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बेटी की हत्याकर मुंह में रखते गुड़, कहते-फिर मत आना:50 साल में 4.6 करोड़ बेटियों की हत्या, यूपी भी पंजाब-हरियाणा की राह पर

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: मनीष तिवारी
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यह स्टोरी 3 अक्टूबर 2022 को अष्टमी के दिन पब्लिश हुई थी। हम आज आपके लिए इसे फिर पेश कर रहे हैं, ताकि आप जान सकें कि अथाह श्रद्धा से कन्यापूजन करने वाले इस देश में कन्याओं की स्थिति कितनी दर्दनाक रही है, और आज भी है। इससे जुड़ी हम आपको रुला देने वाली दो सच्ची कहानियां बताते हैं...

पहली कहानी बरसों पुरानी है, मगर यह एक साइंटिफिक रिसर्च का हिस्सा है। एक समय पंजाब के एक समुदाय में जन्म लेते ही बेटियों को मार देने की कुप्रथा थी। हत्या के बाद नवजात के मुंह में गुड़ और हाथ में कपड़े का टुकड़ा रख दिया जाता था। फिर प्रार्थना की जाती कि बेटी, तुम इस दुनिया में दोबारा मत आना, अपने भाइयों को भेज देना।

दूसरी कहानी पिछले साल अगस्त की है। मुंबई की रहने वाली 40 साल की महिला ने पति पर केस दर्ज कराया। आरोप था कि बेटे की चाह में पति ने 13 साल में 8 बार उसका गर्भपात कराया। प्रेग्नेंट होने पर पति गर्भ में पल रहे बच्चे की जांच करवाता था और बेटी का पता चलने पर हॉन्गकॉन्ग ले जाकर अबॉर्शन करवा देता था। इस वजह से महिला को कम से कम 1500 तरह की दवाएं और इंजेक्शन लेने पड़े।

सनक में बदली बेटे की चाहत में हत्यारा बन जाने के ये अनोखे मामले नहीं हैं। बीते 50 साल में करोड़ों बच्चियों को पैदा होने से पहले ही मार दिया गया...

हरियाणा-पंजाब में तो आप बरसों से ऐसे मामलों के बारे में सुनते-पढ़ते आ रहे होंगे। तमाम रिसर्च हुईं। अनगिनत खबरें छपीं। सरकारों का भी ध्यान हरियाणा-पंजाब पर बना रहा। इस बीच उत्तर प्रदेश की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया, जहां खतरा पंजाब और हरियाणा से कम नहीं है। ऐसे में देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में बेटों के लिए बेटियों की हत्या का सिलसिला जारी रहा।

कुछ वक्त पहले आई एक रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि 2030 तक UP में 20 लाख बच्चियों को गर्भ में ही मार दिया जाएगा। इसकी पुष्टि IIT दिल्ली की प्रोफेसर और एंथ्रोपोलॉजिस्ट रविंदर कौर की रिसर्च से भी होती है।

उत्तर प्रदेश में फीमेल फीटिसाइड के मुद्दे पर रिसर्च कर रहीं प्रोफेसर रविंदर कौर के मुताबिक आने वाले सालों में देश की 30 से 40 फीसदी कन्या भ्रूण हत्याएं अकेले UP में ही सामने आएंगी।

बेटियों की संख्या कम होने की वजह से बड़ी संख्या में लड़कों की शादियां नहीं हो सकेंगी। प्रोफेसर कौर की ही एक और रिपोर्ट के अनुसार 2012 में यूपी में 10 फीसदी पुरुषों की शादियां नहीं हो सकी थीं। 2050 तक ऐसे पुरुषों की संख्या बढ़कर 17 फीसदी तक हो जाएगी, जिन्हें बिना किसी जीवनसाथी के अकेले जिंदगी बितानी पड़ेगी।

UP में भी दिख रहा पंजाब-हरियाणा जैसा ट्रेंड...

