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बीवियों को भी तलाक का हक देता है इस्लाम:महिलाएं तलाक-ए-हसन, खुला, फस्ख, तलाक-ए-तफवीज के जरिए शौहर से हो सकती हैं अलग

एक महीने पहलेलेखक: मरजिया जाफर
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तीन तलाक रोकने के लिए सरकार ने कानून बना दिया लेकिन आज भी ‘तलाक-ए-हसन’ के जरिये तीन तलाक हो रहे हैं। इसके तहत शौहर अपनी बीवी को तीन महीने तक हर महीने एक बार ‘तलाक’ बोलकर तलाक दे सकता है। अब ये समझिए कि जो कानून बना है वह एक बार में तीन बार तलाक बोलकर पत्नी को छोड़ने वाली प्रथा के खिलाफ था और अब तीन महीने में तीन बार तलाक बोलने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। जो महिला सुप्रीम कोर्ट गई है उसके पास अपनी शादी को बचाने के लिए बस 48 घंटे और हैं, अगर इस दौरान कोई फैसला नहीं हुआ तो उसका पति तीसरी बार तलाक कह देगा। मुसलमानों में ‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर देश की सबसे बड़ी अदालत सुनवाई करेगी।

मुस्लिम समुदाय में तलाक शरीयत के हिसाब से होता है।
मुस्लिम समुदाय में तलाक शरीयत के हिसाब से होता है।

समान नागरिक संहिता नहीं, शरीयत के तहत होता है तलाक

मुस्लिम समुदाय में तलाक शरीयत के हिसाब से होता है। शरीयत में तलाक-ए-हसन की इजाजत दी गई है। गाजियाबाद की बेनजीर हिना ने कोर्ट में दाखिल की गई अपनी याचिका में कहा है कि एकतरफा तलाक देने का हक सिर्फ पुरुषों को है। उन्होंने मांग की है कि सरकार सभी धर्मों, महिलाओं और पुरुषों के लिए तलाक का कानून एक समान बनाए। उनका आरोप है कि उनके पति ने दहेज के लिए उत्पीड़न किया और विरोध करने पर बात एकतरफा तलाक पर पहुंच गई।

क्या है तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया

तलाक-ए-हसन में पति तीन महीने के अंतराल पर तलाक कहकर या लिखकर दे सकता है। इसमें तीसरी बार तलाक कहने से पहले तक शादी मान्य मानी जाती है और जैसे ही तीसरी बार तलाक कहा गया निकाह रद्द हो जाएगा। इसमें ‘इद्दत का समय’ यानी दोबारा शादी करने के बीच का गैप 90 दिन यानी तीन महीने का होता है। इसके बाद पति-पत्नी दोबारा शादी कर सकते हैं लेकिन पत्नी को हलाला करना पड़ता है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-मुशावरत (एआईएमएम) के जनरल सेक्रेटरी मौलाना मोहम्मद हामिद नोमानी कहते हैं कि तलाक की व्यवस्था इसलिए बनाई गई थी कि अगर पुरुष और महिला खुश नहीं हैं तो वे शादी खत्म कर सकें।

महिलाओं को भी है तलाक देने का हक

मुस्लिम समुदाय में औरतों को भी तलाक का हक है। इस्लाम औरत को अपनी मर्ज़ी से तलाक लेने का इजाजत देता है। मौलाना मोहम्मद हामिद नोमानी कहते है इस्लाम में ‘खुला’ मतलब औरत के तलाक के हक के बारे में है।

आइए जानते हैं कि क्या हैं इन तीनों के मायने…

खुला-मौलाना नोमानी कहते हैं खुला मतलब अलग होना है। अगर पति-पत्नी में रिश्ता निभाना मुश्किल हो जाए तो पत्नी पति से अलग होने का प्रस्ताव रख सकती है। यह एक तरह से तलाक की साझा प्रक्रिया है जिसमें पत्नी अपने दहेज के एवज में खुला मांगने के लिए पति को राजी करती है।

फस्ख-अगर पति पत्नी को किसी वजह से तलाक नहीं दे रहा हो और उसके साथ ज्यादती करता है तो ऐसे में काजी और जज को उनका निकाह रद्द करने का अधिकार होता है वो जब चाहे ये शादी को खत्म कर सकते हैं।

तलाक-ए-तफवीज- एक शरिया कानून है। इसमें निकाह के दौरान ही बीवी को तलाक का हक दिया जाता है। इसका जिक्र निकाहनामे में होता है साथ ही मौलाना को इस मामले की जानकारी होती है। अगर बीवी को लगता है कि शौहर के साथ वो खुश नहीं है तो वो उस हक़ का प्रयोग कर तलाक ले सकती है।

