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पैदा हुई तो देश ने जश्न मनाया-मंत्रियों ने बधाई दी:मैं 100 करोड़वीं बच्ची, जिसको फ्री पढ़ाने का वादा था, अब लोन लेकर पढ़ रही हूं

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: सुनाक्षी गुप्ता

जब मैं पैदा हुई तो मां को पत्रकारों ने घेर लिया, हर कोई उनकी और मेरी फोटो खींच रहा था। मां को अचानक जनरल वार्ड से प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। पापा पहुंचे तो वो भी घबरा गए कि आखिर ऐसा क्या हो गया है। नानी और दादी को मालूम चला कि अस्पताल में पत्रकार आए हैं तो डर गईं कि कहीं बच्ची में कोई दिक्कत तो नहीं। जैसे ही खबर मिली कि मैं देश की 100 करोड़वीं बच्ची हूं, उसी पल से मैं सभी के लिए खास हो गई।

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दिल्ली के नजफगढ़ के एक सामान्य परिवार में पैदा हुई आस्था अरोड़ा देश की 'बिलियंथ बेबी' हैं। आस्था कहती हैं कि मेरे जन्म लेते ही देश की जनसंख्या 100 करोड़ हो गई। आस्था का जन्म दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में 11 मई 2000 को सुबह 5:05 मिनट पर हुआ था। मेरे पैदा होते ही तत्कालीन महिला व बाल विकास मंत्री सुमित्रा महाजन मुझसे मिलने के लिए अस्पताल पहुंची थीं। वो पहुंचीं तो पूरे अस्पताल में हल्ला मच गया।

आज 11 जुलाई यानी विश्व जनसंख्या दिवस पर पढ़ें कहानी उस 100 करोड़वीं बच्ची की जिसके पैदा होने पर 200 फोटोग्राफर उसकी तस्वीर अपने कैमरे में कैद करने पहुंच गए थे...

तस्वीर 11 मई 2000 की है, जब आस्था का जन्म हुआ। तब इंदौर की सांसद सुमित्रा महाजन अस्पताल पहुंची थीं और आस्था को गोद में उठा लिया था।
तस्वीर 11 मई 2000 की है, जब आस्था का जन्म हुआ। तब इंदौर की सांसद सुमित्रा महाजन अस्पताल पहुंची थीं और आस्था को गोद में उठा लिया था।

सरकार ने मुफ्त पढ़ाई का वादा किया, आज लोन लेकर पढ़ रही
मेरा दुनिया में आना नेशनल न्यूज बन गया था। परिवार के लोग भी काफी खुश थे कि उनकी बेटी सबसे खास है। अस्पताल में मुझे देखने के लिए कई बड़े-बड़े नेता आए। सुमित्रा महाजन ने मुझे गोद में उठाया और आशीर्वाद दिया। मुझे मुफ्त शिक्षा देने का वादा किया गया। वादे के मुताबिक मुझे जीवनभर मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं और मुफ्त यात्रा भी मिलनी थी। आज सारे वादे हवा में गुम हो गए हैं।

जब मैं बड़ी हुई तो पिताजी ने मंत्रालय के चक्कर लगाए। उनसे कहा गया कि आपके पास कोई भी लिखित कागजात नहीं हैं। इसलिए आपकी बेटी को कोई फायदा नहीं मिल सकता। मेरे पैदा होने पर जितने भी वादे किए गए थे, वे सब जुबानी जमाखर्च की तरह निकले। मुझे किसी भी किस्म का कोई फायदा आज तक नहीं मिला है। पापा ने शुरू में 1-2 बार बात करने की कोशिश की, फिर जब कुछ नहीं हुआ तो वो भी अपने काम में लग गए।

जब बड़ी हुई तो मेडिकल फील्ड में जाने का फैसला लिया। पढ़ाई के लिए ज्यादा पैसे नहीं थे इसलिए 5 लाख का एजुकेशन लोन लेकर मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। मैं ग्रेटर नोएडा की शारदा यूनिवर्सिटी में नर्सिंग बीएससी में ग्रेजुएशन कर रही हूं। ये मेरा फाइनल ईयर है, पढ़ाई पूरी कर जल्द से जल्द किसी अस्पताल में नौकरी कर अपना लोन चुकाना चाहती हूं।