नेपाल-बांग्लादेश से खरीदकर लाते हैं दुल्हन

सबसे पहले बात पश्चिमी UP की, जहां प्रतिबंध के बावजूद न सिर्फ अल्ट्रासाउंड जांच के बाद कन्या भ्रूण हत्या जारी है, बल्कि इसमें खुद स्वास्थ्यकर्मी भी शामिल हैं। खासकर पहला बच्चा होने के बाद दूसरी प्रेग्नेंसी में आशा वर्कर की मदद से भ्रूण के लिंग की जांच होती है। और अगर लड़की मिलती है, तो निजी अस्पताल ले जाकर अबॉर्शन करा दिया जाता है। आशा वर्कर इस क्रूरता के लिए पैसे लेती हैं।

ये बात द यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा, स्कॉटलैंड में रिसर्चर श्रुति चौधरी ने 2021 में प्रकाशित अपनी किताब ‘मूविंग फॉर मैरिज: इनइक्वलिटी, इंटिमेसी एंड वुमेंस लाइव्स इन रूरल नॉर्थ इंडिया’ में बताई है। उन्होंने यह रिसर्च 2012-2013 में की। 1901 की जनगणना के समय यूपी में सेक्स रेशियो 938 था। अल्ट्रासाउंड जांच शुरू होने के बाद 1981 में सेक्स रेशियो घटकर 882 तक आ गया।

2011 में हुई जनगणना के मुताबिक यहां 1000 लड़कों पर 912 लड़कियां ही बची थीं। कन्या भ्रूण हत्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई तो हरियाणा-पंजाब की तरह ही यहां भी बेटों की शादी के लिए बांग्लादेश, नेपाल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के गरीब परिवारों की लड़कियों को खरीदकर बहू बनाने का सिलसिला तेज हो गया।

UP में दूसरे राज्यों से सबसे ज्यादा बहुएं 1990 के दशक में आईं, और ये सिलसिला अभी भी जारी है।

कन्या भ्रूण हत्या की वजह से लड़कों की शादियां नहीं हो पा रही हैं, दूसरी तरफ लड़कियों को भी बाल विवाह और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है...

उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा खराब होंगे हालात

बेटियों को लेकर भारत में ही नहीं, विदेशों में भी चिंता जताई जा रही है। 2017 से 2030 के बीच भारत में 68 लाख बेटियां जन्म लेने से पहले ही मार दी जाएंगी। 2017 से 2025 के बीच हर साल 4.69 लाख बच्चियों की गर्भ में हत्या की आशंका है, जबकि 2026 से 2030 के बीच हर साल 5.19 लाख बेटियों को जन्म नहीं लेने दिया जाएगा।

सऊदी अरब की किंग अब्दुल्ला यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर फेंग्किंग चाओ ने 2020 में आई अपनी रिसर्च में ये बातें कही हैं।

जर्नल 'प्लोस' में छपी उनकी रिपोर्ट में बताया गया है कि सबसे खराब हालात उत्तर प्रदेश में होंगे। सिर्फ UP में ही 2017 से 2030 के बीच 20 लाख बेटियां दुनिया नहीं देख सकेंगी। बेटे की चाहत में उन्हें गर्भ में ही मार दिया जाएगा। ये कोरा अनुमान नहीं है, यह बात उन्होंने वैज्ञानिक रिसर्च के आधार पर की है।

सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में कम पैदा हो रहीं लड़कियां

डेमोग्राफर श्रीनिवास गोली कहते हैं कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला राज्य है। सबसे ज्यादा बच्चों का जन्म भी यहीं होता है।

‘हेल्थ मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम’ के अनुसार 2019-20 के दौरान पूरे देश में 2.12 करोड़ बच्चों का जन्म हुआ। इनमें से 40.71 लाख बच्चे सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही पैदा हुए। इस दौरान यहां 1000 बच्चों पर महज 927 बच्चियों का जन्म हुआ।

2015-16 के NFHS-4 के दौरान UP में फर्टिलिटी रेट प्रति महिला बच्चों की संख्या 2.7 थी, जो 2019-21 में घटकर 2.4 रह गई। यहां के फर्टिलिटी रेट में गिरावट होती रही और UP पर ध्यान न दिया गया, समय रहते कदम न उठाए गए, तो पूरे देश पर इसका असर दिखेगा।

जहां पहले जन्म लेने के बाद बच्चियों की हत्या की जाती थी, लेकिन अब अल्ट्रासाउंड जांच के बाद उनको गर्भ में ही मार दिया जाता है...

