• Hindi News
  • Women
  • Kiara Advani Milk Allergy | Know About Lactose Intolerant Symptoms And Diseases

भारतीय सबसे ज्यादा पीते हैं दूध, आधे पचा नहीं पाते:लैक्टोज इनटॉलरेंस जानलेवा, 10 हजार साल से एक जीन लड़ रहा पचाने की जंग

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: दीक्षा प्रियादर्शी/मनीष तिवारी
  • कॉपी लिंक

करीब 10 हजार साल पहले इंसान ने जानवरों का दूध पीना शुरू किया और आज तक इसे पचाने की कोशिश कर रहा है। दुनिया भर में लाखों इंसान ऐसे हैं जो दूध पीकर पचा नहीं पाते हैं। जो लोग इसे पचा लेते हैं, उनकी मदद करता है एक खास जीन। आइए जानते हैं, दूध पीने और उसे पचाने के दिलचस्प सफर को।

सबसे पहले दो केस के जरिए इस परेशानी को समझते हैं।

केस नंबर- 1

एक्ट्रेस कियारा आडवाणी दूध-दही नहीं पी पाती हैं। मिल्क प्रोडक्ट्स खाते ही उन्हें दिक्कत होने लगती है। कुछ समय पहले उन्होंने खुलासा किया था कि वह लैक्टोज इनटॉलरेंट हैं। इसके चलते वह दूध-दही पीने की जगह उनका इस्तेमाल घरेलू नुस्खों में करती हैं, ताकि उनकी स्किन और बाल हेल्दी बने रहें।

कियारा की तरह ही हॉलीवुड एक्ट्रेस और सिंगर माइली साइरस और कर्टनी कर्दाशियां भी लैक्टोज इनटॉलरेंस के चलते डेयरी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल छोड़ चुके हैं। इन्हीं की तरह, दुनिया के आधे से ज्यादा वयस्कों को दूध और उससे बने दूसरे प्रोडक्ट्स खाते ही खासकर पेट से जुड़ी परेशानियां होने लगती हैं।

केस नंबर-2

हरियाणा की शिला बचपन से रोजाना दूध पीती थीं। दही, पनीर मक्खन, घी, खोया जैसी चीजें उनकी डेली डाइट में शामिल थीं। अचानक उन्हें खाना पचना बंद हो गया। उल्टी, सिरदर्द, लूज मोशन होने लगे। डॉक्टर को दिखाया तो पता लगा कि उन्हें लैक्टोज इनटॉलरेंस है। डॉक्टर ने उन्हें जिंदगी भर दूध, पनीर, घी, मक्खन, दही जैसी चीजों से परहेज करने की सलाह दी।

यह परेशानी हजारों साल से चली आ रही है। अधिकतर लोगों को इस बारे में पता ही नहीं होता। फिर भी हमारा शरीर हमारे जीन में बदलाव लाकर हमें दूध-दही खाने लायक बना रहा है और यह जीतोड़ कोशिश हजारों बरसों से चल रही है।

इसकी भी एक दिलचस्प कहानी है, जिसमें हैं कुछ अनूठे किरदार, थोड़ा सा केमिकल लोचा और ढेर सारा एक्शन-रिएक्शन। आइए-पहले जानते हैं गले से उतरकर पेट में दूध के पचने या न पचने की कहानी।

सबको नहीं पचती दूध की 'मिठास'

सबसे पहले तो ये जानिए कि लैक्टोज है क्या और इसके पचने में इतनी मुश्किल क्यों आती है।

लैक्टोज एक तरह की चीनी होती है, जो दूध और दूसरे डेयरी प्रोडक्ट्स में नेचुरल रूप से पाई जाती है। आपने भी दूध पीते समय उसमें हल्की सी मिठास तो महसूस की होगी। यह मिठास इसी लैक्टोज की वजह से आती है। मां के दूध में लैक्टोज की मात्रा ज्यादा होती है, वहीं गाय, भैंस और बकरी जैसे पशुओं के दूध में थोड़ी कम होती है।

अब जान लीजिए क्या है लैक्टोज इनटॉलरेंस

जब हम दूध या उससे बनी कोई दूसरी चीज खाते हैं, तो कई लोगों का शरीर उसमें मौजूद लैक्टोज पचा नहीं पाता। ऐसी चीजों को खाने के बाद लोगों को पेट में तेज दर्द, ब्लोटिंग, गैस, डायरिया जैसी परेशानियां होती हैं। इसे ही डॉक्टरी भाषा में लैक्टोज इनटॉलरेंस कहते हैं। हर व्यक्ति पर इसका असर अलग-अलग होता है। किसी को हल्की-फुल्की दिक्कतें होती हैं, तो किसी को दूध पीते ही डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता है।

