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मैटरनिटी लीव:गोद लेने वाली और जन्म देने वाली मां के बीच 'सरकारी' भेदभाव, कानून के खिलाफ हजारों महिलाओं ने उठाई आवाज

नई दिल्ली6 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन (केएसआरटीसी) ने एक आदेश पारित किया, जिसमें कहा है कि बच्चे को जन्म देने वाली महिला के समान ही अडॉप्ट करने वाली मां को भी मैटरनिटी लीव दी जाएगी। केएसआरटीसी की महिला कर्मचारी बच्चा गोद लेने के एक साल के भीतर या फिर बच्चे के एक साल का होने तक इसका लाभ ले सकती हैं।

इसके बाद मैटरनिटी लीव का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया। क्या देश में ​निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए मैटरनिटी लॉ अलग है? दत्तक मांओं को मैटरनिटी बेनेफिट एक्ट के किस प्रावधान पर आपत्ति है? पढ़िए ऐसे ही कई सवालों के जवाब टटोलती भास्कर वुमन की रिपोर्ट..

जन्म देने वाली और पालने वाली मां में भेदभाव

कोविड-19 ने लाखों बच्चों के सिर से मां का आंचल और पिता का साया छीन लिया। महामारी की मार ऐसी कि मां-बाप को खोने वाले ये मासूम अपनों के लाड़ और दुलार के लिए तरस रहे हैं। अनगिनत महिलाएं ऐसी हैं, जो इन नन्हें-मुन्नों के आंसू पोंछकर इन्हें अपने आंचल की छांव में रखना चाहती हैं। इन पर अपनी ममता लुटाना चाहती हैं, लेकिन मैटरनिटी बेनेफिट एक्ट में गोद लेने वाली और जन्म देने वाली मां के बीच की जो खाई है, वह कहीं न कहीं इन अनाथ बच्चों को मां की ममता से वंचित कर रही है।

बच्चों को अडॉप्ट करने के मुश्किल नियमों के साथ ही इन मांओं को मैटरनिटी लीव में भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
बच्चों को अडॉप्ट करने के मुश्किल नियमों के साथ ही इन मांओं को मैटरनिटी लीव में भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

कानून के इस प्रावधान पर है महिलाओं को आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर आचार्य के मुताबिक, हमारे देश में मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (मैटरनिटी बेनेफिट एक्ट) के तहत कामकाजी महिला अगर बच्चे को जन्म देती है तो 26 हफ्ते का मातृत्व अवकाश यानी मैटरनिटी लीव दिए जाने का प्रावधान है। बच्चा अडॉप्ट कर मां बनने वाली कामकाजी महिला को 12 हफ्ते की छुट्टी देने का नियम है, लेकिन शर्त यह है कि बच्चा तीन माह से कम उम्र का होना चाहिए। यानी कि निजी सेक्टर में काम करने वाली महिलाएं 3 माह से ज्यादा उम्र के एक या दो बच्चों को गोद लेती हैं तो उन्हें सरकार की ओर से मातृत्व अवकाश का लाभ नहीं मिलता है।

दो बच्चों की दत्तक मां ने दी इस कानून को चुनौती
गोद लेने वाली और जन्म देने वाली मां के बीच हो रहे इस भेदभाव के खिलाफ दो बच्चों की दत्तक मां हमसा नंदिनी नंदूरी ने आवाज उठाई। उन्होंने समान मैटरनिटी लीव की मांग को लेकर एक ऑनलाइन पिटीशन फाइल की है, जिसे अब तक 37,505 मांओं का साथ मिल चुका था। बेंगलुरु निवासी हमसा ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी, जिस पर सरकार से जवाब तलब किया गया है।

'यशोदा और देवकी' के बीच भेदभाव करने वाले कानून को चुनौती देने वाली दत्तक मां हमसा नंदिनी नंदूरी।
'यशोदा और देवकी' के बीच भेदभाव करने वाले कानून को चुनौती देने वाली दत्तक मां हमसा नंदिनी नंदूरी।

क्या गोद लिए बच्चे प्यार और देखभाल के हकदार नहीं?
हमसा नंदिनी की वकील बानी दीक्षित बताती हैं कि सरकारी महिला कर्मचारियों को बच्चा अडॉप्ट करने पर बायोलॉजिकल मां के बराबर ही मैटरनिटी लीव मिलती है, जबकि निजी क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को बच्चों की देखभाल की खातिर समय पाने के लिए कंपनियों की दया पर छोड़ दिया जाता है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। मां बनना और आत्मनिर्भर बनना हर औरत का अधिकार है, जिससे उसे वंचित नहीं रखा जा सकता। एडवोकेट बानी सवाल करती हैं कि क्या 3 माह से अधिक उम्र के बच्चे एक नए घर में आने पर प्यार और देखभाल पाने के हकदार नहीं हैं?

