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दैनिक भास्कर से बोलीं कश्मीर की बेटी श्रद्धा बिंद्रू:मैं दुनिया को बताना चाहती हूं कि कश्मीर हमारा है, कोई डरा-धमकाकर हमारे हौसले को पस्त नहीं कर सकता

नई दिल्ली18 दिन पहलेलेखक: दिनेश मिश्र
श्रद्धा बिंद्रू।

‘तुम सिर्फ शरीर को मार सकते हो, मेरे पिता की आत्मा को नहीं। अगर हिम्मत है तो सामने आओ, तुम लोग केवल पत्थर फेंक सकते हो या पीछे से गोली चला सकते हो। मैंने हिंदू होते हुए भी कुरान पढ़ी है। कुरान कहती है कि शरीर का जो चोला है, यह तो बदल जाएगा, लेकिन इंसान का जो जज्बा है, वह कहीं नहीं जाएगा। माखनलाल बिंद्रू इसी जज्बे में हमेशा जिंदा रहेंगे।’ यह कहना है आतंकियों को सरेआम ललकारने वालीं श्रीनगर में कश्मीरी पंडितों का चेहरा रहे दिवंगत फार्मासिस्ट माखनलाल बिंद्रू की बेटी श्रद्धा बिंद्रू का।

वुमन भास्कर ने जब उनसे बात की तो उस वक्त उनके घर में पिता के अंतिम संस्कार के बाद मेहमान जमा थे। कुछ देर ही सही, मगर उन्होंने हमसे बात की और कहा, "जो बात कहनी थी, वह हम कह चुके हैं। मैं मीडिया के जरिये दुनिया को बताना चाहती हूं कि कश्मीर हमारी सरजमीं है, कोई हमें यहां से बेदखल नहीं कर सकता और न ही कोई भी हमें डरा-धमकाकर हमारे हौसले को पस्त कर सकता है। हम इसी मिट्टी में पैदा हुए हैं, हमें इससे प्यार है। हमारे पिता ने भी कश्मीर के अमन और कश्मीरियत के अपनी जान दे दी।"

हमारा यकीन बंदूक नहीं, हम अमनपसंद लोग हैं
श्रद्धा ने कहा, "हम कश्मीरी पंडित अमनपसंद लोग हैं। हम बंदूक नहीं अमन की बात समझते हैं। मैंने जीरो से शुरुआत की है। कश्मीरी पंडित कभी नहीं मरेंगे। मैंने अपने पिता की बदौलत एक मुकाम हासिल किया। मैं एसोसिएट प्रोफेसर हूं और मेरे भाई डॉक्टर हैं। मेरी मां दुकान में बैठती हैं। यही मेरे पिता ने हमें बनाया है। वह एक फाइटर थे, कभी मर नहीं सकते। हम चाहते हैं कि लोग कश्मीर की खूबसूरती को अमन के साथ जानें। मेरे पिताजी साइकिल से चलते थे, मेहनत और ईमानदारी के बूते उन्होंने समाज में रुतबा हासिल किया। उन्होंने हमें तो यही सीख दी कि पढ़ाई ही हमारा सबसे मजबूत हथियार है।"

जब आतंकवाद चरम पर था, तब भी नहीं बिंद्रू ने नहीं छोड़ी घाटी
70 वर्षीय माखनलाल कश्मीरी पंडित थे और श्रीनगर के पुराने बाशिंदे थे। उन्होंने कश्मीर घाटी तब भी नहीं छोड़ी, जब नब्बे के दशक में आतंकवाद चरम पर था और आतंकवादी विशेष रूप से कश्मीरी पंडितों को निशाना बना रहे थे। उनकी दुकान पर लोग दवाइयां खरीदते रहे हैं।

इस साल अब तक 23 लोगों को आतंकियों ने बनाया निशाना, इनमें 5 कश्मीरी पंडित
आंकड़ों के मुताबिक, इस वर्ष जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने करीब 23 लोगों को अपना निशाना बनाया है। श्रीनगर में आतंकियों ने 8, कुलगाम में 5, अवंतीपोरा में 4, बारामुला व अनंतनाग में 2-2 और बडगाम व बांदीपोरा में 1-1 लोगों की हत्या की है। इनमें कम से कम 5 कश्मीरी पंडित हैं। 23 में से 17 हत्याओं को लश्कर-ए-तैयबा और उससे जुड़े स्थानीय आतंकियों ने ही अंजाम दिया है।

1990 के बाद कश्मीरी पंडित अपने ही घर में हुए बेगाने
जम्मू-कश्मीर सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, 1989 और 2004 के बीच 1400 हिंदुओं में से 219 कश्मीरी पंडितों को जान गंवानी पड़ी। हालांकि, सरकारी दावों के उलट कश्मीरी पंडितों की नुमाइंदगी करने वाले एक राजनीतिक समूह पनुन कश्मीर के मुताबिक, 1990 के बाद से 1,341 कश्मीरी पंडितों की हत्याएं हुईं। इंटरनेशनल डिस्प्लेसमेंट मॉनिटरिंग सेंटर ऑफ नॉर्वेजियन रिफ्यूजी काउंसिल के मुताबिक, 1990 के बाद से 2.5 लाख कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए। हालांकि, अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से अब तक करीब 3 लाख कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़ना पड़ा है। अभी तक इनका पुनर्वास नहीं किया जा सका है।