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सैनिटरी पैड को डीकंपोज होने में लगते हैं 500-800 साल:प्लास्टिक की स्ट्रॉ, कप-ग्लास और प्लेट बैन, दूध का पैकेट खोलें तो कॉनर अलग न करें

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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देश में आज से सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं होगा। पाबंदी के तहत स्ट्रॉ, कप-ग्लास, बाउस, कांटा-चम्मच और प्लेट समेत प्लास्टिक व थर्माकोल के कई सामान का यूज नहीं किया जा सकेगा। इसके चलते जहां पेय पदार्थ कंपनियों पर संकट मंडरा रहा है। वहीं आम आदमी और रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं की चिंता भी बढ़ गई है। क्या है सिंगल यूज प्लास्टिक और कैसे यह खतरनाक है? सरकार ने इस पर बैन क्यों लगाया है? इसके विकल्प क्या हैं? भास्कर वुमन की रिपोर्ट में पढ़िए...

पर्यावरणविद् विक्रांत तोंगड़ बताते हैं, 'प्लास्टिक पर हम इस कदर निर्भर हैं कि पीने के लिए पानी से लेकर लंच बॉक्स, दूध-दही के पैकेट, चाय-कॉफी, चिप्स, नमकीन, बिस्कुट और फल-सब्जी घर लाने तक यह हमारी दिनचर्या का हिस्सा है। इसकी वजह यह भी है कि इसे आसानी कहीं भी लाया-ले जाया जा सकता है। यह बाजार में मौजूद अन्य विकल्पों की तुलना में सस्ती, सुंदर और टिकाऊ है, जबकि इसके विकल्प जैसे कांच, कागज और लकड़ी के उत्पाद अब भी बेहद महंगे हैं। साथ ही इन्हें लाने-ले जाने के लिए भी भारी मशक्कत करनी पड़ती है।

तोगड़े कहते हैं कि प्लास्टिक का इस्तेमाल करते वक्त लोग इसके दुष्प्रभावों से अनजान बने हुए हैं। यह पर्यावरण और सेहत दोनों के लिए घातक है। हम लोगों को समझना होगा कि प्लास्टिक जहां पर्यावरण को प्रदूषित और भूजल को दूषित कर रही है। वहीं जलीय जीवों की जान ले रही है। देश में प्लास्टिक कचरे के पहाड़ बन गए हैं, जिनके आसपास रहने वालों का जीना मुहाल हो गया है। इसलिए अब इसके विकल्प तलाशने ही होंगे।'

सिंगल यूज प्लास्टिक: कौन-कौन से सामान हुए बैन?

  • ईयर बड स्टिक
  • प्लास्टिक झंडे
  • आइसक्रीम स्टिक
  • कप-ग्लास
  • कांटा-चम्मच
  • मिठाई के डिब्बे पर लगने वाली पन्नी
  • सिगरेट पैकेट रैपर
  • बलून स्टिक
  • लॉलीपॉप स्टिक
  • थर्माकोल के सजावटी सामान
  • प्लेट्स, बाउल
  • स्ट्रॉ
  • इन्विटेशन कार्ड
  • पीवीसी बैनर

(100 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक)

सिंगल यूज प्लास्टिक क्या है?
सिंगल यूज प्लास्टिक यानी ऐसे प्रोडक्ट जिनका एक बार इस्तेमाल करने के बाद फेंक दिया जाता है। इसे आसानी से डीकंपोज और रीसाइकल भी नहीं किया जा सकता है। यही वजह है कि कचरा और प्रदूषण बढ़ाने में सिंगल यूज प्लास्टिक अहम है। आज से बैन होने वाले सामान में 100 माइक्रोन से कम मोटाई के प्लास्टिक बैनर शामिल हैं। गुब्बारा, फ्लैग, कैंडी, ईयर बड्स के स्टिक और मिठाई बॉक्स में यूज होने वाली क्लिंग रैप्स भी शामिल हैं। यही नहीं केंद्र सरकार ने कहा है कि 120 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक बैग को भी 31 दिसंबर 2022 से बंद कर दिया जाएगा।

क्यों लगानी पड़ी पाबंदी?
प्रदूषण फैलाने में प्लास्टिक कचरा सबसे बड़ा कारक है। केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 2018-19 में 30.59 लाख टन और 2019-20 में 34 लाख टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा जनरेट हुआ था। प्लास्टिक न तो डीकंपोज होती है और न ही इसे जलाया जा सकता है, क्योंकि इससे जहरीला धुआं और हानिकारक गैसें निकलती हैं। ऐसे में रीसाइक्लिंग के अलावा स्टोरेज करना ही एकमात्र उपाय होता है।