100 करोड़वीं बच्ची होने पर मिले 2 लाख रु, आज उनसे पढ़ाई कर रही हूं
बिलियंथ बेबी होने पर यूएन पॉपुलेशन फंड की तरफ से मेरे बैंक खाते में दो लाख रुपए का फिक्‍स डिपॉजिट भी किया गया था। जिससे अब मैं अपनी हॉस्टल व अन्य फीस भर रही हूं। आस्था बताती हैं कि उनके पिता अशोक अरोड़ा इन दिनों नजफगढ़ में ही किराने की दुकान चलाते हैं। मां अंजना अरोड़ा ब्यूटी पार्लर चलाती हैं। आस्था बताती हैं कि मैंने 10वीं तक की पढ़ाई नजफगढ़ में ही एक प्राइवेट स्कूल में की। इसके बाद 12वीं तक की पढ़ाई दिल्ली के सरकारी स्कूल गवर्नमेंट गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल से की।

पिता अशोक अरोड़ा (बाएं) के साथ आस्था। कहती हैं- मैं चाहती थी, जो पैसे मिलें, उनसे पापा की मदद हो जाए, पर उन्होंने इनकार कर दिया था।
पिता अशोक अरोड़ा (बाएं) के साथ आस्था। कहती हैं- मैं चाहती थी, जो पैसे मिलें, उनसे पापा की मदद हो जाए, पर उन्होंने इनकार कर दिया था।

पिता की नौकरी चली गई, तब सोचा कि अब तैयारी करूं या एडमिशन लूं
12वीं तक की पढ़ाई तो जैसे-तैसे पूरी हो गई, लेकिन जब कॉलेज जाने की बात आई तो घर में सभी परेशान हो गए। मुझे मेडिकल में जाना था। मैंने पहली बार नीट की परीक्षा बिना कोचिंग व तैयारी के दी, लेकिन उसमें सफल नहीं हो सकी। ठीक उसी वक्त मेरे पिता की नौकरी भी चली गई। वो एक किराने की दुकान में काम करते थे। दुकान के मालिक को घाटा हुआ और पापा को घर बैठना पड़ा। घर का माहौल उस वक्त बहुत खराब हो गया था। उस वक्त मेरे पास फिक्स डिपॉजिट में 2 लाख रुपए थे। मैंने सोचा कि इन पैसों से पापा की मदद करूं, मगर वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। दूसरा रास्ता था कि मैं एक साल और लगाकर मेडिकल परीक्षा की तैयारी करूं, लेकिन उसका परिणाम क्या होगा, ये किसी को भी नहीं पता था। अंत में मैंने प्राइवेट कॉलेज में पढ़ने का फैसला लिया।

खुशी की बात ये है कि मेरा बड़ा भाई इंजीनियर है और उसको उसी समय नौकरी मिल गई। बाद में भाई ने पापा को छोटी दुकान खोलने में मदद की। जिसे आज पापा संभालते हैं।

नानी के घर जाती हूं तो मिलती है अलग पहचान
हर बच्चे के लिए नाना-नानी और दादा-दादी का घर बहुत ही प्यारा होता है। जब भी मैं अपनी नानी के घर जाती तो मुझे बहुत प्यार मिलता है। यहां तक कि मेरी नानी के घर अगर कोई भी आता है तो वो यही कहकर मिलवाती हैं कि ये भारत की 100 करोड़वीं बच्ची है।

आस्था की पहचान कराते हुए नानी कहतीं - मेरी नातिन देश की 100 करोड़वीं बच्ची है।
आस्था की पहचान कराते हुए नानी कहतीं - मेरी नातिन देश की 100 करोड़वीं बच्ची है।

मां ने कभी नहीं खरीदा डायपर, हमेशा तोहफे में मिले
आस्था कहती हैं कि मेरी मां बताती हैं कि मेरे पैदा होते ही मेरी मां की जिंदगी ही बदल गई थी। मेरे बिलियंथ बेबी होने पर मां को कई तरह के तोहफे मिलते। आए दिन कोई न कोई उनसे मिलने आता और बेबी केयर के सामान दे जाता। मां को कभी भी बचपन में मेरे लिए डायपर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी।

प्रधानमंत्री से पूछा सवाल- कैसे कम होगी देश की जनसंख्या?
साल 2018 की बात है, मैं एक टीवी शो पर पहुंची। वहां हमने प्रधानमंत्री से कुछ सवाल पूछे। मैंने पूछा कि हमें जनसंख्या नियंत्रण के लिए क्या कदम उठाने चाहिए। हम कुछ ही सालों में 200 करोड़ की आबादी वाले देश बन जाएंगे जिससे हमारे देश के विकास की गति धीमी पड़ जाएगी। इस समस्या से निपटने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?

