पत्नी का फोन चुपचाप रिकॉर्ड करने पर होगी सजा:पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा- यह प्राइवेसी में दखलअंदाजी

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: राधा तिवारी
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पत्नी की जानकारी के बिना फोन पर उसके साथ की गई बातचीत को रिकॉर्ड करना निजता का हनन है। यह टिप्पणी पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने की है। न्यायमूर्ति लीला गिल की एकल पीठ ने एक महिला की याचिका पर यह आदेश पारित किया। इस महिला ने बठिंडा फैमिली कोर्ट के 2020 के आदेश को चुनौती दी थी।

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कहा ,पत्नी की जानकारी के बिना फोन पर उसके साथ की गई बातचीत को रिकॉर्ड करना निजता का हनन है।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने कहा ,पत्नी की जानकारी के बिना फोन पर उसके साथ की गई बातचीत को रिकॉर्ड करना निजता का हनन है।

रिकॉर्डिंग को सबूत के तौर पर किया पेश
पहले यह मामला बठिंडा की फैमिली कोर्ट में गया था। पति ने यह बातचीत फोन के मेमोरी कार्ड में रिकॉर्ड की थी और इसे सीडी में लेकर कोर्ट पहुंचा था। पति ने पत्नी के खिलाफ क्रूरता के आरोप लगाए थे। कोर्ट ने सीडी में दर्ज टेलीफोन पर बातचीत की रिकॉर्डिंग से इन आरोपों को साबित करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने इसे याचिकाकर्ता की पत्नी के मौलिक अधिकार का स्पष्ट उल्लंघन करार दिया।

अदालत ने फैसले पर लगाई फटकार
अदालत ने कहा, किसी की रिकॉर्डिंग सुनकर आकलन नहीं किया जा सकता है कि किन परिस्थितियों में बातचीत हुई या किस तरह से बातचीत रिकॉर्ड करने वाले व्यक्ति ने जवाब दिया। क्योंकि यह स्पष्ट है कि रिकॉर्डिंग निश्चित तौर पर दूसरे पक्ष से छिपाकर की गई होगी। पत्नी की जानकारी के बिना पति द्वारा उसकी बात को रिकॉर्ड करना निश्चित तौर पर निजता का हनन है और इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में बठिंडा फैमिली कोर्ट के फैसले को खारिज किया जा रहा है। इस मामले में पति ने 2017 में महिला से तलाक की अर्जी डाली थी। उनकी शादी वर्ष 2009 में हुई थी और दंपति की एक बेटी है।

इस मामले में पति ने 2017 में महिला से तलाक की अर्जी डाली थी। उनकी शादी वर्ष 2009 में हुई थी और दंपति की एक बेटी है।
इस मामले में पति ने 2017 में महिला से तलाक की अर्जी डाली थी। उनकी शादी वर्ष 2009 में हुई थी और दंपति की एक बेटी है।

फैमिली कोर्ट का आदेश किया रद्द
याचिकाकर्ता महिला ने अपनी चार वर्षीय बेटी की कस्टडी दिए जाने की मांग करते हुए कहा था कि पति ने बेटी को अपने पास रखा हुआ है। इतनी छोटी उम्र की बच्ची की कस्टडी पिता के पास होना अवैध है। दूसरी तरफ पति ने पत्नी के पुराने व्यवहार को कारण बताते हुए बेटी की कस्टडी मां को दिए जाने का विरोध किया था। अदालत में अपनी पत्नी के साथ फोन पर हुई बातचीत के दस्तावेज भी पेश किए थे।

चार वर्षीय बच्ची की कस्टडी मां को दी
बच्ची की कस्टडी याचिकाकर्ता मां को दिए जाने का आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा कि पिता को भी अपनी बच्ची से मिलने की छूट होगी। जस्टिस मोंगा ने कहा कि अदालत के आदेश सिर्फ इस हैबियस कॉर्पस याचिका पर दिए गए है। इन आदेशों का दोनों पक्षों के बीच अदालत में विचाराधीन कस्टडी याचिका पर कोई असर नहीं होगा।

बच्ची की कस्टडी याचिकाकर्ता मां को दिए जाने का आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा कि पिता को भी अपनी बच्ची से मिलने की छूट होगी ।
बच्ची की कस्टडी याचिकाकर्ता मां को दिए जाने का आदेश देते हुए कोर्ट ने कहा कि पिता को भी अपनी बच्ची से मिलने की छूट होगी ।

रिकॉर्डिंग को माना जाता है सबूत, इस फैसले से बदलेंगे मायने
इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील अमित पांडेय कहते हैं कि कॉल रिकॉर्डिंग का उपयोग हमारे यहां वर्षों से हो रहा है। कॉल रिकॉर्डिंग को एक दस्तावेज जैसा सबूत माना जाता है और उस के माध्यम से किसी तथ्य को प्रमाणित किया जा सकता है। यह एक स्वाभाविक बात है कि जिस पक्ष के खिलाफ आप किसी दस्तावेज को प्रस्तुत कर रहे हैं यदि वह उस के खिलाफ जा रहा है तो वह उस दस्तावेज के असली होने से इनकार कर सकता है।

कोई आपको अगर कॉल करता है तो आप उससे उसकी कॉल रिकॉर्ड करने की परमिशन तो नहीं लेंगे। इसे ब्रीच ऑफ ट्रस्ट कहते हैं। लेकिन कई न्यायिक मामलों में कॉल रिकॉर्डिंग के जरिये कई सारे मामले सुलझाए जाते हैं। जैसे हालिया मामला लश्कर-ए-तैयबा की आतंकी इशरत जहां का था। इसके अलावा कई पॉलिटिकल मामले भी कॉल रिकॉर्डिंग के जरिये सुलझाए गए हैं।

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