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झारखंड में डायन के शक में तीन की हत्या:सदियों पुरानी है कुप्रथा, कानून के बावजूद नहीं रुक रहीं डायन के नाम पर महिलाओं को नंगा घुमाने और उनकी हत्या की घटनाएं

4 महीने पहले
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सदियों पुरानी कुप्रथा है जारी - Dainik Bhaskar
सदियों पुरानी कुप्रथा है जारी
  • गुमला में डायन के शक में एक ही परिवार के तीन को मारा
  • झारखंड में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम-2001 लागू है
  • राजस्थान में डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम-2015 लागू

झारखंड के गुमला जिले के एक गांव में डायन होने के शक में एक ही परिवार के तीन सदस्यों की हत्या का मामला सामने आया है। डायन का आरोप लगा शनिवार रात सास-ससुर और बहू की कुल्हाड़ी से काटकर की हत्या कर दी गई। लूटो गांव में हत्या को अंजाम देने के बाद दोनों आरोपियों ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया। पुलिस के मुताबिक आरोपी का कहना है कि तीनों ही तंत्र-मंत्र कर उसके परिवार को बर्बाद करना चाह रहे थे।

झारखंड से डायन होने के शक में हत्या जैसी अपराध की घटनाएं तेजी से सामने आ रही हैं। सिर्फ झारखंड ही नहीं बल्कि राजस्थान, असम सहित कई ऐसे राज्य हैं, जहां अंधविश्वास के चक्कर में लोग किसी न किसी की जान ले ले रहे हैं। कानून होने के बावजूद देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं। देश के छह राज्यों में कानून लागू है जबकि कई राज्य सरकारें इसे लागू करने की प्रक्रिया में हैं।

राजस्थानः 1553 में डायन प्रथा पहली बार गैर-कानूनी घोषित

बहरहाल, डायन प्रथा कब शुरू हुई, इसका कोई प्रमाण तो नहीं मिलता, लेकिन माना जाता है कि यह सदियों पुरानी है। राजस्थान के कुछ इलाकों में डाकन या डायन प्रथा कोई छह-सात सौ साल पहले से चलन में थी। जादू-टोना के इस्तेमाल के आरोप में महिलाओं की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती थी। 1553 में उदयपुर में पहली बार इसे गैर-कानूनी घोषित किया गया था। राजस्थान में डायन प्रथा खत्म करने के लिए 'डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम-2015' 26 जनवरी 2016 से लागू है। उस साल राज्य सरकार ने एक्शन प्लान भी तैयार किया था ताकि महिलाओं को डायन, डाकन, डाकिन जैसे शब्दों से संबोधित न किया या और न ही उन्हें प्रताड़ित किया जाए।

डायन प्रथा के खिलाफ जागरूकता जरूरी
डायन प्रथा के खिलाफ जागरूकता जरूरी

झारखंड में चली लंबी लड़ाई, फिर अमल में आया कानून

झारखंड में इस कुप्रथा को रोकने को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने लंबी लड़ी और कानून बनवाया। डायन होने के नाम पर महिला उत्पीड़न के खिलाफ सबसे पहले जमशेदपुर से आवाज बुलंद हुई थी। सरायकेला-खरसावां जिले के कोलाबिरा, वीरबांस की छुटनी महतो ने खुद यह तकलीफ झेली। जमशेदपुर के सामाजिक कार्यकर्ता प्रेमचंद को लगा कि इस कुरीति के खिलाफ सख्त कानून होना चाहिए। छुटनी को उनके गांव वालों ने डायन घोषित कर रखा था। उन्होंने आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ी। छुटनी समाज से बहिष्कृत 80 से ज्यादा महिलाओं को मुख्यधारा से जोड़ चुकी हैं। प्रेमचंद ने ग्रामीण क्षेत्र में अंधविश्वास मिटाने की मुहिम छेड़ रखी है तो छुटनी इस अभियान की जैसे ब्रांड एंबेसडर बन गईं।

झारखंड के गांवों में महिलाओं को डायन ठहरा देना आम है। गांवों में प्रचारित कर दिया जाता है कि डायन जादू-टोना की बदौलत किसी की जान ले सकती हैं। हरे-भरे पेड़ को सुखा देने, बच्चे या किसी को गायब कर देने से जैसे आरोप महिलाओं पर डायन बोलकर आरोप मढ़ दिया जाता है। गांव की कमजोर, विधवा महिलाओं को डायन घोषित कर दिया जाता है। स्थिति ये हो जाती है कि ग्रामीणों को उकसा कर उनकी हत्या कर दी जाती है।

डायन के नाम पर महिलाओं को मैला खिलाना, नंगा घुमाना, हत्या आम

डायन होने के नाम पर महिलाओं को मैला खिलाना, नंगा घुमाना और हत्या कर देने जैसी जघन्य घटनाएं होती हैं। इस कुप्रथा के खिलाफ 1991 में पहली बार जमशेदपुर से आवाज उठी थी। प्रेमचंद ने सोनारी में फ्री लीगल एड कमेटी (फ्लैक) संस्था खड़ी की। इस संस्था ने यूनिसेफ के साथ मिलकर जागरूकता अभियान चलाया। इस संस्था ने ही झारखंड में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम का मसौदा तैयार कर तत्कालीन बिहार सरकार को दिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और उनके मंत्रिमंडल ने ड्राफ्ट को सही माना। अविभाजित बिहार ने इसे कानून का रूप दिया। आजाद भारत में बिहार की पहली सरकार थी, जिसने डायन प्रथा के खिलाफ कानून बनाया और इसके बाद छह राज्यों में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम लागू हो गया।

1999 में बिहार और 2001 में झारखंड में लागू हुआ कानून

वर्ष 1995 में झारखंड के कोलाबिरा के वीर बांस की रहने वालीं छुटनी महतो को ग्रामीणों ने डायन बताकर प्रताड़ित किया था। प्रेमचंद और फ्लैक से जुड़े सहयोगियों ने उन्हें वीर बांस गांव में पुनर्वास सेंटर बनाकर शरण दी। प्रेमचंद ने उन्हें अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया और अंधविश्वास के खिलाफ लड़ाई शुरू की। तब अविभाजित बिहार की तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने 22 अक्टूबर 1999 को डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम को राज्य में लागू किया था।

वर्ष 2000 में झारखंड बिहार से अलग होकर अलग राज्य बना। प्रेमचंद ने झारखंड में भी कानून लागू करने की मुहिम शुरू की। उन्होंने 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी से संपर्क साधा। इसके बाद झारखंड में डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम-2001 को लागू हुआ।

आरोप साबित होने पर क्या है सजा का प्रावधान

झारखंड में महिला को डायन कहने पर अधिकतम तीन महीने का कारावास और एक हजार रुपए के जुर्माने का प्रावधान है। डायन बताकर समाज को उकसाने वाले को तीन महीने की कारावास या एक हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान है। महिला को डायन कहकर यातना देने वाले को छह माह की सजा व दो हजार रुपए जुर्माना लगाया जाता है। झाड़फूंक के नाम पर शारीरिक शोषण करने पर एक साल तक की सजा व दो हजार रुपए तक जुर्माना है।

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