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जर्मन चांसलर की सत्ता में वापसी का चांस नहीं:ओबामा-पुतिन जैसे दिग्गजों के बीच जमाई थी मर्केल ने धाक, दुनिया की सबसे ताकतवर महिला ने सीरियाई लोगों के लिए बॉर्डर खोलने जैसे बिना डरे लिए कई कड़े फैसले

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: दिनेश मिश्र
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जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल। - Dainik Bhaskar
जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल।
  • 735 सीटों वाली संसद बुंडस्टैग के लिए हुए चुनाव में एसपीडी को 206 सीटें मिलीं
  • मर्केल की पार्टी सीडीयू ने सीएसयू के साथ मिलकर 196 सीटें ही जीतीं
  • सत्ता की बागडोर किसके हाथ होगी, यह तो गठबंधन बनने के बाद ही तय होगा

जर्मनी में हुए संघीय चुनावों में सेंटर-लेफ्ट सोशल डेमोक्रेट्स (SPD) ने बेहद मामूली अंतर से जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) को हरा दिया है। 735 सीटों वाली संसद बुंडस्टैग के लिए हुए चुनाव में एसपीडी ने 206 सीटों पर कब्जा जमाया है। जबकि सत्ता पर काबिज मर्केल की पार्टी सीडीयू ने सीएसयू के साथ मिलकर 196 सीटें हासिल कीं। वहीं, 118 सीटों के साथ ग्रीन पार्टी तीसरे स्थान पर काबिज रही है। प्रतिष्ठित मैगजीन फोर्ब्स की दुनिया की 100 ताकतवर महिलाओं की सूची में 10 साल तक लगातार नंबर वन रही मर्केल की अब सत्ता में वापसी के आसार बेहद कम हैं।

16 साल तक चांसलर रहीं मर्केल पर सबकी नजर
जर्मनी में सत्ता की बागडोर किसके हाथ होगी, यह तो गठबंधन बनने के बाद ही तय होगा, क्योंकि किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिल पाया है। वामपंथी रुझानों वाली एसपीडी सत्ता में आने का दावा कर रही है। हालांकि, इतना तय माना जा रहा है कि मर्केल अब सत्ता में नहीं लौटेंगी। खुद मर्केल ने इसका ऐलान हाल ही में किया था। आइए, जानते हैं 2005 में देश की पहली महिला चांसलर बनने वालीं मर्केल के 16 साल के शासन में वे कौन से अहम फैसले थे, जिसने वैश्विक राजनीति की दिशा मोड़ दी। इन फैसलों के कारण उन्हें देश ही नहीं दुनिया भर में सम्मान मिला।

आलोचनाओं से परेशान नहीं हुईं, सीरियाई शरणार्थियों के लिए खोल दिए दरवाजे
एंजेला मर्केल का सबसे साहसिक फैसला सीरियाई शरणार्थियों के लिए जर्मनी के दरवाजे खोलने का था। 2015 का यह वह दौर था, जब सीरियाई गृहयुद्ध का असर पूरे यूरोप पर पड़ रहा था। फ्रांस समेत कई देशों में आतंकी हमले हुए। उस दौर में यूरोप के ज्यादातर देशों ने सीरियाई शरणार्थियों के प्रवेश पर पाबंदी लगा दी थी। यहां तक कि जर्मनी में भी सीरियाइयों को प्रवेश नहीं दिए जाने की मांग उठ रही थी। मगर, मर्केल ने आगे आकर साहसिक तरीके से इन शरणार्थियों का स्वागत किया। वह बेघर हुए ऐसे हजारों लोगों के लिए मसीहा बनकर उभरीं। यही वजह रही है कि फोर्ब्स जैसी प्रतिष्ठित मैगजीन ने उन्हें दुनिया की सबसे ताकतवर महिला का खिताब दिया।

ममा मर्केल: बीते साल कोरोना महामारी के दौरान शरणार्थियों के लिए मसीहा बनीं मर्केल के स्वस्थ होने के लिए सीरिया में दुआएं की गईं।
ममा मर्केल: बीते साल कोरोना महामारी के दौरान शरणार्थियों के लिए मसीहा बनीं मर्केल के स्वस्थ होने के लिए सीरिया में दुआएं की गईं।

