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भास्कर इंटरव्यूमिलिए डॉक्टर इंद्रजीत खांडेकर से:रेप मामलों में इनकी रिपोर्ट पर गाइडलाइंस बनी, टू फिंगर टेस्ट बैन हुआ

नई दिल्ली21 दिन पहलेलेखक: संजय सिन्हा
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‘टू फिंगर टेस्ट’ पर सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद यह खबर चर्चा में रही कि कैसे यह अवैज्ञानिक तरीका लगातार जांच का हिस्सा बना हुआ है। कोर्ट ने टू फिंगर टेस्ट को स्त्री के साथ दोबारा रेप बताया। कोर्ट के इस जजमेंट के पीछे जिस डॉक्टर ने सबसे ज्यादा मेहनत की उनका नाम डॉ. इंद्रजीत खांडेकर है। ‌

डॉ. खांडेकर महाराष्ट्र के वर्धा जिले के सेवाग्राम में महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (MGIMS)में फॉरेंसिक मेडिसिन के प्रोफेसर हैं। उन्होंने रेप विक्टम के साथ हो रहे अन्याय को खत्म करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। डॉ. खांडेकर वर्धा के पुलगांव के रहनेवाले हैं। MGIMS वर्धा से उन्होंने MBBS की पढ़ाई पूरी की। दैनिक भास्कर के सवालों का उन्होंने कुछ इस तरह जवाब दिया।

इंवेस्टिगेशन को लेकर पुलिस अफसरों को ट्रेनिंग देते डॉ. इंद्रजीत खांडेकर।
इंवेस्टिगेशन को लेकर पुलिस अफसरों को ट्रेनिंग देते डॉ. इंद्रजीत खांडेकर।

सवाल: रेप विक्टिम को टू फिंगर टेस्ट के दर्द से बचाने की शुरुआत कैसे हुई? फॉरेंसिक मेडिसिन की पढ़ाई इसमें कितनी काम आई?

जवाब: अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने फॉरेंसिक मेडिसिन में MD किया और वर्धा में ही 2007 में लेक्चरर हो गया। चूंकि फॉरेंसिक मेडिसिन क्राइम इंवेस्टिगेशन में सबसे ज्यादा मदद करता है इसलिए मुझे रेप विक्टिम के दर्द को समझने और पुलिस की कार्यशैली के बारे में पता चला।

मैंने पाया कि रेप से जुड़े मामलों में सही इंवेस्टिगेशन नहीं होता। कारण कि पुलिस अफसरों को ट्रेनिंग नहीं मिलती जिसकी उन्हें जरूरत है। उनमें प्रैक्टिकल नॉलेज नहीं होता। क्राइम सीन पर जाकर क्या करना चाहिए, मेडिको-लीगल केसेज की कैसे पड़ताल होनी चाहिए, उन्हें नहीं पता होता।

यह सब देख और समझकर मैंने एक रिपोर्ट तैयार की। उस समय वर्धा की पुलिस अधीक्षक अस्वती दोरजे थीं। मेरी रिपोर्ट पढ़ने के बाद उन्होंने कहा कि फॉरेंसिक पर ऐसी रिपोर्ट पहले कभी नहीं बनी। उनके कहने पर मैंने रिपोर्ट को बुक की शक्ल दी जो पुलिस के काम आ सके। 2009 में मराठी में बुक पब्लिश होकर आई जिसका नाम था ‘न्यायवैधक शास्त्राच्या दृष्टिकोनातुन गुन्हाचा तपास’। अब इस किताब का तीसरा वॉल्यूम आ चुका है। मुझे लगता है कि फॉरेंसिक की पढ़ाई करने से मुझे क्राइम इंवेस्टिगेशन की बारीकियों और खामियों की गंभीरता का पता चला। जब किताब का पहला एडिशन आया तो मैडम दोरजे ने खुद ही खरीद कर पुलिस विभाग में डिस्ट्रीब्यूट करवाया। दोरजे अभी IG हैं।

सवाल: टू फिंगर टेस्ट अवैज्ञानिक है, इस पर रोक लगनी चाहिए, यह आपने कब सोचा? आपने रेप से जुड़े मामलों की स्टडी कब से शुरू की?

