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महलों में सज रहा झोपड़ी में बना जरदोजी का काम:प्रियंका चोपड़ा भी दीवानी, 1000 करोड़ का कारोबार, पर एक दिन की मजदूरी 250 रुपए

4 महीने पहले
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ईंटों से बनी कोठरी, उसके बाहर काली पन्नी और बारिश में गल चुकी पुरानी चादरों से तनी छोटी सी झोपड़ी देखकर कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता कि यहां बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियों द्वारा पहने जाने वाले महंगे जरदोजी के काम के कपड़े डिजाइन हो रहे हैं। ढलते सूरज की रोशनी में नुसरत जरदोजी का काम करके सूनी आंखों में सपने बुन रही हैं।

नुसरत की कहानी में आगे बढ़ें, उससे पहले जान लेते हैं कि आखिर ये जरदोजी है क्या और साथ ही जानते हैं कि इतने महीन, बारीक काम में लगे कारीगरों का क्या हाल है? वुमन भास्कर की टीम ने ग्राउंड पर जाकर समझी जरदोजी के काम की सच्चाई।

क्या है जरदोजी?
जरदोजी फारसी शब्द है। ये ‘जरी’ और ‘दोजी’ से मिलकर बना है। ‘जरी’ मतलब सोना और ‘दोजी’ मतलब कढ़ाई। यानी ‘सोने की कढ़ाई’ का काम। यह मूल रूप से ईरानी कढ़ाई है। जरदोजी को जरी-जरदोजी, जरी, शाही काम जैसे नामों से भी जाना जाता है। पुराने समय में सोने, चांदी की तारों और कलाकबत्तू, छोटे मोती, नगीनों और रत्नों का इस्तेमाल किया जाता था। राजा-महाराजाओं के कपड़े तो होते ही जरदोजी के थे। इसमें सिल्क, साटिन या वेल्वेट फैब्रिक पर भारी मेटल एंब्रोडरी होती है। डिजाइन के लिए जरी, गोल्डन थ्रेड, मोती, सुनहरे सितारे, कटदाना, सलमा, सितारा, दबका आदि का इस्तेमाल किया जाता है। साड़ी, लहंगे, दुपट्टे, सूट, पानी की बोतल का कवर, बैग्स आदि जैसे सामानों पर जरदोजी का काम होता है।

वेदों में भी ‘जरी’ का जिक्र
जरदोजी कला का जिक्र ऋग्वेद में भी मिलता है। भारत में मुगलों ने इसकी लोकप्रियता बढ़ाई। मुगल शासन काल में अकबर ने इसे ऊंचाइयों पर पहुंचाया। अकबर समेत कई राजाओं की पोशाक जरदोजी से तैयार की जाती थी। लेकिन औद्योगीकरण ने जरदोजी को ऐसी टक्कर दी कि ये कला औंधे मुंह आ गिरी। आजाद भारत में इसे एक बार फिर उठने का मौका मिला।

जरी का काम होता कैसे है?
बरेली में पिछले 45 सालों से जरदोजी के काम में लगे इस्लाम मियां कहते हैं, ‘अपने खानदान में मैंने ही ये काम शुरू किया। जिस वक्त जरदोजी का काम शुरू किया था तब इस काम की अपनी शान और मांग थी, लेकिन अब धीरे-धीरे फीका पड़ रहा है। आज मेरे साथ 35 लोग काम करते हैं। हम सभी एक ही कमरे में अड्डे लगाकर बैठ जाते हैं।
जिस कपड़े पर जरदोजी होनी है, उसे कढ़ाई के लिए लकड़ी के एक फ्रेम में फिट किया जाता है, जिसे अड्डा कहा जाता है। फिर जरदोजी की कढ़ाई हुक जैसी नोक वाले सुआ या अरी से होती है। एक-एक दाना, मोती, कटदाना, सलमा, सितारा, दबका, बड़े ध्यान से लगाना पड़ता है। यह इतना बारीक काम है कि इस काम में लगे कारीगरों को समय से पहले आंखों पर चश्मा लग जाता है।

बरेली को ‘जरी नगरी’ क्यों कहा जाता है?
बरेली को ‘जरी नगरी’ कहा जाता है। बरेली के वरिष्ठ लेखक रंजीत बताते हैं कि बरेली को जरी नगरी इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि यहां आजादी के बाद से ही जरी का काम बहुत हुआ है। आज भी बड़ी संख्या में मुस्लिम परिवार इस काम में लगे हैं। आप बरेली की सीमा समाप्त होने पर एक बोर्ड देखेंगे जिस पर लिखा है ‘जरी नगरी, बरेली। आगमन के लिए हार्दिक धन्यवाद।’ इसे बरेली जिला विकास प्राधिकरण ने लगवाया है।