ऐसे लोग भी हैं, जो दूध से बनी मिठाइयां आसानी से गप्प करते जाते हैं, गटागट दूध पीते हैं, लेकिन उनका पेट सब हजम कर लेता है। आखिर ऐसा क्यों है, आइए समझते हैं।

दूध को पचाने में इस एक जीन का है खेल

किसी का शरीर लैक्टोज पचा पाता है और किसी का नहीं, इसकी भी एक वजह है। इस वजह का नाम है LCT यानी लैक्टेज जीन। यह जीन छोटी आंत में लैक्टेज नाम का ही एंजाइम बनाता है। फिर यह लैक्टेज एंजाइम दूध में मौजूद लैक्टोज को पचाने में मदद करता है।

अमेरिका की ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ पर मौजूद रिसर्च के मुताबिक आमतौर पर स्वस्थ शिशुओं में यह एंजाइम भरपूर रहता है। बाद में जब बच्चा मां का दूध पीना छोड़ता है तो इस प्रक्रिया में बदलाव आना शुरू हो जाता है। बढ़ती उम्र के साथ LCT जीन उतना एक्टिव नहीं रह जाता। वह पर्याप्त मात्रा में लैक्टेज एंजाइम नहीं बना पाता।

कुछ लोगों में ताउम्र एक्टिव रहता है लैक्टेज एंजाइम

रिसर्च के मुताबिक कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनमें ताउम्र यह एंजाइम बनता रहता है। ऐसे सेहतमंद लोग छककर दूध-दही पीते और पचाते रहते हैं। ऐसे लोगों में वयस्क होने के बाद जिंदगी भर लैक्टेज एंजाइम बनता रहता है। जिससे वह ताजे दूध में पाए जाने वाले लैक्टोज को आराम से पचा लेते हैं।

इंसानों में मौजूद इसी क्षमता को वैज्ञानिक ‘लैक्टेज परसिस्टेंस’ (यानी ताउम्र दूध पचाने की क्षमता) या LP कहते हैं। इस समय दुनियाभर के 35 फीसदी वयस्कों में LP ट्रेट मौजूद है, यानी बढ़ती उम्र में भी उनका शरीर दूध और उससे बनी चीजें पचाने की क्षमता रखता है, लेकिन दूध-दही पचाने की क्षमता इंसानों को यूं ही नहीं मिल गई है। इसकी भी एक कहानी है, जिसकी कड़ी जुड़ती है इंसानों के विकास से।

घाना में 100 फीसदी लोग दूध नहीं पचा पाते हैं तो भारत में 61 फीसदी लोगों के पास दूध पचाने की क्षमता नहीं है। वहीं, डेनमार्क की 96 फीसदी आबादी दूध पचाने की क्षमता रखती है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।
घाना में 100 फीसदी लोग दूध नहीं पचा पाते हैं तो भारत में 61 फीसदी लोगों के पास दूध पचाने की क्षमता नहीं है। वहीं, डेनमार्क की 96 फीसदी आबादी दूध पचाने की क्षमता रखती है जो दुनिया में सबसे ज्यादा है।

एक ऐसा जीन जो खुद को हजारों साल से बदल रहा

दूध को पचाने में मदद करने वाला LCT जीन हमेशा से इंसानों में नहीं था। इसे हासिल करने के लिए इंसानों को हजारों साल का सफर तय करना पड़ा। धीरे-धीरे जीन में बदलाव होते गए, वह विकसित होता गया। नई-नई क्षमताएं हासिल करता गया। रिसर्च के मुताबिक लैक्टेज जीन के विकास की प्रक्रिया यूरोप, अफ्रीका और मध्यपूर्व से शुरू हुई और पूरी दुनिया में फैल गई। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जीन में बदलाव आता रहा। यह प्रक्रिया दसियों हजार साल तक जारी रही। अलग-अलग रिसर्च में यह अवधि 20 हजार साल पहले से लेकर 4 हजार साल पहले तक बताई जाती है।

दूध पीने और इसे पचाने में लग गए 10 हजार साल

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इंसानों ने पशुओं का दूध पीने की शुरुआत करीब 10 हजार साल पहले की। तब से हमारा शरीर दूध पचाने की क्षमता विकसित करने की कोशिश में लगा है। इसके बावजूद आज भी दुनिया की एक बड़ी आबादी लैक्टोज इनटॉलरेंस की समस्या का सामना कर रही है।

यूरोप में 8 हजार साल पहले घुमंतू जिंदगी जीने वाला इंसान दूध नहीं पचा पाता था। यूरोप और रूस के 94 प्राचीन कंकालों से पता चलता है कि 4300 साल पहले इंसान में LCT जीन विकसित होना शुरू हुआ।

