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गुलामों से आया था सेफ हाउस का आइडिया:अमेरिका ने इसमें बनाया लादेन-जवाहिरी के मर्डर का प्लान, भारत में महिलाओं-बच्चों के लिए बने सेफ होम्स

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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खबर 1: दिल्ली सरकार ने मार्च 2021 से लेकर अब तक 16 ऐसे कपल्स को ‘सेफ हाउस’ में पनाह दी, जिनके घरवाले इंटरकास्ट या इंटरफेथ मैरिज के खिलाफ थे।

खबर 2: दुनिया के सबसे खूंखार आतंकी संगठन अलकायदा का सरगना अयमान अल जवाहिरी काे करीब दो महीने पहले अमेरिका ने ड्रोन हमले में मार गिराया था। काबुल में जवाहिरी जिस सेफ हाउस में छिपा था, अब उसी मॉडल का एक म्यूजियम वर्जीनिया में अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने बनाया है, जिसमें CIA के कई ऑपरेशन की कहानी बताई जाएगी।

सेफ हाउस को लेकर पिछले हफ्ते ये दो खबरें आईं। दोनों सेफ हाउस का नाम एक जैसा है, लेकिन मकसद और इस्तेमाल अलग। सेफ हाउस…शब्द पढ़ते ही शेल्टर होम, बेघरों के लिए बने रैन बसेरे, सेना के बंकर, आपदा पीड़ितों के लिए टेम्परेरी टेंट और अपराधियों के लिए अंडरग्राउंड बंकर जैसी कई तस्वीरें जेहन में उभर आएंगी।

अब शेल्टर होम, सेफ हैवेन, सेफ हॉर्बर और हाइडिंग प्लेस जैसे कई शब्द मन में कौंधने लगे होंगे। ये सवाल आएगा कि क्या सबका मतलब एक ही है या फिर अलग-अलग? आइए जानते हैं सेफ हाउस क्या है और उन्हें किन-किन नामों से जाना जाता है…

सबसे पहले बात भारत की करते हैं। अपने देश में सेफ हाउस बेसहारा बच्चों, पीड़ित महिलाओं, बुजुर्गों, मानसिक रोगियों और दिव्यांगों काे शरण देने के लिए बनाए जाते हैं। चक्रवात, बाढ़ या फिर किसी और आपदा के चलते बेघर लोगों को टेम्परेरी सेफ हाउस में शरण दी जाती है, लेकिन यहां हम पीड़ित महिलाओं और बच्चों को आसरा देने के लिए बनाए गए सेफ हाउस की ही बात कर रहे हैं।

सेफ हाउस और शेल्टर होम, सेफ हेवन और सेफ हार्बर जैसे सभी शब्दों का मतलब एक ही है। भारत में ये वन स्टॉप सेंटर, शॉर्ट स्टे होम, सुधार गृह, बालिका गृह, प्रोटेक्टिव, रिहेबलिटेटिव होम और चाइल्ड केयर होम नाम से भी जाने जाते हैं।

देश में साल-दर-साल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। यहां पढ़िए, महिलाओं के खिलाफ होने वाले क्राइम के आंकड़े..

अमेरिका में अफ्रीकी गुलामों के दड़बे से आया सेफ हाउस का कॉन्सेप्ट
बात 19वीं शताब्दी की है। अमेरिका ने अंडरग्राउंड रेलमार्ग बनाया। परियोजना में कुछ सेफ हाउस बनाए गए थे, जहां रेलमार्ग बनाने के लिए अफ्रीकी देशों से लाए गए गुलामों को रखा गया था ताकि वे यहां से भाग न सकें। इन घरों के बाहर लालटेन पकड़े अफ्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति की तस्वीरें होती थीं। इसीलिए इन सीक्रेट हाउस को ‘द लैंटर्न होल्डर’ भी कहा जाता था। यहीं से सेफ हाउस का कॉन्सेप्ट आया।

लादेन जहां छिपा वो सेफ हाउस, उसे मारने की प्लानिंग जहां हुई वो भी सेफ हाउस
दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी में हिटलर के अत्याचारों की वजह से महिलाओं और बच्चों को जिन जगहों पर छिपाकर रखा गया, उन जगहों को भी सेफ हाउस कहा जाता था। अमेरिका में हुए 9/11 हमले का मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन जिस जगह छिपकर रह रहा था, वो भी सेफ हाउस ही था। और जहां उसका काम तमाम करने के लिए अमेरिकी नेवी सील ने अपनी रणनीति बनाई उसे भी सेफ हाउस का नाम दिया गया। इतना ही नहीं, दुनिया भर की खुफिया एजेंसी अपने किसी ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए जिस जगह ठहरकर खाका खींचती हैं, उसे भी सेफ हाउस कहा जाता है।

ये तो बात हुई सेफ हाउस की शुरुआत की। अब हम भारत में बने सेफ हाउस के बारे में जानते हैं, जो पीड़ित महिलाओं और बच्चों के लिए बनाए गए। साथ ही ये भी जानने की कोशिश करते हैं कि ये सेफ हाउस महिलाओं और बच्चों के लिए कितने सेफ हैं?

