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इंटरनेशनल गर्ल चाइल्ड डे:सावित्रीबाई, मलाला, मिशेल समेत देश और दुनिया की वे महिला हस्तियां, जिन्होंने बच्चियों के अधिकारों के लिए उठाई आवाज

नई दिल्ली4 दिन पहले
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आज इंटरनेशनल गर्ल चाइल्ड डे है। इस अवसर पर हम आपको बता रहे हैं देश और दुनिया की ऐसी महिलाओं के बारे में, जिन्होंने लड़कियों के अधिकारों के लिए अपनी जिंदगी लगा दी। इन महिलाओं को इस सराहनीय काम के लिए लोगों की आलोचना भी सहनी पड़ी, मगर वे झुकी नहीं और लड़कियों के हक के लिए काम करना जारी रखा। इनमें से कुछ आजादी के पहले की हैं तो कुछ आजादी के बाद की।

सावित्रीबाई फुले: देश में लड़कियों के लिए खोला पहला स्कूल
महाराष्ट्र के सतारा जिले के नयागांव में एक दलित परिवार में 3 जनवरी 1831 को जन्‍मीं सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं। सावित्रीबाई फुले शिक्षक होने के साथ भारत के नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता, समाज सुधारक और मराठी कवयित्री भी थीं। बच्चियों की शिक्षा के लिए काम करने की खातिर पत्थर भी खाने पड़े। अपने पति समाजसेवी महात्मा ज्योति राव फुले के साथ मिलकर 1848 में उन्होंने बालिकाओं के लिए एक स्कूल खोला। पुणे में उन्होंने 5 और स्कूल खोले। 1853 में सावित्रीबाई और ज्योतिराव ने एजुकेशन सोसाइटी बनाई, जिसके तक गांवों के चारों ओर लड़कियों के लिए स्कूल खोले गए। महिला अधिकारों के लिए महिला सेवा मंडल भी खाेला।

सावित्रीबाई फुले।
सावित्रीबाई फुले।

रमाबाई रानाडे: महिलाओं की उच्च शिक्षा की वकालत की
1863 में जन्मीं रमाबाई रानाडे देश की पहली महिला सामाजिक कार्यकर्ता और एजुकेटर थीं। 11 साल की उम्र में उनका विवाह हो गया था। उनके पति महादेव गोविंद रानाडे मशहूर समाज सुधारक थे। रमाबाई ने लेडीज सोशल क्लब बनाया। उन्होंने पति के बनाए प्रार्थना समाज और सेवा सदन में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने गरीब लड़कियों की शिक्षा और महिलाओं की हायर एजुकेशन पर जोर दिया। रमाबाई ने देश में महिलाओं के लिए पहला हाईस्कूल खोला। साथ ही महिलाओं के लिए वोकेशनल ट्रेनिंग, हेल्थकेयर इन्फॉर्मेशन नेटवर्क बनाया।

रमाबाई रानाडे।
रमाबाई रानाडे।

मलाला यूसुफजई: आतंकियों से गोली खाई, मगर नहीं छोड़ा मिशन
पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई को लड़कियों की शिक्षा की वकालत करने की खातिर तालिबानी आतंकियों से गोली भी खानी पड़ी। मलाला तो बच गईं, मगर उन्होंने अपने मिशन को नहीं छोड़ा। उन्हें 17 साल की उम्र में 2014 में भारत के कैलाश सत्यार्थी के साथ नोबेल पुरस्कार मिला। मलाला ने देश और दुनिया में लड़कियों की शिक्षा के लिए काम किए हैं।

मलाला यूसुफजई।
मलाला यूसुफजई।

मिशेल ओबामा: दुनियाभर की लड़कियों के लिए शुरू किया लेट गर्ल्स लर्न
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की पत्नी और फर्स्ट लेडी रहीं मिशेल ओबामा दुनियाभर में लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करती रही हैं। 2015 में उन्होंने दुनियाभर की लड़कियों की शिक्षा पर फोकस करने के लिए अमेरिकी पहल लेट गर्ल्स लर्न की शुरुआत की। इस प्रोजेक्ट में 7,000 पीस कॉर्प्स वालंटियर्स काम कर रहे हैं, जो लड़कियों की शिक्षा के लिए मददगार बनते हैं। मिशेल का मानना है कि लड़कियां बदलाव की सूत्रधार होती हैं, जो दुनिया बदल सकती हैं।

मिशेल ओबामा।
मिशेल ओबामा।

एलेन जॉनसन सरलीफ: 3 करोड़ अफ्रीकी लड़कियों के हक में आवाज बुलंद की
2006 से 2010 तक लाइबेरिया की राष्ट्रपति रहीं एलेन जॉनसन सरलीफ ने लड़कियों की शिक्षा के लिए बखूबी काम किया। राष्ट्रपति रहने के दौरान सरलीफ ने देश में बच्चियों के लिए प्राइमरी एजुकेशन में खासा सुधार किया। 2007 में उन्होंने लाइबेरिया को ग्लोबल पार्टनरशिप फॉर एजुकेशन में शामिल करवाया। उन्होंने पूरे अफ्रीका में 3 करोड़ लड़कियों के लिए शिक्षा समेत मूलभूत अधिकारों की वकालत की। उन्हें फोर्ब्स की ताकतवर महिलाओं में जगह बनाई। सरलीफ को 2011 में नोबेल शांति पुरस्कार से भी नवाजा गया।

एलेन जॉनसन सरलीफ।
एलेन जॉनसन सरलीफ।