आगे बढ़ने से पहले जानिए पुणे की इस बेटी की आपबीती

बात हरियाणा-पंजाब तक पहुंची है, तो पुणे की इस बेटी का हाल भी जान लीजिए। वह पुणे में दसवीं में पढ़ती थी। मां सरकारी स्कूल की टीचर थीं। 9 साल पहले परीक्षा में नंबर कम आए, तो मां की डांट के डर से घर छोड़ दिया। पहले मुंबई, फिर वहां से दिल्ली पहुंची। जहां रेलवे स्टेशन पर मिला एक आदमी उसे अपने साथ लुधियाना ले गया।

उस आदमी ने बच्ची को कुछ दिन साथ रखा, फिर बेच दिया। इस तरह उसे 4 बार बेचा गया। चौथी बार सिरसा के एक किसान ने उसे खरीदा। उसे घर छोड़े हुए 3 साल हो चुके थे और वह दूसरे बच्चे की मां बनने वाली थी।

इसी बीच किसी तरह उन्होंने अपनी मां को फोन किया। जिसके बाद उनका परिवार उन्हें अपने साथ ले गया। उसे खरीदने वाले वे लोग थे, जिन्हें शादी के लिए दुल्हन नहीं मिल रही थी। लड़कियों को खरीद कर शादी करने के बाद उनके साथ ऐसा ही बर्ताव होता रहा है।

क्यों अपनी ही बेटी को मार देते हैं लोग, प्रोफेसर श्रीनिवास गोली ने बताई इसकी वजह...

मानसिक दबाव, ईगो और चिंता पेरेंट्स को बना देती है हत्यारा

कन्या भ्रूण हत्या के पीछे जो वजहें बताई जाती हैं, उनका सामना अधिकतर लोगों को करना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्यों कुछ पेरेंट्स अपने ही बच्चों की हत्या करने देते हैं। इस सवाल का जवाब दिया साइकेट्रिस्ट डॉ. राजीव मेहता ने।

डॉ. मेहता ने बताया कि बेटे को जन्म देने का सामाजिक दबाव, वंश के नाम से पैदा होने वाला अहम, दहेज की परेशानी और बुढ़ापे में ख्याल रखने की चिंता कई बार लोगों के दिलो-दिमाग पर इस कदर हावी हो जाती है, कि वह अच्छे-बुरे में अंतर नहीं कर पाते। कन्या भ्रूण हत्या जैसा कदम उठा लेते हैं।

इन्हीं कारणों के चलते अगर पहले बेटी का जन्म हो भी जाए, तो दूसरी-तीसरी प्रेग्नेंसी में बेटी की बात पता चलने पर गर्भपात कराने का चलन ज्यादा है...

बेटियों की हत्या, सजा भुगतेंगी पीढ़ियां

'सेंटर डी साइंसेज ह्यूमंस' के रिसर्चर क्रिस्टोफ गिलमोटो के मुताबिक 2020 से 2080 के बीच भारत में 4 करोड़ से ज्यादा पुरुषों की कभी शादी नहीं हो सकेगी। बेटियों को मारकर वंश बढ़ाने के लिए बेटा पैदा करने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि वंश आखिर बढ़ेगा कैसे?

