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साइबर क्राइम:इस साल आठ महीने में 46 फीसदी बढ़े अपराध, इंसाफ के लिए 1860 में बने कानून ही सहारा

नई दिल्ली5 दिन पहलेलेखक: दिनेश मिश्र
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  • कोरोना से जूझने के दौरान जुलाई में सबसे ज्यादा क्राइम केस 3,248 बढ़े
  • लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराध बढ़े
  • साइबर बुलिंग, साइबर स्टॉकिंग जैसे मामलों में हो रही बढ़ोतरी

केरल की 28 साल की लड़की से दरिंदगी का मामला सुर्खियों में है। लड़की का कसूर बस इतना था कि टिकटॉक पर उसकी एक लड़के से दो साल पहले दोस्ती हो गई। कोल्लम से कोझिकोड 300 किलोमीटर यात्रा कर वह अपने इसी ऑनलाइन फ्रेंड से मिलने पहुंची थी। आरोप है कि इस फ्रेंड ने अपने साथियों के साथ मिलकर गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया और वीडियो भी बनाया। मामले में आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं। यह तो महज एक उदाहरण है। साइबर क्राइम की ऐसी बहुत सी घटनाएं हैं, जो आए दिन आती रहती हैं। कोरोना वायरस महामारी के इस दौर में भी ऐसे अपराध थमने के बजाय बढ़े ही हैं। लॉकडाउन में ऐसे अपराधों में बढ़ोतरी हुई है। राष्ट्रीय महिला आयोग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 के पहले आठ महीने में महिलाओं के खिलाफ क्राइम के केसेज में 46 फीसदी इजाफा हुआ है। खास बात यह है कि सबसे ज्यादा केस (3,248) तब बढ़े, जब जुलाई में लोग महामारी से पार पाने में जूझ रहे थे। इसमें साइबर क्राइम के मामले बड़ी संख्या में हैं। दरअसल, ऐसे अपराधों में कभी रिपोर्ट नहीं दर्ज होती है तो कभी कानून ऐसी पीड़ित को इंसाफ दिलाने में विफल रहता है। ऐसे में महिलाओं के खिलाफ साइबर क्राइम की चुनौतियों से निपटने के लिए अलग से कानून की वकालत की जा रही है।

राष्ट्रीय महिला आयोग ने की है नए कानून लाए जाने की वकालत
दुनिया कहां से कहां पहुंच गई, मगर महिलाओं के प्रति हमारी सोच में बड़ा बदलाव नहीं आ पाया। डिजिटल दुनिया भी इससे अछूती नहीं है, जहां महिलाएं आए दिन साइबर क्राइम का शिकार बन रही हैं। दिसंबर, 2012 के निर्भया गैंगरेप के बाद इंडियन पीनल कोड, 1860 की कुछ धाराओं में कुछ बदलाव कर उन्हें ऐसे मामलों से पार पाने के काबिल बनाया गया, मगर मौजूदा वक्त की मांग को देखते हुए ये प्रावधान कामचलाऊ ही हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों से निपटने के लिए अलग से कानून लाए जाने की वकालत की है। साइबर बुलिंग यानी गंदी भाषा, तस्वीरों या धमकियों से इंटरनेट पर तंग करना, साइबर स्टॉकिंग समेत साइबर क्राइम के मामले दिनोंदिन बढ़ रहे हैं। कानून के जानकार भी मानते हैं कि बदलते माहौल में नया कानून लाया जाना चाहिए।

तीन साल में 37 हजार मामले, साल दर साल बढ़े मुकदमे
राष्ट्रीय महिला आयोग की हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2021 के पहले आठ महीने में महिलाओं के खिलाफ क्राइम के केसेज में 46 फीसदी इजाफा हुआ है। इसमें कहा गया है कि 2020 में इसी अवधि के दौरान 13,618 केस सामने आए, जबकि इन आठ महीने में 13,618 शिकायतें दर्ज की जा चुकी हैं। इससे पहले हाल ही में लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने यह बताया कि देश में वर्ष 2017 से 2019 के बीच महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराध के 36,463 मामले दर्ज किए गए। 2020 में कोरोना के चलते लगे लॉकडाउन के बावजूद साइबर क्राइम के 704 मामले सामने आए। 2017, 2018 और 2019 में महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराध के क्रमश: 11,018 मामले, 10,686 और 14,759 मामले दर्ज किए गए।

