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आफताब जैसे लड़कों से ब्रेकअप क्यों नहीं करतीं लड़कियां:रिश्ते में पश्चिमी सोच का असर, लेकिन समाज का डर; इसलिए पिटती-कटती हैं महिलाएं

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: मनीष तिवारी
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श्रद्धा की हत्या कर महरौली के जंगलों शव के टुकड़े फेंकने वाले आफताब से पूछताछ पूरी होती, उससे पहले ही दिल्ली में ऐसी ही एक और भयानक घटना सामने आ गई। जिसमें पत्नी ने बेटे के साथ मिलकर अपने पति की हत्या कर दी और शव के टुकड़े करके फ्रिज में रख दिए, फिर धीरे-धीरे उन टुकड़ों को अलग-अलग जगहों पर फेंक दिया।

पति-पत्नी हों या डेटिंग कर रहे कपल्स या फिर लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाले युवा, जो रिश्ते प्रेम की बारिश में सराबोर होने चाहिए, उनमें हिंसा इस कदर बढ़ती जा रही है कि खूंखार अपराधी भी कांप जाएं।

पार्टनर की पिटाई की वजह से कान के पर्दे फट जाते हैं, आंखें फूट जाती हैं और हडि्डयां चकनाचूर हो जाती हैं। दुनिया भर में हर साल लाखों लोग अपने रोमांटिक पार्टनर की हिंसा का शिकार होते हैं। वे गंभीर मानसिक बीमारियों और सेक्शुअली फैलने वाली बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। उनके मानवाधिकार कुचले जा रहे हैं। इसका असर न सिर्फ उनके रिश्तों पर, बल्कि बच्चों पर भी पड़ रहा है।

क्या है 'इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस'?

'इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस' टर्म का इस्तेमाल रोमांटिक रिश्तों में होने वाले एब्यूजिव या एग्रेसिव बिहेवियर के लिए होता है। ऐसे रिश्तों में हिंसक व्यवहार करने वाला पार्टनर प्रेमी हो सकता है, लिवइन पार्टनर हो सकता है, पति हो सकता है और ऐसा साथी भी, जिससे ब्रेकअप या तलाक हो चुका हो। ऐसे रिश्तों में की जाने वाली हिंसा फिजिकल, इमोशनल या सेक्शुअल किसी भी तरह की हो सकती है।

लोग बरसों तक ऐसे जहरीले रिश्तों में यातनाएं झेलते हैं और किसी को बता भी नहीं पाते। इसका असर विक्टिम की फिजिकल और मेंटल हेल्थ के साथ ही उसकी आर्थिक स्थिति पर भी पड़ता है।

इंटिमेट पार्टनर के हिंसक व्यवहार को एक्सपर्ट्स ने अलग-अलग हिस्सों में बांटा है, यहां तक कि बिना मर्जी के पार्टनर को छूना भी एक तरह का वॉयलेंस है:

घरेलू हिंसा और इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस अलग-अलग

जब किसी परिवार में एक फैमिली मेंबर दूसरे मेंबर को फिजिकल, सेक्शुअल या इमोशनल तौर पर प्रताड़ित करता है, तब उसे डोमेस्टिक वॉयलेंस यानी घरेलू हिंसा कहते हैं। इसमें परिवार में होने वाली हर तरह की हिंसा जैसे कि बड़ों के छोटों को पीटने, चाइल्ड एब्यूज, मैरिटल रेप शामिल है। जबकि, इंटिमेट पार्टनर वॉयलेंस में सिर्फ वह हिंसा शामिल है, जो सिर्फ इंटिमेट यानी रोमांटिक पार्टनर करता है।

यह पार्टनर मेल, फीमेल, मौजूदा या पिछला साथी कोई भी हो सकता है।

अपनों ने ही ले ली दुनिया में 56 फीसदी महिलाओं की जान

पूरी दुनिया में महिलाओं की हत्या करने वाले ज्यादातर उनके अपने ही होते हैं, जबकि पुरुषों की हत्या करने वालों में अपरिचितों की संख्या ज्यादा होती है। यूनाइटेड नेशंस की रिपोर्ट के अनुसार 2021 में 56 फीसदी महिलाओं की हत्या उनके पति, पार्टनर या फैमिली मेंबर ने की, जबकि 11 फीसदी पुरुषों की हत्या उनके अपनों ने की।