जवाब: फॉरेंसिक से जुड़े होने की वजह से लगातार क्राइम सीन पर जाना शुरू हुआ। तब रेप विक्टिम की पीड़ा से रू-ब-रू हुआ। मैंने देखा कि हॉस्पिटल में भी रेप विक्टम को गलत नजर से देखा जाता है। खुसुर-फुसुर तो आम बात होती है। लड़की टाइट टीशर्ट में है या स्लीवलेस कपड़े पहने हैं तो कहेंगे कि अब ऐसे कपड़ें पहनेंगी तो रेप तो होगा ही। उनके प्रति लोग संवेदनहीनता की हद तक जाकर बात करते हैं। लोगों का ब्लेमिंग एटीट्यूड दिखता है।

मैंने देखा कि डॉक्टर भी केवल फॉर्मेलिटी पूरा कर रहे थे। सायकोलॉजिकल हेल्प की जगह रेप विक्टिम के जख्मों को कुरेदा जा रहा था। वो बस इसे वाकिंग-टॉकिंग क्राइम सीन के रूप में ही देख रहे थे। टू फिंगर टेस्ट तो भयावह था। जिन रेप विक्टिम का यह टेस्ट होता वो दर्द से कराह उठतीं। वो पहले ही प्रताड़ित होती हैं लेकिन टू फिंगर टेस्ट होने पर उनका दर्द बढ़ जाता था। डॉक्टर इस तरह से जांच करते जैसे उन्हें MBBS करीकुलम में जो पढ़ाया गया है उसका प्रैक्टिकल कर रहे हों। किसी तरह की निजता का ध्यान नहीं रखा जाता था। मैंने देखा है कि डॉक्टर कमेंट भी करते थे। ‘तुम्हें ठीक से रहना चाहिए था। अलर्ट नहीं रहने का नतीजा यही है।’ ऐसे कमेंट कोई भी डॉक्टर नहीं कर सकते, यह गाइडलाइन के खिलाफ है। एथिक्स के भी विरुद्ध है।

और केवल रेप विक्टिम ही नहीं, अनमैरिड लड़की प्रेग्नेंसी लेकर आती है तो लोगों का नजरिया और भी गलत हो जाता है। नर्स से लेकर डॉक्टर और दूसरे मेडिकल स्टाफ भी कमेंट करते हैं। उनके चरित्र पर लांछन लगाया जाता है। ‘ये सब पहले नहीं सोचा। कम से कम घर-परिवार का तो ध्यान रखती। तुम्हें शोभा देता है क्या, अच्छा लगता है क्या।’ यही ऐसी होगी, वैसी होगी।’

डॉक्टर इस बात को भूल जाते हैं कि अबार्शन लीगल है तो करिए अन्यथा इन्कार कर दीजिए, लेकिन अवांछित कमेंट नहीं किया जा सकता।

यह सब देखने-समझने के बाद मैं इस निर्णय पर पहुंचा कि टू फिंगर टेस्ट अवैज्ञानिक है, इसका कोई आधार नहीं है। इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए। यह 2009 की बात है। मैंने रेप से जुड़े मामलों की स्टडी करनी शुरू की। उनकी खामियों के बारे में जाना।

सवाल: कोर्ट का जजमेंट पढ़ना और रिपोर्ट तैयार करने का सिलसिला कब से शुरू हुआ?

जवाब: इसी क्रम में मैंने कोर्ट के जजमेंट पढ़े। डॉक्टर की जो रिपोर्ट कोर्ट में सबमिट की जाती, डॉक्टर ने जो साक्ष्य दिया, कोर्ट में एविडेंस का क्या इंटरप्रिटेशन किया गया और इस पर क्या जजमेंट आया, इस पर स्टडी की। लोअर कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट की स्टडी की। डॉक्टर ने कोर्ट में जो रिपोर्ट दी, उसकी जांच की। हमने पाया कि टू फिंगर टेस्ट दर्दनाक है और इसे खत्म किया जाना चाहिए। तब 268 पेज की रिपोर्ट बनाई जिसका टाइटल था ‘PITIABLE AND HORRENDOUS QUALITY OF MEDICO LEGAL EXAMINATION OF RAPE VICTIMS IN INDIA’ ।