देश में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाली हिंसा के मामले काफी ज्यादा हैं, मगर सेफ हाउस की संख्या बेहद मामूली है।

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के मुताबिक, देश में मौजूदा वक्त में 730 वन स्टॉप सेंटर, 384 शॉर्ट स्टे होम, 375 सुधार गृह, 134 प्रोटेक्टिव एवं रिहेबलिटेटिव होम और 9,588 चाइल्ड केयर होम हैं। इनमें हिंसा और शोषण की शिकार महिलाओं और बच्चों को आसरा दिया जा रहा है। इन सेफ हाउस/शेल्टर होम में पीड़ितों को रहना, खाना, कपड़ा, चिकित्सा व काउंसलिंग, पुलिस और कानूनी मदद मुहैया कराई जाती है।

देश में कितने शेल्टर होम ये बात आपने जान ली है, तो अब ये भी जान लीजिए कि किन राज्यों के सेफ हाउस में महिलाएं और बच्चियां सेफ नहीं हैं..

जहां मिलनी चाहिए सुरक्षा, वहां हो रहा शोषण
इंडियन लीडरशिप फोरम अगेंस्ट ट्रैफिकिंग (इल्फत) की सदस्य परिधि शर्मा (बदला हुआ नाम) बताती हैं कि मैं भी बचपन में कमाने-खाने के लिए नागपुर गई थी, लेकिन वहां देह व्यापार के दलदल में फंस गई। किसी तरह नरक से छूटकर कोलकाता पहुंची तो यहां के एक शेल्टर होम में पनाह मिली।

परिधि पश्चिम बंगाल के नॉर्थ परगना में रहती हैं। वह बताती हैं कि लंबे वक्त तक सदमे में रही। कोई छू लेता तो चीख पड़ती। रात में सपने में भी आपबीती नजर आती, जिसके चलते मैं सो नहीं पाती। शेल्टर होम में न ठीक से खाना-पीना मिलता और न दवा। न वक्त पर काउंसलिंग कराई जाती और न अपनेपन का अहसास। देखभाल करने वाले ही टॉर्चर करते। अपने हिस्से का सारा काम लड़कियों से कराते। कुछ से तो गंदा काम भी कराया जाता और शिकायत भी कोई नहीं सुनता।

शेल्टर होम में 407 महिलाओं-लड़कियों से हुआ रेप
इसी साल मार्च में उत्तरी दिल्ली के एक शेल्टर होम में रह रही नाबालिग से दुष्कर्म की घटना सामने आई। बिहार के मुजफ्फरपुर, पटना और गया, उत्तर प्रदेश के देवरिया, प्रतापगढ़ और कानपुर समेत देशभर के कई शेल्टर होम से लड़कियों के साथ दुष्कर्म के मामले सामने आए।

एनसीआरबी की साल 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, 436 महिलाओं और बच्चियों के साथ शेल्टर होम में यौन शोषण हुआ। इससे पहले शेल्टर होम में यौन शोषण के 2020 में 407, साल 2019 में 473 और 2018 में सबसे अधिक 707 मामले दर्ज किए गए थे। ये आंकड़े सवाल उठाने के लिए मजबूर करते हैं कि क्या ये सेफ हाउस वाकई महिलाओं और बच्चों के लिए सेफ हैं?

सेफ हाउस का शुरुआती आइडिया था कि जब यहां से महिलाएं निकलें तो वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और दोबारा से शोषण और हिंसा की शिकार न हों, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

ट्रेनिंग के नाम पर सिखाया जाता है बस सूई में धागा डालना
इल्फत संस्था की लीडर सुनीता बताती हैं, ‘हमारी संस्था से कई ऐसी लड़कियां जुड़ीं, जिनका लंबा वक्त शेल्टर होम में गुजरा। वहां जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने के लिए ब्यूटीशियन, सिलाई-कढ़ाई और भी कई तरह की ट्रेनिंग दी जाती हैं, जिनके नाम पर शेल्टर चलाने वाले लोग मोटी-मोटी रकम उठाते हैं, लेकिन ट्रेनिंग के नाम पर सूई में धागा डालना और बटन टांकना ही सिखाया जाता है, जिससे बाहर निकलकर कोई काम नहीं मिलता। ऐसा कोई काम नहीं सिखाया जाता है कि बाहर निकलकर लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।’
सुनीता आरोप लगाती हैं कि शेल्टर होम में रहने वाली लड़कियों के लिए जो फंड आता है, उसका आधा हिस्सा भी उन पर खर्च नहीं किया जाता है और फंड लगातार मिलता रहे इसके लिए वे लड़कियों को तीन-तीन साल घर नहीं जाने देते। जब दो-तीन साल रहने के बाद लड़कियां घर जाती हैं, तब समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता, अपने गले नहीं लगाता, बल्कि मुंह मोड़ लेता हैं। शेल्टर में शोषण की खबरें पढ़ने के चलते लोग यहां से आई लड़कियों को ‘अच्छी लड़कियां’ नहीं मानते।

