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बेटा क्लासरूम में लड़कियों पर कमेंट करता है:घूरता है, पीठ पीछे तरह-तरह की बात करता है, तो इसे नजरअंदाज न करें

नई दिल्ली7 महीने पहले
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पटना की रहनेवाली रंजू (काल्पनिक नाम) को प्रिंसिपल ने स्कूल बुलाया। वह स्कूल गईं तो पता चला कि उनका बेटा क्लासरूम में लड़कियों पर कमेंट करता है। क्लास के दूसरे लड़कों के साथ बैठ कर लड़कियों के कपड़े, उनके बाल, उनके रंग पर पीठ पीछे बोलता है। कई लड़कियों ने इसकी शिकायत की है। प्रिंसिपल ने कहा कि आप अपने लड़के को संभालें। हालांकि वह पढ़ने में अच्छा है लेकिन इस बिहेवियर से उसे नुकसान हो सकता है। उसकी पर्सनालिटी किसी और दिशा में डेवलप हो रही है।

दरअसल, कमेंट पास करना, बिना किसी इरादा के अपमान करना आदि माइक्रो अग्रेशन के लक्षण हैं। रांची स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री के डायरेक्टर डॉ. बासुदेव दास बताते हैं कि माइक्रो अग्रेशन ऐसी चीज है जिसमें कोई किसी को प्रोवोक करता है। यह बिना किसी कारण के भी हो सकता है। जैसे किसी ने यह कमेंट कर दिया कि उसके बाल असली है न! या तुम्हारे बाल काले लग रहे, डाई कराया है क्या!

मानसिक बीमारी के हो सकते हैं लक्षण

ऐसे कई कमेंट जिसके पीछे पहले से कोई प्लानिंग नहीं होती, अनायास ही बोल पड़ते हैं माइक्रो अग्रेशन की केटेगरी में आता है। डॉ. बासुदेव बताते हैं कि यह मानसिक बीमारी के लक्षण हो सकते हैं। हालांकि इसकी पहचान करना बहुत मुश्किल होता है। पेरेंट्स भी पहचान नहीं पाते कि यह बीमारी भी हो सकती है। या आगे चलकर बच्चे की पर्सनालिटी पर असर पड़ेगा।

डॉ. बासुदेव का कहना है कि आमतौर पर दो तरह के अग्रेशन होते हैं एक एक्टिव और दूसरा पैसिव। एक्टिव एग्रेशन यानी किसी को क्रिटिसाइज करना, अपमानित करना, उसे नीचा दिखाना। जबकि पैसिव अग्रेशन में व्यक्ति खुद को चोट पहुंचाता है।

घर में जो बच्चे सीख रहे, वही बोल रहे

एक्टिव अग्रेशन भी डायरेक्ट और इनडायरेक्ट होता है। इसे ओवर्ट या कोवर्ट अग्रेशन के रूप में भी देखा जाता है। ओवर्ट अग्रेशन मेंं कोई सबके सामने कुछ भी बोल देता है। जबकि कोवर्ट अग्रेशन में पीठ पीछे आप बोलते हैं। रांची स्थित एफआईपीएस के एमडी और कंसल्टेंट न्यूरो साइकेट्रिस्ट डॉ. निशांत विभाष बताते हैं कि बच्चों की जैसी लर्निंग हो रही है वही वे क्लासरूम में दिखा रहे हैं।

बच्चे करते हैं फॉलो

पहली जिम्मेदारी पेरेंट्स पर है। उनकी जो एक्टिविटी होती है वही बच्चे फॉलो करते हैं। या कहें कि बच्चे मां-बाप को ही फॉलो करते हैं। इसलिए जहां से वो सीख रहे पहले उस सोर्स को बंद करें। बच्चे खुद भी कमेंट के शिकार होते हैं इसलिए वो भी दूसरे बच्चों पर अपना गुस्सा निकालते हैं।

सोशल मीडिया के कारण बिहेवियर में बदलाव

डॉ. निशांत बताते हैं कि आज बच्चों के हाथों में स्मार्टफोन है। वे सोशल मीडिया पर घंटों रहते हैं। आमतौर पर वो कमेंट्स करना तो वहीं से सीख जाते हैं। ट्रोल करना, बच्चे अच्छी तरह जानते हैं। इसी तरह ऑनलाइन गेम में बच्चे लगे रहते हैं। पेरेंट्स को चाहिए कि वो बच्चों पर नजर रखें कि वो सोशल मीडिया पर क्या कर रहे हैं। ऐसा करने से माइक्रो अग्रेशन के लक्षणों को पहचान पाएंगे।

जो बच्चे इसके शिकार होते हैं उनकी काउंसिलिंग की जरूरत

वैसे बच्चे जो बुलिंग के शिकार होते हैं उनकी एक्टिविटी पर ध्यान देना चाहिए। कई बार ऐसे बच्चे अलग-थलग रहने लगते हैं। स्ट्रेस होने से चिड़चिड़े हो जाते हैं। उनका अकादमिक परफॉर्मेंस गिरने लगता है। वो खेलने-कूदने की जगह एकांत रहना पसंद करने लगते हैं। आगे चल कर ऐसे बच्चों में पर्सनालिटी डिसऑर्डर हो जाता है।

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