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महिलाओं को 40% आरक्षण:कांग्रेस छोड़ चुकी महिला नेताओं ने कहा- प्रियंका गांधी से मिलने के लिए मिन्नतें करनी पड़ती हैं, टिकट की बातें महज लॉलीपॉप

नई दिल्लीएक महीने पहले
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कांग्रेस वो पार्टी है, जिसकी पहचान ही महिला नेताओं से रही। इंदिरा गांधी के कार्यकाल में उनकी भृकुटी तनने से ही राजनीति में उठापटक हो जाती थी। बाद में सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान संभाली। किसी सक्रिय पद पर न रहते हुए भी वे कांग्रेस में सबसे मजबूत मानी जाती हैं। अब इसी रास्ते पर प्रियंका हैं।

उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के बीच प्रियंका गांधी ने महिलाओं को 40% आरक्षण देने का ऐलान किया है। क्या प्रियंका का ऐलान पार्टी छोड़ चुकी महिला लीडर्स के लिए घर वापसी का न्योता है! पढ़िए, कांग्रेस छोड़ चुकी महिला नेताओं से दीप्ति मिश्रा और पारुल रांझा की खास बातचीत...

मंच पर 10 लोगों में से सिर्फ 3 महिलाएं, आरक्षण की बात छलावा!
प्रियंका ने जिस मंच से महिलाओं के लिए 40% आरक्षण का ऐलान किया, वहां स्टेज पर ही 10 लोगों में से सिर्फ 3 महिलाएं थीं। उत्तर प्रदेश कांग्रेस महिला मोर्चा (पश्चिमी क्षेत्र) की पूर्व अध्यक्ष (अब भाजपा में) प्रीति तिवारी के मुताबिक, पार्टी का महिला आरक्षण का वादा फुस्स होता गुब्बारा ही साबित होगा।

प्रीति कहती हैं, अगर महिलाओं की बात मायने रखती है तो घोषणा वाले दिन जब लखनऊ कांग्रेस कार्यालय में महिला सम्मेलन आयोजन किया गया था, तब महिला नेताओं को मंच पर जगह क्यों नहीं दी गई। सीधी सी बात है कि कांग्रेस को चुनाव के दौरान ही वादे सूझते हैं, लेकिन बाद में दरियादिली नहीं दिखती। कांग्रेस की एक बैठक में एक महिला को पार्टी कार्यकर्ताओं ने थप्पड़ मारा, बदतमीजी की और अब उसी राज्य में महिलाओं को लालच देकर मूर्ख बनाया जा रहा है।

क्यों छोड़ी पार्टी?
प्रीति ने बताया, 'मेरी मां कांग्रेस को सपोर्ट करती थीं, इसी वजह से मैं भी कांग्रेस से जुड़ी। मैंने करीब तीन साल डटकर काम किया, इसके बाद भी मुझसे बदतमीजी की गई। मथुरा में अपनी ही पार्टी के ट्रेनिंग कैंप में मुझे घुसने नहीं दिया गया। मैं बुरी तरह से बेइज्जत होकर लौटी। तकलीफ इस बात की भी थी कि जब मेरे साथ ऐसा हो रहा है, तो मैं अपने साथ काम करने वाली बाकी महिलाओं को कैसे संभालती। मजबूरन मैंने इस्तीफा दे दिया।'

क्या दोबारा पार्टी में लौटेंगी?
नहीं। मैं पार्टी में अध्यक्ष रही, इसके बाद भी सिर्फ एक बार ही प्रियंका गांधी से मिल पाई। महिला नेताओं को उनसे मिलने के लिए मिन्नतें करनी पड़ती हैं। अगर महिलाएं मायने रखती हैं तो उनकी बात क्यों नहीं सुनी जाती? पार्टी के भीतर दूसरी महिला लीडर्स के भी यही हाल हैं। कांग्रेस नेताओं से मिलने के लिए उन्हीं के पदाधिकारियों को धरना देने की नौबत आ जाती है। ऐसे में अब दोबारा पार्टी जॉइन करने के बारे में सोच भी नहीं सकती।

आरक्षण के ऐलान पर अलग रहा रिएक्शन यूपी चुनाव में 40% टिकट महिलाओं को दिए जाने के ऐलान पर अन्य पार्टी नेताओं की प्रतिक्रिया अलग-अलग रही। कांग्रेस छोड़ शिवसेना में शामिल हुईं प्रियंका चतुर्वेदी ने इसका स्वागत किया। उन्होंने कहा कि महिलाओं का मुद्दा राजनीति से ऊपर है। जब सभी राज्यों की विधानसभाओं और संसद में 50% महिलाएं चुनकर आएंगी, सही मायने में तभी महिलाएं सशक्त होंगी। इसकी पहल सभी पार्टियों को करनी चाहिए।

आसान नहीं है महिलाओं की राह
शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी कहती हैं कि जो महिलाएं पॉलिटिकल बैकग्राउंड से नहीं हैं और जिनके आर्थिक हालात भी ठीक नहीं, राजनीति में उनकी राह आसान नहीं है। पार्टी में बैठी इक्का-दुक्का महिलाएं फैसला लेती हैं कि किस महिला को टिकट दी जाए और किसे नहीं। इसके लिए उन्होंने पैमाना बना रखा है कि महिला राजनीतिक परिवार से हो और फाइनेंशियली दमदार हो। उनके हुनर को एकदम से दरकिनार कर दिया जाता है और सालों-साल भी उन्हें टिकट नहीं मिलती।

