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पुरुषों को शादी के लिए नहीं चाहिए नौकरी वाली लड़की:सर्वे में खुलासा, घर पर रहने वाली ही डार्लिंग, पैसे उतने कमाए जैसे पेड़ पर पत्ते

नई दिल्ली2 महीने पहले
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नौकरीपेशा महिलाओं को मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर पसंद के लड़के कम मिलते हैं। जबकि कुछ न करने वाली लड़कियों की प्रोफाइल को सबसे ज्यादा देखा जाता है और रिश्ते की बात आगे बढ़ती है। एक अध्ययन में इसका खुलासा हुआ है।

वर्किंग होने का भुगतना पड़ता है खामियाजा

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ब्लावैटनिक स्कूल ऑफ गवर्नमेंट में पीएचडी कर रही दिवा धर ने अपनी स्टडी में पाया कि शादी के लिए लड़के की तलाश करते समय वर्किंग वुमन को उसके कामकाजी होने का खामियाजा भुगतना पड़ता है। नौकरीपेशा महिलाओं की तुलना में काम न करने वाली महिलाओं में 15 से 22 फीसदी अधिक लोगों ने रुचि दिखाई।

शादी के बाद करियर पर लग जाता है ग्रहण

मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर नॉन वर्किंग वुमन की प्रोफाइल को अगर 100 पुरुषों ने देखा तो वर्किंग वुमन की प्रोफाइल को बस 78 लोगों ने ही देखा। दिवा धर अपनी स्टडी में इस निष्कर्ष पर पहुंचीं कि जब शादी की बात आती है तो नौकरीपेशा होने या न होने का असर पड़ता है। वह कहती हैं उनके कई दोस्तों ने शादी के बाद काम छोड़ दिया या जिस करियर को लेकर वो आगे बढ़ रहीं थी, उसे शादी के बाद बीच में ही छोड़ दिया।

पिछली तिमाही में कामकाजी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। लेकिन ये संख्या अब भी काफी कम है।
पिछली तिमाही में कामकाजी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। लेकिन ये संख्या अब भी काफी कम है।

मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर स्टडी के लिए बनाई फेक प्रोफाइल

इस स्टडी के लिए एक बड़ी मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर 20 फेक प्रोफाइल बनाए गए। ये सभी प्रोफाइल उम्र, लाइफस्टाइल, डाइट, हॉबी आदि पर लगभग एक जैसे थे। लेकिन इन्हें तीन-चार कैटेगरी में बांटा गया था। जैसे वर्किंग वुमन, उनकी सैलरी, शादी के बाद काम करने की इच्छुक महिलाएं वगैरह। ये प्रोफाइल अलग-अलग जातियों के लिए बनाई गईं। इस सैंपल सर्वे में खुलासा हुआ कि जो महिलाएं काम नहीं करतीं, उनकी प्रोफाइल पर सबसे ज्यादा रिस्पांस रहा। दूसरे नंबर पर वो महिलाएं रहीं, जो अभी वर्किंग तो हैं लेकिन शादी के बाद घर पर रहेंगी।

हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक कामकाजी महिलाएं हैं। कुल कार्यबल में इनकी भागीदारी 63 प्रतिशत है। यहीं नहीं, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि राज्यों में भी वर्किंग वुमन अधिक हैं।
हिमाचल प्रदेश में सबसे अधिक कामकाजी महिलाएं हैं। कुल कार्यबल में इनकी भागीदारी 63 प्रतिशत है। यहीं नहीं, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि राज्यों में भी वर्किंग वुमन अधिक हैं।

पुरुषों से ज्यादा कमाने वाली महिलाएं की प्रोफाइल को कम पसंद किया गया

दिलचस्प यह है कि वैसी वर्किंग वुमन जिन्हें मोटी तनख्वाह मिलती है और शादी के बाद भी नौकरी में रहना चाहती हैं उन्हें अधिक रिस्पांस मिला। यह भी देखने को मिला कि जो वर्किंग वुमन पुरुषों से अधिक कमाती हैं उनकी प्रोफाइल को 10 फीसदी कम पसंद किया गया। जबकि वैसी कामकाजी महिलाएं जो पुरुषों से कम कमाती हैं, उन्हें 15 फीसदी अधिक पसंद किया गया।

7 से 10 लाख इनकम कैटेगरी वाली महिलाओं को पुरुष शादी के लिए पंसद करते हैं।
7 से 10 लाख इनकम कैटेगरी वाली महिलाओं को पुरुष शादी के लिए पंसद करते हैं।

कई रिश्ते इस वजह से टूट गए क्योंकि पत्नी काम करती थी

फैमिली काउंसेलर सुप्रिया गिरी कहती हैं, वर्किंग वुमन के प्रति पुरुषों का नजरिया बदला नहीं है। कई ऐसे मामले सामने आते हैं, जिसमें रिश्ता इसलिए टूट गया कि पति को पत्नी का काम करना पसंद नहीं था। इसमें कई जटिल पहलू होते हैं। जैसे-पत्नी पति से कम कमाती है तो पुरुष नहीं चाहते कि वह नौकरी में रहे। जबकि दूसरा पहलू यह भी है कि पति की कमाई कम है और पत्नी की सैलरी कई गुना तो फिर उन्हें कोई ऐतराज नहीं होता। ऐसे मामले में कह सकते हैं कि उन्हें फिर पत्नी सोने की मुर्गी जैसी दिखती है।

