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गाय ने धड़का दिया 13 हफ़्ते की बच्ची का दिल:हृदय नली में आई दिक्कत तो मासूम की हुई सफल ओपन हार्ट सर्जरी

नई दिल्ली5 महीने पहले
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साउथ-ईस्ट लंदन के सिडकप शहर में दिल की बीमारी से जूझ रही 3 महीने की बच्ची की जान गाय के टिशू से बचाए जाने का मामला सामने आया है। हुआ यूं कि 13 हफ्ते की बच्ची के दिल से शरीर के बाकी अंगों में खून पहुंचाने वाली नली में लीकेज होने लगा। बच्ची की हालत इतनी खराब थी कि उसे सांस लेने में दिक्कत होने लगी और उसने दूध पीना बंद कर दिया। ऐसी स्थिति में बच्ची की जान बचाने के लिए लंदन के डॉक्टर ने बच्ची के दिल में गाय के टिशू को फिट किया। ऑपरेशन सफल रहा और आज बच्ची एकदम स्वस्थ है।

शरीर में नहीं पहुंचता था खून, बच्ची को थी यह खतरनाक बीमारी
13 हफ्ते की फ्लोरेंस फॉक्स के माता-पिता जैनी और बिली को 9वें हफ्ते में बच्ची की अनोखी बीमारी के बारे में पता लगा था। जब उसने दूध पीना बिल्कुल बंद कर दिया।

दरअसल फ्लोरेंस को दिल की ऐसी बीमारी थी, जिसमें हृदय से शरीर के बाकी हिस्सों में ऑक्सीजन भरे खून को सप्लाई करने वाली वाल्व में दिक्कत आ जाती है। छोटे बच्चों में इस तरह की दिक्कत को मिक्स्ड मिट्रल वाल्व डिजीज कहा जाता है। अगर सही समय पर इलाज न मिले तो बच्चे की जान भी जा सकती है।

क्या है यह बीमारी, जो दिल को पहुंचाता है नुकसान

मिट्रल वाल्व एक फ्लैप होता है जोकि ऑक्सीजन भरे खून को फेफड़ों से गुजरते हुए पूरे शरीर में पहुंचाता है। अगर इसमें दिक्कत आती है तो खून की नली ठीक से बंद नहीं होती और खून वापस हृदय में पहुंचने लगता है। इससे हृदय को बहुत खतरनाक नुकसान पहुंचता है।

आमतौर पर बच्चे के थोड़ा बड़े होने पर ही ओपन हार्ट सर्जरी कर इसे ठीक किया जाता है। मगर फ्लोरेंस के मामले में डॉक्टर को इसे तुरंत ऑपरेट करने का फैसला लेना पड़ा। तब जाकर बच्ची की जान बचाई जा सकी।

पहली बार छोटे बच्चे पर किया प्रयोग, 2 साल से अपनाई जा रही तकनीक
पिछले साल सितंबर में हुए ऑपरेशन से पहले डॉक्टर भी इस सर्जरी को करने में घबरा रहे थे। क्योंकि ऐसा पहली बार था जब इतने छोटी बच्ची के साथ ऐसा प्रयोग किया जाना था। लंदन के डॉक्टर पहले यही कोशिश कर रहे थे कि बच्ची की खराब वाल्व को ठीक किया जाए, क्योंकि इस तरह की जटिल सर्जरी में छोटे बच्चों के जिंदा बचने की संभावना भी बहुत कम होती है।

पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट डॉ आरोन बेल कहते हैं कि गाय के दिल के वाल्व से मैलोडी वाल्व बनाने की तकनीक पिछले दो सालों से मेडिकल फील्ड में लागू की जा रही थी। मगर इसे आमतौर पर बड़े लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसके आकार में थोड़ी कांट-छांट कर इसे बड़े बच्चों के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा। मगर कुछ ही महीने के बच्चे का दिल बहुत की छोटे आकार का होता है, इसलिए उनके लिए यह तकनीक अच्छी नहीं बताई जा रही थी।

