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शशि की सेल्फी पर बवाल:सड़क से संसद तक सोच में नहीं है फर्क, पूर्व सांसद बोलीं- महिलाओं के मुद्दे नहीं उठाते पुरुष सांसद

नई दिल्ली6 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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शीतकालीन संसद सत्र के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने महिला सांसदों के साथ एक सेल्फी पोस्ट की, जिसके कैप्शन पर बवाल मच गया। दरअसल, थरूर ने कैप्शन में लिखा था, 'कौन कहता है लोकसभा काम करने के लिए आकर्षक जगह नहीं है?'

एक ओर महिलाएं आसमान छूने और समुद्र की गहराई नापने से लेकर देश की शासन व्यवस्था संभालने तक अहम रोल निभा रही हैं। फिर भी लोगों को महिलाओं की जगह रसोई ही नजर आती है। पुरुषों की इस सोच में घर से लेकर दफ्तर और सड़क से लेकर संसद तक कोई फर्क नहीं है। महिलाओं को लेकर पुरुषों के नजरिये पर कांग्रेस की पूर्व सांसद रंजीत रंजन और पूर्व बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले से वुमन भास्कर की बातचीत ...

'सोच में है दिक्कत, लड़कियां नहीं रुकेंगी'
रंजीत रंजन कहती हैं कि सेल्फी और कैप्शन में मुझे तो कुछ गलत नजर नहीं आया। इस पर बवाल करने वालों के दिमाग में प्रॉब्लम है, तस्वीर में नहीं। राजनीतिक रैलियों और चुनाव प्रचार में लोगों की भीड़ आपको एक नेता के तौर पर देखती है या एक महिला? इसके जवाब में रंजीत रंजन कहती हैं, ''मुझे हमेशा एक नेता के तौर पर देखा गया है, न कि महिला। मेरा मानना है कि हमारे देश की महिलाएं बहुत मजबूत हैं। उन्होंने हर क्षेत्र में खुद को प्रूव किया है कि वे पुरुषों से ज्यादा काबिल हैं। हर सिचुएशन को मजबूती से संभाला है। लोग महिलाओं और लड़कियों के बारे में क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं..यह सोचकर वो रुक तो नहीं जाएंगी। बाहर निकल कर काम करना बंद तो नहीं कर देंगी।

महिलाओं के मुद्दे सिर्फ महिला सांसद ही क्यों उठाएं पुरुष क्यों नहीं..संसद में यह मुद्दा उठाने वाली कांग्रेस नेता रंजीता रंजन। फाइल फोटो
महिलाओं के मुद्दे सिर्फ महिला सांसद ही क्यों उठाएं पुरुष क्यों नहीं..संसद में यह मुद्दा उठाने वाली कांग्रेस नेता रंजीता रंजन। फाइल फोटो

'अन्कान्शस माइंड में है महिलाओं को कमतर आंकना'
रंजीत रंजन ने कहा, महिलाओं को कमतर आंकने की समस्या सिर्फ भारत नहीं दुनिया भर में है। मैं 'वाइअलन्स अंगेस्ट वुमन' कार्यक्रम में इंडिया को रिप्रजेंट करने अमेरिका गई तो देखा वहां भी यही समस्या थी। महिलाओं को कमतर आंकने की समस्या दुनिया भर के पुरुषों के अन्कान्शस माइंड में है।

'पुरुष सांसद नहीं उठाते महिलाओं से जुड़े मुद्दे'
संसद में महिला सांसद जब सवाल पूछती है या फिर कोई मुद्दा उठाती है, तब पुरुष सांसदों का रिएक्शन क्या होता है? जवाब में कांग्रेस नेता बताती हैं कि मैं इस बात से इनकार नहीं करती कि संसद में मैन मेंटालिटी के लोग नहीं हैं। हालांकि, मैं किसी का नाम नहीं लूंगी। मैंने संसद में यह बात उठाई भी कि जब भी कोई महिलाओं से संबंधित मुद्दा आता है तो आप लोग कह देते हैं कि यह तो वुमन इश्यू है। महिलाओं के मुद्दे सिर्फ महिला सांसद ही क्यों उठाएं पुरुष क्यों नहीं? कानून बनाने से पहले मानसिकता ठीक करने की जरूरत है।

वहीं पूर्व भाजपा सांसद सावित्री बाई फुले कहती हैं कि सदन में डॉ. भीम राव अंबेडकर ने महिलाओं के हक की बात की। उन्हें अधिकार दिए। उसके बाद से आज तक किसी भी पुरुष सांसद ने महिलाओं के हक की बात नहीं की है। देश की आधी आबादी की समस्याएं उनके लिए मुद्दा ही नहीं हैं।

'कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हों तो पुरुष सांसदों को बर्दाशत नहीं होता'
सा​वित्री बाई फुले कहती हैं कि घर, दफ्तर और राजनीतिक पार्टियों में बैठे पुरुषों की मानसिकता महिलाओं को गुलाम बनाकर रखने की है। राजनीति की बात करूं तो पहले गिनी-चुनी महिलाओं को टिकट देंगे। अगर वे जीत जाएं और कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हो जाएं तो यह बात पुरुष सांसदों को बर्दाशत नहीं होती है। कुछ महिला सांसद तो ऐसी भी हैं, जो राजनीतिक परिवार से हैं। चुनकर संसद पहुंच गईं, लेकिन परिवार के दबाव में आवाज ही नहीं उठाती हैं। हालांकि, उन्होंने ऐसी किसी महिला सांसद का नाम लेने से मना कर दिया।

बता दें कि सावित्री बाई फुले ने 2014 में भाजपा के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीता था। बाद में कांग्रेस में शामिल हुईं और एक साल बाद ही कांग्रेस छोड़ कांशीराम बहुजन मूल निवासी पार्टी बना ली।

ऐसे पुरुषों को तवज्जो ही क्यों दें..
सा​माजिक कार्यकर्ता अंजली भट्टाचार्य कहती हैं कि कांग्रेस नेता शशि थरूर हों या फिर कोई भी पुरुष, जिनकी महिलाओं को लेकर राय अच्छी नहीं है, उनको तवज्जों ही क्यों दी जाए। पुरुष कब महिलाओं से ज्यादा मजबूत रहे हैं, जो उनके आगे अपने अधिकारों के लिए महिलाओं को गिड़गिड़ाना पड़े। ​पुरुष हमेशा से महिलाओं के खौफ में रहे हैं, इसलिए वे महिलाओं को छोटा दिखाने की कोशिश करते हैं।