सरकारी संरक्षण में रहने के बावजूद लड़कियों को समाज ‘अच्छी लड़की’ मानने से इनकार करता है और उन्हें बुरी नजर से देखता है, क्यों?

इसके जवाब में सुनीता ने कहा- अक्सर सेफ हाउस में गलत काम होने की खबरें आती रहती हैं, जिस कारण लोगों को लगता है कि सेफ हाउस में जो भी लड़कियां रह रहीं हैं, वे सब गंदे काम में शामिल रहीं हैं।

एक तो देश में सेफ हाउस पहले से ही कम हैं। दूसरा, सरकारी संरक्षण के बावजूद इनमें रहने वाली महिलाओं का यौन शोषण नहीं रुक रहा। तीसरा, यहां रहने वाली महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने के बड़े-बड़े दावे भी थोथे साबित हो रहे हैं। और तो और इन सेफ हाउसेस को सही तरीके से चलाने के लिए सरकार की तरफ से पैसा भी वक्त पर नहीं मिलता है।

यहां पढ़िए, सेफ हाउस में महिलाओं क्या-क्या मदद मिलती है..

सरकार से नहीं मिलता समय पर पैसा
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की ओर से चलाए जा रहे दिल्ली के कड़कड़डूमा स्थित ‘स्नेहालय शॉर्ट होम’ में 25 महिलाएं और 6 बच्चे रह रहे हैं। इसकी प्रेसिडेंट पूर्व उपराष्ट्रपति कृष्णकांत की पत्नी सुमन कांत हैं। स्नेहालय की इंचार्ज रानी भाटिया बताती हैं कि यहां पुलिस की ओर से लाई गई या फिर कोर्ट की ओर से भेजी गई महिलाओं को ही सहारा देते हैं।

दरअसल, यह शॉर्ट होम स्टे है, जहां 6 महीने से ज्यादा किसी पीड़िता को रखने की इजाजत नहीं होती। ऐसी स्थिति में पीड़िताओं के परिवार का पता लगाना, काउंसलिंग करना और उनका मामला जल्द से जल्द सुलझाना होता है। रानी भाटिया कहती हैं कि सरकार की ओर से पिछले 4 साल से हमारी संस्था को कोई फंड नहीं मिला। संस्था के सदस्य मिलकर यहां रहने वालों के लिए खाने-पहनने, दवा और स्टाफ की सैलरी का खर्च उठा रहे हैं।

सेफ हाउस में 50 के रहने की जगह लेकिन रह रहीं 80, फैली अव्यवस्था
उत्तर प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष विमला बाथम कहती हैं कि सेफ हाउस महिलाओं और बच्चों के लिए मददगार साबित हुए हैं। इनमें अव्यवस्थाओं की वजह क्षमता से अधिक संख्या में पीड़िताओं का पहुंच जाना है। जहां 20 महिलाओं के रहने की जगह है, वहां 30 रह रही हैं और जहां 50 की जगह है, वहां 80 महिलाएं रह रही हैं।

दरअसल, कोई पीड़िता रात में पहुंची तो उसे वापस नहीं भेजा जा सकता और न ही नाबालिग रेप विक्टिम प्रेग्नेंट महिला को बालिग होने से पहले निकाला जा सकता है। अगर उसके परिवार वाले अपने साथ ले जाएं तब तो ठीक है, लेकिन कई केस में लड़कियां घर जाना नहीं चाहतीं तो कई मां-बाप रखना नहीं चाहते।

महिलाओं के लिए बने सेफ हाउस में कितनी अवधि तक रहा जा सकता है, पढ़िए..

