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शाहरुख की लाडली सुहाना का चिकनकारी लहंगा बना ट्रेंड:करीना, सारा, जाह्नवी ने चिकन वर्क को किया पॉपुलर , कारीगर को नहीं मिलती सही कीमत

3 महीने पहलेलेखक: मरजिया जाफर
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शाहरुख खान की बेटी सुहाना खान की चिकनकारी ड्रेस इसलिए लाइम लाइट में आयी, क्योंकि डिजाइनर मनीष मल्होत्रा ने कुर्ती और साड़ी से हटकर चिकनकरी का लहंगा उसके लिए डिजाइन किया। चिकन वर्क के वाइट लहंगे और चोली में सुहाना का गॉर्जियस लुक फैशन ट्रेंड बन गया। सुहाना खान की तस्वीरों पर फैन्स ने 'हुस्न है सुहाना' जैसे कमेंट तक लिखे और ये हैशटैग काफी पॉपुलर भी हुआ।

चिकन वर्क न्यू फैशन ट्रेंड है

ये एंब्रॉयडरी फैशन का अहम हिस्सा बन चुकी है। जहां फैशन शोज में सेलिब्रिटी चिकन वर्क की ड्रेसेस में पहने नजर आते हैं वहीं डिजाइनर भी इस एम्ब्रॉयडरी को लेकर खूब एक्सपेरिमेंट करने में जुटे हैं। रेगुलर चिकनकारी सूट के साथ ही इसके गाउन, लहंगा जैसे ट्रेंडी आउटफिट्स भी तैयार किये जा रहे हैं।

चिकनकारी लखनऊ की शान है, लेकिन कारीगर परेशान हैं।
चिकनकारी लखनऊ की शान है, लेकिन कारीगर परेशान हैं।

कारीगरों को नहीं मिलती सही कीमत

चिकन वर्क का फैशन जितना पॉपुलर हो रहा है, उतना फायदा इन्हें तैयार करने वाले कारीगरों को नहीं मिल रहा। कारीगरों का कहना है कि कढ़ाई में इतनी हम मेहनत करके भी गुजर बसर मुश्किल है। कुर्ते पर बारीक से बारीक काम करने के भी हमें ज्यादा से ज्यादा 300 रुपये मिलते हैं, जबकि ट्रेडर्स करोड़ों में खेल रहे हैं। 'शहर-ए-अदब' लखनऊ की चिकनकारी भारत ही नहीं दुनिया भर में मशहूर है। यहां आने वाले लोग चिकन की कढ़ाई की साड़ी या सूट ले जाना नहीं भूलते। चिकनकारी यहां की शान है, लेकिन कारीगर परेशान हैं।

महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन चिकन कढ़ाई के काम के पैसे नहीं बढ़ रहे।
महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन चिकन कढ़ाई के काम के पैसे नहीं बढ़ रहे।

कई पीढ़ियां करती थी कढ़ाई

लखनऊ के हुसैनाबाद की रहने वाली रिजवाना शेख पिछले 20-22 साल से चिकनकारी का काम कर रही हैं। रिजवाना की कई पीढ़ियां इसी काम को करती रही हैं। वो कहती हैं, दिन-रात मेहनत करने के बावजूद हमें इसका फायदा नहीं मिलता। मेरी बनाई ड्रेस मार्केट में डबल दाम में बिकती हैं। अब तो हालात और भी खराब हो गए हैं। हल्के शैडो वर्क की कढ़ाई 50-100 रुपये में बनाना पड़ता है। फैंसी काम में 250-300 रुपये मिल पाते हैं। महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन चिकन के काम के पैसे नहीं बढ़ रहे।

22 साल से चिकन की कढ़ाई कर रही हैं।
22 साल से चिकन की कढ़ाई कर रही हैं।

आंखों की रौशनी ने साथ छोड़ दिया

मैं जब लखनऊ के टेम्पल रोड पर रहने वाली रिहाना ने बता कर रही थी तो मेरा चिकन वर्क का कुर्ता देखकर उन्होंने पूछा कि ये कुर्ता मैंने कितने में खरीदा।मैंने जब उन्हें यह बताया कि इस कुर्ते के मैंने 2500 हजार रुपये दिए हैं तो वो हैरान होकर मेरी शक्ल देखने लगीं। उनका कहना था कि उन्हें इस तरह की कढ़ाई के सिर्फ 100 से 150 रुपये मिलते हैं। 22 साल से ये काम कर रही हैं और अब आंखों की रौशनी ने साथ छोड़ दिया है।

मेहनत के हिसाब से दाम मिलते है।
मेहनत के हिसाब से दाम मिलते है।

मेहनत के हिसाब से पैसा बहुत कम

उन्हीं की पास बैठी रूबीना कहती हैं कि 5 मीटर की साड़ी बनाने में 8 दिन लग जाते हैं, क्योंकि इस पर बहुत बारीक कढ़ाई करनी पड़ती है। रूबीना बताती हैं कि दुपट्टे समेत साढ़े पांच मीटर सूट की बारीक कढ़ाई का उन्हें 1500 रुपये तक मिलता है। अरबीना के मुताबिक जितनी मेहनत वो इसके लिए करती हैं, उस हिसाब से ये पैसा बहुत कम है। चिकन की कढ़ाई के लिए अलग अलग डिजाइन और कढ़ाई के हिसाब से दाम मिलते है।