कई रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि कन्या भ्रूण हत्या का खमियाजा सबसे ज्यादा महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है। यूनाइटेड नेशंस पहले ही चेतावनी दे चुका है कि भारत में फीमेल फीटिसाइड पर अंकुश न लगा, तो सोसायटी में महिलाओं के खिलाफ सेक्शुअल वायलेंस, चाइल्ड एब्यूज, वाइफ शेयरिंग जैसी घटनाएं बढ़ेंगी और पूरे समाज को इसके नतीजे भुगतने पड़ेंगे।

बेटों की चाह में बार-बार अबॉर्शन कराने से महिलाओं की सेक्शुअल और रिप्रोडक्टिव लाइफ पर भी बुरा असर पड़ता है। उनकी फिजिकल और मेंटल हेल्थ भी खराब होने लगती है।

साइकेट्रिस्ट डॉ. राजीव मेहता के मुताबिक ऐसी महिलाएं लंबे समय के लिए डिप्रेशन, एंजायटी का शिकार हो जाती हैं। खुद को दोषी मानने लगती हैं। कुछ भी गलत होने पर गर्भपात से उसे जोड़कर देखने लगती हैं, जिससे अंधविश्वास को भी बढ़ावा मिलता है।

आज भले ही अबॉर्शन के जरिए बेटियों को गर्भ में मारा जा रहा हो, लेकिन पहले पैदा होने के बाद उन्हें मारने के जो तरीके अपनाए जाते थे, उनके बारे में सोचकर ही रूह कांप उठती है...

ढाई हजार साल पहले भी होती थी मासूमों की हत्या

जन्म के बाद बेटियों की हत्या प्राचीन काल से ही होती रही है। करीब ढाई हजार साल पहले आपस्तम्ब ने अपनी किताब धर्मसूत्र में इसका उल्लेख किया है और इसे पाप कहा है।

लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर प्रमोद कुमार श्रीवास्तव ने इस मुद्दे पर रिसर्च करते हुए रिपोर्ट तैयार की है। पोर्टल 'साइंटिफिक रिसर्च' पर मौजूद उनकी रिपोर्ट के मुताबिक कई और धर्मग्रंथों में भी इसकी आलोचना करते हुए ऐसा करने वालों को सजा देने की बात लिखी है।

राजस्थान के राजाओं ने सबसे पहले उठाए कदम

1731 में राजा जयसिंह द्वितीय ने बेटियों की हत्या रोकने की कोशिश की। उन्होंने देखा कि बच्चियों की हत्या की एक बड़ी वजह दहेज का बोझ है। उन्होंने नियम बनाया कि परिवार की एक साल की इनकम से ज्यादा दहेज नहीं दिया जा सकता।

1820 में गवर्नर एल्फिंस्टन ने बॉम्बे में इंफैंटिसाइड फंड बनाया। बच्चियों की हत्या न रोक पाने वाले भारतीय अफसरों से जुर्माना वसूल कर इस फंड में जमा किया जाता और अच्छा काम करने वालों को इससे पुरस्कार दिया जाता था। इसी बीच, 1833 में कोटा के राजा महाराव रामसिंह ने कन्या वध पर प्रतिबंध लगा दिया।

इसी दौरान देशभर में हो रही बच्चियों की हत्या की खबरें ब्रिटिश सरकार तक पहुंचने लगीं, तो उन्होंने मासूमों को बचाने की कोशिशें शुरू कर दीं...

1870 में बना कानून, मिलती थी मौत की सजा

सबसे बड़ा कदम उठाया गया 1870 में, जब ब्रिटिश सरकार ने इसपर रोक लगा दी। इसे हत्या घोषित करते हुए फांसी, उम्रकैद जैसी सजाएं तय कर दी गईं। लेकिन, इस कानून का शिकार भी महिलाएं ही हुईं, क्योंकि ये हत्याएं अधिकतर मां से करवाई जाती थीं या फिर दाई के जरिए।

