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खूनी मांझा, असली कहानी:लहुलुहान हाथों से बनता मांझा; भारत में ही बनते हैं और कहलाते हैं ’गर्दन काट' चाइनीज मांझे

4 महीने पहले
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बरेली का बाकरगंज मोहल्ला। दूर से देखने पर लगता है कि किसी चित्रकार की पेंटिंग है। कहीं खेलते बच्चे, कहीं पतंगों के कन्नों में धुएं की धुआंर लगाते कुछ लड़के। कहीं किसी घर की दहलीज पर पतंगों में कन्ने बांधते लड़के। कहीं सुबह के 11 बजे की धूप, फुर्ती समेटे पेड़ के नीचे बैठे मर्द और यहीं मजार के बगल में कच्ची जमीन पर लकड़ी के लट्ठों पर सूती धागे की रील बांधते लोग। यह सूती धागा रंगाई, पुताई और मेहनत के पसीने में डूबकर मांझा कहलाता है।

ये बरेली के बाकरगंज मोहल्ले का नजारा है। एक तस्वीर में लड़का पतंग के कन्नों में धुआंर लगा रहा है और दूसरी तरफ मांझा तैयार हो रहा है।
ये बरेली के बाकरगंज मोहल्ले का नजारा है। एक तस्वीर में लड़का पतंग के कन्नों में धुआंर लगा रहा है और दूसरी तरफ मांझा तैयार हो रहा है।

बरेली और मांझे का कनेक्शन

हथकरघा मांझा पतंग उद्योग संस्था के अध्यक्ष कमाल आसिफ बताते हैं कि मेरे फुफा अली मोहम्मद के परदादा नन्हे मियां ने साल 1940 में बरेली में मांझे का पहला कारखाना खोला। मेरे वालिद प्यारे मियां के उस्ताद मेरे फुफा ही थे। इस तरह हमारे खानदान के जरिए बरेली से मांझे का कारोबार शुरू हुआ। भारत में सबसे पहले यहीं मांझे का पहला कारखाना खुला। हमारे यहां से सीखे कारीगरों ने बाद में लखनऊ, इलाहाबाद, सूरत और अहमदाबाद जैसी जगहों पर मांझे का काम शुरू किया।

कमाल आसिफ आगे कहते हैं - साल 2015 में प्लास्टिक, नायलोन, सिंथेटिक, चाइनीज धागा, कांच और मेटल की कोटिंग वाले मांझे के खिलाफ हमने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन डाली थीं। इस मांझे से लोगों की जानें जा रही थीं और दूसरा हमारे सूती मांझे पर भी बुरा असर पड़ रहा था।

बाद में हमारी लड़ाई जनहित की बन गई और साल 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने देश भर में नाइलॉन, सिंथेटिक और चाइनीज कहे जाने वाले मांझे पर रोक लगा दी। पर दुख इस बात का है कि देश में आज भी कई जगहों पर ये मांझा धड़ल्ले से बिक रहा है और लोगों की गर्दन काट रहा है। यही नहीं इस मांझे को ऑनलाइन भी बेचा जा रहा है।’

अभी मांझे पर बात क्यों?
देशभर में 15 अगस्त की धूम है। रक्षाबंधन का भी इंतजार है। ये दोनों ही मौके ऐसे हैं जिन पर दिल्ली और उत्तर प्रदेश में पतंगें उड़ाई जाती हैं, लेकिन यही वह समय है जब मांझे से होने वाले हादसे भी चिंता का विषय बने रहते हैं। साल 2017 में दिल्ली के रहने वाले बबलू कुमार का गला भी चीनी मांझे से कटा। दर्द को याद करते हुए कहते हैं- 'मैं मरते-मरते बचा। मौत को अपनी आंखों से देखा। सड़क पर बदहवास पड़ा रहा। अस्पताल में गले पर 17 टांके आए। 15 दिन आईसीयू में रहा। उस खौफनाक मंजर को याद करते ही रूह कांप उठती है।'

बबलू तो बच गए लेकिन अभी 8 अगस्त का ही मामला है जब दिल्ली में एक फूड डिलीवरी बॉय की मौत मांझे से हुई। दुख तो इस बात का है कि नरेंद्र कुमार का मृत शरीर फ्लाइओवर पर पड़ा रहा और गाड़ियों से उसका सिर कुचल चुका था। पर कोई मदद को आगे नहीं आया। यही नहीं, पिछले महीने 30 साल के एक मोटरसाइकिल सवार की पतंग के मांझे से जान चली गई। ये हादसा दिल्ली के नॉर्थ वेस्ट हैदरपुर फ्लाइओवर पर हुआ।

