• Hindi News
  • Women
  • Get 4 Tests Done In Pregnancy, The Child Will Remain Away From Congenital Diseases

गर्भ में शिशु की सेहत के लिए 4 टेस्ट जरूरी:बच्चे को नहीं होंगी जन्मजात बीमारियां, जरा सी चूक बन सकती है जानलेवा

8 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
  • मां बनने का एहसास कितना सुखद होता है, यह एक मां ही समझ सकती है। यह एहसास जिंदगी में अपने साथ-साथ बहुत सारे बदलाव लेकर आता है जिनमें से कुछ शारीरिक और कुछ मानसिक भी होते हैं। आइए, जानते हैं इन्हीं अनमोल पल के बारे में।

फर्स्ट ट्राइमेस्टर

प्रेग्नेंसी के पहले 3 महीनों को फर्स्ट ट्राइमेस्टर कहते हैं। इस दौरान गर्भ में भ्रूण का विकास होता है। महिला का शरीर कई तरह के हार्मोनल बदलावों से होकर गुजरता है। ये महीने सबसे ज्यादा चुनौती भरे होते हैं, इन्हीं महीनों में अबॉर्शन का चांस सबसे ज्यादा रहता है। इस दौरान डॉक्टर से पूछे बिना कोई भी दवा न लें। इससे बच्चा स्ट्रक्चरल डिसऑर्डर बचा रहता है। डॉक्टर इस समय में महिला को फोलिक एसिड लेने और थोड़ा योगासन करने की सलाह देते हैं। .

इन बातों का रखें ध्यान

डॉ. रंजना गुप्ता की माने तो प्रेग्नेंसी के शुरुआती महीनों में किसी भी महिला को ज्यादा भीड़भाड़, ऊबड़-खाबड़ रास्तों, प्रदूषण और रेडिएशन वाली जगह पर जाने से बचना चाहिए। टाइट कपड़े नहीं पहनना चाहिए।

डाइट का भी रखें ध्यान

डॉ. रंजना के अनुसार प्रेग्नेंट वुमन को थोड़ी थोड़ी देर पर हेल्दी फूड खाते रहना चाहिए। इन तीन महीनों में बच्चे के अंग बनने शुरू हो जाते हैं इसलिए अल्कोहल से दूर रहें।

रुटीन चेक-अप

एंटी नेटल स्क्रीनिंग टेस्ट जिसमें ब्लड ग्रुप और आरएच, हीमोग्लोबिन, ब्लड शुगर, स्क्रीनिंग फॉर इंफेक्शन एचआईवी, सिफलिस, रुबेला, हेपेटाइटिस सी, हीमोग्लोबिन पैथी की रूटीन चेक-अप कराएं। यूएसजी ताकि आपको अपनी डिलीवरी डेट के साथ यह भी पता चल जाए कि गर्भ में एक या उससे ज्यादा शिशु तो नहीं है। 7वें और 12वें हफ्ते में अल्ट्रासाउंड किया जाता है। प्रेग्‍नेंसी की पहली तिमाही में डबल मार्कर टेस्‍ट किया जाता है। इससे शिशु में नसों से जुड़ी बीमारी जैसे डाउन सिंड्रोम, एडवर्ड सिंड्रोम का पता चलता है। यह टेस्‍ट प्रेग्‍नेंसी के 10वें और 14वें हफ्ते में होता है।

प्रेग्‍नेंसी की दूसरी तिमाही 13वें हफ्ते से लेकर 27वें हफ्ते तक होती है। इस दौरान बच्चा बड़ा होने लगता है। कई महिलाओं का पेट बाहर निकलने लगता है। पहली तिमाही के मुकाबले दूसरी तिमाही आसान होती है और महिलाएं अपनी प्रेग्‍नेंसी को एंजॉय कर पाती हैं।

शिशु का विकास

इस दौरान शिशु के अंग पूरी तरह से डेवलप हो जाते हैं। वह मूवमेंट के साथ सुनना और स्‍वाद लेना शुरू कर देता है। मां को शिशु के सोने और जगाने का समय महसूस होने लगता है।

डॉक्‍टर को कब दिखाए

सेकंड ट्राइमेस्टर

सेकंड ट्राइमेस्टर में 15 दिन में एक बार डॉक्‍टर के पास चेक-अप के लिए जाना चाहिए। डॉक्‍टर ब्‍लड प्रेशर और वजन चेक करने के साथ अल्‍ट्रासाउंड, ब्‍लड टेस्‍ट, डायबिटीज और जेनेटिक डिसऑर्डर की जांच के लिए स्‍क्रीनिंग टेस्‍ट कराएंगे। इस समय मिसकैरेज का खतरा कम होता है, लेकिन फिर भी इसकी संभावना बनी रहती है।

समय से पहले डिलीवरी

38वें हफ्ते से पहले लेबर पेन हो तो इसे प्री-टर्म लेबर कहते हैं। जिन महिलाओं का पहला बच्‍चा भी प्री-टर्म हुआ था, उनमें इसका खतरा ज्‍यादा होता है। वहीं जुड़वां बच्‍चे होने पर भी दूसरी तिमाही में जल्‍दी डिलीवरी हो सकती है।

थर्ड ट्राइमेस्टर

प्रेग्‍नेंसी 40 हफ्ते की होती है। महिलाओं के लिए ये समय बहुत चैलेंजिंग होता है। 37वें हफ्ते तक शिशु का संपूर्ण विकास हो चुका होता है और अब वो जन्‍म लेने के लिए तैयार होता है। यह समय मां और शिशु के लिए नाजुक होता है।

शिशु का विकास

32वें हफ्ते में शिशु की हड्डियां पूरी तरह से बन चुकी होती हैं। वो मिनरल्स जैसे आयरन और कैल्शियम को स्‍टोर करने लगता है। 36वें हफ्ते तक शिशु का सिर नीचे योनि की ओर आ जाना चाहिए। ऐसा न होने पर डॉक्‍टर सिजेरियन डिलीवरी की सलाह देते हैं। 37वें हफ्ते के बाद शिशु को फुल टर्म माना जाता है और उसके अंग खुद काम करने के लिए तैयार होते हैं।

डॉक्‍टर को कब दिखाएं

थर्ड ट्राइमेस्टर में चेक-अप करवाते रहना चाहिए। 36वें हफ्ते में हानिकारक बैक्‍टीरिया की जांच के लिए डॉक्टर ग्रुप बी स्‍ट्रेप टेस्‍ट करते हैं। 20वें हफ्ते के बाद प्रेग्नेंट महिलाओं को यह समस्‍या हो सकती है। सही समय पर इलाज न होने के कारण दौरे पड़ सकते हैं या एक्लेमप्सिया या किडनी फेल हो सकती है और कुछ केस मे मां और शिशु की मृत्‍यु तक हो सकती है।