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महिलाएं जिन्हें चुनावी चौसर पर जीतते-जीतते मिली मात:2017 के चुनावी रण में कोई 171 वोट से हारी तो किसी ने छुड़ाए प्रतिद्वंदियों के पसीने

नई दिल्लीएक वर्ष पहले
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कल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव परिणाम आने हैं। उम्मीदवारों की धुकधुकी बढ़ी हुई है। हार जीत का फैसला कल होगा। चुनाव परिणाम से 24 घंटे पहले हम बात करेंगे उत्तर प्रदेश की उन महिलाओं की, जो साल 2017 के विधानसभा चुनाव में बहादुरी से लड़ी। हर मोर्चे पर डटी रहीं। सारे समीकरण साधे। जीत का इत्मीनान भी था, लेकिन उनकी नैया मझधार पार कर गई और किनारे पर आकर डूबी। जीतते-जीतते हार जाने की टीस कहीं ज्यादा चुभती हैं। भास्कर वुमन की रिपोर्ट में पढ़िए, पिछले चुनाव में किन सीटों पर हार-जीत का अंतर बहुत कम था? कौन हैं वे महिलाएं जो जीतते-जीतते हार गईं?

1. डुमरियागंज सीट: प्रदेश में सबसे कम वोटों से हारने वाली नेता सैयदा खातून
पिछले चुनावों में डुमरियागंज सीट से बसपा प्रत्याशी सैयदा खातून प्रदेश में सबसे कम वोटों से हारने वाली महिला नेता रहीं। इस सीट से भाजपा के उम्मीदवार राघवेंद्र प्रताप सिंह सिर्फ 171 वोटों से जीते थे। बसपा की सैयदा खातून जीतते-जीतते रह गई थीं। भाजपा के उम्मीदवार राघवेंद्र प्रताप सिंह को 67,227 और सैयदा खातून को 67,056 वोट मिले थे। यानी कि सैयदा खातून को सिर्फ 171 वोटों से मात मिली। हालांकि, इस बार सैयदा खातून ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा।

सैयदा खातून इस साल बहुजन समाजवादी पार्टी को छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गईं।
सैयदा खातून इस साल बहुजन समाजवादी पार्टी को छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गईं।

2. बांसडीह: केतकी सिंह ने सपा उम्मीदवार को दी थी कड़ी टक्कर
बांसडीह विधानसभा सीट से साल 2017 में निर्दलीय उम्मीदवार केतकी सिंह ने चुनावी मैदान में अपने प्रतिद्वंदी सपा प्रत्याशी राम गोविंद चौधरी को कड़ी टक्कर दी थी। हालांकि, केतकी सिंह 1,687 वोटों से राम गोविंद चौधरी से हार गईं थीं। राम गोविंद चौधरी को 51,201 और केतकी सिंह को 49,514 वोट मिले थे। इस बार केतकी सिंह भाजपा एवं निषाद पार्टी गठबंधन की उम्मीदवार के तौर पर बांसडीह विधानसभा से मैदान में हैं। बांसडीह विधानसभा बलिया जिले की हाई प्रोफाइल सीट है।

बांसडीह विधानसभा क्षेत्र की भाजपा प्रत्याशी केतकी सिंह का साल 2017 के चुनाव में धमकी देने का वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में वह किसी को दस जूते मारने और एक गिनने की बात कह रही थी।
बांसडीह विधानसभा क्षेत्र की भाजपा प्रत्याशी केतकी सिंह का साल 2017 के चुनाव में धमकी देने का वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में वह किसी को दस जूते मारने और एक गिनने की बात कह रही थी।

3. महमूदाबाद: सपा उम्मीदवार से 1% वोटों से हारीं आशा मौर्य
साल 2017 के विधानसभा चुनाव में सीतापुर जिले की महमूदाबाद सीट पर सबसे अधिक 72.41% मतदान हुआ। इस सीट से भाजपा प्रत्याशी आशा मौर्य को अपने प्रतिद्वंदी सपा उम्मीदवार नरेंद्र सिंह वर्मा से केवल 1% वोटों से मात मिली थी। नरेंद्र सिंह वर्मा को 81,469 और आशा मौर्य कुल 79,563 वोट मिले थे। यानी कि केवल 1906 वोटों से जीतते-जीतते हार गईं।

भारतीय जनता पार्टी ने इस बार के विधानसभा चुनाव में भी महमूदाबाद सीट से आशा मौर्य पर अपना दांव खेला है।
भारतीय जनता पार्टी ने इस बार के विधानसभा चुनाव में भी महमूदाबाद सीट से आशा मौर्य पर अपना दांव खेला है।

