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खाने में ज्यादा गैप से मौत का खतरा:नाश्ता नहीं करने पर हो सकता है हार्ट अटैक; सैनिटरी पैड से मां बनने में मुश्किल

2 महीने पहले
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नमस्कार,

आज हम आपके और आपके परिवार की सेहत का ध्यान रखते हुए ‘वीकली हेल्थ ब्रीफ’ लेकर आए हैं। इसमें आपको देश और दुनिया की हेल्थ अपडेट्स, महत्वपूर्ण रिसर्च से जुड़े आंकड़े और डॉक्टरों की रेलेवेंट सलाह मिलेंगी। महज 2 मिनट में पढ़कर ही आपको सेहत से जुड़ी हफ्ते भर की जरूरी जानकारियां मिलेंगी और आप परिवार का बेहतर ख्याल रख पाएंगी।

महाराष्ट्र में खसरे का खतरा, दुनिया में वैक्सीन न मिलने से 4 करोड़ बच्चों की मौत

मुंबई में खसरा की चपेट में आने से 12 लोगों की जान जा चुकी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र सरकार को खसरा प्रभावित इलाकों में 6 से लेकर 9 महीने के सभी बच्चों को वैक्सीन लगवाने के निर्देश दिए हैं। महाराष्ट्र में खसरा के जो केस मिले हैं उनमें 9 महीने से कम उम्र के बच्चों की संख्या 10 फीसदी है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने महाराष्ट्र सरकार को नौ महीने से पांच साल के बीच के सभी बच्चों को खसरा से बचाने वाली वैक्सीन खसरा और रूबेला युक्त वैक्सीन (MRCV) की एक अतिरिक्त खुराक देने की भी सलाह दी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के मुताबिक कोरोना वायरस महामारी के चलते 2021 में करीब 4 करोड़ बच्चों को खसरे की टीके की खुराक नहीं दी गई। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें करीब 2.5 करोड़ बच्चे पहली खुराक पाने से ही वंचित रह गए। जबकि 1.47 करोड़ बच्चों को दूसरी खुराक नहीं दी जा सकी।

डब्ल्यूएचओ और यूएस सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की रिपोर्ट के अनुसार साल 2021 में दुनियाभर में खसरे के करीब 90 लाख नए मामले मिले और 1.28 लाख मौतें हुईं। जबकि 95% से अधिक मौतें विकासशील देशों जैसे अफ्रीका और एशिया में हुईं। दुनिया भर के करीब 22 देशों ने इस भयंकर बीमारी का प्रकोप का सामना किया।

खाने के बीच बहुत गैप या एक बार ज्यादा खाने से मौत का खतरा

अगर आप खाने की बीच ज्यादा टाइम का गैप रखते हैं या फिर एक बार में अधिक खाना खाते हैं, तो यह जानलेवा हो सकता है। अमेरिकी रिसर्चर्स ने बताया है कि दिन में 3 बार खाना खाने के बजाय एक बार ज्यादा खाना खाने से मौत का खतरा 30 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।

ब्रेकफास्ट करने वाले लोगों की तुलना में नाश्ता न करने वालों में 40 फीसदी दिल की बीमारी से मौत का खतरा था।
ब्रेकफास्ट करने वाले लोगों की तुलना में नाश्ता न करने वालों में 40 फीसदी दिल की बीमारी से मौत का खतरा था।

इस रिसर्च में 40 से अधिक उम्र के करीब 24 हजार लोगों को शामिल किया गया। 15 साल तक इन पर सर्वे किया गया। यह रिसर्च जर्नल ऑफ न्यट्रिशन एंड डायबिटिक्स जर्नल में प्रकाशित हुई है।

टेनेसी यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने पाया कि ऐसे लोगों में 83 प्रतिशत दिल की बीमारी का खतरा भी ज्यादा पाया गया। ब्रेकफास्ट करने वाले लोगों की तुलना में नाश्ता न करने वालों में 40 फीसदी दिल की बीमारी से मौत का खतरा था। जो लोग लंच या डिनर नहीं करते थे, उनके मरने की आशंका 12 से 16 फीसद अधिक थी।

प्रेंग्नेंसी में शराब पीने की हैविट से बदल रही बच्चे के दिमाग की बनावट

प्रेंग्नेंसी में एक बार भी शराब पीने से बच्चे के दिमाग की बनावट बदल सकती है। रिसर्चर्स का दावा है शराब का एक पैक भी बच्चे के दिमाग को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

रिसर्चर्स ने एमआरआई स्कैन के इस्तेमाल से प्रेंग्नेंसी के 22 से 36 सप्ताह के बीच शराब पीने वाली 24 प्रेग्नेंट महिलाओं में भ्रूण के ब्रेन का अध्ययन किया। जिसमें 17 प्रेंग्नेंट महिलाओं में एक ने हर सप्ताह कम शराब पी, जबकि 2 ने एक सप्ताह में छह बार शराब और एक ने 14 से अधिक बार शराब पी। जिसमें पाया कि जन्म से पहले शराब के संपर्क में शिशु के आने से उसके दिमाग का दाया हिस्सा प्रभावित हाेता है, जिससे उनकी महसूस करने और सीखने की क्षमता पर असर पड़ता है।

जब शिशु के बॉडी पार्ट बनने शुरू होते हैं, तब शराब पीना बहुत ज्यादा नुकसानदायक होता है।
जब शिशु के बॉडी पार्ट बनने शुरू होते हैं, तब शराब पीना बहुत ज्यादा नुकसानदायक होता है।

ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना की मेडिकल यूनिवर्सिटी के रिसर्चर और न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर किनास्ट ने बताया कि प्रेंग्नेंसी में महिलाओं को शराब पीने से बचना चाहिए।