5 से 10 साल के अंदर महिलाओं पर भ्रूण हत्या के कुल 381 केस दर्ज हुए, जिनमें से 18 मामलों में मौत की सजा सुनाई गई। जिनमें से 3 को सजा मिली भी। वहीं, 152 महिलाओं को राज्य से निकाल दिया गया।

महिलाएं बनीं कानून का शिकार

  • मद्रास प्रेसिडेंसी में 10 साल के दौरान 112 केस ट्रायल के लिए आए।
  • बॉम्बे प्रेसिडेंसी में 1871 से 1875 के बीच 43 मामलों का ट्रायल हुआ।
  • उत्तर-पश्चिम प्रांत और अवध में 1873 से 1876 के बीच 19 महिलाओं पर केस दर्ज हुए।
  • पंजाब में 10 साल में 51 केस में ट्रायल हुआ। मैसूर में 10 साल के दौरान 40 केस दर्ज हुए।
  • अजमेर और मारवाड़ा में 1862 से 1876 के बीच 13 मामलों में ट्रायल हुआ।
  • हैदराबाद में 10 साल में 17 केस आए। बंगाल में 5 साल में 11 मामले आए।

इनमें से अधिकतर मामलों में महिलाओं को ही फांसी और उम्र कैद जैसी सजाएं सुनाई गईं।

...लेकिन 'सेवेन सिस्टर्स' पर है नाज

इसके उलट, 19वीं सदी में असम और ब्रिटिश बर्मा में कन्या भ्रूण हत्या का एक भी केस दर्ज नहीं हुआ। उस समय के असम से ही आज के असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा राज्यों का गठन हुआ है। ये वे राज्य हैं, जहां आज भी सेक्स रेशियो सबसे अच्छा है।

देश में 1000 लड़कों के मुकाबले लड़कियों का राष्ट्रीय औसत 929 है, वहीं त्रिपुरा में 1000 लड़कों के मुकाबले 1028 लड़कियां हैं...

सख्त सजा से बचने के लिए बरतने लगे और क्रूर तरीके

कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कदम उठाए तो देश के पढ़े-लिखे तबके में इसपर बहस छिड़ गई। उनमें से बहुत से लोगों ने सख्त कानूनों का विरोध किया। वहीं, सजा से बचने के लिए लोगों ने बेटियों को मारने के नए और क्रूर तरीके अपना लिए।

उस दौरान के एक उर्दू अखबार ने इसपर खबर लिखी, ‘1870 के द इंफैंटिसाइड एक्ट से बच्चों की हत्या रुकने की जगह हालात और बदतर हो गए। पहले जन्म होते ही बेटियों की हत्या कर दी जाती थी, लेकिन अब उन्हें इतने खराब हाल में रखा जाता है कि वह 1 से 2 साल के अंदर बीमार होकर मर जाती हैं। बेटियों को मारने की पुरानी प्रैक्टिस से भी ज्यादा घिनौना तरीका है यह।’

जान बचाने वाली टेक्नोलॉजी बन गई 'किलिंग मशीन'

फिर दौर आया अल्ट्रासाउंड का। 1970 के दशक में भारत में यह मशीन इसलिए लाई गई थी, ताकि गर्भ में पल रहे बच्चों की जांच की जा सके और उन्हें कोई समस्या हो तो समय पर उनका इलाज हो सके।

इसी दौरान 1971 में 'मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट' पास हुआ। जिससे मेडिकल अबॉर्शन लीगल हो गया।

इसके बाद अस्पतालों में अल्ट्रासाउंड के जरिए पता लगाया जाने लगा कि गर्भ में लड़का पल रहा है या लड़की। लड़की का पता चलते ही अबॉर्शन करा दिया जाता। अबॉर्शन कराने वाले डॉक्टरों ने तर्क दिए कि इससे जनसंख्या नियंत्रण में मदद मिलेगी।

जान बचाने वाली टेक्नोलॉजी के जरिए 3 दशक में जाने कितनी बच्चियों की जिंदगी छीन ली गई...