जाली की कढ़ाई सबसे महंगी

कपड़े पर जालीदार कढ़ाई करना सबसे ज्यादा मुश्किल और ये कढ़ाई सबसे मंहगी होती है। लेकिन अब इस कढ़ाई को नेट के कपड़े पर कर के कपड़े पर पैच लगाते हैं।

मटिरियल का इस्तेमाल

चिकनकारी के लिए ज्यादातर कच्चे धागे का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन फैब्रिक के हिसाब से भी धागा बदल जाता है। जैसे जॉर्जेट, सिल्क के कपड़े पर रेशम के धागे से कढ़ाई होती है लेकिन चिकनकारी के लिए सूती कच्चा धागा खास माना जाता है।

लॉकडाउन में सोशल मीडिया बना सपोर्ट सिस्टम

मैन्युफैक्चरर रजत सेठ का कहना है कि चिकनकारी एक अवयवस्थित बिजनेस है। इसमें कोई कारखाना लगाकर काम नहीं होता। बिचौलियों के जरिए घरेलू महिलाओं से यह काम करवाया जाता है। चिकनकारी के काम में लखनऊ और उसके आसपास की 99 प्रतिशत महिलाएं ही जुड़ी हैं।

महंगाई लगातार बढ़ रही है। रॉ मटीरियल का दाम 30 परसेंट महंगा हो गया है। रजत कहते हैं, हम गल्फ देशों, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में माल सप्लाई करते हैं, लेकिन किसी और एक्सपोर्टर के जरिए। लॉकडाउन के दौरन एक तरफ जहां बिजनेस ठप्प हो गया था, वहीं दूसरी तरफ सोशल मिडिया बिजनेस का एक बहुत बड़ा सपोर्ट सिस्टम बना। जो लोग व्हाट्सएप, फेसबुक के जरिए सेल कर रहे थे उन लोगों ने चिकन वर्क की पहचान लोकल लेवल तक पहुंचाई है।

ओडीओपी क्या है?

ओडीओपी कार्यक्रम को उत्तर प्रदेश सरकार ने 2018 में शुरू किया था। इसका उद्देश्य है वन डिस्ट्रिक वन प्रोडक्ट को बढ़ावा देना। उत्तर प्रदेश की शिल्प कलाओं और उत्पादों को प्रोत्साहित किया जाए जो देश में कहीं और न बनती हों।

कारीगरों की मांग, ऐसे सेंटर बनाए जाएं जहां काम मिले और सही मेहनताना भी।
कारीगरों की मांग, ऐसे सेंटर बनाए जाएं जहां काम मिले और सही मेहनताना भी।

चिकन वर्क कारीगरों के मुद्दे

कारीगरों की मांग है कि उनके लिए बेहतर योजना बने और ऐसे सेंटर बनाए जाएं जहां स्थायी काम मिले और सही मेहनताना भी। चिकनकारी की बात करें तो दस्तकारी के काम में महिलाएं ज्यादा हैं, वहां सिर्फ कुर्ते की सिलाई, कढ़ाई और डिजाइन के छापे का काम मर्दों के हाथ में है। उत्तर प्रदेश में लखनऊ चिकनकारी कशीदाकारी का गढ़ है। चिकनकारी क्योंकि शुरू से असंगठित क्षेत्र तक सीमित रहा, इसलिए इसमें शुरू से ही शोषण की गुंजाइश बनी रही। बावजूद इसके ये कला खत्म नहीं हुई।

पांच लाख लोगों की रोजी रोटी भी खतरे में है।
पांच लाख लोगों की रोजी रोटी भी खतरे में है।

लखनऊ की चिकनकारी पर चीन की नजर

भारत के एक प्रमुख औद्योगिक संस्था के अध्ययन में यह बात सामने आई कि चीन मशीन से चिकनकारी की कढ़ाई को कर रहा है जिससे पारंपरिक ओरिजनल कढाई खतरे में है। अध्ययन के अनुसार, चीन में बने कपड़ों की वजह से करीब पांच लाख लोगों की रोजी रोटी भी खतरे में है। चीन में यह कढ़ाई मशीन से की जाती है जिसमे समय और लागत दोनों ही कम लगती है। नतीजतन, लखनऊ की यह खूबसूरत कला खतरे में है।

नूरजहां के दौर में लखनऊ पहुंचा चिकन

चिकन की कशीदाकारी मुगल बादशाह जहांगीर की बेगम नूरजहां के दौर में भारत आई। कहते हैं, नूरजहां की एक कनीज अवध में आ बसी और उन्होंने ये कारीगरी चंद औरतों को सिखा दी। 'चिकन' तुर्की शब्द चिक से आया है। चिक यानी जाली, जिससे रोशनी और हवा का गुजर हो सके। कढ़ाई नाजुक थी, देखने में खूबसूरत, इसलिए जो देखता सीखने बैठ जाता। कल का ये शौक आज हजारों की रोजी-रोटी है। चिकनकारी का इतिहास दो सौ साल से भी पुराना है।

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