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श्रद्धा के सिर की तलाश जारी:मिलने पर होगा फॉरेंसिक फेस रिकंस्ट्रक्शन, हिटलर और शीना बोरा केस में हो चुका है इस्तेमाल

नई दिल्ली22 दिन पहले
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श्रद्धा वॉकर मर्डर केस में हर रोज नए खुलासे हो रहे हैं। लेकिन अब तक पुलिस को न तो श्रद्धा का सिर मिला और न ही जिस वेपन से उसका मर्डर किया गया वो हाथ लगा है। अब तक जो भी कहानी सामने आ रही है वो आरोपी आफताब का कबूलनामा ही है।

ऐसे में सवाल उठा रहा है कि अगर श्रद्धा का सिर और मर्डर वेपन न मिला तो पुलिस कैसे साबित करेगी कि मर्डर अफताब ने ही किया है? अगर कोर्ट में आफताब अपनी बात से मुकर जाए फिर पुलिस के लिए ये साबित करना काफी मुश्किल हो जाएगा कि आफताब गुनाहगार है।

इस केस में स्कल सुपरइम्पोजिशन तकनीक काम आ सकती है। आइए जानते हैं कि ये क्या है और कैसे काम करती है-

फेस रिकंस्ट्रक्शन और स्कल सुपरइम्पोजिशन क्या है?

श्रद्धा मर्डर केस में अब तक उसका सिर नहीं मिला है। तो पुलिस की कोशिश है कि सबसे पहले श्रद्धा का सिर ढूंढा जाए। अगर पुलिस के हाथ सिर लग भी जाए तो वो श्रद्धा का है या नहीं ये कंफर्म करना जरूरी होगा। ऐसे में पुलिस फॉरेंसिक मदद लेगी और फेस रिकंस्ट्रक्शन- 3डी स्कल सुपरइम्पोजिशन के जरिए ये कंफर्म करेगी कि सिर श्रद्धा का ही है। स्कल सुपर इम्पॉजिशन या फेस रिकंस्ट्रक्शन तकनीक फोटोग्राफिक, वीडियो और कंप्यूटर असिस्ट तीन तरह से काम करती है। इस टेक्नीक में थ्री डी की मदद से मृतक के चेहरे को बनाया जाता है। किसी भी केस में इस तकनीक का इस्तेमाल तब किया जाता है, जब डीएन, फिंगर प्रिंट्स और भी बाकी सारे विकल्प काम नहीं कर रहे हों।

फेस रिकंस्ट्रक्शन का इतिहास 125 साल पुराना

फेशियल रिकंस्ट्रक्शन का इतिहास काफी पुराना है। साल 1895 में जर्मन एनाटोमिस्ट विल्हेम हिज़ ने पहला फेशियल रिकंस्ट्रक्शन किया था। विल्हेम ने जर्मन कंपोजर जोहान सेबेस्टिन बाख के चेहरे का पुनर्निर्माण किया था। लेकिन फॉरेंसिक फेशियल रिकंस्ट्रक्शन का काम क्रिमिनल केस में पहचान आइडेंटिफाइड करने के लिए इस्तेमाल होता है।

तीन तरीके से होता है फॉरेंसिक फेशियल रिकंस्ट्रक्शन

रिकंस्ट्रक्शन तीन तरह से होता है। टू डाईमेंशनल, थ्री डाइमेंशनल और सुपरइम्पॉजिशन। टू डाइमेंशनल तकनीक में मृतक के पुरानी फोटो और खोपड़ी के कंकाल को मिलाया जाता है। इसमें स्कल रेडियोग्राफी भी इस्तेमाल होती है। हालांकि इसमें कभी-कभी गलतियों की गुंजाइश रह जाती है। इस मेथड में आमतौर पर एक आर्टिस्ट और एक फोरेंसिक एंथ्रोपोलॉजिस्ट मिलकर काम करते हैं।

थ्री डाइमेंशनल असल में टू डाइमेंशनल का अपडेटेड वर्जन है। इसमें सिर्फ दो साइड से नहीं बल्कि हर एंगल से जांच होती है। इस मेथड में भी आर्टिस्ट और फॉरेंसिक एंथ्रोपोलॉजिस्ट दोनों की जरूरत होती है। मैनुअल मेथड में पीड़ित की खोपड़ी के कंकाल पर सीधे मिट्टी, प्लास्टिक या मोम का उपयोग करके चेहरे का पुनर्निर्माण किया जाता है। या एक तरीके से रेप्लिका बनाई जाती है। वहीं कंप्यूटर प्रोग्राम से अनआईडेंटिफाइड स्कल (खोपड़ी) की स्कैन की गई फोटो, फेस फीचर्स की स्टॉक फोटो और रिकंस्ट्रक्शन के लिए दी गई अन्य जानकारियों को मिलाकर एक चेहरा तैयार किया जाता है।

टू डाइमेंशनल, थ्री डाइमेंशनल से अलग है सुपरइम्पोजिशन

सुपरइम्पोजिशन तकनीक 2डी और 3डी से अलग तकनीक होती है। 2डी और 3डी में जहां स्कल के बारे में कुछ जानकारी रहती है, वहीं इस तकनीक में स्कल के बारे में पुख्ता जानकारी नहीं होती। इसमें फोटो और स्कल की कंप्यूटर से मैंपिंग की जाती है। अगर स्कल और फोटोग्राफ एक ही इंसान की है तो वो उसके चेहरे के फीचर आपस में मैच कर जाते हैं। इसका इस्तेमाल 2डी और 3डी तकनीक के मुकाबले कम किया जाता है।

हिटलर की पहचान के लिए भी हो चुका है इस्तेमाल

जैसा कि हमने आपको शुरू में ही बताया कि ये तकनीक बहुत पुरानी है। 1945 में हिटलर की मौत के बाद उसकी पहचान पुख्ता करने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। अगर हालिया केस की बात करें तो देश की चर्चित शीना बोरा मर्डर मिस्ट्री में डिजिटल स्कल सुपरइम्पोजिशन का इस्तेमाल किया गया था। शीना बोरा केस में उसका स्कल इस तकनीक की वजह से 100% फीसदी मैच हुआ था।