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राममंदिर चंदा कोराेना वैक्सीनेशन फंड से ज्यादा:3 लाख करोड़ की ‘टेंपल इकोनॉमी’ डिफेंस बजट के करीब, 'मिडडे-मील' से दोगुना 6 मंदिरों का चढ़ावा

नई दिल्ली7 दिन पहलेलेखक: संजीव कुमार
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आज ‘फुरसत का रविवार’ है। ईश्वर को याद किया क्या? नहीं, तो कोई बात नहीं। हम आपको घर बैठे मंदिरों, भक्तों और चढ़ावे की कहानी पढ़ाते हैं। वैसे तो धार्मिक आस्था के नाम पर दान देना किसी इंसान का निजी मामला होता है, लेकिन जब यह मामला देश के मंदिर, मस्जिद, चर्च और तमाम धर्मस्थलों की प्रसिद्धि और समृद्धि की तरफ बढ़ता है तो ये सरकारी नियम-कानूनों के दायरे में आने लगता है।

क्या आप जानते हैं कि राम मंदिर को मिलने वाला अब तक का चंदा कोरोना वेक्सीनेशन को इस बार मिले फंड से ज्यादा है। यही नहीं देश की टेंपल इकोनॉमी 3 लाख करोड़ के पार हो चुकी है। जो घरेलू डिफेंस बजट से कुछ ही कम है। साथ ही देश के छह मंदिरों में इतना चढ़ावा आता है जो इस बार मिड डे मील को मिले पैसों से भी दोगुना है। हाल ही में रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी 5 जी लॉन्च होने से पहले तिरुपति बालाजी मंदिर पहुंचे थे। उन्होंने मंदिर को 1.5 करोड़ रुपए दान दिया।

इस समय पूजा स्थलों के फंड पर सरकारी कंट्रोल को लेकर देश में बहस छिड़ी हुई है जो कि सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची है।

ऊपरी तौर पर देखा जाए तो यह मामला किसी तरह से उलझाऊ नहीं लगता, मगर जब तह तक पहुंचेंगे तो इसमें कई तरह के पेंच नजर आने लगेंगे। यही वजह है कि धार्मिक चंदे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय और कई धार्मिक संगठनों ने करीब 15 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की हैं। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म से जुड़े पूजा स्थलों के फंड पर सरकारी कंट्रोल है, जबकि मस्जिद, मजार और चर्च सहित दूसरे धार्मिक स्थलों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। ऐसा क्यों?

सबसे पहले इस ग्रैफिक के जरिए ये समझ लेते हैं कि आखिर देश में मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों की असल संख्या कितनी है।

इन याचिकाओं में कहा गया है कि सरकार का देश के 9 लाख मंदिरों में से 4 लाख मंदिरों पर नियंत्रण है। जबकि चर्च, मस्जिद, मजार और अन्य धार्मिक स्थलों पर कोई नियंत्रण नहीं है। याचिका में मांग है कि सभी धर्मों के लिए समान धार्मिक संहिता बननी चाहिए। अब सीजेआई यूयू ललित के नेतृत्व वाली बेंच इन याचिकाओं पर 19 सितंबर यानी सोमवार को सुनवाई करेगी।

खैर, यह तो बात हुई याचिका और उसकी सुनवाई की। इन याचिकाओं में बड़ा मुद्दा धर्मस्थलों को मिलने वाला चंदा है और हम आज फुरसत में इसी की बात करेंगे।

हैरान न हों, जानें डिफेंस बजट के बराबर है ‘टेंपल इकोनॉमी’

अब बात करते हैं ‘टेंपल इकोनॉमी’ के बारे में। यानी मंदिर में आने वाला चंदा और मंदिर का खर्च। यह इकोनॉमी भी देश की इकोनॉमी की तरह लगातार बढ़ रही है। देश में करीब 9 लाख रजिस्टर्ड मंदिर हैं जिनमें से 4 लाख मंदिरों में दिल खोलकर चढ़ावा आता है और उससे जुड़े लोगों का घर-बार भी चलता है।

