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सांवलेपन पर करते कमेंट, फेयरनेस क्रीम से शुरू हुई लड़ाई:MP के गांवों में सुनाई जा रहीं मेरी कहानियां, राष्ट्रपति ने किया सम्मानित

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: ऐश्वर्या शर्मा

मैं शशि पुरवार मुंबई से हूं। मैं एक लेखिका और कवयित्री हूं। मैंने अपना जीवन हिंदी को समर्पित कर दिया है। लेखन से मेरा रिश्ता बचपन से जुड़ा।

मेरी मां भी लिखती थीं और मुंशी प्रेमचंद से अपनी रचनाओं की चर्चा करतीं। पेशे से वह टीचर थीं। उन्हीं को देखकर मैंने लिखना शुरू किया, लेकिन लेखिका बनना है, यह कभी नहीं सोचा था।

इंदौर की बेटी हूं

मेरा मायका इंदौर है। शादी महाराष्ट्र के अकोला में हुई। साहित्य की तरफ मेरा झुकाव बचपन से था। मैं जब 9वीं में थी, तब गालिब को पढ़ा करती थी। मां की रचनाओं को भी चोरी छुपे पढ़ा। हमारे घर में कई किताबें मौजूद थीं तो वही मेरी दोस्त बन गईं। मेरे नानाजी स्वतंत्रता सेनानी थे। मैंने उनसे देश की आजादी के कई किस्से सुने।

मेरी मां ने उस समय बीए, एमए और पीएचडी की लेकिन सामाजिक बंधनों के चलते लेखन में आगे नहीं बढ़ पाईं। हालांकि मेरे नाना ने हमेशा लड़कियों को शिक्षा देने की पैरवी की। मैंने बचपन से ही कविता, गीत, लघु कहानियां लिखनी शुरू कर दी थीं। जबकि मेरा सपना डॉक्टर या बिजनेसवुमन बनने का था।

बचपन में रंगभेद की हुई शिकार

हमारे समाज में गोरे रंग को खूबसूरती का पैमाना माना जाता है। बचपन में मेरा रंग सांवला था। जब छोटी थी तो मुझे रंगभेद का शिकार होना पड़ा। उस समय फेयर एंड लवली लॉन्च हुई थी तो कुछ लोग तब लड़कियों को यह क्रीम गिफ्ट करते थे।

उस समय मेरा दिल बहुत दुखी हुआ और मन में आया कि क्या सांवली लड़की अपने रंग की जगह अपनी काबिलियत से नहीं पहचानी जा सकती। मैंने ठान लिया था कि इसके खिलाफ आवाज बुलंद करनी है। मैंने रंगभेद के बारे में खूब लिखा।

इंग्लिश मीडियम में की पढ़ाई लेकिन हिंदी का थामा साथ

मेरी सारी पढ़ाई इंग्लिश मीडियम में हुई। मेरा हिंदी की तरफ कुछ खास रुझान नहीं था। लेकिन हमारे देश में एक ऐसा दौर आया कि हमारी राष्ट्रभाषा को हीन नजरों से देखा जाने लगा। जब मैं महाराष्ट्र आई तब यहां हिंदी-मराठी भाषा के बीच लड़ाई चल रही थी। ऐसे में मैंने फैसला लिया कि मैं हिंदी को प्रोत्साहित करूंगी और अपना लेखन हिंदी में ही करूंगी। अब मैं पूरी तरह हिंदी के लिए समर्पित हूं।

नौकरी छोड़ लेखन को अपनाया

शादी से पहले मैंने फार्मेसी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव की नौकरी की। हालांकि, इस बीच मैं विदेश में भी बसना चाहती थी। 12वीं के बाद मेरा एनडीए में सिलेक्शन हुआ, लेकिन मुझे वहां जाने की अनुमति नहीं मिली। फिर मेरी शादी हो गई। ससुराल में भी नौकरी करने की अनुमति नहीं मिली तो मैंने अपने आर्टिकल अखबारों और मैगजीन में लिखकर भेजने शुरू कर दिए।

मैंने अपने विचारों के जरिए समाज में फैली बुराइयों पर लेख लिखे। 1999 में मैंने पूरी तरह लेखन शुरू कर दिया था। मेरा पहला लेख 1992 में एक अखबार में छपा। इसके बाद मैंने दैनिक भास्कर की मधुरिमा मैगजीन में लंबे वक्त तक लेखन किया। यहीं नहीं मैं सोशल मीडिया पर भी खूब लिखा।

2011 में मैंने ब्लॉग लिखना शुरू किया। मैं महिलाओं के लिए उस बंधन को तोड़ना चाहती थी जिसमें वह आज तक बंधी हुई हैं।

लोगों ने हमेशा की मेरी आलोचना

शुरुआती दौर में लेखन के क्षेत्र में भी मैं आलोचना का शिकार हुई। लोग कहते थे, ये क्या लेखिका बनेगी। मैं गीत लिखती रही हूं। ऐसे में हरिवंश राय बच्चन के मित्र मधुकर गौड़ ने मुझसे संपर्क किया।

मुझे फिल्मों से भी ऑफर आए लेकिन उन्होंने कहा कि अभी सही वक्त नहीं आया है। मेरे गीत और कविताओं का पंजाबी में अनुवाद हुआ है। मैंने कई राष्ट्रीय, अखिल भारतीय संगोष्ठी और कई अंतरराष्ट्रीय नवगीत सम्मेलन में भाग लिया।

घर वालों ने मेरे लेखन को गंभीरता से नहीं लिया

मैं लिखती जरूर थी लेकिन परिवार ने मेरे इस टैलेंट को कभी गंभीरता से नहीं लिया। मगर, पति ने मुझे हमेशा सपोर्ट किया। मुझे लिखने से कोई कमाई भी नहीं होती। लेकिन मैं लिखती रही और पाठकों से जुड़ती रही।

जब मैं 100 वुमन अचीवर्स ऑफ इंडिया के लिए नॉमिनेट हुई तब भी घरवालों को लगा कि मुझे हिंदी लेखन के लिए कुछ नहीं मिलेगा। लेकिन जब 25 लाख लोगों के नॉमिनेशन के बीच से मेरा 400 और फिर 100 लोगों के बीच सिलेक्शन हुआ तब उन्होंने मेरी काबिलियत को पहचाना। मुझे बाल एवं महिला विकास मंत्रालय की तरफ से राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किया गया।

मैं बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की समर्थक हूं। इस बारे में लेख भी लिखे।

मध्यप्रदेश की महिलाएं हो रहीं प्रेरित

मुझे कुछ लोगों से पता चला कि मध्य प्रदेश के कुछ गांव में मेरी लिखी कहानियां सुनाई जाती हैं ताकि महिलाएं मोटिवेट हों और अपना समय सार्थक कामों को दे सकें।

मुझे 2018 में इंदौर की महापौर से उत्कृष्ट काम के लिए सम्मान मिल चुका है।

नसों की गंभीर बीमारी से जूझ रही हूं

मेरा शरीर ऊपर से ठीक दिखता है, लेकिन अंदर से खोखला है। दरअसल मुझे वर्टिगो हुआ। नसों से जुड़ी गंभीर बीमारी भी है।

मेरी नसें लगातार सिकुड़ रही हैं लेकिन मैं फिर भी अपने लेखन से आगे बढ़ रही हूं। लेखन मेरे लिए पूजा है।