'बेटी के साथ बिताने के लिए नहीं था वक्त'
वर्किंग वुमन दीपाली भट्टाचार्य बताती हैं, 'मैंने 2001 में एक 8 माह की बेटी को गोद लिया। उस वक्त कानून में दत्तक मांओं के लिए मैटरनिटी लीव का कोई प्रावधान नहीं था। फिर भी मेरी कंपनी ने मुझे 4 हफ्ते की छुट्टी दी। मैं बच्ची को घर ले आई, लेकिन बच्ची के साथ खेलने, उससे प्यार जताने और उसका ख्याल रखने के लिए मेरे पास वक्त ही नहीं होता था। एक माह की छुट्टी खत्म होने के बाद 9 माह की बच्ची को छोड़कर ऑफिस जाना बहुत मुश्किल होता था। दिनभर तन से ऑफिस और मन से बेटी के पास रहती। मेरे पति संजय ओझा उस वक्त घर से काम करते थे। मुझसे ज्यादा बेटी के साथ वक्त वो बिताते, उसका ख्याल रखते। यही वजह है कि हमारी बेटी अपने पापा के साथ ज्यादा अटैच हो गई, जोकि आज तक है।'

अपनी बेटी के साथ दीपाली भट्टाचार्य।
अपनी बेटी के साथ दीपाली भट्टाचार्य।

दीपाली भट्टाचार्य कहती हैं कि बच्चे को गोद लेने वाली मांओं को भी बायोलॉजिकल मां के बराबर ही मैटरनिटी लीव मिलनी चाहिए। बच्चे को कंफर्ट फील कराने और उसके साथ घुलने-मिलने के लिए वक्त चाहिए होता है।

बेटी गोद लेने में आड़े आ रहा कानून
गुरुग्राम के सेक्टर-9 में रहने वाली प्रिया दीक्षित एक एमएनसी में काम कर रही हैं। प्रिया बताती हैं कि मेरी शादी को चार साल हो चुके हैं। मैं और मेरे पति एक बेटी को गोद लेना चाहते हैं, लेकिन मैटरनिटी लीव के चलते मुझे इस फैसले पर सोचना पड़ रहा है क्योंकि मेरे पति भी वर्किंग हैं।

तीन महीने का बच्चा मिलना मुश्किल
सुप्रीम कोर्ट के वकील ऋषभ राज बताते हैं कि किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के बच्चे को गोद दिए जाने से पहले चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस को दो माह अपने यहां रखना होता है, फिर चाहे वो नवजात ही क्यों न हो। इसके बाद ही बच्चे को गोद दिया जा सकता है। ऐसे में दत्तक माता-पिता को 3 माह से कम उम्र का बच्चा मिलना बहुत ही मुश्किल है।

सरकारी नौकरी करने वाली महिलाओं के लिए है अलग कानून
एडवोकेट बानी दीक्षित कहती हैं कि प्राइवेट सेक्टर की महिलाओं के लिए सशर्त मैटरनिटी लीव का प्रावधान है, जबकि सरकारी नौकरी करने वाली महिलाओं के लिए ऐसा नहीं है। उनके लिए बच्चा अडॉप्ट पर 180 दिन की लीव का प्रावधान है। केंद्र सरकार ने 2006 में सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाली महिला कर्मचारियों के लिए 135 दिन की छुट्टी देने का प्रावधान किया था, जिसे 2009 में बढ़ाकर 180 दिन कर दिया।

बीमारी से लड़ने में मदद करती है मां के साथ बॉन्डिंग
बाल चिकित्सक डॉ. एस. पी शर्मा बताते हैं कि बच्चा 1 से 3 महीने के बीच मां को पहचानने लगता है। उस वक्त जो उसके सबसे ज्यादा करीबी होता है, वो उसी को मां समझने लगता है। बच्चा जब बीमार होता है तो उसे मां के साथ और अपनेपन की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। मां के साथ बच्चे की बॉन्डिंग सकारात्मक असर डालती है, जिससे बच्चा जल्दी रिकवर करता है। डॉ. शर्मा के मुताबिक, दत्तक मांओं के साथ चुनौती यह है कि बच्चा 1 माह से लेकर 7 साल तक या उससे बड़ा भी हो सकता है। बड़े बच्चे के साथ बॉन्डिंग बनाने में वक्त लगता है। ऐसे में अगर मां के पास समय नहीं होता है तो मां-बच्चे की बॉन्डिंग तगड़ी नहीं हो पाती है, जिससे बच्चा अकेलापन महसूस करने लगता है और कई तरह परेशानियों से गुजरता है।