• Hindi News
  • Women
  • Day night, Holiday festival, Exam covid Did Not See Anything, 750 Girls Made Satellite From Kashmir To Kanyakumari

स्पेस में पहुंचना असफलता नहीं, नई चुनौती के लिए तैयार:दिन-रात, छुट्टी-त्योहार, परीक्षा-कोविड कुछ नहीं देखा, कश्मीर से कन्याकुमारी तक 750 लड़कियों ने बनाया सैटेलाइट

नई दिल्ली6 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

देश की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर ISRO ने स्टूडेंट सैटेलाइट 'AjaadiSAT' को लॉन्च किया। जिसे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के 750 छात्राओं ने 6 महीने में तैयार किया था। ये लड़कियां 7 अगस्त को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर पहुंची और सैटेलाइट लॉन्चिंग का हिस्सा बनीं।

दुनिया के सबसे सस्ते सैटेलाइट लॉन्चिंग रॉकेट SSLV से दो सैटेलाइट एकसाथ लॉन्च किए जा रहे थे, जिसमें से एक स्टूडेंट सैटेलाइट भी था। रॉकेट जैसे ही पृथ्वी की सतह पार कर स्पेस में पहुंचा इन बच्चियों के साथ इस सैटेलाइट पर काम करने वाले तमाम वैज्ञानिक भी खुशी से झूमने लगे। लेकिन सैटेलाइट लॉन्चर के सेंसर खराब हो गए और सैटेलाइट अपने तय ऑर्बिट में नहीं पहुंच सकी। दुनिया की नजर में भले ही ये प्रोजेक्ट असफल रहा। मगर बच्चियों के लिए यह सुनहरा अवसर था।

कई रातों की नींद उड़ी तब जाकर तैयार हुआ सैटेलाइट
बच्चों के साथ अटल टिंकरिंग लैब में सैटेलाइट को तैयार करने के लिए मेंटर्स भी दिन-रात एक कर काम करते रहे। आगरा के ही एक स्कूल में पढ़ने वाली हिमानी तिवारी बताती हैं कि फरवरी में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई थी। ISRO के साथ ही नीति आयोग और स्पेस किड्स इंडिया की गाइडेंस में हमने इस सैटेलाइट के सेंसर यूनिट, इलेक्ट्रोनिक्स और प्रोग्रामिंग पर काम किया था। Ajaadisat को स्पेस का तापमान, नमी और प्रेशर आदि पता लगाने के उद्देश्य से बनाया गया था।

हमने इस सैटेलाइट का माइक्रोप्रोसेसर बोर्ड तैयार किया। इसमें दो सेंसर लगाए, जिनका काम स्पेस में तापमान, नमी आदि जानकारी इकट्ठा करना है, इसके अलावा एक पोजिशनिंग सेंसर बनाया था जिसका काम सैटेलाइट की पोजिशन बताने का था। बच्चों ने माइक्रो प्रोसेसर के लिए कोडिंग भी खुद ही की थी।

ISRO ने रॉकेट SSLV-D1 को पहली बार लॉन्च किया। इसमें दो सैटेलाइट EOS-2 और स्टूडेंट्स मेड सैटेलाइट AzaadiSAT को स्पेस में लॉन्च किया गया।
ISRO ने रॉकेट SSLV-D1 को पहली बार लॉन्च किया। इसमें दो सैटेलाइट EOS-2 और स्टूडेंट्स मेड सैटेलाइट AzaadiSAT को स्पेस में लॉन्च किया गया।

हिमानी बताती हैं कि हम छुट्टी के दिन भी इसी काम में लगे रहते थे। प्रोजेक्ट में 9 से 12वीं कक्षा तक के स्टूडेंट्स शामिल थे, तो सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि उन्हें लगातार सिखाने के साथ काम कराना। इस बीच बच्चों की परीक्षाएं भी आई, कोविड की परेशानी भी रही। मगर हर चुनौती का सामना कर हम स्पेस सेंटर तक पहुंचे।

