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मां की मेहनत ने दिखाया रास्ता:पति को हुई बीमारी तो खेत में चलाया हल ताकि बेटा जा सके स्कूल, आज ओडिशा के सुदामा ने खड़ा किया लाखों रुपये का देसी बीज बैंक

नई दिल्ली9 दिन पहले
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  • 40 लाख रुपये सालाना पहुंच चुका है देसी बीज बैंक का टर्नओवर
  • मां से खेती और दादा से सीखे बीजों को बचाने के देसी तरीके के गुर

ओडिशा के बरगढ़ जिले में लाखों रुपये का देसी बीज बैंक चलाने वाले सुदामा साहू का बचपन बेहद मुश्किलों में बीता। पिता खेती कर परिवार का गुजारा करते थे। उनकी तबीयत खराब रहने लगी तो खेती छूट गई। ऐसे में सुदामा की मां ने परिवार चलाने का जिम्मा संभाला। उन्होंने खेती के लिए खेतों में खुद हल पकड़ा, ताकि सुदामा स्कूल जा सकें। हालांकि, खेती में मां के सिखाए गुर ने ही उनकी जिंदगी बदल दी। आज सुदामा के पास देसी बीज बैंक है, जिसका सालाना टर्नओवर 40 लाख रुपये तक पहुंच चुका है।

ससुर और पति के बीमार रहने पर मां ने उठाई जिम्मेदारी
सुदामा के परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। परिवार में उनके दादाजी थे, जो उम्र ज्यादा होने की वजह से कोई काम नहीं कर सकते थे। पिता बीमार रहने लगे तो खेती और मजदूरी छूट गई। तब मां ने ही हौसला बढ़ाया और खुद हल पकड़ लिया। मजदूरी भी की, ताकि परिवार को दो वक्त का खाना नसीब हो सके। सुदामा को भी पढ़ने भेजा।

मां के हौसले को देख खेती को कॅरियर बना लिया
मां के साथ ही साथ सुदामा को भी कम उम्र में ही खेती और मजदूरी करनी पड़ी। मां की मेहनत से इतनी कमाई नहीं हो पाती थी कि वे 12वीं के बाद पढ़ाई कर सके। ऐसे में 16 वर्षीय सुदामा ने मां के हौसले को देखकर खेती को ही अपना जुनून और करियर बना लिया। स्पोटर्स कोटे से मिल रही सरकारी नौकरी के ऑफर को भी ठुकरा दिया।

सुदामा छात्र-छात्राओं को भी ट्रेनिंग देते हैं। उनकी लिखी किताब कुछ स्कूलों में पढ़ाई जा रही है।
सुदामा छात्र-छात्राओं को भी ट्रेनिंग देते हैं। उनकी लिखी किताब कुछ स्कूलों में पढ़ाई जा रही है।

देसी बीज बैंक में 1100 वैराइटी, हो रहा है रिसर्च
सुदामा ने देसी बीजों को लेकर कई सारे प्रयोग किए। बीजों को जुटाने दूर-दूर तक जाते। आज उनके देसी बीज बैंक में 1100 से ज्यादा अलग-अलग वैराइटी के बीज हैं। उन्होंने शुरुआत दो देसी बीजों से की थी। सुदामा अपने देसी बीजों की देशभर में मार्केटिंग कर रहे हैं। कई बड़े संस्थानों में उनके देसी बीजों पर रिसर्च हो रहा है। सुदामा ने देसी बीजों पर कई किताब भी लिख डाली है, जो कई स्कूलों में पढ़ाई जा रही है।

मां से सीखे खेती और दादा से बीजों को सहेजने के गुर
अब 48 साल के हो चुके सुदामा ने मां से खेती करने के गुर सीखे। वहीं अपने दादा से उन्होंने बीजों को सहेजने के गुर सीखे। वह कहते हैं कि खेती से मेरा गहरा लगाव रहा है। उन्होंने कहा, मां और पिता की इच्छा थी कि मैं पढ़ाई करूं, मगर घर चलाने का कोई और जरिया नहीं था। 7वीं क्लास से ही खेती करने लगा। मां भी मुझे खेती करने में मदद करती थीं और सिखाती थीं। हर दिन स्कूल से आने के बाद मां के साथ खेती में लग जाता था। यहीं से मेरा मन खेती में रमने लगा। 12वीं के बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी और पूरा समय खेती को देने लगा।