2013 में आईपीसी में किया गया संशोधन, कुछ धाराएं जोड़ी गईं
जब मोबाइल या कंप्यूटर पर इंटरनेट के जरिए अश्लील हमला किया जाता है, जिससे महिला की गरिमा को ठेस पहुंची हो तो उसे महिला के खिलाफ साइबर अपराध माना जाता है। सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील और साइबर मामलों के जानकार अनिल सिंह श्रीनेत कहते हैं कि 2013 के पहले महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों से निपटने के लिए कोई कानून नहीं था, मगर 2013 में आपराधिक संशोधन अधिनियम के जरिये भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) , 1860 की धारा 354 ए से लेकर धारा 354 डी लाया गया।

धारा 354 ए: तीन साल तक सख्त कारावास
यौनेच्छा की मांग करना या महिला की इच्छा के खिलाफ पोर्नोग्राफी दिखाना, या अभद्र टिप्पणी करना, ऐसे सभी मामले यौन उत्पीड़न की श्रेणी में माने जाएंगे। ऐसे मामलों में तीन साल तक का कड़ा कारावास, जुर्माना या फिर दोनों हो सकता है।

धारा 354 बी: गैर जमानती अपराध
इस धारा के तहत किसी महिला को जबरन कपड़े उतारने पर मजबूर करना जैसे अपराध आते हैं। राज कुंद्रा मामले में लड़कियों के साथ ऐसा ही मामला बना है। ऐसे मामलों में कम से कम तीन साल और अधिक से अधिक सात साल की सजा का प्रावधान है। साथ ही यह गैर जमानती अपराध भी है।

धारा 354 सी: सात साल तक की सजा
महिला की निजी गतिविधियों की बिना सहमति के फोटो लेना और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के मामले में आईपीसी की धारा-354 सी लगती है। दोषी को एक साल से तीन साल तक कैद का प्रावधान है। दूसरी बार दोषी पाए जाने पर 3 साल से 7 साल तक कैद की सजा हो सकती है और यह गैर जमानती अपराध होगा।

धारा 354 डी: साइबर स्टॉकिंग
लड़की या महिला का पीछा करना और कॉन्टैक्ट करने का प्रयास यानी स्टॉकिंग के मामले में आईपीसी की धारा-354 डी के तहत केस दर्ज होगा। इसमें व्हाटसएप, फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया पर साइबर स्टॉकिंग भी शामिल है। इस मामले में दोषी को तीन साल तक कैद हो सकती है।

ये भी हैं प्रावधान, जो ऐसे अपराधों पर कसते हैं शिकंजा
इसके अलावा, धारा 499, 503, 507 और 509 भी हैं, जिनसे ऐसे अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है। धारा 509 के अनुसार अगर कोई शब्द, इशारा, ध्वनि या किसी वस्तु को इस आशय से दिखाया जाए जिससे किसी स्त्री की इज्जत का अनादर होता है या जिससे उसकी निजता का अतिक्रमण करता है तो ऐसी स्थिति में उसे तीन साल तक जेल या आर्थिक दंड या दोनों ही सजा दी सकती है। वहीं, सूचना एवं प्रौद्योगिकी यानी आईटी एक्ट, 2000 की कई धाराओं में अलग-अलग सजा का प्रावधान है।

इस साल अब तक सबसे ज्यादा क्राइम यूपी में
राष्ट्रीय महिला आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अब तक महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा क्राइम उत्तर प्रदेश (10,084), दिल्ली (2,147), हरियाणा (995) और महाराष्ट्र (974) जैसे राज्यों में हुए। वहीं, एनसीआरबी के मुताबिक, साल 2018 में महिलाओं के खिलाफ हुए साइबर अपराध के मामले सबसे ज्यादा जिन राज्यों से सामने आए हैं, उनमें कर्नाटक (1374), महाराष्ट्र (1262) असम (670) और उत्तर प्रदेश (340) शामिल हैं। इन मामलों में साइबर ब्लैकमेलिंग, धमकाना, स्टॉकिंग, फर्जी प्रोफाइल, बदनाम करना जैसे मामले शामिल हैं। दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में वरिष्ठ वकील शिवाजी शुक्ल कहते हैं कि दरअसल, महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराधों को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता है। अगर नया कानून बनता है तो ज्यादा संभव है कि ऐसे मामलों के प्रति गंभीरता बढ़े।