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चूहों पर प्रयोग से पता चला टैल्कम पाउडर घातक:स्किन से खून में पहुंचता है, बनता है ओवरी और लंग्स कैंसर की वजह

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: ऐश्वर्या शर्मा
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अमेरिका के टेक्सास में रहने वालीं 52 साल की डार्लिन कोकर जानती हैं कि उनकी जिंदगी के दिन कम होते जा रहे हैं। वह मेसोथेलियोमा (Mesothelioma) नाम के जानलेवा कैंसर से जूझ रही हैं। यह बीमारी उनके फेफड़ों के साथ शरीर के बाकी अंगों को भी खराब कर चुकी है। दर्द से जूझते हुए वह हर सांस के लिए लड़ती हैं। आज उन्हें पता है कि उनका ये दर्द उस टैल्कम पाउडर की देन है जिसे वो ताजगी और खुशबू के लिए लगाती रही हैं। उस समय वह यह नहीं जानती थीं कि इस महक को पाने के लिए उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ेगी और इसका जिम्मेदार कौन है। अब जाकर उन्होंने जाना कि जिस बीमारी की चपेट में वो हैं उसकी वजह खतरनाक ‘एस्बेस्टस’ है, जो टैल्कम पाउडर में मौजूद रहता है।

आखिर डार्लिन ‘एस्बेस्टस’ के संपर्क में कैसे आईं? इसके लिए उन्होंने अपने ‘पर्सनल इंजरी लॉयर’ Herschel Hobson से बात की। उन्होंने डार्लिन के घर का मुआयना किया, जहां उन्हें जॉनसन एंड जॉनसन पाउडर रखा मिला। हॉब्सन अपने पुराने केसों की वजह से जानते थे कि जब टैल्क को जमीन से निकाला जाता है तो उसमें एस्बेस्टस भी होता है जिसमें कार्सिनोजन (carcinogen) मिला होता है जो कैंसर का कारण बनता है।

इसके बाद डार्लिन कोकर ने कंपनी के खिलाफ केस किया। यह बात 1999 की है। वह पहली ऐसी महिला थीं जिसने जानलेवा टैल्कम पाउडर के खिलाफ आवाज उठाई। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को तब तक नहीं पता था कि एस्बेस्टस कितना खतरनाक हो सकता है।

यह बात आपको इसलिए बताई जा रही है ताकि आप टैल्कम पाउडर का उपयोग करने से पहले सोचें, क्योंकि इसे हर उम्र का व्यक्ति इस्तेमाल कर रहा है। बचपन में मां ने कभी न कभी आपको टैल्कम पाउडर जरूर लगाया होगा क्योंकि यह हर घर की जरूरत होता है। पसीना आए तो लगा लीजिए, खुजली या रैशेज हो तो तुरंत इसको याद कीजिए। ब्यूटी पार्लर में हर उस क्लाइंट को पहले टैल्कम पाउडर लगाया जाता है जो थ्रेडिंग और वैक्सिंग कराने आता है।

अगर आपने टैल्कम पाउडर लगाया नहीं होगा तो कैरम खेलने के दौरान बोर्ड पर छिड़का जरूर होगा। यानी टैल्कम पाउडर हमारी जिंदगी में इस कदर शामिल है कि इसके बिना ताजगी महसूस नहीं होती।

तो टैल्कम पाउडर की जरूरत कब और कैसे पड़ी। इसके लिए आपको चलना होगा प्राचीन मिस्र में। लेकिन इससे पहले आपको बताते हैं टैल्क शब्द कहा से आया।

भंवरे की कलाकृतियों को टैल्क से चमकाते थे मिस्रवासी

प्राचीन समय में टैल्कम पाउडर नहीं टैल्क का इस्तेमाल होता था। यह पाउडर टैल्क नाम के मिनरल से बनता था। टैल्क नीले, हल्के हरे, सलेटी, गुलाबी, सफेद, पीले, भूरे या सिल्वर रंग का होता है। यह नमी या तेल सोखने में मदद करता है।

प्राचीन मिस्र में भंवरे को शुभ माना जाता था। भंवरे को इतना महत्वपूर्ण माना जाता था कि उसकी कलाकृतियां और मुहरें बनाई जाती थीं। इन कलाकृतियों काे निखारने के लिए भी टैल्क का इस्तेमाल किया जाता। इसका संबंध मिस्र के देवता 'रा' से भी जोड़ा गया।