फिर लौटते हैं नुसरत की कहानी की ओर….
शरीर पर पड़े गुलाबी दुपट्टे सी मासूमियत लिए 20 साल की नुसरत कहती हैं- 10 साल की थी, तबसे आरी (कार-चोबी) का काम कर रही हूं। मेरे पैदा होते ही मां के हाथ-पैरों ने काम करना बंद कर दिया। एक साल की हुई तो अब्बा गुजर गए। अब तीन बहनों और एक भाई का पेट इसी कारचोबी (जरदोजी) के काम से पाल रही हूं।’ ‘थोड़ा बहुत पैसा जुड़ा तो उससे बड़ी बहन की शादी कर दी। अब कुछ और जुड़े तो मेरे लिए रिश्ता देखा जाए। घर में ईंटों को जोड़कर बनाए बाथरूम के सामने खड़ी नुसरत दबी आवाज में कहती हैं-घर खुला है तो कोई भी यहां घुस आता है। अभी कल चोर आ गया था और एक साल पहले कुछ आवारा लड़के मुझे छेड़ते घर में घुस गए थे। फिर मैंने पुलिस में शिकायत कराई।

बरेली की रहने वाली नुसरत इकलौती ऐसी महिला नहीं हैं जो जरदोजी का महीन काम करके इस तरह की जिंदगी गुजार रही हों, बल्कि यहां इस काम में सबसे निचले स्तर पर लगी महिला कारीगरों का यही हाल है।

ये नुसरत का घर है, जिस जगह वे कारचोबी का काम कर रही हैं।
ये नुसरत का घर है, जिस जगह वे कारचोबी का काम कर रही हैं।

नुसरत के घर से थोड़ी ही दूरी पर पतली गली में बरेली के बाकरगंज मोहल्ले में शबनम काम करती हैं। उनके घर जाकर मालूम हुआ कि शबनम के पति को हार्ट की प्रॉब्लम है। तीन बेटियां और एक बेटे का पेट पालने के लिए पूरा घर कारचोबी के काम में दिनभर लगा रहता है। शबनम कहती हैं सुबह से शाम हो जाती है आंख गढ़ाकर जरदोजी का काम करने में। डिबरियों में टिमटिमाती लौ और गरीबी में गीले होते आटे के बीच ‘अड्डे’ सजते हैं। फिर कटदाना, मोती से लेकर और बारीक काम की गुथाई सादे कपड़े पर होती है। फिर तैयार होता है एक ब्रांडेड जरदोजी के काम से सजा और भरा कपड़ा, लेकिन पेट खाली ही रहता है।

शमा परवीन का घर बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन इसी छोटी सी जगह पर वे जरदोजी का काम करती हैं।
शमा परवीन का घर बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन इसी छोटी सी जगह पर वे जरदोजी का काम करती हैं।

‘जरी नगरी’ में अर्श से फर्श पर क्यों पहुंचा जरदोजी
जेजी एंब्रोइडर्स बरेली की 35 साल पुरानी कंपनी है। यहां जरदोजी का ही काम होता है। साथ ही यह वो कंपनी है, जहां से अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा की साड़ियां भी जरदोजी का वर्क होकर जाती हैं। इस कंपनी के मालिक जुनैद बताते हैं बेशक बरेली को जरी नगरी कहा जाता हो, लेकिन अब इस ‘जरी’ की चमक फीकी पड़ने लगी है। एक वक्त था जब सिर्फ दिल्ली से जरदोजी के काम की डिमांड पूरी नहीं कर पाते थे और अब ये हाल है कि कंपनी बंद करके कोई दूसरा काम करने की सोच रहा हूं।

सुस्त मन से जुनैद कहते हैं - ‘इस काम में जितनी मेहनत है, उतनी आमदनी नहीं होती। आमदनी कम है तो अब लोग अपने बच्चों को ये काम सिखाना नहीं चाहते, लिहाजा ये काम कम हो रहा है। इसका असर ये होगा कि भविष्य में जरदोजी से बने कपड़े और महंगे होंगे और डिमांड कम होगी। कुल मिलाकर स्थितियां अच्छी नहीं हैं। लॉकडाउन के बाद स्थितियां और खराब हुई हैं। 50 प्रतिशत काम कम हो गया है।’