ISRO ने इस लॉन्चिंग के फेलियर की असल वजह पता लगाने के लिए एक कमेटी का गठन किया है जो जल्द ही अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। उसी के आधार पर हम आगे सैटेलाइट पर काम करना शुरू करेंगे और इसे सफलता की मंजिल तक पहुंचाएंगे।

स्पेस सेंटर जाने का खर्चा भी खुद उठाया
बच्चों से लेकर शिक्षकों तक ने स्पेस सेंटर जाने का खर्चा खुद उठाया था, जबकि कुछ बच्चे किराया देने की स्थिति में भी नहीं थे। प्रोजेक्ट में शामिल स्कूल की 10 में से 9 बच्चियां ही स्पेस सेंटर पहुंच सकी।

श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर पहुंचने का न्यौता तो मिला, मगर अपने खर्चे पर जाना सभी स्टूडेंट्स के लिए चुनौतीपूर्ण।
श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर पहुंचने का न्यौता तो मिला, मगर अपने खर्चे पर जाना सभी स्टूडेंट्स के लिए चुनौतीपूर्ण।

स्पेस फॉर वुमन के मिशन पर काम करेंगी ये छात्राएं
गणेशराम नागर सरस्वती बालिका विद्या मंदिर स्कूल की प्रिंसिपल चारू पटेल कहती हैं कि Space4Women संयुक्त राष्ट्र के ऑफिस ऑफ आउटर स्पेस (UNOOSA) प्रोजेक्ट के तहत महिलाओं को स्पेस में बराबर मौके देने के लिए काम कर रहा है। इसी मुहिम पर भारत ने भी खास लड़कियों को स्टूडेंट सैटेलाइट प्रोजेक्ट में मौका दिया था। इसका फायदा यह हुआ है कि अब ज्यादा से ज्यादा लड़कियां स्पेस की पढ़ाई करना चाहती हैं और इसमें दिलचस्पी ले रही हैं।

हमारा सफर तो अब शुरू हुआ है... स्पेस में यात्रा भी करूंगी
आगरा की 10वीं छात्रा अनुष्का गुप्ता ने बताया, यह उनकी लाइफ का अबतक का सबसे अच्छा पल रहा है। जब वह स्पेस सेंटर पहुंची तो वहां की दुनिया में खो गईं। मैं अपने बाकी दोस्त, मेंटर व प्रिंसिपल के साथ स्पेस सेंटर पहुंची थी हमने लॉन्चिंग देखी, वह एक अद्भुत नजारा था। हालांकि तकनीकी कारणों से सैटेलाइट लॉन्चिग सफल नहीं हो सकी। मगर हम कहीं से भी डिमोटिवेट नहीं हुए हैं बल्कि पहले से ज्यादा ऊर्जा से भर गए हैं।

दिसंबर 2021 में ही स्कूल में शुरू हुई थी अटल टिंकरिंग लैब, पहले ही साल में मिला इसरो का प्रोजेक्ट, छात्राओं को मिला बूस्ट।
दिसंबर 2021 में ही स्कूल में शुरू हुई थी अटल टिंकरिंग लैब, पहले ही साल में मिला इसरो का प्रोजेक्ट, छात्राओं को मिला बूस्ट।

ISRO पहुंच कर पता लगा कि हमें खुद को साबित करने के लिए बहुत सारे मौके मिल सकते हैं। ये तो सिर्फ शुरुआत है, अगर मौका मिला तो हम एक बार फिर सैटेलाइट तैयार करेंगे। मुझे पूरी उम्मीद है कि हम एक दिन सफल होंगे। मैं आगे स्पेस के बारे में और पढ़ना चाहती हूं और अगर मौका मिला तो स्पेस की सैर करने भी जरूर जाऊंगी।

खबरें और भी हैं...