• Hindi News
  • Women
  • PhD On Premchand, Taught In University, Then Left Everything And Started Writing

मुकाम पर महिलाएं:बुकर की लिस्ट में गीतांजली श्री का उपन्यास, पहली हिंदी लेखिका जो दुनिया के तीसरे सबसे बड़े अवॉर्ड के लिए चुनी गईं

5 महीने पहले
  • कॉपी लिंक

“बेटियां हवा से बनती हैं। निस्पंद पलों में दिखाईं नहीं पड़ती और बेहद बारीक एहसास कर पाने वाले ही उनकी भनक पाते हैं।” ये कहना है मशहूर हिंदी साहित्यकार गीतांजली श्री का। हाल ही में गीतांजली श्री के अनूदित उपन्यास ''टूंब ऑफ सैंड'' को बुकर पुरस्कार के लिए नामित लेखकों की प्रारंभिक सूची में शामिल किया गया है। बुकर पुरस्कार साहित्य जगत का एक प्रतिष्ठित सम्मान और नोबेल प्राइज एवं पुलित्जर के बाद दुनिया का तीसरा बड़ा अवॉर्ड है और हर साल इन्हीं दिनों में इस पुरस्कार के लिए नामित होने वाले दुनियाभर के लेखकों की सूची जारी की जाती है।

इस बार इस सूची में भारत की गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' के अंग्रेजी में अनुदित उपन्यास ''टूंब ऑफ सैंड'' को शामिल किया गया है। डेजी रॉकवैल ने यह अनुवाद किया है। खास बात यह है कि पहली बार किसी हिंदी रचना को इस सूची में जगह मिली है। बता दें कि बुकर पुरस्कार की घोषणा 26 मई को की जाएगी।

बता दें कि वीएस नेयपॉल के उपन्यास इन ए फ्री स्टेट (1971) , सलमान रूश्दी के मिडनाइट्स चिल्डरन (1981), अरुंधती राय के द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स (1997) , किरण देसाई के इनहेरिटेंस ऑफ लास (2006) और अरविंद अडिगा के व्हाइट टाइगर (2008) को बुकर पुरस्कार मिल चुका है।

12 जून 1957 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में जन्मी गीतांजलि श्री हिन्दी की जानी-मानी कथाकार और उपन्यासकार हैं। उत्तर प्रदेश के कई छोटे शहरों में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज से स्नातक और जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय से इतिहास में एम.ए. किया। महाराज सयाजी राव विश्वविद्यालय, वडोदरा से प्रेमचंद और उत्तर भारत के औपनिवेशिक शिक्षित वर्ग विषय पर शोध की उपाधि प्राप्त की। कुछ दिनों तक जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में अध्यापन के बाद सूरत के सेंटर फॉर सोशल स्टडीज में पोस्ट-डॉक्टरल रिसर्च के लिए गईं। वहीं रहते हुए उन्होंने कहानियां लिखनी शुरू कीं।

कलम के सिपाही कहे जाने वाले प्रेमचंद उनके पसंदीदा उपन्यासकार हैं। उन्होंने प्रेमचंद पर पीएचडी की है और उनकी जीवनी भी लिखी है। गीतांजलि श्री ने विश्वविद्यालय में अध्यापन किया, फिर सबकुछ छोड़ कर स्वतंत्र लेखन की तरफ चली आईं।

मिल चुके हैं कई सम्मान

दिल्ली की हिंदी अकादमी ने उन्हें 2000-2001 के साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया है। 1994 में उन्हें अपने कहानी संग्रह अनुगूंज के लिए यूके कथा सम्मान से सम्मानित किया गया। इनको कृष्ण बलदेव वैद कथा सम्मान, इंदु शर्मा कथा सम्मान, द्विजदेव सम्मान के अलावा जापान फाउंडेशन, चार्ल्स वॉलेस ट्रस्ट, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और नॉन्त स्थित उच्च अध्ययन संस्थान की फ़ेलोशिप मिली है। ये स्कॉटलैंड, स्विट्ज़रलैंड और फ्रांस में राईटर इन रेज़िडेंसी भी रही हैं। गीतांजलि श्री ने साहित्य, थिएटर, अध्यापन और विभिन्न फेलोशिप पर काम किया है।

साहित्य का कई भाषाओं में हुआ अनुवाद

गीतांजलि श्री के अब तक पांच उपन्यास और पांच कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं; उनकी कृतियों के जर्मन, फ्रेंच और अंग्रेजी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं तो कई कृतियों पर इतालवी, कोरियन और रसियन भाषाओं में काम हुआ है। हाल ही में प्रकाशित ‘रेत समाधि’को सब बंधन तोड़ देने के बाद ऐसे लिखा गया है जैसे कि मन सोचता है। उपन्यास ‘रेत समाधि’ की असाधारण व्यक्तित्व रखने वाली बूढ़ी अम्मा की कहानी अब फ्रांस के साहित्य का हिस्सा बन, एक नई पहचान में पाठकों के सामने उपलब्ध है।

'रेत समाधि' उपन्यास

'रेत समाधि' शीर्षक से लिखे गए इस मूल हिंदी उपन्यास का डेजी रॉकवैल ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। यह एक 80 वर्षीय महिला की कहानी है जो अपने पति की मृत्यु के बाद बेहद उदास रहती है। आखिरकार, वह अपने अवसाद पर काबू पाती है और विभाजन के दौरान पीछे छूट गए अतीत की कड़ियों को जोड़ने के लिए पाकिस्तान जाने का फैसला करती है। गीतांजली श्री ने बेहद मार्मिक और संवेदनशील भाषा में इस महिला की मन:स्थिति को तराशा है और डेजी ने इसके अंग्रेजी अनुवाद में भी इसकी मूल आत्मा को बरकरार रखते हुए इसे सुंदर शब्दों में ढाला है।

अपने अनुभव व्यक्त करते हुए गीतांजीली श्री कहती हैं-

"मैं उत्तर प्रदेश में जन्मी, पली बढ़ी हूं। मेरे समय में भी अच्छी शिक्षा अंग्रेज़ी माध्यम वाली मानी जाती थी, सो वह मैंने पायी। पर मेरा सौभाग्य कि मैं महानगर में न रहकर छोटे शहरों में रही, जहां स्कूल के बाहर मैंने देशी शिक्षा अनौपचारिक रूप में पायी। उस समय अंग्रेज़ी आज जितनी हावी नहीं हुई थी सो उन शहरों में हिंदी उर्दू के साहित्यकारों की ख़ूब इज़्ज़त थी। पंत जी, फ़िराक़ साहेब, महादेवी वर्मा, इत्यादि हमारे लिए शीर्ष लोग थे। हम हिंदी की पत्रिकाएं किताबें घर में पढ़ते थे। इसलिए मैं हिंदी से वैसे नहीं कटी जैसे आज के महानगर में पलने बढ़ने वाले बच्चे हो जाते हैं, न हिंदी को वैसे हेय समझा जैसे आज बच्चे मान लेते हैं। ये अलग बात है कि मुझे पारम्परिक हिंदी शिक्षा दीक्षा नहीं मिली। पर शायद उसने मुझमें अपने ढंग से भाषा को बरतने का जज़्बा जगाया।"