काम कम हुआ, अभिनेत्रियां भी रहीं जरदोजी की दीवानी
जुनैद कहते हैं कि बेशक जरदोजी का काम कम हो गया है लेकिन आज भी कुछ कस्टमर ऐसे हैं जो जरदोजी ही पहनना चाहते हैं। अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा जब जरदोजी की साड़ी पहनना चाहती हैं तो हमारे यहां से ही डिजाइन कराती हैं। अभी 9 महीने पहले ही उनकी मां हमसे एक साड़ी लेकर गई हैं। हमारी कंपनी ने पिछले सात सालों में करीब 40 साड़ियां डिजाइन करके प्रियंका तक पहुंचाई होंगी। प्रियंका से होते हुए बॉलीवुड की बाकी बड़ी हस्तियों तक भी हमारा काम पहुंचा है। दिल्ली, जयपुर से माल आता है और हम डिजाइन करके भेज देते हैं।

मशीनों ने बिगाड़ी जरदोजी की हालत
'एक जनपद एक उत्पाद' की वेबसाइट के मुताबिक, जरदोजी का काम सोना, चांदी और रेशम के धागों से होता था, लेकिन अब इनकी जगह सिंथेटिक धागों ने ले ली है। बैग, साड़ी, जूते, दुपट्टे, गाउन के अलावा दीवारों पर टांगने वाले हैंगिंग वॉल्स, पानी की बोतलों के कवर आदि भी जरदोजी से डिजाइन हो रहे हैं। पर मशीनों ने हाथ के काम को दबा दिया है, जहां एक डिजाइन को तैयार करने में पांच लोग लगते थे, अब एक मशीन कुछ ही घंटों में कर देती है।

सरकार का पक्ष क्या है?
जिला उद्योग केंद्र, बरेली के उपायुक्त ऋषि रंजन गोयल बताते हैं कि कोविड के बाद कारीगर वापस अपने घर लौट आए हैं। फिर से बरेली में जरदोजी के काम को सांस मिली है। इस वक्त बरेली में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से 2 लाख लोग इस काम से जुड़े हुए हैं।

भारत में फर्रुखाबाद, लखनऊ, प्रयागराज भी जरदोजी के हब माने जाते हैं। यही नहीं भारत की जरदोजी पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां की जरदोजी अमेरिका, यूके, जापान और सउदी अरब भी जाती है।

6 घंटे की 250 रुपए नफरी
कारीगर और ठेकेदार इस्लाम मियां बताते हैं कि जरदोजी के कारीगरों को सरकार की तरफ से कोई सुविधा नहीं मिलती। कारीगर 6 घंटे काम करता है तो उसे 6 घंटे की नफरी 250 रुपए मिलती है और पार्टी की तरफ से मुझे पौने तीन सौ रुपए मिलते हैं। अब इतने रुपए में इंसान खाएगा क्या और बच्चों को कैसे पालेगा?

क्या जरदोजी कारीगरों को कोई खास सुविधा मिलती है?
उपायुक्त ऋषि रंजन गोयल के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार ने शिल्पकला और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए साल 2018 में 'एक जनपद एक उत्पाद' योजना की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत हम कारीगरों को ट्रेनिंग मुहैया कराते हैं। काम का प्रचार-प्रसार करने के लिए देशभर में प्रदर्शनी आयोजित की जाती हैं। आगे सरकार स्वास्थ्य बीमा योजना देने की भी तैयारी कर रही है।

हालांकि, इससे पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने 2009 में 'जरी कार्ड स्वास्थ्य लाभ योजना' के तहत इस काम में लगे कार्डधारक मजदूरों के बैंक खाते से जुड़ा एक स्मार्ट कार्ड जारी किया था। इसकी ऊपरी सीमा 30,000 रुपए तक थी। कुछ समय बाद यह काम नहीं कर सका।

‘हमें नहीं मिली कोई ट्रेनिंग’
शबनम पिछले 10 सालों से अड्डा काढ़ने का काम करती हैं। वे कहती हैं कि हमने ये काम अपनी अम्मी से सीखा। अब वे बूढ़ी हो गई हैं, इसलिए हम करते हैं। हमारी कभी कोई ट्रेनिंग नहीं हुई। हमने ये काम एक-दूसरे को देखकर ही सीख लिया। कई साल पहले एक जरी कार्ड बनवाया था लेकिन उसका आज तक कोई इस्तेमाल नहीं हुआ है। रोज मर-खपकर आंखें गड़ाकर काम करते हैं। पेट पल जाए बस इतना ही सोच पाते हैं, ज्यादा बड़े ख्वाब नहीं पालते।

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