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एक महिला के हाथ होगी स्पेस मिशन की कमान:नेविगेटर शॉन प्रोक्टर की खास भूमिका, जानिए क्या है महिलाओं को स्पेस में भेजने का लॉजिक

नई दिल्ली2 दिन पहलेलेखक: दिनेश मिश्र
  • अभी स्पेस ट्रेनिंग में 50 फीसदी महिलाएं, पहले थीं केवल 11 फीसदी
  • 1959 में पहली बार मिशन मर्करी के लिए महिला ने पास किया टेस्ट
  • महिलाओं को स्पेस से दूर रखने के पीछे दिए जाते थे अजीब तर्क

अरबपति एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स चार यात्रियों को लेकर अंतरिक्ष में जा रही है। इसमें दो पुरुष और दो महिलाएं हैं। खास बात यह है कि इंस्पिरेशन फोर नाम के इस मिशन में महिला नेविगेटर शॉन प्रोक्टर प्रमुख भूमिका निभा रही हैं। वह मिशन की पायलट हैं। वहीं, दूसरी महिला 29 साल की हेयली आर्केनो हैं, जो एक कैंसर सर्वावइर हैं। वह अंतरिक्ष में जाने वाली सबसे कम उम्र की अमेरिकी नागरिक होंगी।

महिलाओं की स्पेस मिशन में अहम भूमिका, खुल रहीं नई राहें

दरअसल, निजी कंपनी स्पेस एक्स ही नहीं, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी 2024 में चांद पर पहली महिला यात्री को भेजने की योजना बनाई है। इसी साल स्पेस एक्स मार्स पर मानव मिशन भेज सकती है, जिसमें भी महिला सदस्य को शामिल किया जा सकता है। इसके बाद नासा के ही मार्स मिशन में भी महिलाएं अहम भूमिका में नजर आएंगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि मौजूदा स्पेस मिशन का मकसद भले ही फंड जुटाना बताया जा रहा है, मगर इसके पीछे स्पेस में महिलाओं की राह खोलना भी है। कई रिसर्च के अनुसार, स्पेस मिशन के लिए पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा मुफीद होती हैं।

महिलाओं का वजन कम हाेने से फ्यूल खपत कम, कैलोरी भी 25% कम खर्च
किसी भी मिशन में खास बात यह ध्यान में रखने की होती है कि स्पेसक्रॉफ्ट का कुल वजन कम से कम रहे, क्योंकि वजन बढ़ने से रॉकेट का फ्यूल भी ज्यादा खर्च होगा। आम तौर पर महिलाओं का वजन पुरुषों के मुकाबले कम होता है। यानी रॉकेट को कम फ्यूल खर्च करना पड़ेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व वैज्ञानिक विनोद कुमार श्रीवास्तव ने दैनिक भास्कर के साथ खास बातचीत में बताया कि कई रिसर्च के हवाले से यह सामने आया है कि स्पेस में जाने के लिए महिलाओं का शरीर पुरुषों के मुकाबले ज्यादा कुशल होता है। पुरुषों को अपना वजन बरकरार रखने के लिए हर दिन महिलाओं के मुकाबले करीब 25 फीसदी कैलोरी ज्यादा की जरूरत होती है। इसके अलावा, अंतरिक्ष में जीरो ग्रैविटी से पुरुषों की आंखों पर ज्यादा असर पड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर साल भर रहने वाली यात्री स्कॉट केली कहती हैं कि अंतरिक्ष में रहने के दौरान आंखों से खूब पानी आता है, जिससे रेटिना मोटा हो जाता है। यह समस्या पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में कम होती है।

महिला सदस्यों का स्पेस मिशन में अनुपात बढ़ाने के पीछे कई तर्क
महिला सदस्यों का स्पेस मिशन में अनुपात बढ़ाने के पीछे कई तर्क

मिशन के लिए शरीर और दिमाग बेहद अनुकूल और ज्यादा कुशल भी
दरअसल, अंतरिक्ष मिशन के लिए महिलाओं के शरीर और दिमाग विशिष्ट रूप से अनुकूल हैं। वे कई मायनों में शारीरिक रूप से अधिक कुशल हैं और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं। नासा के साथ काम करने वाली एजेंसी द ट्रांसलेशनल रिसर्च इंस्टीटयूट फॉर स्पेस हेल्थ में रिसर्चर क्रिस्टीन फैबरे का कहना है कि जब बात चांद पर जाने की होती है तो पहले आदमी की बात की जाती है, जब मंगल की बात होती है, तब कहा जाता है कि मार्स पर शायद पहला कदम किसी महिला का ही होगा। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की विज्ञान प्रसार यूनिट में वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ टी.वी. वेंकटेश्वरन ने दैनिक भास्कर को बताया कि अंतरिक्ष में महिलाओं की भूमिका बढ़ रही है। वे कड़ी से कड़ी ट्रेनिंग से भी गुजर रही हैं। ऐसे में इस बात का कोई मतलब नहीं है कि अंतरिक्ष में कौन जाए। वही जाएगा जिसका शरीर और दिमाग अंतरिक्ष के हिसाब से अनुकूल होगा। यह पुरुष या महिला कोई भी हो सकती है।