असल में, जन्म से पहले विकास के दो स्टेज होते हैं। जिसमें पहला स्टेज भ्रूण होता है, जिसे विकसित होने में आठ सप्ताह लग सकते हैं। जब बॉडी पार्ट बनने शुरू होते हैं, तब शराब पीना बहुत ज्यादा नुकसानदायक होता है। जिससे दिमागी कोशिकाओं पर निगेटिव असर पड़ता है।

सैनेटरी पैड से महिलाओं को कैंसर और मां न बन पाने का खतरा

सैनेटरी पैड महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। इसे बनाने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल से महिलाओं को कैंसर का खतरा है। इससे महिलाएं बांझपन का भी शिकार हो सकती हैं।

एनजीओ टॉक्सिक्स लिंक के प्रोग्राम कोर्डिनेटर डॉक्टर अमित ने बताया कि सैनिटरी प्रॉडक्ट्स में कई गंभीर केमिकल जैसे कारसिनोजन, रिप्रोडक्टिव टॉक्सिन, एंडोक्राइन डिसरप्टर्स और एलरजेंस पाए गए हैं। जिससे प्राइवेट पार्ट पर इन खतरनाक केमिकल्स का असर ज्यादा होता है। इसलिए कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इससे महिलाओं में बांझपन का खतरा भी रहता है।

रिसर्च के लिए भारत में सैनिटरी नैपकिन बेचने वाले 10 ब्रांड्स के प्रॉडक्ट्स शामिल किए गए। जिसमें रिसर्चर्स को सभी सैंपलों में थैलेट (phthalates) और वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड (VOCs) के तत्व मिले।

चिंता की बात है कि यह दोनों केमिकल्स कैंसर के सेल्स बनाते हैं। एनजीओ टॉक्सिक्स लिंक की एक अन्य प्रोग्रोम कोर्डिनेटर अकांक्षा मेहरोत्रा ने इंडिया टुडे के हवाले से बताया कि सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि सैनिटरी पैड के इस्तेमाल से महिला के प्राइवेट पार्ट्स पर इन केमिकल्स का ज्यादा असर होता है।

बच्चों को प्राणायाम से बनाएं स्मार्ट

प्राणायाम से बच्चों को स्मार्ट बनाया जा सकता है। मेडिटेशन दिमाग को शांत करने और खुद पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बेहतर है, जो तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है। रिसर्च में दावा किया गया है कि प्राणायाम से पेरेंट्स अपने बच्चे का मेंटल हेल्थ सुधार सकते हैं।

बच्चों को 3-10 मिनट और दिन में दो बार मेडिटेशन करने की सलाह दी गई है।
बच्चों को 3-10 मिनट और दिन में दो बार मेडिटेशन करने की सलाह दी गई है।

संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल आपातकालीन कोष (यूनिसेफ) की एक रिसर्च में बताया गया है कि कोविड के बाद बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा है। यूनिसेफ के मुताबिक हर साल दुनियाभर में लगभग 46 हजार किशोर आत्महत्या कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि ध्यान बच्चों के लिए अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने और स्वस्थ होने में मदद करने का एक सही तरीका हो सकता है। मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग कंपनी राउंडग्लास की ग्लोबल हेड प्रकृति पोद्दार ने बताया कि ध्यान से बच्चों के लिए कई लाभ हो सकते हैं।

2020 में नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक स्टडी में कहा गया है कि मेडिटेशन से बच्चों और किशोरों की मनोदशा, मानसिक स्वास्थ्य, स्कूल में उनकी उपस्थिति बढ़ती और क्लास में परफॉर्मेंस में सुधार करने में मदद मिलती है।

अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स ने बच्चों के लिए ध्यान की गाइडलाइन भी जारी की है। प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को 3-10 मिनट और दिन में दो बार मेडिटेशन करने की सलाह दी गई है। यह भी कहा गया है कि किशोर रोजाना 5-45 मिनट मेडिटेशन कर सकते हैं।

बिना QR कोड के नहीं बिकेंगी दवाएं

कंपनियां अब बिना QR कोड के दवा नहीं बेच पाएंगी। इस संबंध में केंद्र सरकार ने दवा कंपनियों को नोटिस जारी किया है। केंद्र सरकार ने कहा है कि एच2 लिस्ट में दवा करोबारी अपने पहले कवर पर QR कोड प्रिंट कराएंगे। अगर पहले लेबल पर जगह नहीं है, तो पैकिंग के दूसरे लेबल पर QR कोड लगाएंगे।

अधिकारियों ने बताया कि बार कोड या क्यूआर कोड से ग्राहकों को दवाओं के असली-नकली की जांच में मदद मिलेगी।
अधिकारियों ने बताया कि बार कोड या क्यूआर कोड से ग्राहकों को दवाओं के असली-नकली की जांच में मदद मिलेगी।

इससे असली और नकली दवाओं की पहचान की जा सकेगी। अगस्त 2023 से एलेग्रा, एज़िथ्रल, बीकोसूल कैप्सूल, कैलपोल, पैंटोसिड डीएसआर, मोनोसेफ और थायरोनोर्म जैसी बिकने वाली दवाओं की पैकेजिंग पर बार कोड या क्विक कोड लगाया जाएगा।

दवा का रेट, नाम, ब्रांड का नाम, निर्माता का नाम और पता, बैच नंबर, दवा की एक्सपायरी डेट, लाइसेंस आदि की जानकारी भी जरूरी होगी। अधिकारियों ने बताया कि बार कोड या क्यूआर कोड से ग्राहकों को दवाओं के असली-नकली की जांच में मदद मिलेगी। ऐसे में वह यह भी जांच कर सकेंगे कि वे जो दवाएं ले रहे हैं वो कितनी सुरक्षित हैं।