इतिहासकार मानते हैं कि टैल्क का इस्तेमाल प्राचीन मिस्र में कॉस्मेटिक्स के तौर पर भी किया जाता था। मान्यता थी कि इससे देवता खुश होते हैं।

10,000 ईसा पूर्व में मिस्र में महिला और पुरुष दोनों ही खुशबूदार चीजों का इस्तेमाल करते थे, ताकि उनकी त्वचा मुलायम रहे। इसमें टैल्क भी शामिल था।

टैल्क होता क्या है, इसका पहली बार पता 1880 में लगा। जानिए कैसे?

कनाडा के एक खेत में मिली थी टैल्क की खदान

मिस्र के लोग टैल्क का भले ही इस्तेमाल कर रहे थे, लेकिन उन्हें इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। टैल्क को उसकी पहचान और नाम 1880 के दशक में तब मिली जब उसकी खदान कनाडा के मैडोक में एक खेत में पाई गई। यह टैल्क की पहली खदान थी।

1896 में यहां Henderson Talc Mine नाम की कंपनी खोल दी गई। यहीं से टैल्क ने ब्यूटी बाजार में कदम रखा। भले ही टैल्क की खोज कनाडा में हुई लेकिन दुनिया में भारत सबसे ज्यादा टैल्कम पाउडर का उत्पादन करता है और इसका इस्तेमाल भी सबसे ज्यादा यहां होता है।

अब आपको दोबारा ले चलते हैं जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी के बेबी पाउडर की तरफ? कैसे टैल्क से टैल्कम पाउडर बना, इसके पीछे भी एक कहानी है।

खुजली ने सताया तो बना टैल्कम पाउडर

अमेरिका के डॉ. फ्रेड्रिक.बी.किल्मर टैल्कम पाउडर बनाने वाले पहले व्यक्ति थे। वह फार्मासिस्ट और जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी के साइंटिफिक लैबोरेट्री निदेशक थे। किल्मर ने एक मरीज को खुजली होने के बाद टैल्कम पाउडर बनाया। दरअसल, उस मरीज के हाथ पर प्लास्टर चढ़ा था। जब प्लास्टर काटा गया तो उसे खुजली हाेने लगी। उसने डॉ. किल्मर को इसके बारे में बताया तो उन्होंने इटैलियन परफ्यूम से लैस एक पाउडर नुमा दवा भेज दी। यह बात 1892 की है।

इसके बाद उन्होंने इस बारे में बहुत सोचा और खुजली से आराम पहुंचाने के लिए 1893 में जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी के लिए बेबी पाउडर डेवलप किया। कंपनी ने एक साल बाद इस पाउडर को मार्केट में उतारा।

जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी ने भारत पहुंचाया टैल्कम पाउडर

भारत को आजादी मिलने के एक साल बाद 1948 में पहली बार जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी ने भारतीय बाजार में कदम रखा। इन्होंने इंडिया में बेबी पाउडर लॉन्च किया, जो बच्चों को रैशेज से बचाता था। उस समय इसे मुंबई में ब्रिटिश ड्रग हाउस नाम की लोकल कंपनी बना रही थी।

1957 में जॉनसन एंड जॉनसन इंडिया लिमिटेड बनाकर रजिस्टर की गई। तब यहां केवल 12 वर्कर काम करते थे। 1959 में मुंबई में प्रोडक्शन के लिए मुलुंड प्लांट शुरू किया गया। आगे बढ़ने से पहले नीचे दिए गए ग्रैफिक से जॉनसन एंड जॉनसन के पाउडर को लेकर विवाद जान लीजिए।

हर ब्यूटी प्रोडक्ट में मौजूद रहता है टैल्क

बेबी पाउडर ही नहीं टैल्क का इस्तेमाल फुट पाउडर, फर्स्ट ऐड पाउडर, आईशैडो, ब्लशर, मस्कारा, आईलाइनर और लिक्विड और ड्राई फाउंडेशन समेत कई ब्यूटी प्रोडक्ट्स में हो रहा है। इससे डियोड्रेंट भी बन रहे हैं। कई नामी गिरामी कंपनियां इसका इस्तेमाल कर चुकी हैं। महिलाओं के लिए बाजार में बिक रहे कई हाइजीन प्रोडक्ट्स में भी यह डाला जा रहा है।

