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PM ने जो तोहफे दिए, उनकी रोचक कहानी:हीरोइनों ने पहनी जरी-ज़रदोज़ी, शाही कपड़ों की शान बढ़ाता था बाइडेन को मिला बनारसी गिफ्ट

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: सुनाक्षी गुप्ता
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जर्मनी के G-7 शिखर सम्मेलन में भारत की अनमोल कलाएं अपनी पहचान बना रही हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के 'एक जिला एक उत्पाद' योजना की ब्रांडिंग करने के लिए प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्र में तैयार किए गए सुंदर हस्तशिल्प ग्लोबल लीडर्स को भेंट किए हैं।

पढ़िए बनारसी गुलाबी मीनाकारी कला का ईजाद कैसे हुआ? ब्लैक पॉटरी कला के निजामाबाद पहुंचने की पूरी कहानी।

बनारस की 'गुलाबी मीनाकारी' करोबार में है महिलाओं का कब्जा
बनारस के पान-साड़ी और घाट के बाद जो सबसे प्रसिद्ध चीज है वो है 'बनारसी गुलाबी मीनकारी'। इस कला का इस्तेमाल मुगल काल में राजे-रजवाड़ों के मुकुट, वस्त्र और रत्नजड़ित आभूषणों को तैयार करने के लिए किया जाता था। पीएम मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को बनारस में तैयार गुलाबी मीनाकारी पिकॉक ब्रोच और कफलिंक सेट गिफ्ट में दिया। कफलिंक राष्ट्रपति के लिए और पिकॉक ब्रोच वहां की फर्स्ट लेडी के लिए तैयार किया गया है।

इस शिल्प को बनाने के लिए 600 से 1200 डिग्री सेल्सियस तापमान पर भट्‌टी में तपाकर इसमें सोना और चांदी मिलाया जाता है। इसके बाद अपारदर्शी मीना पर गुलाबी पेंटिंग की जाती है, इसलिए इसे गुलाबी मीनाकारी भी कहते हैं। इसे गहने, सजावटी सामान और चांदी के बर्तनों आदि पर किया जाने लगा। वाराणसी के गाय घाट क्षेत्र में इस शिल्पकला के कारीगर देखने को मिलते हैं।

गुलाबी मीनाकारी कर हर महीने करीब 15 से 20 हजार रुपए कमा लेती हैं महिलाएं।
गुलाबी मीनाकारी कर हर महीने करीब 15 से 20 हजार रुपए कमा लेती हैं महिलाएं।

एक समय ऐसा था कि मीनाकारी कला दम तोड़ रही थी। इस बीच सरकार ने इस कला को वापस जिंदा कर देश-दुनिया में फैलाने का फैसला लिया। मीनाकारी में जीआई टैग दिया गया। यानी गुलाबी मीनाकारी को अपनी अलग पहचान मिली। इससे मीनाकारी कला की डिमांड बढ़ी और मार्केट में वैल्यू भी बढ़ी।

बाकी ज्वेलरी इंडस्ट्री के मुकाबले मीनाकारी में महिलाओं का दबदबा चलता है। गुलाबी मीनाकारी करने वाली ज्यादातर महिलाएं गृहणी हैं। गुलाबी मीनाकारी कला को वापस निखारने के लिए सरकार की ओर से बनारस की महिलाओं को यह कारीगरी सीखने के प्रत्येक दिन 300 रुपए मेहनताना के रूप में मिलते हैं।

मुरादाबाद की पीतल पर 'मरोड़ी नक्काशी' ने जीता था ओबामा का दिल
भारत दुनिया का सबसे बड़ा पीतल के बर्तन बनाने वाला देश है। यहां हजारों वर्षों से पीतल के बर्तन इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इन बर्तनों में बनाई गई पारंपरिक कलाकारी भी दुनियाभर में लोग काफी पसंद करते हैं। यहां तक की पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भी मरोड़ी नक्काशी के दीवाने थे। भारत सरकार से सम्मानित मुरादाबाद के इकराम हुसैन अंसारी ने पीतल के जार पर अपने हाथों से ईसा मसीह का चित्र उकेरकर ओबामा का दिल जीता था। उनकी इस कारीगरी को देख अमेरिका के राष्ट्रपति भवन से इस कला की तारीफ करते हुए पत्र भी लिखा गया था।