इस रिपोर्ट की बातों को मैंने प्वाइंटवाइज लिखा, इसे संक्षेप में यहां समझा जा सकता है।

  • सेक्शुअल असॉल्ट मामले में मेडिकल जांच करने, रिपोर्ट बनाने और डॉक्टरों के ओपिनियन देने में किसी तरह की यूनिफॉर्मिटी नहीं है
  • रेप विक्टिम और आरोपित के मेडिकल एग्जामिनेशन के लिए कोई विशेष प्रोफॉर्मा नहीं है
  • ज्यादातर मामलों में डॉक्टरों को टू फिंगर टेस्ट के लिए विशेष ट्रेनिंग नहीं दी गई है। वैसे मेडिकल ऑफिसर जिन्होंने इंटर्नशिप के दौरान भी कभी मेडिकल एग्जामिनेशन नहीं किया, वे भी टू फिंगर टेस्ट कर रहे थे
  • CrPC की धारा 164 A की गाइडलाइंस का उल्लंघन किया जा रहा था
  • DNA प्रोफाइल के लिए सैंपल को प्रिजर्व नहीं किया जा रहा था
  • पीड़िता की मानसिक स्थिति पर कोई रिपोर्ट नहीं बनाई गई
  • मेडिकल रिपोर्ट में डॉक्टर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उसके कारणों के बारे में नहीं लिखते
  • मेडिकल एग्जामिनेशन होने से पहले पीड़िता का कंसेंट नहीं लिया जाता
  • जहां कंसेंट लिया भी जाता है वहां यह ठीक से नहीं होता
  • रिपोर्ट में इस बात का जिक्र नहीं होता कि जांच कब शुरू हुई और कब खत्म हुई
  • फॉरेंसिक एनालिसिस के लिए बहुत कम नमूने लिए जाते थे
  • दूसरे देशों की तरह स्पेशल किट SAFE (specialized sexual assault forensic evidence) भी नहीं दिए जाते
  • अधिकतर रेप मामलों में DNA जांच के लिए डॉक्टर न तो सैंपल कलेक्ट करते हैं या ऐसा करने की सलाह ही देते हैं
  • घटना के समय पीड़िता के पहने गए कपड़े की जांच नहीं की जाती
  • कई रिपोर्ट में डॉक्टर उन बातों का उल्लेख नहीं करते जिन्हें लेकर पुलिस की क्वेरी होती है
  • कोर्ट में एक्सपर्ट एविडेंस के रूप में कैसे प्रस्तुत करना है इसे लेकर डॉक्टरों को ट्रेनिंग नहीं दी जाती
  • पीड़िता और आरोपी की मेडिकल जांच में पुलिस के साथ-साथ डॉक्टरों के द्वारा भी देरी की जाती है जिससे फॉरेंसिक एविडेंस खत्म होने का रिस्क रहता है
  • जांच में देरी का बड़ा कारण अस्पतालों में महिला डॉक्टरों की कमी है
  • पीड़िता को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल और एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास भेजा जाता है

इस रिपोर्ट को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मेडिकल टॉक्सिकोलॉजी एंड लीगल मेडिसिन में भी प्रकाशित किया गया है जहां इसे देखा जा सकता है।

इस रिपोर्ट को पहले सरकार को भेजा गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। फिर कोर्ट में रिपोर्ट को सबमिट किया गया। कोर्ट ने इसे सीरियसली लिया और PIL के रूप में कई निर्देश दिए। 2011 में महाराष्ट्र सरकार ने कहा कि ‘टू फिंगर टेस्ट’ नहीं करना है। 10 मई 2013 को सरकार ने रिजोल्यूशन पारित किया। एक कंप्रिहेन्सिव मैन्युअल बनाया गया। पहले जो खामियां थीं उसे दूर करने के लिए एक गाइडलाइन महाराष्ट्र सरकार ने रिलीज किया।

सवाल: निर्भया कांड के बाद केंद्र सरकार ने भी गाइडलाइन जारी किए। क्या यह आपकी रिपोर्ट पर ही आधारित थी?