यहां आपको ग्रैफिक के जरिए बताते चलें कि यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में कौन-कौन से मंदिर शामिल हैं।

नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन यानी NSSO के मुताबिक देश में ‘टेंपल इकोनॉमी’ 3.02 लाख करोड़ रुपए (40 बिलियन डॉलर) की है। इसमें फूल, तेल, घी, दीपक, चूड़ियां, सिंदूर, मूर्तियां, तस्वीरें, पोशाक समेत पूजा-अर्चना की सभी चीजें शामिल हैं। अगर देश के लिए रक्षा साजो-सामान के आयात की राशि यानी 1 लाख 52 हजार 3 सौ 69 करोड़ रुपए न शामिल की जाए तो ‘टेंपल इकोनॉमी’ देश के इस वर्ष के डिफेंस बजट (3.7 लाख करोड़ रुपए) के लगभग बराबर हो गई है।

यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में देश के मंदिर ही नहीं कुछ चर्च और मस्जिदें भी शामिल हैं जैसे कि इस ग्रैफिक से पता चल रहा है।

अयोध्या के राममंदिर का चंदा कोविड वैक्सीनेशन को दी गई रकम से ज्यादा

केंद्र सरकार ने देश में कोविड वैक्सीनेशन के लिए 5000 करोड़ रुपए दिए। इससे ज्यादा रकम राममंदिर निर्माण के लिए अब तक चंदे में मिली है। राममंदिर निर्माण के लिए राममंदिर ट्रस्ट को मिले चंदे की बात करें तो यह अब तक 5,500 करोड़ रुपए के पार पहुंच गया है।

‘मिडडे मील’ में केंद्र सरकार के बजट से ढाई गुना ज्यादा 6 मंदिरों का चंदा

इतना ही नहीं, यह देश के डिफेंस बजट (करीब 5,25,166 करोड़ रुपए) के 1 फीसदी से ज्यादा है। और तो और सरकारी स्कूलों में चलने वाली ‘मिडडे मील’ योजना का पूरे साल का जितना बजट केंद्र सरकार की तरफ से इस बार बना है, यह रकम उसकी आधी है।

अब इस ग्रैफिक के जरिए समझिए कि देश के पांच बड़े मंदिर कितना सालाना चंदा हासिल कर रहे हैं।

आम बजट 2022-23 में स्कूलों में चलाए जाने वाले ‘मिडडे मील’ कार्यक्रम में केंद्र सरकार ने 10,234 करोड़ रुपए दिए हैं। इसका करीब ढाई गुना यानी करीब 24 हजार करोड़ रुपए तो देश के महज छह बड़े मंदिरों को सालाना चंदा मिल जाता है।

ये तो हुई सालाना चंदे की बात। अब बात करते हैं मंदिरों में रखी अकूत दौलत की। इन मंदिरों के पास सोने के इतने बड़े भंडार हैं कि लगता है, ‘सोने की चिड़िया’ आज भी वहीं रहती है।

भारत सरकार के कुल स्वर्ण भंडार का छठा हिस्सा मंदिरों के पास

हमारे देश के बारे में कहा जाता है कि हम ‘गोल्ड प्रेमी’ हैं। ये सिर्फ कहने भर की बात नहीं है, गोल्ड ज्वेलरी के इस्तेमाल में हम पूरी दुनिया में सबसे आगे हैं। हम तो सोना पहनते, सहेजते और रखते हैं, लेकिन हमारे भगवान को भी सोना बेहद पसंद है। तभी तो देश के कुल स्वर्ण भंडार का छठा हिस्सा मंदिरों में है।

इतना ही नहीं, देश में लोग धार्मिक यात्राओं पर सबसे ज्यादा खर्च करते हैं। यहां समझिए प्रति व्यक्ति के हिसाब से टैवल का गणित।

‘वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल’ की रिपोर्ट 2020 के मुताबिक भारत के पास 24 हजार टन स्वर्ण भंडार है, जिसमें से 4 हजार टन सोना मंदिरों में है। अब तो हर साल एक हजार टन सोना इस देश में बाहर से मंगाया जा रहा है। बाहर से आए इस सोने का बड़ा हिस्सा धर्मस्थलों पर चढ़ावे की शक्ल में जाता है।

हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध पूजास्थलों पर लागू हैं 35 कानून

याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने दैनिक भास्कर को बातचीत में बताया कि हिंदुओं के पूजास्थलों को लेकर 35 कानून लागू हैं जो कि संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का सीधे-सीधे उल्लंघन है।

अब यहां ग्रैफिक्स के जरिए जानते हैं कि मंदिर प्रबंधन को लेकर किस राज्य में कितने कानून मौजूद हैं।

सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि यह अंग्रेजों के समय का कानून है। सरकार दूसरे धार्मिक स्थलों को अपने नियंत्रण में क्यों नहीं लेना चाहती है?

अब आपको एक प्यारी बात बताते हैं। हमारे देश में ऐसे मुस्लिम शासक भी हुए, जिन्होंने मंदिरों के रख रखाव के लिए खुलकर दान दिया।

हैदराबाद के कंजूस निजाम ने दिया तिरुपति बालाजी मंदिर को दान

आपने मुस्लिम शासकों के आक्रमणों, मंदिरों को तोड़ने और लूटने की बहुत कहानियां सुनी होंगी, लेकिन इसी देश में कई मुस्लिम शासक ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने हिंदुओं की धार्मिक आस्थाओं का सम्मान किया और मंदिरों-मठों को दान भी दिया। इन बादशाहों में अकबर, जहांगीर, शाहजहां और हैदराबाद के निजाम उस्मान अली शामिल हैं।

‘वृंदावन रिसर्च इंस्टीट्यूट’ में मौजूद डॉक्यूमेंट से इस बारे में कई जानकारियां मिलती हैं। इन डॉक्यूमेंट को ‘इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस’ के 48वें और 49वें सत्र में जाने-माने इतिहासकार तारापड़ मुखर्जी और इरफान हबीब ने पेश किया था। इनके मुताबिक अगस्त-सितंबर 1598 के अपने फरमानों में मुगल शासक अकबर ने वृंदावन, मथुरा और आस-पास के क्षेत्र में मौजूद मंदिरों के लिए कई दान दिए और 121 बीघा भूमि भी दी। इसके बाद जहांगीर ने भी इसे बरकरार रखा और उसने 1620 में वृंदावन मंदिर में जाकर श्रीकृष्ण के दर्शन भी किए थे।

देश में कानून संविधान से चलता है और संविधान में धर्म को लेकर क्या कहा गया, आइए जानते हैं इस ग्रैफिक में

मुगल शासक औरंगजेब ने चित्रकूट में बालाजी के मंदिर के लिए 330 बीघा टैक्स फ्री जमीन दी थी, जिसके दस्तावेज अब तक मंदिर में मौजूद हैं। इसके अलावा प्रयाग, वाराणसी और उज्जैन के मंदिरों को भी उसने दान दिया।

दक्षिण भारत की बात करें तो 20वीं सदी की शुरुआत में हैदराबाद के सातवें निजाम उस्मान अली का नाम दुनिया के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट में शामिल था। उनके दौलतमंद होने की बातें जितनी मशहूर थीं उनकी कंजूसी भी उतनी ही चर्चा में रहतीं। उनकी कंजूसी को लेकर दीवान जर्मनी दास ने अपनी मशहूर किताब 'महाराजा' में जिक्र करते हुए बताया, ''जब भी वो किसी को अपने यहां बुलाते थे, उनको बहुत कम खाना परोसा जाता था। चाय पर भी सिर्फ दो बिस्किट खाने के लाए जाते थे, एक उनके लिए और दूसरा, मेहमान के लिए। अगर मेहमानों की संख्या ज्यादा होती थी तो उसी अनुपात में बिस्किटों की संख्या बढ़ा दी जाती थी।

हालांकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्य अभिलेखागार और अनुसंधान संस्थानों के रिकॉर्ड बताते हैं कि हैदराबाद के निजाम ने कई मौकों पर हिंदू मंदिरों को बड़ा दान दिया।