NCBI पर मौजूद एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर तीसरी महिला अपने पार्टनर की फिजिकल या सेक्शुअल वॉयलेंस का शिकार होती है। इनमें से 42% महिलाओं को गंभीर चोटें लगती हैं, जबकि 13% गंभीर तौर पर घायल होती हैं। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में 13% से 61% महिलाएं जिंदगी में कभी न कभी पार्टनर की पिटाई झेलती हैं।

इसी तरह, 6% से 59% महिलाओं को सेक्शुअल वॉयलेंस यानी पति या प्रेमी की जोर-जबरदस्ती का सामना करना पड़ता है। 31% शादीशुदा भारतीय महिलाएं कभी न कभी अपने पति के हिंसक बर्ताव की शिकार होती हैं।

महिलाओं की जान के दुश्मन पेशेवर अपराधियों से ज्यादा उनके घर में रहने वाले पति, प्रेमी, पार्टनर और दूसरे रिश्तेदार हैं:

हिंसा की शिकार 92% घायल महिलाएं नहीं करातीं इलाज

77% महिलाएं कभी भी अपने साथ हो रही किसी तरह की हिंसा के बारे में नहीं बता पातीं, जिससे किसी को कभी इसका पता नहीं चल पाता। NCBI पर मौजूद एक रिपोर्ट के मुताबिक फिजिकल वॉयलेंस का शिकार 92% महिलाएं इलाज के लिए कभी डॉक्टर के पास नहीं जाती हैं। हालांकि, डॉक्टर के पास जाने वाली महिलाएं यह जरूर चाहती हैं कि डॉक्टर उनसे पूछें कि उन्हें चोट कैसे लगी।

लेकिन, 10 फीसदी से भी कम डॉक्टर इलाज कराने आई महिलाओं से चोटों की वजह पूछते हैं।

पुरुष भी होते हैं पत्नी-प्रेमिका की हिंसा के शिकार

महिलाओं की तरह ही पुरुषों को भी पत्नी, लिवइन पार्टनर की हिंसा का शिकार होना पड़ता है। साइकेट्रिस्ट डॉ. राजीव मेहता कहते हैं कि लड़कों को भी रिश्तों में उतना ही वॉयलेंस झेलना पड़ता है। लड़कों में टेस्टोस्टेरॉन लेवल ज्यादा होता है, इसलिए वे ज्यादा एग्रेसिव होते हैं। जिससे फिजिकल वॉयलेंस की शिकार लड़कियां ज्यादा होती हैं। लेकिन, बात मेंटल और इमोशनल टॉर्चर की हो तो लड़के भी उतने ही विक्टिम होते हैं।

पति के परिवार से अलग होने का दबाव बनाने, बेवजह की डिमांड करने, दहेज जैसे मामलों में झूठा फंसाने के लिए धमकाने जैसी बातें मानसिक प्रताड़ना के दायरे में आती हैं:

जानलेवा हो सकती है पार्टनर की हिंसा

रोमांटिक पार्टनर की हिंसा झेलने वाले कई बार गंभीर तौर पर घायल हो जाते हैं और उनकी जान तक चली जाती है। विक्टिम के दिल, उसकी मसल्स, हड्डियों, पाचन तंत्र, रिप्रोडक्टिव ऑर्गन्स और नर्वस सिस्टम पर इस हिंसा का बेहद बुरा असर पड़ता है।

पार्टनर की पिटाई की वजह से हडि्डयां चकनाचूर हो जाती हैं। द लैंसेट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत, अमेरिका, कनाडा, नीदरलैंड और डेनमार्क में फ्रैक्चर का इलाज कराने पहुंची हर छठी महिला की हडि्डयां उनके पति या प्रेमी ने तोड़ी थीं। यही नहीं, पार्टनर की क्रूरता इस कदर बढ़ रही है कि पिटाई के चलते लोगों के कान के पर्दे फट जाते हैं, आंखें खराब हो जाती हैं। जिससे सुनाई और दिखाई देना बंद हो जाता है।