जवाब: रेप विक्टम से जुड़ी स्टडी पर रिपोर्ट मैंने राज्य सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी भेजी थी। 2012 में निर्भया कांड के बाद रेप से जुड़े मामलों को लेकर सरकार ने एक्शन लेना शुरू किया। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने एक कमेटी का गठन किया जिसमें मुझे को-ऑर्डिनेटर बनाया गया। इस कमेटी का मुख्य उद्देश्य सेक्शुअल असॉल्ट विक्टिम्स के लिए नेशनल गाइडलाइन तैयार करना था। कमेटी में AIIMS दिल्ली के डॉक्टर ओपी मूर्ति और मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज दिल्ली के डॉ. बीएल चौधरी को रखा गया। दिसंबर 2013 में ICMR ने महाराष्ट्र सरकार की तर्ज पर गाइडलाइन तैयार कर लिया। इसे ही केंद्र सरकार ने 2014 में नेशनल गाइडलाइंस के रूप में रिलीज किया।

सवाल: आपने बताया कि टू फिंगर टेस्ट अवैज्ञानिक है। मेडिकल की किताबों में इसे साइंटिफिक कहकर पढ़ाया जाता है, आपका एप्रोच क्या रहा?

जवाब: टू फिंगर टेस्ट को अवैज्ञानिक बताने के कई कारण थे। इस टेस्ट से यह प्रूफ नहीं किया जा सकता कि रेप हुआ है या नहींं। डॉक्टर टू फिंगर टेस्ट कर यह बताते कि पीड़िता सेक्स की आदी रही है या नहीं। तब किसी को भी यह लग सकता है कि रेप पीड़िता का ट्रायल चल रहा है या रेप पीड़िता के कैरेक्टर का ट्रायल हो रहा है। यह जांच महिला की प्रतिष्ठा को तार-तार करने वाला था। पूरी तरह अमानवीय और आपत्तिजनक।

कोर्ट ने टू फिंगर टेस्ट को अवैज्ञानिक बताया लेकिन दुखद बात यह है कि मेडिकल करीकुलम में यह वैज्ञानिक कहकर पढ़ाया जाता रहा। मेडिकल की किताबों में अभी भी यह साइंस आफ वर्जिनिटी के रूप में पढ़ाया जा रहा। परीक्षा में यह भी पूछा जाता था कि साइंस ऑफ वर्जिनिटी क्या है? वर्जिनिटी पर लांग क्वेश्चन पूछे जाते थे। कुल मिलाकर मेडिकल के छात्रों को गलत पढ़ाया जाता था। 2018 में महाराष्ट हेल्थ यूनिवर्सिटी, MCI (तब मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, अब यह नेशनल मेडिकल कमीशन है), राज्य सरकार और केंद्र सरकार को एक रिप्रेजेंटेशन ड्राफ्ट किया। उसमें कोर्ट केस का भी रेफरेंस दिया। बताया कि यह अवैज्ञानिक है। स्टडी भी प्रूव करती है कि जिसे वैज्ञानिक कहकर पढ़ा रहे उसे अवैज्ञानिक कहकर पढ़ाया जाना चाहिए।

इस पर महाराष्ट्र हेल्थ यूनिवर्सिटी ने निर्णय लिया और बताया कि साइंस ऑफ वर्जिनिटी अवैज्ञानिक है। करिकुलम में टू फिंगर टेस्ट की पढ़ाई अवैज्ञानिक है। इसे किताबों से निकालें। मैंने तत्कालीन MCI से भी जवाब मांगा, पर वहां से कोई रिस्पांस नहीं आया। NMC के अस्तित्व में आने पर रिमाइंडर भेजा कि महाराष्ट्र सरकार की तरह सेंट्रल में भी इस तरह से डिसीजन लेना चाहिए। इस पर NMC के अंडरग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड की प्रेसिडेंट डॉ. अरुणा वी वनिकर ने एक कमेटी बनाई और मुझे इसका को-आर्टिनेटर बनाया।