दादा ने कहा था कि देसी बीज बचाएं तो ही मिलेगा भावी पीढ़ियों को शुद्ध अनाज
सुदामा के मुताबिक, दादाजी ने मुझे देसी बीजों को बचाने के लिए प्रेरित किया। दादाजी कहते थे कि देसी बीजों को बचाने पर ही हम सही खेती कर सकते हैं। देसी बीज हमारे पूर्वजों की विरासत है, अगर हमने इन्हें नहीं सहेजा तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध अनाज खाने को नहीं मिलेगा। फिर मैं देसी बीजों को सहेजने में जुट गया। कई गांवों में जाकर बीज जुटाए।

किसानों को ट्रेनिंग देते हुए सुदामा।
किसानों को ट्रेनिंग देते हुए सुदामा।

देसी बीजों को सहेजने के लिए ली ट्रेनिंग, फिर किसानों को भी बताया
सुदामा ने देसी बीजों को सहेजने के लिए ट्रेनिंग ली और बीज बैंक बनाने और स्टोर करने की पूरी प्रक्रिया समझी। महाराष्ट्र के वर्धा में गांधी आश्रम जाकर ऑर्गेनिक खेती और बीज सहेजने की ट्रेनिंग ली। इसके बाद तो एक तरह से सुदामा के लिए देसी बीजों को बचाना एक मिशन बन गया। खुद तो सहेजते ही साथ में कई राज्यों में घूम-घूमकर किसानों को ट्रेनिंग भी देने लग गए।

एक बोरा अनाज बन गया सुदामा की जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट
सुदामा एक बार छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में किसानों को ट्रेनिंग देने के लिए गए। वहां पर उन्हें एक बोरा अनाज मिला, जिसमें उन्हें 80 नई देसी बीजों की किस्में मिलीं। यही उनकी जिंदगी का अहम मोड़ साबित हुआ। 2009 तक उनके पास 300 से 400 बीजों की वैराइटी जमा हो गई। फिर तो सिलसिला चल पड़ा।

ब्रिटेन, श्रीलंका और भूटान समेत कई देशों की किस्में
सुदामा के देसी बीज बैंक में 1100 से ज्यादा किस्में हैं। इनमें एक हजार से ज्यादा धान और बाकी दलहन फसलों की किस्में हैं। उनके पास देश की नहीं ब्रिटेन, श्रीलंका और भूटान समेत कई देशों की बीजों की देसी किस्में हैं। अनुभव सीड बैंक नाम से उन्होंने एक संस्था बनाई है, जिससे 1,000 से ज्यादा किसान जुड़े हैं। नेशनल राइस इंस्टीट्यूट कटक, एग्रीकल्चर रिसर्च सेंटर मैसूर सहित कई संस्थानों में उनके देसी बीजों पर शोध हो रहे हैं।

ऐसे करते हैं देसी तरीके से देसी बीजों का संग्रह
सुदामा देसी बीजों को बचाने के लिए देसी तरीका ही अपनाते हैं। मिट्टी के मटके में गोबर और हल्दी का लेप करके बीज को रखा जाता है। इसके बाद मटके को धूप में सुखा देते हैं, फिर इसमें बीज डालकर ऊपर से नीम की सूखी पत्तियां डाल दी जाती हैं, ताकि अंदर कीड़े नहीं लगें। हर 3-4 महीने पर इसकी निगरानी की जाती है। सुदामा फिलहाल 5 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। इसमें एक हिस्से पर वे खुद के खाने के लिए अनाज उगाते हैं, जबकि बाकी जमीन पर वे बीज बचाने के लिए खेती करते हैं। फसल तैयार होने के बाद उनके यहां बीजों को सहेजने का काम होता है।