आज स्पेस टेस्ट में 50 फीसदी महिलाएं, पहले 11 फीसदी थीं
द ट्रांसलेशनल रिसर्च इंस्टीटयूट फॉर स्पेस हेल्थ के मुताबिक, आज अंतरिक्ष यात्री प्रशिक्षण में करीब 50 फीसदी महिलाएं होती हैं। इससे पहले यह भागीदारी महज 11 फीसदी हुआ करती थी। ये वे महिला यात्री हैं, जिन्हें बाहरी अंतरिक्ष में भेजा गया था। हालांकि, इसकी वजहों का महिलाओं की योग्यता और क्षमताओं से कोई लेना-देना नहीं है।

महिलाओं को स्पेस से दूर रखने के पीछे अजब तर्क

यह कोई 1950 के दशक की बात है, जब अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रम तेजी से परवान चढ़ रहा था, उस वक्त महिलाओं के अंतरिक्ष में जाने के लिए स्वास्थ्य के डेटा की अनदेखी की गई। यह कहा गया कि शारीरिक क्षमता के आधार पर अंतरिक्ष का क्षेत्र महिलाओं के लिए बेहद जटिल और सही नहीं होगा। समय बदलने के साथ पुरानी मान्यताएं भी बदलीं और अब महिलाएं बढ़-चढ़कर स्पेस मिशन में शामिल हो रही हैं।

करीब 60 साल पहले पहली बार मिशन मर्करी के लिए महिला ने पास किया था टेस्ट
1959 में नासा के चयनकर्ता डॉ. विलियम रैंडोल्फ लवलेस ने मिशन मर्करी के लिए पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं का परीक्षण करने का फैसला किया। 1960 में डॉ. लवलेस ने बताया कि महिला पायलट जेरी कॉब ने अंतरिक्ष यात्री योग्यता टेस्ट पास कर लिया है। उन्होंने यह भी कहा कि महिला अंतरिक्ष पायलटों में अपने सहयोगी पुरुषों के मुकाबले बेहतर हैं।

12 और महिलाएं 87 टेस्ट से गुजरीं, मगर दबा दिया गया डेटा
दरअसल, कॉब के अलावा, 12 और महिलाओं ने पुरुषों की तरह ही 87 फिजिकल टेस्ट पास किए, मगर उनका डेटा जानबूझकर दबा दिया गया। बाद में इन महिलाओं को स्पेस प्रोग्राम के तहत उड़ान भरने का मौका नहीं मिल पाया और प्रोजेक्ट ही बंद कर दिया गया।

अमेरिकी राष्ट्रपति केनेडी के एक फैसले का भी पड़ा असर

1962 में नागरिक अधिकार अधिनियम पारित हुआ। इसने महिला अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस में जाने में आ रही बंदिशें हटाईं, मगर तत्कालीन राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी की मंशा थी कि चांद पर एक आदमी जाए। ऐसे में अंतरिक्ष में जाने के लिए तवज्जो पुरुषों को ही मिली। करीब 20 साल बाद 1983 में सैली राइड बाहरी अंतरिक्ष में जाने वाली पहली अमेरिकी महिला बन पाईं।

भारत की कल्पना चावला समेत इन महिलाओं ने नापा अंतरिक्ष
रूस की वैलेंटीना तेरेश्कोवा पहली और सबसे युवा अंतरिक्ष यात्री थीं, जो 16 जून, 1963 को अंतरिक्ष गईं। उन्होंने पृथ्वी के 48 बार चक्कर लगाए। कनाडा की रॉबर्टा बॉन्डर पहली कनाडाई महिला थीं, जो अंतरिक्ष में गईं। इसके बाद से कई महिला वैज्ञानिक अंतरिक्ष का चक्कर लगा चुकी हैं, जिनमें 1997 में भारतीय मूल की कल्पना चावला का नाम भी शामिल है।