'सुसाइड सीट' पर उतार, कर दी जाती है छुट्टी
बकौल प्रियंका, जिनका राजनीतिक परिवार से नाता नहीं है, उन्हें अगर टिकट मिलती भी है तो उस सीट के लिए, जहां जीतने के चांस न के बराबर होते हैं। उसके बाद उनकी छुट्टी। मेरा परिवार यूपी से है। यूपी में अभी तक उन्हीं महिलाओं को तवज्जो मिलती है, जिनके पिता या पति लंबे समय से राजनीति में हैं। मुझे लगता है कि इस माइंडसेट को बदलने की जरूरत है। यूपी की हुनरमंद महिलाओं को राजनीति से जोड़ा जाए तो उत्तर प्रदेश की दशा और दिशा बदल जाएगी।

यूपी का सियासी सफर और महिलाएं
चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में आजादी के ठीक बाद साल 1952 में हुए विधानसभा चुनावों में 20 महिलाएं चुनी गईं थीं। इसके बाद साल 2003 में यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 3 रह गया था। वहीं साल 2017 में सबसे ज्यादा 40 महिला विधायक चुनी गईं। बता दें कि यूपी विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं।

चुनाव के दौरान ही क्यों याद आती हैं महिलाएं?
देश में करीब 42 करोड़ महिला वोटर हैं। साल 2019 के आम चुनाव में चुने गए 542 सांसदों में 79 महिलाएं थीं। वहीं उस दौरान संसद में सबसे ज्यादा महिला सांसद यूपी और पश्चिम बंगाल से जीतकर आईं। हाल ही में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की जीत का कारण भी महिलाओं को माना गया।

क्या कहता है इतिहास?
अगर इतिहास पर नजर डालें तो महिला आरक्षण के लिए लंबित बिल को पास कराने की मांग कई बार उठ चुकी है। सबसे पहले यह पहल 90 के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए सरकार ने की।

इसके बाद यूपीए-1 में मनमोहन सिंह सरकार ने लोकसभा और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण से जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश किया। राज्यसभा में पास होने के बावजूद लोकसभा में यह पास नहीं हो पाया। अब शायद राजनीतिक दल इस बात को समझ चुके है कि महिलाओं को इग्नोर नहीं किया जा सकता है। संसद में महज 12% प्रतिनिधित्व ही महिलाओं का है।

आखिर कांग्रेस को भी यह बात समझ में आई
दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यह बहुत पहले कर चुकी हैं। टीएमसी पहली पार्टी थी, जिसने साल 2019 में महिलाओं को 40% सीटें दी थीं। विधानसभा चुनाव में हम में से 50 महिलाएं थीं। टीएमसी ने स्थानीय निकायों में भी 50% महिलाओं के आरक्षण की व्यवस्था की है। रॉय ने कहा, यह अच्छी बात है कि कांग्रेस भी अब यह बात समझ चुकी है।

पार्टियों ने 2017 में इतनी महिलाओं को दी टिकट

  • भाजपा - 46
  • सपा - 34
  • बसपा - 21
  • आरएलडी - 27
  • कांग्रेस - 12
  • अपना दल - 02

यूपी में कितनी महिला वोटर्स?

  • कुल वोटर - 14.40 करोड़
  • पुरुष वोटर- 7.79 करोड़
  • महिला वोटर- 6.61 करोड़

किन महिलाओं को मिलेगा टिकट?

जिला एटा की कांग्रेस कार्यकर्ता मेहरुम निशा कहती हैं, 'साल 2009 में मैं कांग्रेस से जुड़ी। क्षेत्र में जमकर काम किया। अपना घर परिवार तक भूल गई, लेकिन जब चुनाव में टि​कट देने की बारी आती है तो तरीका ही बदल जाता है।​​ प्रियंका गांधी ने कहा है, लेकिन मुझे टिकट मिलने की कोई उम्मीद नहीं है।'

नोएडा में कांग्रेस कार्यकर्ता अनामिका सिंह कहती हैं कि पार्टी ने महिलाओं के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। टिकट किनको दिए जाएंगे ये तो मैं नहीं कह सकती, लेकिन देश के लिए काम करने वाली और विकास के मुद्दों को समझने वाली महिलाओं को प्राथमिकता दी जाएगी। फिर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो महिला कौन है, क्या करती है।

क्या कहती हैं महिला वोटर?
लखनऊ की महिला वोटर आशा चौहान कहती हैं कि यूपी चुनाव में मैं अपना वोट उस कैंडिडेट को दूंगी, जो हमारी समस्याओं पर काम करे। पार्टी आलाकमान को देखकर नहीं। वहीं पेशे से गृहिणी महिला वोटररजनी कहती हैं कि मैं अपनी पसंद की पार्टी को वोट दूंगी। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी पसंदीदा पार्टी कौन सी है।

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