पीड़ित महिलाओं के लिए 1969 में शुरू हुए थे शॉर्ट होम स्टे
महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगों के कल्याण से जुड़े कार्यक्रमों के लिए 12 अगस्त, 1953 को केंद्रीय समाज कल्‍याण बोर्ड बनाया। बोर्ड ने 16 साल बाद 1969 में पहली बार शॉर्ट होम स्टे बनवाए, जिनमें हिंसा, यौन शोषण से पीड़ित उन बेघर महिलाओं को शरण दी गई जिनका सामाजिक और नैतिक रूप से बहिष्कार कर दिया गया।

सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 15 से 35 साल की महिलाओं को प्राथमिकता दी गई थी। ये महिलाएं यहां 6 महीने से लेकर 3 साल तक रह सकती थीं। यहां 7 साल तक के बच्चे अपनी मां के साथ रह सकते थे। स्वैच्छिक संगठन महिलाओं की देखभाल करते और पुनर्वास कराने में मदद करते थे।

2002 में स्वाधार योजना से बनाए शॉर्ट होम स्टे
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2001-02 में शॉर्ट होम स्टे योजना के तहत स्वाधार योजना लॉन्च की। इसके तहत गरीब विधवा, आपदा में बेघर होने वालीं, परिवार से निकाली गईं और किसी अपराध के चलते जेल की सजा काटकर लौटीं महिलाओं को शरण दी गई। रहने-खाने के साथ ही महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक पुनर्वास की व्यवस्था करना भी शामिल था।

सेफ हाउस में भी सेफ नहीं महिलाएं-बेटियां, यहां देखिए आंकड़ा...

2007 में उज्ज्वला होम नाम से बनाए गए सेफ हाउस
स्वधार गृहों में ह्यूमन ट्रैफिकिंग से रेस्क्यू होने वाली महिलाओं को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था, जिसमें भेदभाव सबसे अहम था। ह्यूमन ट्रैफिकिंग से पीड़ित महिलाओं की मांग के बाद महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 2007 में उज्ज्वला होम (प्रोटेक्टिव एवं रिहेबलिटेटिव होम) नाम से सेफ हाउस बनाए। महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में जानकारी देते हुए बताया कि 2013 से लेकर 2019 के बीच 34,910 पीड़िताओं का बचाव और पुनर्वास किया गया।

स्मृति ईरानी ने बताया कि 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया गैंगरेप के बाद बनाए गए कानून में हिंसा व यौन हिंसा की पीड़ित महिलाओं को फौरी राहत देने के लिए 733 वन स्टॉप सेंटर बनाने की मंजूरी दे गई, जिनमें से 704 संचालित हो रहे हैं। इन वन स्टॉप सेंटर के जरिए अब तक 5 लाख के करीब महिलाओं को मदद मिली चुकी है।

साल 2016 में सरकार ने स्वधार योजना में कुछ संशोधन भी किए। ज्यादातर स्वधार गृह किराए की इमारत में चल रहे हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने एक और कृष्ण कुटीर समेत उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन स्वधार गृहों की इमारत बनाई है।

सिंगल महिलाओं के लिए बनाए गए वर्किंग वुमन्स हॉस्टल
अनमैरिड, विडो और डिवोर्सी महिलाएं कामकाज के लिए बाहर निकलने लगीं तो सरकार ने 1972-73 में किफायती और सुविधाजनक वर्किंग वुमन्स हॉस्टल बनाए। इसमें रहने की शर्त यह थी कि इन महिलाओं के परिवार किसी दूसरे शहर में रहते हों। जून, 2015 में वर्किंग हॉस्टल के लिए बनाई गई नीति के मुताबिक, केवल वे महिलाएं रह सकती हैं, जिनकी आय महानगरों में 50 हजार रुपए प्रतिमाह और अन्य शहरों में 35 हजार से कम हैं।

सेफ हाउस में कितने बच्चों को मिली पनाह? यहां पढ़िए...

चाइल्ड केयर में पले-बढ़े आधे बच्चों को नहीं मिलता काम
अगस्त, 2019 में ‘बियॉन्ड 18ः लीविंग चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस, ए स्टडी ऑफ आफ्टरकेयर प्रैक्टिसेज इन फाइव स्टेट्स ऑफ इंडिया’ नाम से आई रिपोर्ट के मुताबिक, चाइल्ड केयर होम और आफ्टरकेयर होम में पले-बढ़े करीब आधे युवाओं को रोजगार नहीं मिल पाता है। यह रिपोर्ट दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक के चाइल्ड केयर होम पर आधारित है।

रिपोर्ट में बच्चों की देखभाल करने वालों ने बताया कि 21% युवाओं को ऑफ्टर केयर होम में वह शिक्षा नहीं मिलती, जिसे वह लेना चाहते हैं। 49% को कभी भी खाना बनाना और 44% को घरेलू प्रबंधन नहीं सिखाया गया, जबकि बच्चे सीखना चाहते थे। चाइल्ड केयर होम में रहने वाले 64% के पास वोटर कार्ड, 62% के पास राशन कार्ड, 54% के पास पैन कार्ड और 4% बच्चों के पास आधार कार्ड नहीं था।

ग्रैफिक्स: सत्यम परिडा

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