पीएम मोदी ने जर्मन चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ को मरोड़ी नक्काशी वाला मटका गिफ्ट दिया है। हाथ से उकेरा गया पीतल का बर्तन है, जो मुरादाबाद की कला है। इस डिजाइन को बनाने के लिए पहले इसका कागज पर स्केच तैयार किया जाता है। फिर इसे बर्तन पर उकेरा जाता है, इस कारीगरी को ही मरोड़ी कहते हैं।

मुरादाबाद के मरोड़ी नक्काशी वाले पीतल के बर्तन 250 रुपए से लेकर 1.5 लाख रुपए तक में बिकते हैं।
मुरादाबाद के मरोड़ी नक्काशी वाले पीतल के बर्तन 250 रुपए से लेकर 1.5 लाख रुपए तक में बिकते हैं।

पुरातत्व अभिलेखों को देखें को भारत में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में पीतल लोकप्रिय हो गया था और ज्यादातर देवी-देवताओं की मूर्तियां भी पीतल से बनाई जाती थीं। मुरादाबाद में सबसे ज्यादा पीतल के बर्तन बनाए जाते हैं और इनपर नक्काशी होती। मुरादाबाद में बने पीतल के बर्तन अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, जर्मनी, एशिया और मिडिल ईस्ट के कई देशों में एक्सपोर्ट किए जाते हैं। इसलिए मुरादाबाद को पीतल नगरी कहा जाता है।

फिल्मों में हीरोइनों ने 'जरी- ज़रदोज़ी' को आम महिलाओं तक पहुंचाया
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन को पीएम मोदी ने ज़रदोज़ी बॉक्स में इत्र की शीशियां गिफ्ट में दी हैं। ज़रदोज़ी के बक्से को लखनऊ में तैयार किया गया है, जिसे फ्रेंच रंगों से खादी रेशन और साटन के कपड़े पर हाथ से कढ़ाई कर बनाया गया है।

सोने और चांदी के चमकीले धागे को बारीक सुई में लपेटे, कपड़ों पर करिश्माई बुनाई करने की कला को ज़रदोज़ी कहते हैं। असल में जरदोजी का नाम फारसी से आया है, जिसका मतलब है सोने की कढ़ाई। सुनहरे धागे की यह कला 12वीं शताब्दी में दिल्ली पहुंची। मुगल बादशाह अकबर के समय में राजा-रानियों की पोशाकें जरी के धागे से तैयार होती थी। उस समय ज़रदोज़ी का काम काफी फला-फूला और सबसे ज्यादा लखनऊ के कारीगरों ने इसे अपनाया। आज लखनऊ में ही इस काम से करीब 4 लाख लोग जुड़े हुए हैं। ज़रदोज़ी कढ़ाई से साड़ी, लहंगा-चोली, पर्दे, तकिया, बैग, जानवरों का श्रंगार, बटुआ, जूते, बेल्ट और कोट आदि सजाए जाते हैं।

लखनऊ में तैयार हुए जरी-ज़रदोज़ी के कपड़े सऊदी अरब, अमेरिका, सिंगापुर आदि देशों में जाते हैं।
लखनऊ में तैयार हुए जरी-ज़रदोज़ी के कपड़े सऊदी अरब, अमेरिका, सिंगापुर आदि देशों में जाते हैं।