शादी में देरी होने पर कामकाजी महिलाएं करियर में लापरवाही दिखाती

भारत में 99 प्रतिशत महिलाएं 40 की उम्र तक पहुंचने से पहले शादी कर लेती हैं। स्टडी में दिवा ने बताया है कि जब महिलाओं को लगता है कि नौकरीपेशा होने पर उन्हें शादी में परेशानी होगी तो वो अपने करियर के प्रति लापरवाह हो जाती हैं। शादी से पहले करियर बनाने या शादी के बाद नौकरी में रहने के विचार को एक तरह से त्याग देती हैं। यह एक महत्वपूर्ण कारण है जिसकी वजह से भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या कम है।

सरकारी सुविधाओं के बाद भी महिलाओं की भागीदारी कम

नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (एनएसओ) की ओर से हाल में जारी पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे जारी किया गया था। सर्वे में बताया गया कि 15 वर्ष से ऊपर की कामकाजी जनसंख्या में महिलाओं की भागीदारी 28.7 प्रतिशत है, जबकि पुरुषों की भागीदारी 73 प्रतिशत है। यह स्थिति तब है जब सरकार की ओर से महिलाओं को कई तरह की सुविधाएं दी गईं हैं। जैसे-पेड मैटरनिटी लीव, सुरक्षा के साथ नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति आदि।

10 साल पहले आज के मुकाबले ज्यादा महिलाएं काम करती थीं

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के उदित नारायण पीजी कॉलेज पडरौना में समाजशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर विश्वंभर नाथ प्रजापति कहते हैं, जो समाज बेटी के जन्म पर दुखी हो जाता है। वह उन्हें काम करता हुए देखकर कैसे खुश हो सकता है। भले समाज का ढांचा बदला, संविधान के तहत अधिकार मिले, पर हकीकत है कि स्त्रियों के नए रोल को पढ़े-लिखे समाज ने स्वीकार नहीं किया है। 10 वर्ष पहले का ही आंकड़ा देखें तो कार्य बल में महिलाओं की भागीदारी अधिक थी, लेकिन अब कम है। यह भी देखें कि शहरी क्षेत्र में महिलाएं अधिक पढ़ी-लिखी हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि कामकाजी ग्रामीण महिलाएं अधिक हैं। आज इन्फॉर्मेशन इकोनॉमी, नॉलेज इकोनॉमी, सर्विस इकोनॉमी की हम बात करते हैं लेकिन यहां भी वही सोच हावी दिखती है।

उत्तर भारत राज्य के पुरुषों की पंसद गैर कामकाजी लड़कियां

प्रोफेसर विश्वंभर नाथ प्रजापति बताते हैं कि एक शोध में पाया गया है कि उत्तर भारत के राज्यों बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश में पुरुषों को गैर कामकाजी लड़कियां पसंद हैं, जबकि दक्षिण में यह कम है। दक्षिण भारत के राज्यों तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक आदि में 57 प्रतिशत से अधिक पुरुषों को वर्किंग वुमन चाहिए। इसमें देखा गया है कि जिन राज्यों में साक्षरता अधिक है, वहां के पुरुष वर्किंग वुमन को प्राथमिकता देते हैं।

आर्थिक रूप से कमजोर तबके में भी महिला का कामकाजी होना इशू

वर्किंग वुमन को पंसद करने वाले पुरुष यह देखते हैं कि लड़की कौन सा काम कर रही है। सामान्य तौर पर टीचिंग के काम से पुरुषों को दिक्कत नहीं होती है। अगर लड़की किसी फैक्टरी में काम, डिफेंस जैसे फील्ड में होती तो वो मुंह मोड़ लेते हैं। विश्वंभर नाथ प्रजापति बताते हैं कि जो पिछड़े वर्ग के लोग हैं या आर्थिक रूप से कमजोर हैं, उनमें भी यह प्रवृत्ति है। वो मानते हैं कि पढ़ना-लिखना तक तो ठीक, लेकिन वर्किंग वुमन नहीं चाहिए। हम जिस समाज में रहते हैं, उसमें शादी बड़ा मुद्दा है, नौकरी नहीं। पुरुषों में यह सोच हावी है कि महिलाएं नौकरी करेंगी तो उनकी मोबिलिटी अधिक होगी, संपर्क अधिक बढ़ेगा। घर से बाहर निकल कर बाहर के पुरुषों से बात करेंगी। यह उन्हें बर्दाश्त नहीं होता है। पत्नी का अधिकार सर्विलांस पर रहता है। पुरुषों को लगता है कि नौकरी करने पर महिलाएं उन पर आश्रित नहीं रहेंगी। वो खुद डिसीजन ले सकेंगी, उनकी चलेगी नहीं। इसलिए वो नौकरीपेशा महिलाओं को नहीं पसंद करते।

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