जब शुरू हुआ बेटियों के नरसंहार का दौर

1976 से 1977 के बीच देश के शहरी अस्पतालों में जितनी जांचों में लड़कियों के होने का पता चला, उनमें से 96% को गर्भ में मार दिया गया। इसके उलट, अल्ट्रासाउंड की जांच में 250 केस में लड़के मिले। इनमें से कुछ जेनेटिक डिफेक्ट्स का शिकार भी थे। इसके बावजूद इनमें से एक भी मामले में अबॉर्शन नहीं हुआ और जेनेटिक डिफेक्ट्स के शिकार लड़कों ने भी जन्म लिया।

मुंबई का एक बड़ा क्लिनिक तो अबॉर्शन सेंटर में ही तब्दील हो गया। 1984-85 के बीच वहां 15,914 अबॉर्शन हुए और इनमें से सभी लड़कियां थीं। इसी तरह, शहर के 6 और अस्पतालों में कुल 8,000 अबॉर्शन हुए, जिनमें से 7,999 मामलों में बेटियां थीं।

बेटों की चाह में बेटियों की 'सीरियल किलिंग'

अल्ट्रासाउंड मशीन एक ऐसा ब्लैकहोल बन गई थी, जो दुनिया में आने से पहले ही बेटियों को निगलती जा रही थी। हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में तेजी से बेटियों की संख्या कम होने लगी। दूसरे शहरों का भी यही हाल था। बेटे की चाह में पेरेंट्स अल्ट्रासाउंड जांच कराने आते, लड़की का पता चलते ही अबॉर्शन करा देते।

इस तरह महिलाओं को लगातार कई-कई अबॉर्शन कराने पड़ते। बेटियों की इस कदर हत्या कर रहे लोगों ने यह भी नहीं सोचा कि वे सीरियल किलर बनते जा रहे हैं। आखिर में सरकार को 1994 में 'PC-PNDT Act' बनाकर प्रसव से पहले भ्रूण की लिंग की जांच पर प्रतिबंध लगाना पड़ा।

बेटियों को कैसे बचाया जाए, यह पूर्वोत्तर भारत और केरल जैसे राज्यों से सीख सकते हैं...

अमेरिका में रहने वाले चीनी-भारतीय भी गर्भ में पल रहीं बेटियों को मार देते हैं

अमेरिका सहित अधिकतर विकसित देशों में जन्म से पहले बच्चे के लिंग की जांच कराने पर कोई रोक-टोक नहीं है। बल्कि, पेरेंट्स वहां 'जेंडर रिवील सेरेमनी' ऑर्गेनाइज करते हैं और आने वाले बच्चे के जेंडर का खुलासा कर करीबियों के साथ जश्न भी मनाते हैं, फिर भले ही गर्भ में बेटा हो या बेटी।

लेकिन, इन देशों में रह रहे एशियाई वहां भी बाज नहीं आ रहे हैं। भारतीय और चीनी नागरिकों पर वहां भी लड़कियों को गर्भ में ही मारने के आरोप लगते रहे हैं। गर्भ में बच्चियों की हत्या करने के मामले में भारतीयों के दोषी पाए जाने की मीडिया रिपोर्ट्स भी आती रही हैं। ऐसे मामलों को रोकने के लिए अमेरिकी संसद में कानून तक पेश किए जा चुके हैं।

ये पूरी कहानी उन कन्याओं की है, जिन्हें जन्म लेने ही नहीं दिया गया। समाज ने उनके साथ इतनी क्रूरता और बेरहमी दिखाई कि रूह तक कांप जाए। मां, बहन, बेटी या पत्नी, स्त्रियों को हर रूप में हम पूजते हैं, पर यह सिर्फ नाम का पूजन है? बेटियों को जन्म लेने और फलने-फूलने देने का प्रण हमें लेना ही चाहिए।

खबर पढ़कर अब आपको हालात का अंदाजा तो हो गया होगा, फैमिली प्लानिंग पर अब अपनी राय भी साझा करते चलें...

ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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