इसके बाद NMC के स्तर पर कई निर्णय लिए गए। तय हुआ कि मेडिकल के छात्रों को जो पढ़ा रहे हैं वो गलत है। कोई लड़की वर्जिन है या नहीं या सेक्शुअल आदी है या नहीं, इस पर डॉक्टर ओपिनियन नहीं दे सकते। यहां तक कि कोई भी कोर्ट आदेश देता है कि वर्जिनिटी टेस्ट करनी है तो हमें कोर्ट को समझाना है कि जिस साइंस की बदौलत ये टेस्ट करते थे, वो अवैज्ञानिक है। इसलिए हम यह टेस्ट नहीं कर पाएंगे। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला लिया, उससे अब मेडिकल की किताबें बदल जाएंगी। मेरा यह मानना है कि वर्धा के सेवाग्राम से शुरू हुआ सफर काफी आगे आ गया है। WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) ने भी 2018 में एक्शन लिया। कहा कि अवैज्ञानिक है और प्रोफेशन्ल एथिक्स के खिलाफ है। 2021 में पाकिस्तान की एपेक्स कोर्ट ने भी ऐसा ही निर्णय लिया। जिस चीज को हमने 2011 में बताया उस पर दुनिया भर में बहस छिड़ी और निर्णय हुए। जिन देशों में टू फिंगर टेस्ट चलन में है वहां भी इसे बैन किया जा रहा है।

डॉ. खांडेकर की पुस्तक जिसमें बताया गया है कि रेप मामलों में इंवेस्टिगेशन कैसे हो।
डॉ. खांडेकर की पुस्तक जिसमें बताया गया है कि रेप मामलों में इंवेस्टिगेशन कैसे हो।

सवाल: आपने कहा है कि टू फिंगर टेस्ट के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है? इसका मतलब क्या है?

जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने रेप विक्टिम के मामले में टू फिंगर टेस्ट को बैन किया है। लेकिन मैरिटल डिस्प्यूटस में देशभर में हाई कोर्ट और फैमिली कोर्ट डॉक्टरों को आदेश देते हैं कि संबंधित महिला का वर्जिनिटी टेस्ट करें। यदि पति के नपुंसक होने पर पत्नी तलाक चाहती है तब कोर्ट वर्जिनिटी टेस्ट कराने का आदेश देता है। मेरा सवाल यह है कि यदि यह टेस्ट रेप विक्टिम्स के लिए अवैज्ञानिक है तो फिर यही टेस्ट मैट्रिमोनियल डिस्प्यूट्स में कैसे साइंटिफिक हो सकता है? यह लड़ाई तब तक खत्म नहीं होगी जब तक सुप्रीम कोर्ट लोअर और हाई कोर्ट को वर्जिनिटी टेस्ट करने जैसे आदेश देने से रोके।

आप डॉक्टर के साथ RTI एक्टिविस्ट भी हैं। RTI डालने और फिर रिपोर्ट बनाने और एक्शन होने तक चुप नहीं बैठते। कौन सी बात आपको कुरेदती है?

जवाब: मैं बिल्कुल सामान्य डॉक्टर ही हूं, पर जिस सिस्टम में आप रहते हैं वहां की गलत चीजों को देखकर चुप रहना ठीक नहीं है। जब कोई चीज मुझे खटकती है तब उसके कारणों की तलाश करता हूं। जब वाजिब कारण मिल जाते हैं तब मैं अथॉरिटी से पूछता हूं कि ऐसा क्यों है? इसलिए मैंने RTI(राइट टू इंफॉर्मेशन) डालनी शुरू की। 2013 में मैंने पहली RTI डाली और तब से लेकर अब तक 500 से अधिक RTI डाल चुका हूं।

महाराष्ट्र में IG अस्वती दोरजे ने डॉ. खांडेकर की पुस्तक को पुलिसकर्मियों के बीच बंटवाया।
महाराष्ट्र में IG अस्वती दोरजे ने डॉ. खांडेकर की पुस्तक को पुलिसकर्मियों के बीच बंटवाया।