एक समय पर सिर्फ शाही परिवारों और परंपराओं तक सीमित रही जरी आज आम आदमी तक पहुंच चुकी हैं। इसका श्रेय हम भारतीय सिनेमा को भी दे सकते हैं। 1970 के दशक में ज़रदोज़ी का कार्य काफी सीमित था। मगर 1980 में बॉम्बे में कई हिंदी फिल्मों में हीरोइनों की कास्टयूम को रॉयल लुक देने के लिए डिज़ाइनरों ने जरी-ज़रदोज़ी को अपनाया। पहली बार यह कला लखनऊ की सीमा से बाहर आई। 1980 से 2000 के बीच पहली बार ज़रदोज़ी के काम को उद्योग के रूप में स्वीकारा गया। लखनऊ के आसपास के जिलों से कारीगर जरी का काम सीखने के लिए शहर पहुंचने लगे। ज़रदोज़ी की कढ़ाई वाले कपड़ों की डिमांड देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर में है।

गुजरात के कच्छ से निजामाबाद पहुंची ब्लैक पॉटरी
प्रधानमंत्री ने जापान के पीएम फुमियो किशिदा को ब्लैक पॉटरी पीस गिफ्ट किया है। गुजरात से होते हुए उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के निजामाबाद शहर में पहुंची मशहूर ब्लैक पॉटरी को तैयार करने के लिए विशेष तरीका अपनाया जाता है। दुनियाभर में मिट्टी के बर्तन बनाए जाते हैं मगर सिर्फ भारत ऐसा देश है यहां काली मिट्टी के बर्तन तैयार होते हैं जो इसे विश्वभर में अलग पहचान देता है।

निजामाबाद में बनने वाले काली मिट्टी के बर्तन को खास तरीके से बनाया जाता है। इन्हें बिना ऑक्सीजन की भट्टी में तैयार किया जाता है, इसलिए इसका रंग काला पड़ जाता है। औरंगजेब के मुगल काल में गुजरात के कच्छ क्षेत्र से कुछ कुम्हार निजामाबाद चले गए। वहां मिट्टी से बने पात्रों पर चांदी का पैटर्न बनाया गया। चांदी के तारों से बर्तनों को सजाया जाता। यह कला इलाहाबाद के बिदरीवेयर से प्रेरित है। इन बर्तनों को खास निजामाबाद की महीन मिट्टी से बनाया जाता है। इन्हें तपाने के बाद वनस्पतियों के पाउडर से धोया जाता है, सरसों का तेल मला जाता है। इसे तरह-तरह के पैटर्न से सजाया जाता है। बंद भट्टी में चावल की भूसी के साथ धुएं वाली आग में तपाया जाता है, इससे ब्लैक पॉटरी पर अलग से चमक दिखाई देती है। अंत में एक बार फिर तेल घिसकर पकाया जाता है।

ब्लैक पॉटरी को करीब 3 से 4 बार अलग-अलग भट्टी में पकाया जाता है, जो इसे मजबूत और खास बनाता है।
ब्लैक पॉटरी को करीब 3 से 4 बार अलग-अलग भट्टी में पकाया जाता है, जो इसे मजबूत और खास बनाता है।

मिट्टी का बर्तन तैयार होने पर उसके खांचों में सिल्वर पाउडर भरा जाता है जो इसे रॉयल लुक लेते है और सबसे अंत में पॉलिश की जाती है। निजामाबाद की ब्लैक पॉटरी देश और विदेश में प्रसिद्ध है। इससे सिर्फ बर्तन ही नहीं बल्कि सजावटी सामान जैसे गुलदस्ते, प्लेट, दीपक, चाय के सेट, कटोरे और भगवान की मूर्तियां भी तैयार होती हैं। 2015 में निजामाबाद की ब्लैक पॉटरी की कला को जीआई टैग के साथ अलग पहचान मिली है। निजामाबाद में 200 से ज्यादा परिवार इस शिल्पकला में शामिल हैं।