एक्टा साइंटिफिक ऑप्थल्मोलॉजी पर प्रकाशित नीलाक्षी भगत की एक रिपोर्ट के मुताबिक आंखों में चोट का इलाज कराने पहुंचीं 73.8% महिलाएं पति या प्रेमी की क्रूरता का शिकार हुई थीं। जबकि, 26.2% मेल पेशेंट्स की जख्मी आंखों की वजह पत्नी या प्रेमिका का हिंसक बर्ताव होता है।

हिंसक पार्टनर की वजह से रिस्की हो जाता है सेक्शुअल बिहेवियर

पार्टनर के जलाने से चेहरे और शरीर पर पड़े दाग मेंटल हेल्थ भी खराब कर देते हैं। यही नहीं, पार्टनर का इमोशनल और फिजिकल वॉयलेंस उन्हें ऐसी सेक्शुअल एक्टिविटीज की तरफ ले जाता है, जो उनकी सेहत और जिंदगी पर बुरा असर डालता है। उन्हें स्मोकिंग और शराब की लत पड़ सकती है। इन कारणों के चलते क्राइम भी बढ़ता है।

अमेरिका के नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन पर मौजूद एक रिपोर्ट के मुताबिक, टीनेज में सेक्शुअल असॉल्ट झेलने वाली लड़कियों में कम उम्र में ही संबंध बनाने जैसा रिस्की बिहेवियर देखने को मिल सकता है। उनमें बालिग होने से पहले ही अनचाही प्रेग्नेंसी का खतरा भी ज्यादा होता है।

हिंसा झेल रहीं महिलाओं को बिना गर्भनिरोधक संबंध बनाने पड़ते हैं, जिससे उनके लिए HIV/AIDS जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

अगर आपको लग रहा है कि भारत जैसे ही देशों में ही लोग पार्टनर के हिंसक व्यवहार के शिकार होते हैं, तो नीचे दिए गए ग्रैफिक्स पर भी एक नजर डालें:

प्रेम करने वाला बिगाड़ देता है मेंटल हेल्थ

पार्टनर की हिंसा के शिकार लोग डिप्रेशन, PTSD, ईटिंग डिसऑर्डर और ऐसे ही दूसरे एंजाइटी डिसऑर्डर की चपेट में आ जाते हैं। उन्हें नींद से जुड़ी बीमारियां हो जाती हैं और आत्महत्या की कोशिश करने लगते हैं। 2013 में हुई एक रिसर्च में पाया गया कि रोमांटिक पार्टनर की हिंसा की वजह से महिलाओं में डिप्रेशन का खतरा दोगुना हो जाता है। सिरदर्द, पेन सिंड्रोम जैसे कि बैकपेन, पेटदर्द, पेल्विक पेन की समस्या गंभीर हो जाती है।

कपल्स का झगड़ा बच्चों के लिए भी खतरा

NCBI पर मौजूद रिपोर्ट्स के अनुसार मां-बाप के बीच हिंसक व्यवहार देखने वाले बच्चे भी गंभीर समस्याओं का शिकार हो जाते हैं। रिश्तों पर से उनका भरोसा खत्म हो जाता है। वे जल्द किसी पर विश्वास नहीं कर पाते। उनके मानसिक बीमारियों की चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है और उनका बर्ताव भी हिंसक हो सकता है। ऐसे बच्चे भावनात्मक तौर पर डिस्टर्ब रहते हैं।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि इतनी तकलीफें झेलने के बाद भी कपल्स काउंसिलिंग के लिए साइकोलॉजिस्ट या काउंसलर के पास नहीं जाते:

धीरे-धीरे रिश्तों में घुलता है जहर

रिलेशनशिप काउंसलर शिवानी मिश्री साधू बताती हैं कि कोई रिलेशनशिप रातोंरात एब्यूजिव नहीं हो जाती। चीजें धीरे-धीरे बदलती हैं, माहौल अनहेल्दी होने लगता है, छोटी-मोटी चीजों पर टोकाटाकी शुरू होती है, फिर झगड़े बढ़ने लगते हैं। कोई एब्यूजिव रिलेशनशिप में फंस चुका है, जब तक यह समझ आता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है।