पुलिस अपनी जांच के दौरान पूछती है कि रेप पीड़िता संभोग की आदी है कि नहीं, इसे चैलेंज किया। मैंने 75 पेज की रिपोर्ट बनाई और सरकार को भेजी। बलात्कार हुआ कि नहीं, यह लीगल डिफिनिशन है। डॉक्टर नहीं कह सकते कि पीड़िता संभोग की आदी है या नहीं। इस संबंध में मैंने 2013 में महाराष्ट्र सरकार के होम डिपार्टमेंट में RTI डाली कि किस आदेश के तहत यह पूछा जाता है। रिपोर्ट जमा करने के बाद मैंने फिर RTI से पूछा कि क्या कार्रवाई की गई है। 2015 में महाराष्ट्र सरकार ने इस प्रैक्टिस को बंद कर दिया।

RTI से पूछा रेप को नेचुरल सेक्शुअल ऑफेंस में कैसे डाला

मेडिकल करीकुलम में सेक्शुअल ऑफेंस को नेचुरल और अननेचुरल केटेगरी में डिवाइड किया गया था। हास्यास्पद था कि रेप को नेचुरल केटेगरी में डाला गया था। मैंने RTI के जरिए जवाब मांगा कि क्या यह किसी सर्कुलर या किसी आदेश के जरिए ऐसा पढ़ाया जा रहा है। सवाल यही था कि कोई भी ऑफेंस नेचुरल नहीं हो सकता (NO offense can be natural)। मैंने कहा कि ऐसी चीजें क्यों लिख रहे। सेक्शुअल ऑफेंस, एनल सेक्स, ओरल सेक्स, चाइल्ड एब्युज लिखिए। यानी लीगल ऑफेंस ही लिखना है। NMC ने करिकुलम को मोडिफाई किया है। लीगल ऑफेंस को ही लिखना है।

NCERT को दिए कई RTI

मैंने NCERT (नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग) को कई RTI दाखिल किए। मैंने पूछा कि पार्ट्स ऑफ बॉडी में आप सभी नाम क्यों नहीं दे रहे। इसे कवर क्यों किया गया है। क्या इस संबंध में कोई सर्कुलर जारी किया गया है या कोई आदेश है?

NCERT ने कहा कि कमेटी बनाएंगे। लेकिन दो साल बाद भी कुछ नहीं हुआ। हालांकि वहां के डिप्टी डायरेक्टर ने आरटीआई डालने के बाद फोन किया और कहा कि ये चीजें पेरेंटस ही पढ़ा सकते हैं। तब मैंने कहा कि हैंड वाश भी आप पढ़ाते हैं तो ये भी पेरेंट्स बखूबी पढ़ा सकते हैं। आप जेनेटिला के बारे में क्यों नहीं पढ़ा सकते। मेरा मानना है कि बच्चों को इनके बारे में न बताकर हम उनमें कांफिडेंस कम कर देते हैं। आप देखिए, पहली से पांचवीं कक्षा तक के बच्चे क्रॉनिक अब्यूज के शिकार होते हैं।

सवाल: पुलिस और फॉरेंसिक का चोली-दामन का साथ है। आपने कहा कि इंवेस्टिगेशन के लिए पुलिस को सही तरीके से ट्रेनिंग नहीं दी जाती। इस संबंध में आपकी क्या स्टडी रही?

जवाब: फॉरेंसिक की ट्रेनिंग के दौरान कई चीजें मैंने जानी थी। जैसे मुझे पता चला कि बलात्कार के आरोपी का सीमेन कलेक्शन किया जाता है। एम्स से लेकर छोटे गांव में भी यह कलेक्ट किया जाता है। सीमेन कलेक्ट करने के लिए पुलिस को काफी मशक्कत करनी पड़ती है। कई बार चार-पांच दिन तो कभी-कभी सप्ताह भर लग जाते हैं। एक पुलिस अफसर ने बताया कि सीमेन के लिए क्या-क्या पापड़ बेलते हैं। एक उदाहरण देकर बताया कि एक रेप के आरोपित को पहले PHC लेकर गए। वहां सीमेन कलेक्ट नहीं हो सका। डॉक्टर ने तालुका अस्पताल भेज दिया। दो पुलिस वाले आरोपित को लेकर दूसरे दिन तालुका ले गए। वहां भी सीमेन नहीं लिया जा सका। उसे लेकर फिर जिला अस्पताल और फिर वहां से मेडिकल कॉलेज। पुलिस ने बताया कि सीमेन कलेक्शन नहीं होता है तो आरोपित को पोर्नोग्राफी मेटेरियल दिया जाता है। यह सब जानने के बाद बड़ा क्षोभ हुआ कि रेप को आरोपित को पोर्नोग्राफी मेटेरियरल दिया जा रहा!

