लेकर ज्यादा संवेदनशील हुई है। कई ऐसे फैसले आए हैं, जिन्होंने नजीर बनाई है।