मगर 13 हफ्ते की फ्लोरेंस की हालत बहुत खराब थी, उनके वाल्व के ठीक होने के भी आसार नहीं थे। तब जाकर डॉक्टरों ने यह कदम उठाया और फ्लोरेंस आज तक की सबसे छोटी उम्र की मरीज रहीं जिन्हें ओपन हार्ट सर्जरी से नया वाल्व लगाया गया। डॉक्टर का यह भी मानना है कि अगर कुछ साल पहले बच्ची को यही परेशानी होती तो शायद वह उसका इलाज नहीं कर पाते।

गुब्बारे की मदद से बच्ची के दिल में लगाया गाय का टिशू
कुछ ही महीनों के बच्चों को साथ इस तरह की सर्जरी करना काफी मुश्किल होता है, क्योंकि उनका दिल भी एक अखरोट जितना छोटा होता है।

बच्ची के दिल में गाय का टिशू लगाने के लिए डॉक्टर ने उसकी ओपन हार्ट सर्जरी की थी। सबसे पहले उसके हृदय से खराब वाल्व को बाहर निकाला गया। इसके बाद उसमें गाय के टिशू से बना नया मैलोडी वाल्व को डाला गया। नए वाल्व को उसकी सही जगह पर बिठाने के लिए एक पतली गुब्बारे जैसी चीज का इस्तेमाल किया जाता है। जैसे ही नई वाल्व अपनी जगह पर सेट हो जाती है, गुब्बारे को हटा दिया जाता है। इसके बाद बच्ची के दिल को बंद कर उसे दोबारा काम करने के लिए छोड़ दिया जाता है।

इस छह घंटे की प्रक्रिया के दौरान फ्लोरेंस के हृदय-फेफड़े को बाईपास मशीन पर रखा गया था। जिससे उसके शरीर के बाकी अंगों पर खून और ऑक्सीजन सप्लाई चालू रहे। जबतक की बच्ची की ओपन हार्ट सर्जरी जारी थी।

इस सर्जरी के 8 दिन बाद ही फ्लोरेंस काफी ठीक हो गई थी और वापस अपने घर भी जा सकी। हालांकि उनकी मुश्किलों का सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। फ्लोरेंस जैसे-जैसे बड़ी होती जाएंगी उन्हें अपने वाल्व को समय-समय पर बदलवाना पड़ेगा।

नीला पड़ गया था शरीर, सांस लेने में होती थी दिक्कत
फ्लोरेंस की मां जैनी बताती हैं कि जब फ्लोरेंस कुछ ही हफ्तों की थी वह अक्सर सांस लेने में कुछ अलग आवाज निकालती थी। शुरुआत में मां को लगा कि वह खेल-खेल में ऐसा कर रही हैं। मगर आगे जाकर उन्होंने इसे गंभीरता से लिया।

फ्लोरेंस कुछ नहीं कर पाती थी, उसका शरीर भी धीरे-धीरे नीला पड़ने लगा था। फ्लोरेंस के दिल की दिक्कत के कारण उसके फेफड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचती थी और बच्ची को सांस लेने में दिक्कत होने लगी थी। धीरे-धीरे बच्ची की हालत इसकी खराब हुई वह दूध की एक बूंद भी नहीं पी पाती थी। उसे सांस लेने और दूध पीने में से किसी एक चीज को चुनना पड़ता था। जब जैनी उन्हें डॉक्टर के पास ले गई तो डॉक्टर ने कहा कि बच्ची को बिना इलाज के हॉस्पिटल से बाहर नहीं भेजा जा सकता।

भारत में हर साल 30 हजार बच्चों की होती है हार्ट सर्जरी
भारत में हर साल 2 लाख बच्चे दिल की बीमारी के साथ पैदा होते हैं। इनमें से 30 हजार बच्चों की हार्ट सर्जरी कर उनका जीवन बचाया जाता है।

वहीं यूके में हर साल मिक्स्ड मिट्रल वाल्व डिजीज से प्रभावित 70 बच्चों के ऑपरेशन किए जाते हैं। इस तरह हृदय की वाल्व बदलने के बाद भी मुश्किल से 50% बच्चे की जीवित रह पाते हैं। इसलिए डॉक्टर की कोशिश रहती है कि इन तरह के ऑपरेशन करने की नौबत जल्दी न आए। पीडियाट्रिक कार्डियक सर्जन कोनल ऑस्टिन का कहना है कि इस नई तकनीक से बच्चे जल्दी ठीक हो रहे हैं।