टैल्कम पाउडर का इस्तेमाल स्किन को मुलायम और पसीने की बदबू को दूर करने के लिए होता है। हालांकि, यही इस्तेमाल बीमारी का घर बनता है। टैल्कम पाउडर की वजह से कई लोगों को कैंसर हुआ। खासकर महिलाओं में ओवेरियन कैंसर के मामले बढ़े। इसी तरह की एक कैंसर पीड़िता डार्लिन कोकर का जिक्र आपने ऊपर पढ़ा। नीचे दिया इस ग्रैफिक से पता चलता है कि किस किस ब्यूटी प्रोडक्ट में टैल्कम का इस्तेमाल होता है।

अमेरिका में टेस्ट हुए तो 4 हजार महिलाओं को निकला कैंसर

टैल्कम पाउडर के खिलाफ लड़ाई अमेरिका से शुरू हुई। अमेरिका में 10 लाख से ज्यादा महिलाएं टैल्कम पाउडर का इस्तेमाल आज भी करती हैं। लेकिन जो रोज इसे यूज कर रही थीं, उनमें से 4 हजार से ज्यादा महिलाओं में ओवरियन कैंसर मिला। अमेरिकन कैंसर सोसायटी की स्टडी में इस बात का पता चला है।

‘अफ्रीकन अमेरिकन कैंसर एपिडेमियोलॉजी स्टडी’ और ‘न्यू इंग्लैंड स्टडी’ ने अफ्रीकन-अमेरिकन महिलाओं पर शोध किया। इसमें 63% महिलाएं ओवेरियन कैंसर से जूझ रही थीं। ये वो महिलाएं थीं, जाे टैल्कम पाउडर का रोज इस्तेमाल कर रही थीं। एक रिसर्च में टैल्कम पाउडर का भयानक सच चूहों के ओवेरियन टिश्यू पर देखने को मिला। यह रिसर्च 1971 में मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट’ में छपा।

1992 में Obstetrics & Gynecology की स्टडी में पाया गया कि जो महिलाएं 10 साल या उससे लंबे समय से टैल्कम पाउडर को अपने प्राइवेट पार्ट के आसपास रोज लगाती रही हैं उनमें ओवेरियन कैंसर की आशंका बढ़ जाती है। 2013 में Cancer Prevention Research में बताया गया कि टैल्कम पाउडर के इस्तेमाल करने से महिलाओं में कैंसर का खतरा 30% ज्यादा बढ़ जाता है।

आपको यहां एक और जानकारी देते चलें कि जॉनसन एंड जॉनसन कंपनी अमेरिका और कनाडा में 2 साल पहले ही अपने टैल्कम प्रोडक्ट को मार्केट से हटा चुकी है।

क्यों टैल्कम पाउडर को बताया जा रहा है कैंसर एजेंट?

जिस खदान से टैल्क निकलता है, वहीं एस्बेस्टस भी मिलता है। एस्बेस्टस यानी अभ्रक एक प्रकार का सिलिकेट मिनरल है। भारत में इसका इस्तेमाल सीमेंट की शीट बनाने में होता है। एस्बेस्टस पर पहले ही बहुत विवाद रहा है।

भारत में सफेद एस्बेस्टस के खनन पर रोक है। हालांकि इसके आयात, निर्यात और निर्माण उद्योग में इस्तेमाल पर कोई बैन नहीं है।

खून में मिल जाता है एस्बेस्टस

महिलाएं अक्सर पीरियड्स के दौरान रैशेज पड़ने पर टैल्कम पाउडर को अपने प्राइवेट पार्ट के आसपास लगा लेती हैं। इससे बचना चाहिए। गुरुग्राम के क्लाउडनाइन हॉस्पिटल की गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. रितु सेठी ने