उस वक्त तक असहाय हो चुका विक्टिम न तो खुद को संभाल पाने की हालत में होता है और न ही उसमें ऐसे रिश्ते से बाहर आने की हिम्मत बची होती है। इसलिए एब्यूजिव रिलेशनशिप के संकेतों को पहले से समझ लेना बेहतर है, ताकि आप या आपका कोई फ्रेंड ऐसे रिश्तों में फंसे, तो हालात इतने न बिगड़ने पाएं।

जहरीले रिश्तों को पहचानने के ये संकेत कौन से हैं, जानने के लिए पढ़ें यह ग्रैफिक्स:

डेटिंग वॉयलेंस भी झेलते हैं लोग

रिलेशनशिप काउंसलर शिवानी बताती हैं कि आमतौर पर मैरिड और अनमैरिड कपल्स के बीच अलग-अलग तरह की हिंसा होती है। कपल अगर मैरिड हैं, तो पति-पत्नी के बीच होने वाली घरेलू हिंसा उनके आसपास के लोगों पर भी असर डालने लगती है। पति-पत्नी का झगड़ा मां-बाप, भाई-बहन, दोस्त और कलीग के साथ रिश्ते भी बिगाड़ देता है। पति या पत्नी एक-दूसरे को कंट्रोल करने की कोशिश करने लगते हैं।

गैर शादीशुदा कपल्स के बीच होने वाली हिंसा को डेटिंग वॉयलेंस कहते हैं। ऐसे रिश्तों में बिना मर्जी के टच करने, संबंध बनाने का दबाव डालने जैसी शिकायतें आम हैं। डेटिंग कर रहे कपल्स में दूसरे साथी को धक्का देने, थप्पड़ मारने, लात मारने, पीटने, नोचने, थूकने, जबरदस्ती पकड़ने और रोकने, गुस्से से विक्टिम की तरफ सामान फेंकने जैसी शिकायतें सबसे ज्यादा आती हैं।

आखिर वे कौन सी वजहें हैं, जिनके कारण पार्टनर अपने दूसरे साथी के साथ हिंसक बर्ताव करने लगते हैं, बता रहीं हैं एक्सपर्ट:

डॉ. राजीव मेहता रोमांटिक रिश्तों में बढ़ती हिंसा की एक और वजह बताते हैं- वेस्टर्नाइजेशन। अब लोगों को जिंदगी में सबकुछ जल्दी चाहिए। लोगों में धैर्य खत्म हो रहा है। सोसायटी में कल्चरल वैल्यू कम हो रही है। प्रेम पर सेक्स, पैसा और तेज रफ्तार जिंदगी हावी हो रही है। लोगों को सिर्फ अपनी खुशी से मतलब है।

हिंसक होने लगे साथी, तो ऐसे करें मदद

रिलेशनशिप काउंसलर बताती हैं कि श्रद्धा हत्याकांड जैसे मामले में कब कोई आफताब की तरह हिंसक हो जाएगा और हत्या कर बैठेगा, यह पहले से बता पाना मुश्किल है। लेकिन, रिश्ते इस हद तक न पहुंच जाएं, इसके लिए पहले से ही ध्यान रखना चाहिए। अगर लगे कि रिलेशनशिप एब्यूजिव हो रही है और रिश्तों के खराब होने के साथ ही आपकी फिजिकल व मेंटल हेल्थ बिगड़ रही है, तो इसकी अनदेखी मत करें।

अगर लगता है कि पार्टनर से बात करने पर चीजें सुधर सकती हैं और कुछ बेहतर होने की गुंजाइश बची है, तो कुछ तरीके अपनाए जा सकते हैं, ताकि आप समस्या की जड़ तक पहुंच सकें।

रिश्तों को सुधारने के लिए आप ये कोशिशें कर सकते हैं:

क्या करें कि न झेलनी पड़े साथी की हिंसा

सबसे पहले तो पुरुष हो या स्त्री, दोनों को यह बात समझने की जरूरत है कि रिश्तों में हिंसक बर्ताव करने का हक किसी को नहीं है। कपल में से अगर कोई पैसे कमा रहा है और दूसरे की जरूरतें पूरी कर रहा है, तब भी वह दूसरे के साथ किसी भी तरह की हिंसा या जोर-जबरदस्ती नहीं कर सकता। अब वक्त बदल रहा है। लड़कियां भी पढ़ लिख रही हैं।