जिनमें LCT जीन नहीं तो बैक्टीरिया करते हैं दूध पचाने में मदद

वैज्ञानिक अब भी दूध पचाने की क्षमता से जुड़ी गुत्थी पूरी तरह सुलझा नहीं सके हैं। मसलन, अफ्रीकी देश यूथोपिया के सोमाली लोगों में दूध पचाने की क्षमता बहुत कम है। फिर भी वह रोज आधा लीटर दूध गटागट पी सकते हैं। इसके बाद न तो उन्हें पेट दर्द होता है, न डायरिया या फिर लैक्टोज इनटॉलरेंस से जुड़ी कोई दूसरी दिक्कत। अब यहां से आंतों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया का असली खेल शुरू होता है, जो दूध और उससे बनने वाले प्रोडक्ट को पचाने में मदद करता है।

मां बनने वाली महिलाओं की जा सकती है जान

किसी प्रेग्नेंट महिला को लैक्टोज इनटॉलरेंस की परेशानी है और वो मिल्क व डेयरी प्रोडक्ट्स ले रही है तो उसे पेट की बीमारी, कुपोषण हो सकता है। समय रहते इसका पता न चला और डॉक्टरी सलाह न मिली तो इस दौरान उसकी जान जा सकती है या फिर उसका मिसकैरिज भी हो सकता है।

कई बार प्रेग्नेंसी के दौरान दूध ज्यादा पीने या डेयरी प्रोडक्ट लेने की वजह से शरीर लैक्टोज पचा नहीं पाता। इससे ब्लोटिंग, डायरिया, उल्टी या माइग्रेन हो सकता है। ऐसा हो तो डॉक्टर से सलाह लेकर जल्द से जल्द मिल्क, फैट फूड या डेयरी प्रोडक्ट को लेना बंद कर दें।

आंत खराब होने के वजह से भी होता है लैक्टोज इनटॉलरेंस

गट हेल्थ एक्सपर्ट पायल कोठारी का कहना है कि कई बार गट हेल्थ यानी आंत से जुड़ी परेशानी की वजह से लैक्टोज इनटॉलरेंस हो जाती है। इस कारण गट में लैक्टोबैसिलस बैक्टीरिया कम हो जाते हैं, जिससे लैक्टोज पच नहीं पाता। आजकल दूध में कई तरह के एंटीबायोटिक्स और केमिकल्स मिले रहते हैं, जिस वजह से भी पेट खराब होता है।

पचा नहीं पाने के बाद भी पी रहे दूध तो आंतें भुगतेंगी

शरीर दूध पचा नहीं पाता है और फिर भी दूध पिए जा रहे हैं या डेयरी प्रोडक्ट्स ले रहे हैं तो पाचन के दौरान जहरीली चीजें भी खून में चली जाती हैं, जिन्हें आंतें रोक नहीं पाती हैं। इसे लीकी गट कहते हैं। इस दौरान प्रोटीन, वायरस, फैट्स भी ब्लड में जाने लगते हैं, जो बॉडी की अच्छी कोशिकाओं को मारने लगते हैं। इससे शरीर की इम्यूनिटी कमजोर हो जाती है।

पिज्जा, बर्गर, पास्ता और शेक में लैक्टोज ज्यादा

50 साल पहले लोग केवल दूध, दही, बटर, पनीर, खोया या दूध से बनी मिठाई खाते थे, जिसके जरिए ही लैक्टोज शरीर में जाता था, मगर अब हम अपने डेली लाइफ में फास्ट फूड जैसे कि बर्गर, पिज्जा, पास्ता, कॉफी, शेक के जरिए अधिक मात्रा में दूध, चीज, बटर या क्रीम को अपनी डाइट में शामिल करते हैं, जिससे शरीर में लैक्टोज की मात्रा बढ़ जाती है और वो पच नहीं पाता है।

बच्चों की ग्रोथ पर पड़ सकता है असर

डॉ. कुणाल सहाय बताते हैं कि बच्चे में लैक्टोज इनटॉलरेंस है तो उसकी ग्रोथ पर असर पड़ता है। उसका डाइजेस्टिव सिस्टम ठीक से काम नहीं करेगा। बच्चे को उल्टी और लूज मोशन हो रहा है तो उसे दूध से एलर्जी हो सकती है। हालांकि मां का दूध पीने वाले बच्चे के साथ ऐसा बहुत कम होता है, लेकिन कई बार माता-पिता से ये प्रॉब्लम बच्चों में भी आ जाती है। बच्चों में ऐसी स्थिति है तो उन्हें लैक्टोज फ्री मिल्क या जूस देना चाहिए।

नॉलेज बढ़ाने वाली और जरूरी जानकारी देने वाली ऐसी खबरें लगातार पाने के लिए डीबी ऐप पर 'मेरे पसंदीदा विषय' में 'वुमन' को सेलेक्ट करें या प्रोफाइल में जाकर जेंडर में 'मिस' सेलेक्ट करें।

खबरें और भी हैं...