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साड़ीवाली लड़की ने नसबंदी-गर्भपात का लिया नाम तो मचा तहलका:मरते दम तक लड़ती रही, अमेरिकी राष्ट्रपति पर भी उठाया था सवाल

नई दिल्ली3 महीने पहले
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भारत वो पहला देश है, जिसने परिवार नियोजन को आधिकारिक रूप से बढ़ावा दिया था। इसमें अवाबाई वाडिया का बड़ा योगदान रहा है। अवाबाई का नाम दुनिया के सबसे अमीर चर्चित जजों में लिया जाता है।

19 साल की अवाबाई वाडिया यूनाइटेड किंगडम में 'बार' परीक्षा पास करने वाली सीलोन (अब श्रीलंका) की पहली महिला बनीं। उनकी सफलता ने ही श्रीलंका सरकार को महिलाओं को देश में कानून की पढ़ाई करने की अनुमति देने के लिए प्रोत्साहित किया। वाडिया के कई ऐसे किस्से हैं, जिससे ये पता चलता है कि वो महिलाओं के अधिकारों पर सरकारी नीतियों को चुनौती या बढ़ावा देती थी। 2005 में जब उनकी मृत्यु हुई, तब तक वह परिवार नियोजन आंदोलन में विश्व स्तर पर सम्मानित और चर्चित नाम के तौर पर जानी जाती थी।

कानूनी करियर को जारी न रखना, गलत नहीं था- वाडिया
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वाडिया का जन्म 1913 में कोलंबो के प्रगतिशील पारसी परिवार में हुआ था। महिलाओं के लिए छोटी सोच होने के बावजूद उन्होंने एक वकील के रूप में पढ़ाई करने की और उसके बाद लंदन और कोलंबो में काम किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह मुंबई आ गई और सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर काम करने लगीं। यहीं से उन्होंने बदलाव और महिलाओं के हक में काम करना शुरू किया। वाडिया अपनी आत्मकथा "द लाइट इज आवर" में लिखा है, "मुझे लगता है कि, कानूनी करियर को जारी न रखना एक गलत फैसला नहीं था क्योंकि मेरे द्वारा किए गए सभी कार्यों में कानून एक मजबूत तत्व था।

वाडिया के कारण भारत सरकार परिवार नियोजन नीतियों को आधिकारिक रूप से बढ़ावा देने में सफल रहीं।
वाडिया के कारण भारत सरकार परिवार नियोजन नीतियों को आधिकारिक रूप से बढ़ावा देने में सफल रहीं।

फैमिली प्लानिंग को टैबू शब्द से अलग करने कोशिश की

1940 के दशक के अंत में फैमिली प्लानिंग शब्द दुनियाभर में एक 'टैबू' था। धार्मिक रूढ़िवादियों को भड़काने के अलावा से लेकर इसे नस्लवाद से भी जोड़कर देखा जाता था। वाडिया ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में बताया है कि 'बर्थ कंट्रोल' शब्द सुनते ही लोगों ने लोगों ने उनसे दूरी कर ली। मगर, वो बॉम्बे में एक महिला डॉक्टर से बहुत प्रभावित हुईं, उन्होंने कहा था कि भारतीय महिलाएं प्रेग्नेंसी और कॉम्प्लिकेशन को लेकर तब तक झूलती रहती हैं जब तक कि मृत्यु उनकी कहानी को खत्म नहीं कर देती।

बिना रुके लड़ती रहीं वाडिया
सामाजिक बहिष्कार के बावजूद वाडिया इस मुद्दे को लेकर लड़ती रहीं। 1949 में उन्होंने फैमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FPAI) की स्थापना की, जिसे उन्होंने 34 वर्षों तक हेड किया। एफपीएआई गर्भनिरोधक विधियों को बढ़ावा देने से लेकर प्रजनन सेवाएं प्रदान करने को लेकर काम करता था। इस काम से वाडिया को संतुष्टि मिलती थी। इस दौरान वाडिया का भी मिसकैरेज हो गया था और उनके कोई बच्चे नहीं थे। यह वाडिया के प्रयास ही थे, जिसके कारण भारत सरकार 1951-52 में परिवार नियोजन नीतियों को आधिकारिक रूप से बढ़ावा देने वाली दुनिया में पहली सरकार बन गई।

एफपीएआई ने परिवार नियोजन के अलावा वनों की कटाई से लेकर सड़क निर्माण तक की परियोजनाएं शुरू कीं। परिवार नियोजन को शिक्षा, कौशल विकास और स्वास्थ्य के एजेंडे से जोड़ते हुए, वाडिया और उनकी टीम ने सामाजिक संदेश के साथ भजन (भक्ति गीत) गाने जैसी रचनात्मक संचार तकनीकों को नियोजित किया और एक परिवार नियोजन प्रदर्शनी का आयोजन किया जिसे पूरे देश में प्रदर्शित किया गया। एफपीएआई की इस कार्यशैली ने जनता के विश्वास को बढ़ावा दिया।

वाडिया और उनकी टीम ने कई बार परिवार नियोजन से जुड़ी जानकारी को अलग-अलग तरह से प्रदर्शित किया।
वाडिया और उनकी टीम ने कई बार परिवार नियोजन से जुड़ी जानकारी को अलग-अलग तरह से प्रदर्शित किया।

1970 के दशक में आया बदलाव
उदाहरण के तौर पर कर्नाटक के मलूर 1970 के दशक में शुरू हुई एक परियोजना के परिणाम रहा कि शिशु मृत्यु दर में कमी आई, विवाह की औसत आयु में वृद्धि हुई और साक्षरता दर दोगुनी हो गई। परियोजना को इतना लोकप्रिय समर्थन मिला कि एफपीएआई के वहां से बाहर निकलने के बाद ग्रामीणों ने इन नीति को रुकने नहीं दिया।