मर्केल के एनर्जी रिफॉर्म पर लिए गए फैसले ने पूरी दुनिया को चौंकाया
जापान में 2011 में हुए फुकुशिमा परमाणु संयंत्र हादसे के बाद मर्केल ने ऐलान किया था कि जर्मनी अपने 17 न्यूक्लियर रिएक्टरों में से 8 को बंद करेगा। बाकी के न्यूक्लियर रिएक्टरों को 2022 तक बारी-बारी से बंद किया जाएगा। मर्केल का यह कदम तब बड़े पैमाने पर वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों की राह खोलने के तौर पर देखा गया। दुनिया ने उनके इस कदम की जमकर तारीफ की। पेरिस जलवायु समझौते के लिए देशों को एकजुट करने में भी मर्केल की भूमिका की तारीफ होती रही है।

क्लाइमेट चांसलर: यह तस्वीर 2015 के जी-7 समिट की है, जब मर्केल तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ बात कर रही हैं। उन्हें जलवायु परिवर्तन पर नेताओं को राजी करने के लिए क्लाइमेट चांसलर तक कहा गया।
क्लाइमेट चांसलर: यह तस्वीर 2015 के जी-7 समिट की है, जब मर्केल तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ बात कर रही हैं। उन्हें जलवायु परिवर्तन पर नेताओं को राजी करने के लिए क्लाइमेट चांसलर तक कहा गया।

बड़ी कंपनियों में मैनेजमेंट कोटा लागू करने के लिए 2020 में कानूनी बदलाव
मर्केल वैसे तो चाहती थीं कि बड़ी कंपनियां खुद ही मैनेजमेंट कोटा लागू करें, मगर जब कंपनियों ने साल दर साल उनकी सलाह दरकिनार करती रहीं तो उनके शासनकाल में ही 2020 में मैनेजमेंट की भूमिका में महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा मौका देने के लिए 2020 में कानूनी बदलाव किया गया।

जर्मनी में मर्केल ने मैटरनिटी लीव की योजनाएं लागू कीं।
जर्मनी में मर्केल ने मैटरनिटी लीव की योजनाएं लागू कीं।

डे केयर समेत महिलाओं से जुड़े ऐसे फैसले लिए, जो बने चर्चा का विषय
पूर्वी जर्मनी में पली बढ़ीं मर्केल के कार्यकाल में कई ऐसे कानून पारित हुए, जिन्होंने मॉडर्न फैमिली की नई परिभाषा लिखी। मैटरनिटी लीव और वित्तीय सहायता योजना लागू की गई और देशभर में डे-केयर सेंटर खोले गए। उन्होंने एक नया नियम लागू किया, जिसके तहत युवा मांओं के लिए मैटरनिटी लीव के बाद काम पर लौटना आसान बन गया। यह काफी चर्चा का विषय बना रहा।

सेना में अनिवार्य भर्ती के नियम को रद्द किया, चाइल्ड केयर सर्विस में लगाया
1989 में बर्लिन की दीवार गिरने के बाद सियासत में कदम रखने वालीं मर्केल का एक और फैसला, जो जर्मनी के इतिहास में दर्ज हो गया। 50 साल से चले आ रहे सेना में अनिवार्य भर्ती के नियम को उन्होंने रद्द कर दिया। 2.40 लाख की सेना का आकार घटाकर 1.70 लाख कर दिया। इनमें से कई को चाइल्ड केयर सर्विस में लगा दिया गया। हालांकि, इस फैसले की वजह से मर्केल को दुनिया में तो तारीफ मिली, मगर अपने देश में वह विपक्षियों के निशाने पर रहीं। मर्केल सियासत में आने से पहले वैज्ञानिक थीं।

महिलाओं के असमान वेतन समेत कुछ ऐसे मुद्दे, जिन पर फैसला नहीं ले पाईं मर्केल
मर्केल के कुछ फैसले भले ही उन्हें ताकतवर महिला साबित करते हों, मगर उन्होंने घरेलू हिंसा, महिलाओं के लिए अलग छत, असमान वेतन, बड़ी कंपनियों के बोर्ड में भेदभाव और गरीब बच्चियों के लिए कुछ खास नहीं कर पाईं। असमान वेतन को कुछ कम जरूर किया गया, मगर वह अंतर को पाट नहीं पाईं। वह दुनिया के बड़े मसलों पर सख्त फैसलों के लिए जानी जाती रहीं, मगर एक महिला के तौर पर महिलाओं के लिए ज्यादा फैसले नहीं ले पाईं।