अयोध्या मंदिर ने बढ़ाई लकड़ी के 'राम दरबार' की डिमांड
वाराणसी में लकड़ी के खिलौनों का उद्योग कई वर्षों पुराना है। अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के बाद से ज्यादातर पर्यटक अयोध्या और फिर काशी में विश्वनाथ मंदिर के दर्शन करने जरूर आते हैं। यही कारण है कि खिलौना व्यापारियों ने ज्यादातर लकड़ी के राम दरबार बनाना शुरू किया और आज देशभर में इसकी डिमांड बढ़ गई है। बनारस में बनने वाले लकड़ी के राम दरबार सबसे ज्यादा धार्मिक पर्यटन स्थल पर बेचे जाते हैं।

पीएम मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो को काशी में बना राम दरबार गिफ्ट किया है। उसकी भी एक अलग कहानी है। वह गूलर की लकड़ी पर लाक की पेंट का इस्तेमाल कर बनाया गया है। इसमें श्रीराम, देवी सीता, भगवान हनुमान और जटायु की प्रतिमा बनी हुई है।

गूलर की छाल और पत्तों से सूजन और दर्द कम हो जाता है, पुराने घाव भी दूर होते हैं।
गूलर की छाल और पत्तों से सूजन और दर्द कम हो जाता है, पुराने घाव भी दूर होते हैं।

पीपल, तुल्सी, बरगद और बेल की तरह ही गूलर के पेड़ को भी हिंदू धर्म में पूजा जाता है। इसे शुक्र ग्रह से भी जोड़ा जाता है जोकि जीवन में भौतिक सुख देने वाला माना जाता है। गूलर एक औषधीय पौधा है जिसके फल, छाल, पत्ते और जड़ का इस्तेमाल से कई बीमारियां दूर होती हैं।

वाराणसी के लकड़ी खिलौने उद्योग में अब राम दरबार भी बन रही है। लकड़ी खिलौना उद्योग से जुड़े अमर अग्रवाल और बिहारी लाल अग्रवाल ने बताया कि काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण और अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास के बाद पर्यटकों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है। इससे लकड़ी के खिलौना उद्योग को काफी मदद मिली है। कोरोना के बावजूद अगले एक साल तक के लिए ऑर्डर मिल चुका है।

विदेशी लीडर को गिफ्ट देने से 250 करोड़ की इंडस्ट्री को मिलेगा बूस्ट
साल 2018 की शुरुआत में उत्तर प्रदेश सरकार ने हर जिले में 'एक जिला एक उत्पाद' के तहत उस क्षेत्र के शिल्प को बढ़ावा देने की योजना शुरू की थी। इन इंडस्ट्री में बूस्ट लाने के लिए 250 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया। एमिटी स्कूल ऑफ सोशल साइंस के सोशियोलॉजिस्ट प्रशांत आर चौहान बताते हैं कि ग्लोबल लीडर्स को इस तरह के गिफ्ट देने के पीछे कई लॉजिक और फायदे होते हैं।
- विदेशी लीडर को गिफ्ट देने पर विदेशी मीडिया इसे कवरेज देती है, इस तरह भारतीय शिल्प का ग्लोबल प्रचार होता है।
- विदेशी प्रदर्शनी में शिल्पकारों को भाग लेने का मौका मिलता है।
- एक्सपोर्ट बढ़ता है व्यापार बढ़ता है। जो लोग ऐसे शिल्प पसंद करते हैं वह उसे अपने देश में आयात करते हैं।
- आर्ट एंड कल्चर से भारत का प्रतिनिधित्व होता है। विदेशी प्रतिनिधि को हम अपने देश की याद दिलाते हुए भी ऐसे गिफ्ट देते हैं जो हमारे कल्चर को बढ़ावा दे।
- ऑनलाइन शॉपिंग का दौर है, अब लोग बिना दूसरे राज्य या क्षेत्र में पहुंचे बिना भी ऑनलाइन इन शिल्पों को अपने घर मंगवा सकते हैं।
- अनोखे उत्पादों के बारे में जागरूकता बढ़ती है।