किसे चाइनीज मांझा कहें?
हथकरघा मांझा पतंग उद्योग संस्था के अध्यक्ष कमाल आसिफ और इसी संस्था के जनरल सेक्रेटरी मो. शमी कहते हैं कि चीन से कोई मांझा नहीं आता है। भारत में ही प्लास्टिक, नाइलॉन से बने मांझे को चाइनीज मांझा कहा जा रहा है। इस चाइनीज कहे जाने वाले मांझे की शुरुआत बैंग्लोर में मोनोकाइट नाम की कंपनी ने की। लोगों ने प्लास्टिक के मांझे को पॉपुलर करने के लिए इसे चाइनीज मांझा नाम दे दिया। कांच के टुकड़े, धातु और लोहे के बुरादे को गोंद में मिलाकर मांझे पर चढ़ाया जाता है, जिससे चाइनीज मांझा बनता है। इसके अलावा इस मांझे में कई कैमिकल भी मिलाए जाते हैं, जो जान के लिए घातक साबित होते हैं।

फिर लौटते हैं बाकरगंज के मांझा मेकर्स के पास
लकड़ी के लट्ठों में कॉटन का धागा बांधने का काम इतनी तेजी से होता है कि इस काम के रफ्तार के बीच कोई औरत, मर्द और बच्चा नहीं आता। यहां काम करने वाले रईस मियां कहते हैं-’अब्बा-अम्मी ने नाम तो मेरा रईस रख दिया, लेकिन जीवन में कभी अमीरी नहीं देखी। 10 साल का था जब मांझा बनाना शुरू किया और आज 50 का हूं और आज भी मांझा ही बना रहा हूं।’

कड़ी धूप में काम करते मांझे की काली लुगदी को हाथ में लिए और चेहरे पर बहते पसीने को पोछते हुए रईस कहते हैं, ‘दिन भर में कुल 200 रुपए कमा पाता हूं और अगर कभी स्पेशल मांझा, मतलब जो कभी कॉम्पिटीशन वगैरह के लिए तैयार करना होता है उसे बनाने के लिए एक दिन में 400 रुपए मिल जाते हैं। इस कमाई में बच्चों की पढ़ाई और बीवी की फरमाइश कुछ भी पूरा नहीं कर पाता। कहने को बरेली का मांझा मेकर हूं।’

रईस से बातचीत के बीच वहां काम कर रहे बाकी मजदूर फाजिल को नाम पुकारते हैं और कहते हैं, ‘इसका हाथ देखिए किस तरह कटा है।’ 26 साल के फाजिल के हाथों में हरा रंग लगा है और वो कटी उंगलियां और हथेलियां मुझे दिखाते हैं। ये हाथ धागे से इतनी बुरी तरह कटे हुए थे कि देखे नहीं जा रहे थे। ये सिर्फ फाजिल है, आलिम-फाजिल नहीं। जिनके घर के सामने एक बीमार सी सूखी नदी बहती है। जिसका नाम किला है।

इस तस्वीर में फाजिल और उनकी मां हैं। साथ ही मांझा बनाने से कटा फाजिल का हाथ।
इस तस्वीर में फाजिल और उनकी मां हैं। साथ ही मांझा बनाने से कटा फाजिल का हाथ।

फाजिल के घर जाने पर उनकी मां नुसरत बताती हैं कि फाजिल सात साल का उम्र से मांझा बनाने का काम कर रहा है। घर के पुराने हालात याद कर पेट खौलने लगता है, गला रुंध जाता है, आंखें बुझ जाती हैं। अफसोस, मैं अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाई।

हाथ की चक्की से चावल पीसकर बनाया मांझा
दुपट्टे से चेहरा पोंछते हुए नुसरत अपनी बात जारी रखते हुए कहती हैं- ‘मैं सुबह चावल पका देती और शीशा पीसने बैठ जाती। चावल, शीशा, ईबसगोल और कुछ जड़ी-बूटियां मिलाकर लुगदी तैयार करती थी। इसी लुगदी को कॉटन की डोरी पर मजदूर घिसते हैं और इस लुगदी को घिसने के दौरान हाथ कटते हैं।

फाजिल का मन काम पर जाने का नहीं होता था क्योंकि हाथ कटने के बाद इसके लिए खाना खाना तक दूभर हो जाता। खाना खाते समय हाथ में नमक-मिर्च-मसाले आंसू निकाल देते हैं। सर्दी के महीने में खाल ठिठुर जाती, काम करना मुश्किल हो जाता। रात भर हाथों की जलन से कराहता। बेटे का दर्द देखकर मैं भी रोती, पर क्या करती, पेट के आगे हम सभी मजबूर थे।

फाजिल की मां नुसरत जैसे बात करते-करते अपने संघर्ष के दिनों में पूरी तरह खोकर बोलती ही जा रही थीं-‘जब ये बच्चे छोटे थे तब चकिया ( हाथ वाली चक्की) से मैं खुद अपने हाथ से शीशा पीसती और चावल पकाकर उसमें इसे मिलाकर मांझे की लुगदी तैयार करती थी। इसी बीच फाजिल का दर्द झलक पड़ता है और कहते हैं- ‘मांझा बनाने के दर्द से छुटकारा मिले, इस वजह से कई बार मैं घर से भाग गया, लेकिन जाता कहां? मरता क्या न करता, रात को रोता हुआ वापस मां की गोद में आकर मुंह छुपा लेता। अगले दिन फिर लहुलुहान हाथों के साथ लुगदी लेकर मांझा बनाने चल देता और आज तक उसी सड़क पर चल रहा हूं।’