मैं ये मानती हूं कि किसी भी देश की ज्यादा जनसंख्या उसके विकास में आड़े आती है। हमारी जनरेशन के लिए मेडिकल हेल्प, एजुकेशन और नौकरी हर चीज पाना मुश्किल हो जाता है। पॉपुलेशन बढ़ने से कॉम्पिटिशन बढ़ता है, सीटें बिकती हैं, इससे निपटने का सिर्फ एक ही तरीका है और वो है जनसंख्या नियंत्रण।

आस्था ने पीएम से कहा था- जनसंख्या की वजह से हर जगह प्रतियोगिता बढ़ती है, मौके कम हो जाते हैं।
आस्था ने पीएम से कहा था- जनसंख्या की वजह से हर जगह प्रतियोगिता बढ़ती है, मौके कम हो जाते हैं।

अच्छी नौकरी करना और माता-पिता की ख्वाहिश पूरी करना चाहती हूं
मेरा सपना देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में नौकरी करना है। वहां पहुंचने के लिए एम्स प्रवेश परीक्षा नॉर्सेट की तैयारी कर रही हूं। मेरा एक ही सपना है कि मैं अपने माता-पिता की हर ख्वाहिश को पूरा कर सकूं। मैं उन्हें पूरा देश घुमाना चाहती हूं।

बचपन से देती आ रही इंटरव्यू, फ्रेंड्स के बीच सेलिब्रिटी की तरह हूं
जब स्कूल गई तो वहां लोगों को पता था कि मैं 100 करोड़वीं बच्ची हूं, बचपन में मेरे फ्रेंड्स ये जानकर बड़े खुश होते थे। आज भी कॉलेज में मेरे कई साथियों को ये बात पता है। जिनको नहीं पता, जब मैं इंटरव्यू देती हूं तो उनको भी पता लग जाता है। आज सभी जानते हैं, लेकिन सेलिब्रिटी जैसा कुछ नहीं है। जब भी जनसंख्या नियंत्रण पर कोई कार्यक्रम होता है तो मैं उसमें शामिल होती हूं और अपने विचार रखती हूं।

मां अंजना अरोड़ा (बाएं से तीसरी) कहतीं - बचपन में आस्था को इतने तोहफे मिले कि डायपर खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ी।
मां अंजना अरोड़ा (बाएं से तीसरी) कहतीं - बचपन में आस्था को इतने तोहफे मिले कि डायपर खरीदने की जरूरत ही नहीं पड़ी।

जब लोगों का चेहरा बेटी पैदा होने पर नहीं उतरेगा, उस दिन देश विकसित होगा
सरकार जनसंख्या नियंत्रण और जागरूकता के लिए कई काम करती है। जिस जिन हम लोग बेटा और बेटी में अंतर देखना बंद कर देंगे, उसी दिन से देश की स्थिति सुधर जाएगी। मुझे आज भी याद है मेरे ही परिवार के एक रिश्तेदार के घर लगातार दूसरी बार बेटी का जन्म हुआ, उस घर में खुशी नहीं थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे कोई संसार में आया नहीं है, बल्कि जा रहा है। आज उन्हीं की बेटियां उनका ख्याल रखती हैं।

देश में महिला सुरक्षा को लेकर कदम उठाए जाने चाहिए
देश में महि्ला सुरक्षा को लेकर कदम उठाए जाने की जरूरत है। अगर बेटियों को समाज में सम्मान दिलाना है तो उनके लिए बराबरी और सुरक्षा का माहौल बनाना होगा। हमको भरोसा होना चाहिए कि हम भी सिर उठाकर घूम सकती हैं। ऐसा हो सका तो हम बेटियां समाज में पूरी तरह से योगदान दे सकेंगीं।