जब मैंने स्टडी की तो पता चला कि सीमेन निकालने का उद्देश्य ब्लड ग्रुप जानना है। 40 साल पुराने जजमेंट में इसका उल्लेख है। तब मैंने कहा कि ये कैसे चल रहा है। मैंने कहा कि सीमेन का कोई यूज नहीं है। यदि ब्लड ग्रुप या DNA निकालना है तो ब्लड लीजिए। इस पर रिपोर्ट बनाई। इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने इसे बैन किया। देश में पहली बार इसे किसी राज्य में बैन किया गया। हालांकि महाराष्ट्र छोड़ देश में कई जगह यह प्रैक्टिस अभी भी है।

सवाल: आपने पुलिस के साथ-साथ डॉक्टरी पेशे की खामियों को भी उजागर किया है। इस संबंध में क्या कुछ किया है?

जवाब: हर फील्ड में तरह-तरह की बातें होती हैं। मेडिकल प्रोफेशन में भी कई चीजें पहले से चली आ रही हैं जिन्हें बदलने की जरूरत है। इस दिशा में भी काम किया है। जैसे-रेप विक्टिम की रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट या कोई भी मेडिको लीगल रिपोर्ट, इंज्युरी रिपोर्ट रिडेबल नहीं होती। डॉक्टर की हैंडराइटिंग को पढ़ना मुश्किल होता है। मैंने अपनी स्टडी में पाया है कि कई डॉक्टर खुद की बनाई रिपोर्ट नहीं पढ़ पाते। तब मैंने इस बात को 2012 में ही सामने रखा। कोर्ट में रिपोर्ट सबमिट की। कोर्ट ने PIL पर कंप्यूटराइजेशन का काम पूरा करने का आदेश दिया। सेवाग्राम स्थित महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज में इसे लागू किया गया। तब रात-रात भर काम कर हम लोगों की टीम ने इसका सॉफ्टवेयर तैयार किया। अब यहां हर मेडिकल लीगल रिपोर्ट कंप्यूटराइज्ड है। यह वह दौर था जब मेरी पत्नी ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रही थीं। तमाम परेशानियों के बाद यह काम पूरा हुआ। देश का पहला सॉफ्टवेयर बना 2016 में। काफी अस्पतालों ने इसे अपनाया है।

काउज ऑफ डेथ में डाउट हो तो ही करें पोस्टमार्टम

मैंने पोस्टमार्टम पॉलिसी को लेकर भी रिपोर्ट बनाई। सरकार को लिखा, PIL फाइल की। तब बाॅम्बे हाई कोर्ट ने निर्देश दिए। कमेटी बनी और गाइडलाइन इश्यू किए गए। मैंने 25 से 30 RTI डाले तब जाकर केंद्र सरकार ने भी कमेटी बनाई।

मैंने पाया कि अनावश्यक रूप से डॉक्टर पोस्टमार्टम करते हैं। 174 CrPC कहता है कि काउज ऑफ डेथ में डाउट है तो ही पोस्टमार्टम करना है। लेकिन होता ये है कि जैसे किसी एक्सीडेंट में किसी को हेड इंजुरी हुई और इसकी वजह से उसकी मौत हो गई। तब सामान्य सी प्रैक्टिस है कि डॉक्टर काउज ऑफ डेथ न लिखकर सीधे पोस्टमार्टम के लिए भेज देते हैं।