तब पॉपुलर था मांझा
40 साल के इशाक मंसूरी मायूसी भरी आवाज में कहते हैं- ‘अभी कुछ दिनों से काम नहीं मिल रहा है तो ये हाथ इतने लाल हैं, अगर रोज ये हाथ काम कर रहे होते तो इन्हें देखना मुश्किल होता। मंसूरी के अनुसार, जब मैंने काम शुरू किया था तब दिन के 2 रुपए मिलते थे। इस काम की इतनी चर्चा थी। फिल्म स्टार जॉनी वॉकर, सुपरस्टार राजेश खन्ना जैसे अभिनेताओं तक हमारा बना हुआ मांझा जाता रहा है।

यहां तक कि अभिनेता अमिताभ बच्चन के मुंह से भी बरेली के मांझे का जिक्र सुना है। वो दिन कुछ और थे, तब काम करने का मजा ही अलग था। खून तब भी बहता था, खून आज भी बहता है, पर तब धंधा चलता था और आज मंदा है। अब चीन का कहा जाने वाला मांझा हमारी ‘गर्दन’ ही नहीं ‘जेब’ भी काट रहा है। इशाक की बेटी कहती हैं- ‘मुझे 12वीं के बाद ग्रेजुएशन करना था, लेकिन अब्बू के पास उतने पैसे ही नहीं हैं कि वो आगे मुझे पढ़ा पाएं। फिर मुझे लगता है कि उन्होंने इतनी मेहनत करके मुझे जहां तक पढ़ा दिया है, वही मेरे लिए काफी है।’

बरेली में कैसे शुरू हुआ मांझे का व्यापार
ऑल यूपी सूती धागा-मांझा मजदूर वेलफेयर सोसाइटी के अध्यक्ष अरशद हुसैन- मांझे से जुड़ा एक मजेदार किस्सा बताते हैं। वे कहते हैं कि बरेली में मांझे की शुरुआत करने वाले नन्हें मियां के जमाने से ये किस्सा चला आ रहा है कि बरेली में मांझा हकीम रुकमान की देन है। सदियों पहले एक बादशाह के लड़के को लकवा हुआ। हकीम रुकमान ने एक पतंग बनाकर एक तागे से बांधकर उस लड़के से उड़वाई और उसका लकवा ठीक हो गया। बस तभी से ये पतंगबाजी शुरू हो गई। हालांकि, इस किस्से का जिक्र इतिहास में नहीं मिलता।

कितना पुराना है मांझे का व्यापार
अरशद हुसैन के मुताबिक, ‘बरेली में मांझे का कारोबार 200 साल पुराना है। साल 2010-11 में करीब 70 करोड़ का कारोबार सालाना बरेली को मांझे से हो जाता था, लेकिन 2007-08 से इस मांझे की मांग दिन पर दिन गिरती गई। मांझे में ये गिरावट सिर्फ नाइलोन के मांझे की वजह से हुई। मांझे पर 5 प्रतिशत जीएसटी लगाने से इसकी मांग और कम हुई है।

‘कोट्स इंडिया’ के बरेली के सीनियर सेल्स मैनेजर जावेद अहमद बताते हैं कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ ‘मुद्रा कोट्स’ नाम के धागे की कंपनी भारत में धागे का व्यापार करने आई। ‘कोट्स इंडिया’ नाम से यह कंपनी आज भी देश में काम कर रही है।

‘मैं खुद 28 सालों से इस कंपनी के साथ काम कर रहा हूं। हमारे यहां से बरेली, अहमदाबाद, जयपुर, दिल्ली, कोलकाता और पंजाब में कच्ची डोरी मांझे के लिए जाती है। पहले मांझे बनने के लिए इस्तेमाल होने वाले तागे से कंपनी को 12 करोड़ का कारोबार हो जाता था, लेकिन अब यह 4 करोड़ पर आकर ठहर सा गया है।

सूती मांझा ही सही
अरशद हुसैन के मुताबिक, 'ऐसा नहीं है कि हमारे पास मांझे के अच्छे विकल्प नहीं हैं। सदियों से कॉटन का मांझा लोगों के उत्साह का हिस्सा रहा है लेकिन अब चीनी मांझा सिर्फ लोगों की जान ले रहा है। इस प्लास्टिक मांझे ने लोगों के रोजगार भी खा लिए हैं। पहले बरेली में करीब 60-65 हजार परिवार माझा बनाते थे लेकिन अब 15 हजार भी नहीं रहे। मैं चाहता हूं कि लोग वापस कॉटन के मांझे की ओर लौटें। ’

समी आगे कहते हैं - एनजीटी के आदेश के बाद भी आज भी सूरत, नोएडा, सोनीपत, बद्दी और बैंग्लोर जैसी जगहों पर प्लास्टिक से बना मांझा तैयार हो रहा है। यहां के कारखाने ऑनलाइन भी ये मांझा बेच रहे हैं।’ समी के मुताबिक, ‘पहले करोड़ों का व्यापार मांझे से होता था, लेकिन अब लाख तक भी नहीं बचा है। अब मजदूरी कम हुई तो मजदूर भी कम हुए। लगता है बरेली के मांझे की पतंग कट गई।’

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