बराबरी की बुनियाद है इस्लाम में शादी

कुरान में शादी को पुरुष-महिला के बीच एक विधिवत करार के रूप में देखा गया है और इसके चलते दोनों ही पक्षों को करार रद्द करने का भी हक है। शादी के लिए दोनों पक्षों का बालिग या होश-ओ-हवास में होना जरूरी है। मतलब, वही व्यक्ति बालिग है जो एक परिपक्व दिमाग और विकसित शरीर रखता हो, जिसकी मर्जी और नामर्जी चलती हो। यही नियम महिलाओं के साथ भी लागू होता है यानी जो महिला करार करने के योग्य हो, वह इस समझौते को रद्द भी कर सकती है।

खुला लेने की अलग-अलग वजह

निकाह के रिश्ते में पत्नी तीन वजहों से खुला या तलाक की कानूनी करवाई शुरू कर सकती है। असल में इन तीन आयामों में जिंदगी के सभी पहलू आ जाते हैं। पति फर्ज न निभा पा रहा हो मुस्लिम महिलाएं पति का गलत व्यवहार सहने के लिए मजबूर नहीं है। उसे प्यार , इज्जत, सुख पाने का हक है। इस्लाम के इन्हीं मूल्यों के चलते देश में मुस्लिम विवाह विच्छेद कानून, 1939 बनाया गया। यह कानून सिर्फ मुस्लिम महिलाओं के तलाक के हक के लिए है। इसके मुताबिक भारत में कोई भी मुस्लिम महिला अपने पति से तलाक ले सकती है।

  • शारीरिक कमी या ऐब, पति द्वारा खराब बर्ताव, कानूनी क्रूरता।
  • पति शारीरिक फर्ज निभाने में नाकाम है तब पत्नी खुला ले सकती है।
  • पति का चेहरा आकर्षक न लगने पर भी पत्नी के खुला ले सकती है।
  • पति समय पर घर न लौटे या रोज देर रात घर आए तब भी पत्नी खुला ले सकती है।

मुस्लिम महिला पति से नौ वजहों के आधार पर खुला ले सकती है

डिजोल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट 1939 सिर्फ मुस्लिम महिला के तलाक के हक़ के लिए है। इसके मुताबिक भारत में मुस्लिम महिला अपने पति से नौ वजहों के आधार पर तलाक ले सकती है।

इद्दत क्या है

इद्दत का मतलब ‘प्रतीक्षा की अवधि’ मुस्लिम महिलाएं पति के गुजर जाने या तलाक के बाद इसका पालन करती हैं। इसे पवित्रता का समय भी कहा जाता है। इससे पहले कि वह दोबारा शरियत के कानूनी के हिसाब से शादी नहीं कर सकती है। इद्दत की अवधि का पालन करने का कारण यह पता लगाना है कि महिला गर्भवती है।

जब कोई विवाह मृत्यु या तलाक द्वारा भंग किया जाता है तो महिला को एक निश्चित समय के भीतर शादी करने से मना किया जाता है। इसे इद्दत कहते हैं।

तीन चन्द्रमास

आम तौर पर, पति द्वारा तलाक दी गई महिला के लिए यह अवधि तीन महीने होती है, लेकिन अगर शादी के बाद फिजिकल रिलेशन नहीं बना तो 'इद्दत' की कोई शर्त नहीं होती है। जिस महिला के पति की मृत्यु हो गई हो, उसके लिए इद्दत पति की मृत्यु के बाद के चार महिना दस दिन होती है, चाहे शादी के बाद फिजिकल रिलेशन हुआ हो या नहीं।

बच्चे के जन्म के बाद

अगर कोई प्रेग्नेंट महिला विधवा हो जाती है या उसका तलाक हो जाता है, तो 'इद्दत तब तक चलती है जब तक बच्चे का जन्म नहीं होता। बच्चे के जन्म के बाद वो महिला दुबारा किसी से भी शादी कर सकती है। उसके लिए समय और अवधि के मुताबिक कोई इद्दत की शर्त नहीं है।

तीन पीरियड तक इद्दत का पालन

तीन पीरियड साइकिल की मुताबिक तलाकशुदा महिला को किसी गैर मर्द के साथ रिलेशन में आने की इजाजत नहीं है। किसी भी रिश्ते में आने से पहले उसे अपनी इद्दत की अवधी को पूरा करना जरूरी है।

हलाला क्या है

इस्लाम में औरत को तीन तलाक देने के बाद दोबारा उसी औरत से विवाह करना है तो उसका निकाह पहले किसी और शख्स से कराया जाएगा और बाद में फिर से तलाक यानी अपनी पत्नी से दोबारा शादी करने के लिए उसका निकाह किसी और से कराने की प्रक्रिया को हलाला कहते हैं।