मैंने रिपोर्ट में दावा किया कि 40 प्रतिशत पोस्टमार्टम कम कर सकते हैं। तब अंकित गोयल वर्धा के एसपी थे। उन्होंने एक कमेटी बनाई जिसमें मुझे को-आर्डनिटेर बनाया। मैंने कहा कि लॉ को इंप्लीमेंट करना जरूरी है। तभी क्वालिटी पोस्टमार्टम हो सकेगा।

पहले दो गलत धारणाए थीं। पहला, कोई कॉज आफ डेथ नहीं देनी है और दूसरा पोस्टमार्टम अनिवार्य है। मैंने RTI डाला कि क्या मेडिकल लीगल केस में क्या कोई ऐसा लॉ है या ऐसा सर्कुलर है। सेक्शन 10, सब सेक्शन 3 में बताया गया है कि काउज आफ डेथ देना अनिवार्य है। कोई भी रिस्ट्रक्शन नहीं है।

इसे पुलिस के पास भेजा जाएगा। 174 CrPC के तहत पंचनामा बन जाएगा। लेकिन बॉडी पोस्टमार्टम के लिए नहीं जाएगा। इस फैसले का असर ये हुआ कि 6 साल में वर्धा में 51 प्रतिशत पोस्टमार्टम कम हो गया है। वर्धा में हर साल 750 पोस्टमार्टम होते थे जो घट कर 300 हो गया। त्रिपुरा सरकार ने भी इसे लागू करने की पहल की है। RTI से बताया गया कि मेडिकल किताबों में भी बताया जा रहा है कि डॉक्टरों को काउज ऑफ डेथ देना है। इस रिपोर्ट को कई जर्नल में भी प्रकाशित किया गया है।

सवाल: सिस्टम में बदलाव लाने के लिए कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जब आप कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहे थे, तब फैमिली ने किस तरह सपोर्ट किया?

जवाब: मेरे पापा टीचर हैं। भैया, दीदी और बहनोई डॉक्टर हैं। इन्हें देखकर ही डॉक्टरी पेशे में आया। हालांकि मैंने 2009 में LLB भी किया था। जब मैंने काम करना शुरू किया तो पहले-पहले रिपोर्ट बनानी शुरू की। रिपोर्ट सरकार को भेजता। तब घरवाले कहते कि रिपोर्ट से कुछ होता नहीं है। कुछ भी बदलने वाला नहीं है। ये तो बस टाइमपास ही है। बाहर के लोग भी कमेंट पास करते थे। लेकिन जो क्रिटिकल कमेंट होते थे वे मुझे सोचने पर मजबूर कर देते थे। पर मैं हताश नहीं होता, स्टडी करता और रिपोर्ट बनाता। घर के लोग डरते भी थे। डर था कि कोर्ट का मामला है पता नहीं क्या होगा। लेकिन जब सफलता मिली, पहला जजमेंट आया और मेरा नाम हुआ तब सब लोग पॉजिटिव मानने लगे। मेरे पिता कहा करते थे कि जो काम दिल से किया जाता है उसमें सफलता मिले या नहीं मिले खुशी जरूर मिलती है।

मुझे हमेशा इस बात की खुशी रही कि मैं जिस मेडिकल कॉलेज में हूं वहां का मैनेजमेंट हमेशा मेरे साथ रहा। पत्नी ने भी रिपोर्ट और बुक लिखने के लिए हमेशा इनकरेज किया।

सवाल: आप पुलिस इंवेस्टिगेशन के लिए भी ट्रेनिंग देते आए हैं। पुलिस विभाग में ही आपने कई लेक्चर दिए हैं। डॉक्टर, प्रोफेसर, ट्रेनर किस भूमिका में अपने आपको पाते हैं?

जवाब: फॉरेंसिक मेरा विषय है। इसी से ये सारी चीजें जुड़ी हैं। यह सही है कि देशभर से मुझे पुलिस इंवेस्टिगेशन पर लेक्चर देने के लिए बुलाया जाता है। अब तक 15000 पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षित कर चुका हूं। मेडिकल कॉलेजों, फार्मेसी, लॉ कालेज और कॉफ्रेंस में भी जाता हूं। पुलिस विभाग में कम से कम 300 से ऊपर लेक्चर दे चुका हूं। मुंबई पुलिस को भी ट्रेनिंग दी है।

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