उन्होंने आजादी से पहले तिरुपति के प्रसिद्ध तिरुमला बालाजी मंदिर को 8000 रुपए का दान दिया था, जो उस दौर में बड़ी रकम थी। हैदराबाद के एक और निजाम की तरफ से हैदराबाद के मंदिरों की देखभाल के लिए 50,000 रुपए दिए जाने का भी जिक्र मिलता है।

दक्षिण अयोध्या के नाम से मशहूर और भद्राचलम में गोदावरी नदी के किनारे मौजूद श्री सीता रामचंद्र स्वामी मंदिर के लिए 29,999 रुपए दान का जिक्र मंदिर के अभिलेखों में मिलता है।

चलते-चलते चोल साम्राज्य से सीखने वाली बात…

मंदिर में आए चढ़ावे के पैसों से शिक्षा, सिंचाई, सड़क, न्याय और पर्यावरण पर खर्च करने की परंपरा

मंदिरों में चढ़ावा देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन दक्षिण भारत में इस दान का इस्तेमाल लोगों की बेहतरी के लिए ज्यादा शानदार ढंग से किया गया। दक्षिण भारत में आंठवीं से 13वीं सदी के दौरान चोल शासनकाल में मंदिरों ने सकारात्मक संस्कृति को जन्म दिया।

आपको बताते चलें कि यूनेस्को की लिस्ट में दक्षिण के 11 मंदिरों का एक समूह भी शामिल है जानिए कौन-कौन से है वे मंदिर

मंदिरों में पूजा के अलावा भी चढ़ावे की रकम को कई तरह के जन कल्याणकारी कामों में इस्तेमाल किया जाता था। चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी, मेरठ में इतिहास के प्रोफेसर रहे डॉ. ओमेंद्र सिंह के मुताबिक, चोल मंदिरों के अधिकार में सैकड़ों गांव आते थे। ये मंदिर शिक्षा, सड़क, सिंचाई, न्याय प्रक्रिया और पेड़ लगाने जैसे जनहित कामों की जिम्मेदारी बखूबी निभाते थे। इनकी समितियां होती थीं। मसलन, तोट्‌टावारियम समिति बाग-बगीचे बनाने का काम करती थी तो एरिवारियम तालाबों के रख-रखाव और निर्माण के काम से जुड़ी थी। सोना-चांदी और मुद्राओं के लिए पोनवारियम समिति थी। इसके अलावा मंदिर के कामों की व्यवस्था कोयिल्वारियम के पास थी।

चोल साम्राज्य की बात हो रही है तो ये भी जान लीजिए कि उस समय मंदिरों ने न केवल अपने चढ़ावे का इस्तेमाल सामाजिक कार्यों में किया बल्कि कला और संस्कृति को भी नए आयाम दिए।

भरतनाट्यम का जन्मदाता रहा है राजराज का बृहदेश्वर मंदिर

चोल शासक राजराज का बृहदेश्वर मंदिर सिर्फ पूजा का स्थान नहीं था, बल्कि एक ऐसा केंद्र था जहां लोग बड़ी संख्या में शाम को जुटते थे, जिसमें संगीतकारों के साथ देवदासियों का नृत्य देखा जाता। इस भव्य मंदिर को रोशन करने के लिए 160 दीपक और मशालें जलाई जाती थीं। इन दीपकों के लिए बड़ी मात्रा में घी की आवश्यकता होती, जिसके लिए गाय, भेड़ और भैंसें पाली जाती थीं। मंदिरों के लिए तंजावुर के पड़ोसी इलाकों में जमीन दी गई थी। राजराज के बनाए बृहदेश्वर मंदिर में ही सादिर अट्टम का जन्म हुआ जो आज भरतनाट्यम के नाम से जाना जाता है।

चोल साम्राज्य की तरह ही हम अपने सुनहरे अतीत से सीख भी ले सकते हैं। टेंपल इकोनॉमी को पॉजिटिव कल्चर की शक्ल देने का वक्त आ चुका है।

ग्रैफिक्स: प्रेरणा झा

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