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नाक-मुंह ही नहीं पीछे से भी ले सकेंगे सांस:कछुआ, चूहा, सूअर पर प्रयोग रहा सफल, आंतों को रगड़कर लेते हैं ऑक्सीजन

10 दिन पहले
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हो सकता है कि कुछ दिनों में इंसान नाक और मुंह के अलावा पीछे से भी सांस ले सकेंगे। वैज्ञानिक इस दिशा में कोशिश कर रहे हैं। 'क्लिनिकल एंड ट्रांसलेशनल रिसॉर्स एंड टेक्नोलॉजी इनसाइट्स जर्नल' में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों के एक समूह ने चूहे और सूअरों पर इस तरह के कई प्रयोग किए हैं। इन सभी प्रयोग का आइडिया कछुए के धीमे मेटाबोलिज्म पर आधारित था।

कैसे ले सकेंगे पीछे से सांस?
'डेली स्टार' पर इस रिपोर्ट को कवर किया गया है। इस रिसर्च में पशुओं की आंतों के म्युकोस स्तर को रगड़कर पतला किया गया, जिससे रक्त धमनियों में रुकावटें कम हुईं और​ ब्लड फ्लो आसानी से बढ़ाया जा सका। इस प्रयोग के बाद जानवरों को ऑक्सीजन रहित कमरों में रखा गया। ऐसा माना जाता है कि कछुओं में म्युकोस की परत पतली होती है, जिस वजह से वे पीछे से सांस ले पाते हैं और ठंड में भी जिंदा रह पाते हैं। आंतें शरीर के हर हिस्से से जुड़ी होती हैं।

तीन स्तरों पर किया गया परीक्षण
रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि वैज्ञानिकों की यह टीम कहां की है। रिपोर्ट के अनुसार, वे जानवर जिन्हें सांस नहीं मिली और वे पीछे के रास्ते से होते हुए आंतों से भी ऑक्सीजन नहीं सोख पाए, वे 11 मिनट में ही मर गए।

तीन स्तरों पर यह परीक्षण किया गया। हालांकि, वैज्ञानिकों की टीम कहां की है, यह नहीं बताया गया है।
तीन स्तरों पर यह परीक्षण किया गया। हालांकि, वैज्ञानिकों की टीम कहां की है, यह नहीं बताया गया है।

तो वहीं, वे पशु जो आंतों को रगड़े बिना ऑक्सीजन ले पाए, लगभग 18 मिनट जिंदा रहे। इससे पता चलता है कि वे कुछ हद तक वे ऑक्सीजन को सोख पाए। तीसरे चरण में बचे हुए 75% जानवरों की आंतों को रगड़ा गया और पीछे से ऑक्सीजन का प्रवाह किया गया। इससे वे एक घंटे तक जीवित रह पाए। इस प्रयोग की पूरी अवधि एक घंटा थी।

क्या इंसान भी ले सकेगा पीछे से सांस?
इस प्रयोग ने साबित किया कि चूहे और सूअर सही परिस्थितियों में आंतों से सांस लेने में सक्षम हैं। रिसर्च के निष्कर्ष के मुताबिक, वैज्ञानिकों का विश्वास है कि अन्य स्तनधारियों की तरह मनुष्य भी पीछे से सांस ले सकते हैं। पर इससे पहले कि आप अपनी आंतों को रगड़ने लगें तो रुक जाइए, ऐसा मत कीजिए। वैज्ञानिक दूसरे कम खतरनाक तरीकों की भी रिसर्च कर रहे हैं। वे ऐसे द्रव्यों की खोज कर रहे हैं जिनमें ऑक्सीजन की मात्रा ज्यादा हो।

अभी यह तय नहीं है कि क्या मनुष्य पर भी ट्रायल होगा?
अभी यह तय नहीं है कि क्या मनुष्य पर भी ट्रायल होगा?

अभी साफ नहीं है स्थिति
यह परीक्षण अभी तक इंसानों पर नहीं किया गया है और आगे ऐसा करने की योजना भी नहीं है। साथ ही अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि रिसर्च से निकले परिणाम किन परिस्थितियों में इंसानों के काम आएंगे।