इसलिए जरूरी है कि वह पुरुषों पर निर्भर रहने की जगह खुद आत्मनिर्भर होने की कोशिश करें।

हिंसा करने वाला कोई भी हो, उससे बचने के लिए सबसे जरूरी है विरोध करना और हिंसा के खिलाफ आवाज उठाना। अगर पहली बार कोई एब्यूजिव हो रहा है, उसी समय आपने विरोध कर दिया, तो संभव है कि आगे कभी ऐसा बर्ताव दोबारा नहीं हो।

लेकिन, अगर लगातार आपको किसी भी तरह की हिंसा झेलनी पड़ रही है, तो दोस्त या परिवार में जिसपर भी आप भरोसा कर सकते हैं, उससे बात करें और मदद मांगें। इसमें काउंसलर भी आपकी मदद कर सकते हैं। जरूरी लगे तो कानूनी सहायता लेने से मत झिझकें।

तमाम कोशिशों के बावजूद अगर लगता है कि पार्टनर नहीं सुधर सकता, तो रास्ते अलग कर लेना बेहतर है:

टॉक्सिक रिश्तों से बाहर क्यों नहीं आते लोग

लगातार हिंसा झेलने के बाद भी लोग तलाक या ब्रेकअप नहीं चाहते। यह एक बड़ा सवाल है कि क्रिमिनल माइंडसेट वाले अपने पति, प्रेमी और पार्टनर से फिजिकल, सेक्शुअल और साइकोलॉजिकल वॉयलेंस झेलने के बावजूद लड़कियां आखिर क्यों ऐसे रिश्ते से बंधी रहती हैं।

इसका जवाब देते हैं साइकेट्रिस्ट डॉ. राजीव। वह बताते हैं कि लोग पश्चिमी संस्कृति को अपना तो रहे हैं, लेकिन इंडियन माइंडसेट से बाहर नहीं निकल पा रहे। यह दो संस्कृतियों के बीच का संघर्ष है। ऐसे में पश्चिमी सोच से प्रभावित रिश्ता भले खराब हो जाए, लेकिन मूल रूप से इंडियन माइंडसेट होने के नाते तब भी उसे बचाने की कोशिश करते हैं।

विक्टिम के साथ ही आसपास के लोग भी चाहते हैं कि किसी भी तरह रिश्ता चलता रहे, चाहे रिश्ता घिसट के ही क्यों ही न चल रहा हो।

इसके साथ ही, विकसित देशों में तलाक जल्दी हो जाता है, जबकि भारत में लंबा समय लगता है। कुछ लोग यह सोचकर रिश्ता चलाते रहते हैं कि समाज क्या कहेगा। इन कारणों से लोग एब्यूजिव रिलेशनशिप से बाहर नहीं निकल पाते और घुट-घुटकर जीते हैं या जान से जाते हैं।

जिनसे प्यार का दावा, उनकी जान लेने वाले कौन

डॉ. राजीव बताते हैं कि बचपन में किसी को कैसे पाला-पोसा गया है, इसका बाद की जिंदगी पर बहुत असर पड़ता है। मां-बाप बच्चों को टाइम न दें, बच्चे वीडियो गेम में उलझे रहें, वे फिल्मों और वेब सीरीज से सीखें कि पावर हासिल करना ही सबकुछ है, पावर वॉयलेंस से मिलता है और पैसा देकर कानून से बच सकते हैं, तब ऐसा झूठा विश्वास बच्चों को बिगाड़ता है।

मां-बाप की अनदेखी, सोशल मीडिया का बुरा असर, खुद को चालाक समझना कि कुछ भी करके बच जाएंगे, इससे बच्चे पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का शिकार हो जाते हैं। बच्चों में हिंसक बर्ताव दिखे, तभी साइकेट्रिस्ट से इलाज कराना जरूरी है।

प्रेम का दावा कर वॉयलेंस करने वालों पर रिपोर्ट तो आपने पढ़ ली, अब अपनी राय भी साझा करते चलें:

ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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