बताया कि टैल्कम पाउडर में कई तरह के केमिकल्स होते हैं। इसमें एस्बेस्टस भी मिला है। जब पाउडर लगाते हैं तो उसमें मिक्स एस्बेस्टस के फाइबर्स को स्किन सोख लेती है। स्किन के जरिए यह नसों में प्रवेश करते हैं। ये फाइबर्स ओवरी के टिश्यू की तरफ अट्रैक्ट होते हैं और वहां जमा हो जाते हैं। इससे ओवरी में छोटे-छोटे सिस्ट बन जाती हैं जो गर्भाशय और फैलोपियन ट्यूब को डैमेज करती है। यही ओवेरियन कैंसर का कारण बनता है। इसे यूट्रस कैंसर भी कहते हैं।

इसके लक्षण जल्दी देखने को नहीं मिलते। यह इतना खतरनाक है कि इस बीमारी का पता कैंसर की स्टेज 3 और 4 पर पहुंचने के बाद ही चलता है। इसके बाद कीमोथेरेपी के अलावा ट्रीटमेंट का कोई ऑप्शन नहीं रह जाता।

टैल्कम पाउडर 10 साल से ज्यादा यूज करने पर लंग्स कैंसर का खतरा

फरीदाबाद के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल के पल्मोनोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ. रवि शेखर झा बताते हैं कि किसी को पहले से एलर्जी हो, तो टैल्कम पाउडर के कण और उसकी खुशबू उन्हें अस्थमा का मरीज बना सकती हैं। जिन्हें एलर्जी नहीं है और रेगुलर टैल्कम पाउडर का इस्तेमाल कर रहे हैं तो उनके फेफड़ों पर बुरा असर पड़ सकता है और अस्थमा हो सकता है।

अगर 10 साल से ज्यादा समय के लिए टैल्कम पाउडर का इस्तेमाल किया जाए तो लंग्स कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। साथ ही इसका एक खतरनाक प्रकार है मेसोथेलियोमा। यह कैंसर फेफड़ों की लाइनिंग के बाहर होता है जो लाइलाज है।

बच्चों को टैल्कम पाउडर की जरूरत नहीं

‘अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स’ बच्चों को टैल्कम पाउडर न लगाने की सलाह दे चुकी है। वहीं, कई पीडियाट्रीशियन भी ऐसा करने को मना करते हैं। उनका तर्क है कि अगर बच्चे के शरीर में टैल्कम पाउडर सांस के जरिए प्रवेश कर जाए तो इससे उन्हें संक्रमण, चोकिंग या श्वास संबंधी समस्या हो सकती है। बच्चों को डायपर पहनाने से पहले भी टैल्कम पाउडर लगाने से बचना चाहिए।

हालांकि दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल में बाल चिकित्सक डॉ. नीरज गुप्ता कहते हैं कि बच्चों को टैल्कम पाउडर लगाने की जरूरत ही नहीं है।

रैशेज पर टैल्कम पाउडर नहीं, नारियल तेल लगाइए

टैल्कम पाउडर को लगाने से हमेशा बचना चाहिए। दिल्ली के फोर्टिस हॉस्पिटल में डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. रश्मि शर्मा ने बताया, ‘अक्सर महिलाएं रैशेज होने पर अंडर आर्म्स और प्राइवेट पार्ट के पास पाउडर लगा लेती हैं लेकिन इसकी सलाह नहीं दी जाती। मैं हमेशा नारियल का तेल लगाने की सलाह देती हूं।’

क्या टैल्कम पाउडर से स्किन कैंसर भी हो सकता है इस पर कुछ शोध हुए हैं। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ हवाई की स्टडी में सामने आया कि अगर कई साल तक एस्बेस्टस मिले टैल्क के संपर्क में रोज आए तो यह स्किन में जलन, खुजली, रैश और दर्द कर सकता है। यह आसानी से स्किन के जरिए बॉडी में दाखिल हो जाता है। इससे स्किन कैंसर की आशंका भी बढ़ जाती है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) ने भी इसकी पुष्टि की है।

महिलाओं के लिए यह समझना जरूरी है कि टैल्कम पाउडर जैसे किसी भी ब्यूटी प्रोडक्ट को इस्तेमाल करने से पहले उसमें शामिल सामग्री के बारे में जानकारी जरूर रखें। कहीं वह आपकी सेहत को भविष्य में नुकसान तो नहीं पहुंचा रहा।

ग्रैफिक्सः प्रेरणा झा

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