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डिमांड में होम ट्यूशन:कोरोना की वजह से परेंट्स ने बच्चों को नहीं भेजा स्कूल, प्ले स्कूल और प्राइमरी स्कूल के बच्चे होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित

6 दिन पहलेलेखक: राधा तिवारी
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कोरोना महामारी का असर देश के हर क्षेत्र पर दिख रहा है। लोगों की नौकरी गई, लाखों लोग बेरोजगार हुए लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान पढ़ाई के क्षेत्र में हुआ और इसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा बदलाव भी हुआ। प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे अब सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं। असर की रिपोर्ट के मुताबिक, 2018 में राष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ 30 फीसदी बच्चे ही ट्यूशन लेते थे पर, 2021 में यह आंकड़ा बढ़कर 40 फीसदी पहुंच गया है। ट्यूशन लेने वालों में सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के छात्र-छात्राएं दोनों ही शामिल हैं। स्टडी में पाया गया कि छात्र, विशेष रूप से गरीब परिवारों के छात्र, निजी ट्यूशन पर पहले से कहीं अधिक निर्भर हैं। स्टडी में यह भी कहा गया कि कम पढ़े-लिखे पेरेंट्स भी अब अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर जागरूक हैं कि कहीं वे पढ़ाई में पिछड़ ना जाए।

आर्थिक तंगी के कारण कई बच्चे सिर्फ ट्यूशन पर निर्भर
आर्थिक तंगी के कारण कई बच्चे सिर्फ ट्यूशन पर निर्भर

सरकारी स्कूलों में 7% एडमिशन बढ़ा
एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (Annual Status of Education Report-ASER) यानी 'असर' की रिपोर्ट में कहा गया कि कई पेरेंट्स की जॉब चली गई। यही कारण है कि लोगों ने आर्थिक तंगी के कारण अपने बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में ना करवा कर सरकारी स्कूलों में करवाया है। इस वजह से सरकारी स्कूलों में 7 फीसदी एडमिशन बढ़ गए और होम ट्यूशन की डिमांड बढ़ गई।

बच्चों की पढ़ाई को लेकर पेरेंट्स जागरूक
बच्चों की पढ़ाई को लेकर पेरेंट्स जागरूक

कई पेरेंट्स ने बच्चों की ट्यूशन भी बंद करवायी
नोएडा में बेस्ट ट्यूशन टीचर डॉट कॉम के डायरेक्टर राज सिंह
कहते हैं कि पहले की तुलना में होम ट्यूशन या ऑनलाईन ट्यूशन की डिमांड बढ़ी है। लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहते हैं। वहीं, दूसरे पहलू पर बात करें तो कई पेरेंट्स की जॉब जाने की वजह से उन्होंने अपने बच्चों की ट्यूशन बंद करा दी है।

सेविंग खत्म हुआ तो शुरू किया ट्यूशन
बेंगलुरु में एक एमएनसी की एक्स-एंप्लायी स्वाति बताती है कि कोरोना के समय उनकी जॉब चली गई और उस समय जॉब ढूंढना काफी मुश्किल था। हार कर उन्हें अपने होम टाउन आना पड़ा। जहां नौकरी ना मिलने की वजह से वे काफी बुरे दौर से गुजरी। कुछ सेविंग थी जिससे परिवार का खर्चा किसी तरह चल पा रहा था। फिर ऑनलाइन ट्यूशन का ख्याल आया और आज मैं अपने पुराने ऑफिस से ज्यादा पैसे हर महीने अपने परिवार के साथ रहकर कमा रही हूं।

सॉफ्टवेयर इंजिनियर ने की बागवानी
हैदराबाद में एक टेक कंपनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर रहीं अवन्ति पोखरियाल कहती हैं कि कोरोना के पहले लॉकडाउन में कंपनी ने वर्क फ्रॉम होम के साथ सैलरी में भी डिडक्शन कर दिया। दूसरी लहर में मेरे पति की जॉब चली गई। तब घर चलाना काफी मुश्किल हो गया था। हम वापस अपने शहर आ गए। मेरे में पति ने बागवानी में अपना समय देना शुरू किया और मैं आसपास के बच्चों को पढ़ाने लगी। साथ ही मैंने ऑनलाइन क्लासेज लेना भी स्टार्ट कर दिया। आज मैं अपनी फैमिली के साथ अपने शहर में हूं।

कोरोना के बाद नहीं दिखी एडमिशन में कमी
डीएवी स्कूल की कॉडिनेटर रेणु छिब्बर कहती हैं कि कोरोना से बच्चों के एडमिशन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। पहले की तरह अभी भी स्कूल में एडमिशन हो रहें है या यूं कहें कि पहले से ज्यादा अब एडमिशन हो रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई पहले की तरह ही चल रही है। कुछ क्लासेज ऑनलाइन तो कुछ ऑनलाइन हो रहे हैं। सारे टीचर्स पहले की तरह ही स्कूल आते हैं और हर क्लास में 4 से 5 बच्चे आते हैं।

ऑनलाइन स्टडी से बच्चों के दिमाग पर गहरा असर​​​​​​​
मनोचिकित्सक संजीव त्यागी कहते हैं कि कोरोना के बाद से बच्चे पूरे तरीके से डिजिटली डिपेंड हो गए हैं। ऑनलाइन स्टडी से बच्चों के दिमाग पर गहरा असर देखने को मिल रहा है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित प्ले स्कूल और प्राइमरी स्कूल के बच्चे होंगे क्योंकि उनमें प्री-प्राइमरी क्लास और डिजिटल उपकरण का कोई अनुभव नहीं होगा। इससे बच्चे के भविष्य में कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसलिए पेरेंट्स अपने बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। उनके साथ इनडोर और आउटडोर गेम्स खेले।

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