4. नगीना: ओमवती देवी ने सपा विधायक को दी टक्कर
नगीना विधानसभा सीट से साल 2017 में सपा प्रत्याशी मनोज कुमार पारस जीते थे। वहीं, चुनावी मैदान में उनके सामने खड़ीं बसपा प्रत्याशी ओमवती देवी केवल 4% वोटों से हारी थीं। मनोज पारस को 77,145 और ओमवती को 69,178 वोट मिले थे।

नगीना विधानसभा सीट से साल 1996, 2002 और 2007 में ओमवती देवी विधायक रहीं, लेकिन पहले दो चुनाव में वह सपा और 2007 का चुनाव बसपा की टिकट से जीतीं।
नगीना विधानसभा सीट से साल 1996, 2002 और 2007 में ओमवती देवी विधायक रहीं, लेकिन पहले दो चुनाव में वह सपा और 2007 का चुनाव बसपा की टिकट से जीतीं।

5. कैराना: दूसरे नंबर पर रहीं मृगांका सिंह
कैराना से भाजपा उम्मीदवार मृगांका सिंह अपने प्रतिद्वंदी और सपा प्रत्याशी नाहिद हसन से करीब 10% वोटों से हारी थीं। विजेता नाहिद हसन 98,830 वोट मिले थे, वहीं मृगांका की झोली में 77,668 वोट आए थे। बता दें कि मृगांका सिंह दिवंगत सांसद हुकुम सिंह की बेटी हैं।

इस साल कैराना सीट पर हुकुम और हसन परिवार की बेटियां मैदान में हैं। बाबू हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह जीत के इरादे से उतरी हैं तो दूसरी तरफ राजनीति में अपना भविष्य तलाश रहीं हसन परिवार की इकरा हसन पहली बार चुनाव लड़ रही हैं।
इस साल कैराना सीट पर हुकुम और हसन परिवार की बेटियां मैदान में हैं। बाबू हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह जीत के इरादे से उतरी हैं तो दूसरी तरफ राजनीति में अपना भविष्य तलाश रहीं हसन परिवार की इकरा हसन पहली बार चुनाव लड़ रही हैं।

6. बालामऊ सीट: नीलू सत्यार्थी ने भाजपा प्रत्याशी को दी टक्कर
बालामऊ (सुरक्षित) विधानसभा सीट साल 2012 में हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई। साल 2017 यानी कि इस सीट पर दूसरी बार हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रामपाल वर्मा ने जीत दर्ज की थी, जबकि बसपा उम्मीदवार नीलू सत्यार्थी दूसरे और सपा प्रत्याशी सुशीला सरोज तीसरे नंबर पर रहीं थी। विधायक रामपाल वर्मा को 74,917, नीलू सत्यार्थी को 52,029 और सुशीला सरोज को 43,507 वोट मिले थे।

पिछले विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की नीलू सत्‍यार्थी 22,888 वोट से हार गईं थीं। इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रामपाल वर्मा जीते थे।
पिछले विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की नीलू सत्‍यार्थी 22,888 वोट से हार गईं थीं। इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रामपाल वर्मा जीते थे।

7. लखनऊ कैंट: चुनावी मैदान में नारी शक्ति की जंग
उत्तर प्रदेश की राजधानी में लखनऊ कैंट विधानसभा ऐसी सीट है, जहां हमेशा से ही भाजपा और कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार ही जाते हैं। सपा और बसपा के उम्मीदवारों को इस सीट से कभी जीत नहीं मिली। यहां से 7 बार भाजपा और 7 दफा कांग्रेस जीती है। साल 2017 के भाजपा ने कांग्रेस छोड़कर पार्टी से जुड़ी दिग्गज महिला नेता रीता बहुगुणा जोशी को उम्मीदवार बनाया था। रीता बहुगुणा जोशी ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंदी सपा उम्मीदवार और मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव को हराया था। रीता बहुगुणा जोशी को 95,402 और अपर्णा यादव को 61,606 वोट मिले थे। हालांकि, 2019 में हुए उपचुनाव में भाजपा नेता सुरेश चंद्र तिवारी जीते और विधायक बने।

साल 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले रीता बहुगुणा जोशी ने कांग्रेस पार्टी का हाथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। वहीं इस बार के विधानसभा चुनाव से पहले अपर्णा यादव समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गईं।
साल 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले रीता बहुगुणा जोशी ने कांग्रेस पार्टी का हाथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया था। वहीं इस बार के विधानसभा चुनाव से पहले अपर्णा यादव समाजवादी पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गईं।
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