अपनी अंतरराष्ट्रीय परवरिश के कारण, वाडिया भारतीय परिवार नियोजन को वैश्विक स्तर पर ले जाने में सफल रहीं। दक्षिण कोरियाई महिलाओं के क्लबों की सफलता से प्रेरित होकर, उन्होंने ऐसी समूहों का आयोजन किया जहां महिलाएं दहेज से लेकर राजनीति में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व तक के सामाजिक मुद्दों पर चर्चा कर सकती थीं। साथ ही, वह इंटरनेशनल प्लांड पेरेंटहुड फेडरेशन (आईपीपीएफ) में एक प्रमुख शख्सियत बन गई, जिसने भारत की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करने में कई चुनौतियों का सामना किया।

जरूरत पड़ने पर वाडिया ने भारत सरकार और अमेरिकी राष्ट्रपति की भी आलोचना की।
जरूरत पड़ने पर वाडिया ने भारत सरकार और अमेरिकी राष्ट्रपति की भी आलोचना की।

राजनीति ने इन चुनौतियों को और जटिल कर दिया
1975 से 1977 तक लगाए गए आपातकाल के दौरान, भारत सरकार ने जबरन नसबंदी सहित कठोर जनसंख्या नियंत्रण उपायों को अपनाया। वाडिया ने इसकी निंदा की और परिवार नियोजन कार्यक्रमों में जबरदस्ती के खिलाफ चेतावनी दी और घोषणा की कि इसमें किसी की भागीदारी स्वैच्छिक होनी चाहिए। परिवार नियोजन के अच्छे परिणाम दिखने लगे थे, लेकिन उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा कि आपातकाल ने "पूरे कार्यक्रम को बदनाम कर दिया।"

1980 के दशक की शुरुआत में, वाडिया को आईपीपीएफ के अध्यक्ष के रूप में एक और विकट चुनौती का सामना करना पड़ा। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के खिलाफ आवाज उठाई, जिन्होंने कुछ संगठनों को वित्त सहायता में कटौती करने आदेश दिए जो गर्भपात सेवाएं प्रदान करने में समर्थन करते थे। हालांकि, आईपीपीएफ ने आधिकारिक तौर पर गर्भपात को बढ़ावा नहीं दिया, लेकिन इसके कुछ सहयोगियों ने उन देशों में गर्भपात सेवाएं प्रदान कीं जहां यह कानूनी था।

वाडिया ने रीगनाइट की इस धारणा का उपहास उड़ाया कि मुक्त बाजार अर्थशास्त्र जनसंख्या वृद्धि का मुकाबला करेगा। अगर कोई भी यह मान रहे हैं तो समझ लें कि अभी विकासशील शब्द के आस पास भी नहीं है। देश में बहुत सारे लोग गरीब हैं और आप उसे बिना सहारा दिए नहीं छोड़ सकते। संयुक्त राज्य अमेरिका में, रूढ़िवादियों ने तर्क दिया है कि रो वी वेड में गर्भपात के अधिकारों को उलटने के बाद गर्भनिरोधक तक आसानी से पहुंच के फैसलों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

वाडिया इस बात से चिंतित थीं कि जन्म नियंत्रण के खिलाफ आंदोलन में गर्भपात को कैसे हथियार बनाया जा सकता है। लोग गर्भपात को परिवार नियोजन के साथ जोड़कर भ्रमित करने की कोशिश कर रहे हैं। वाडिया ने कहा कि मानव और व्यक्तिगत अधिकारों को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है

परिवार नियोजन आंतरिक रूप से कानून और राजनीति से जुड़ा हुआ है।
परिवार नियोजन आंतरिक रूप से कानून और राजनीति से जुड़ा हुआ है।

'बर्थ कंट्रोल' को सामाजिक आर्थिक विकास से अलग नहीं किया जा सकता
आज भारत में, राजनीतिक बहस परिवारों के आकार को सीमित करने के लिए उकसाने वाले और जबरदस्ती करने वाले तत्वों को नियोजित करने पर हो रही है। वाडिया ने ऐसे तरीकों के प्रति आगाह किया था। वाडिया ने 2000 में महाराष्ट्र राज्य - दो बच्चों के मानदंड को लागू करने के लिए, भोजन राशन और मुफ्त प्राथमिक शिक्षा के किसी भी तीसरे जन्म के बच्चे को छीनने पर दोबारा विचार करने को लेकर कहा था कि हम उन प्रोत्साहनों का समर्थन नहीं कर सकते हैं जो बुनियादी मानवाधिकारों को बरकरार नहीं रखते हैं।

भारत में ऐसी कई घटनाओं से प्रदर्शित हुआ है कि परिवार नियोजन आंतरिक रूप से कानून और राजनीति से जुड़ा हुआ है। शायद यह एक संयोग था कि भारत में एक ऐसी महिला वकील थी जो परिवार नियोजन आंदोलन को लेकर प्रमुखता से लड़ती रहीं। वाडिया का करियर इस बात पर जोड़ देता है कि 'बर्थ कंट्रोल' को सामाजिक आर्थिक विकास से अलग नहीं किया जा सकता है।

वाडिया की मृत्यु से कुछ साल पहले, एमएस स्वामीनाथन, जिन्होंने भारत की हरित क्रांति का नेतृत्व किया था, वाडिया को लेकर कहा कि वो जानती थी कि अगर हमारी जनसंख्या नीतियां गलत होती हैं, तो किसी और को सही होने का मौका नहीं मिलेगा।