प्लास्टिक अलग-अलग रास्तों से होकर नदी और समुद्र में पहुंच जाता है। प्लास्टिक सूक्ष्म कणों में टूटकर पानी में मिल जाती है, जिसे हम माइक्रोप्लास्टिक कहते हैं। ऐसे में नदी और समुद्र का पानी भी प्रदूषित हो जाता है। यही वजह है कि प्लास्टिक वस्तुओं पर बैन लगने से भारत अपने प्लास्टिक वेस्ट जेनरेशन के आंकड़े में कमी ला सकेगा।

इम्यून सिस्टम हो सकता है खराब
पीजीआई में ऑन्कोलॉजी डिपार्टमेंट की हेड डॉ. नीता राधाकृष्णन कहती हैं कि प्लास्टिक निर्माण में कई खतरनाक केमिकल का यूज होता है। जब प्लास्टिक में गरम या खट्टा पदार्थ डालते हैं तो ये कैमिकल रिलीज होते हैं। फिश खाते हैं, उससे भी शरीर में प्लास्टिक कण पहुंच जाते हैं। सीसी, कैडमियम, बीपीए और पारा जैसे जहरीले केमिकल सीधे मानव शरीर के संपर्क में आते हैं, जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी, जन्मजात विकलांगता, इम्यून सिस्टम और बच्चों का विकास प्रभावित करने के कारक बन सकते हैं।

प्लास्टिक जनित बीमारियों से कैसे बचें?

  • प्रिज्वर्ड फूड अवॉइड करें।
  • फ्रिज में कॉपर, स्टील और कांच की बोतल रखें।
  • प्लास्टिक के बर्तन में गर्म और खट्टा खाना न खाएं
  • माइक्रोवेव में प्लास्टिक के डिब्बे में खाना न गरम करें।
  • प्लास्टिक के डिब्बे, पॉलीथिन का इस्तेमाल करने से बचें।

रेहड़ी-पटरी वाले बचा सकते हैं 3000 रुपये प्रतिमाह
पर्यावरणविद् शैल माथुर कहती हैं कि सरकार के फैसले से खुश हूं, लेकिन इसका परमानेंट हल निकाला जाना चाहिए। हमारे यहां कानून तो बन जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर लागू नहीं हो पाता है। हालांकि, इस बार प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन, इंपोर्टिंग और सेलिंग सभी तरीके से बैन की जा रही है। साथ ही कानून का उल्लंघन करने पर 500 से 5000 तक के जुर्माना वसूलने का भी प्रावधान है। लोगों को पुराने तौर-तरीकों को फिर से अपनाने के लिए जागरूक करना होगा। पहले लोग घर से खाना-पानी लेकर बाहर निकलते थे। बाजार से सामान लाने के लिए भी घर से थैला लेकर जाते थे। अब खाना नहीं ले सकते, तो स्टील की प्लेट, बाउल और बोतल तो साथ रख ही सकते हैं। दूध पैकेट से लेने की जगह बूथ से जाकर ले सकते हैं। रेहड़ी-पटरी वाले पॉलीथिन न देकर महीने में करीब 3000 रुपये बचा सकते हैं।

बता दें कि शैल माथुर पिछले कई सालों से दुकान, रेहड़ी-पटरी मार्केट के विक्रेताओं को पॉलीथिन की जगह पेपर व कपड़े बैग यूज करने के लिए जागरूक कर रही हैं। वह अब तक स्थानीय बाजारों से 3000 किलोग्राम से ज्यादा पॉलीथिन इकट्ठा कर चुकी हैं। वहीं अब तक करीब 15 हजार से ज्यादा कपड़े के थैले बांट चुकी हैं।

टेट्रा पैक नहीं होता रीसाइकल
शैल माथुर कहती हैं कि सरकार को पहले वह प्लास्टिक बैन करनी चाहिए, जो रीसाइकल नहीं हो सकती है। 'प्लास्टिक हटाओ, टेट्रा पैक लाओ' जैसी मुहिम चलाई गई, लेकिन टेट्रा पैक में कई लेयर होती हैं, जो रीसाइकल नहीं हो पातीं। पानी की बोतल, दूध की थैली जैसे तमाम तरह की प्लास्टिक रीसाइकल हो सकती है, लेकिन प्लास्टिक कचरा वहां तक पहुंच नहीं पाता है। सिंगल यूज प्लास्टिक के प्रमुख स्रोत हॉस्पिटल, फूड एंड बेवरेज इंडस्ट्री, यात्रा और पर्यटन, एफएमसीजी, ई-कॉमर्स रिटेल, निकोटिन इंडस्ट्री, अल्कोहल बेवरेज इंडस्ट्री हैं। धरती को बचाने के लिए इनको आगे आना होगा।

विक्रांत तोंगड़ कहते हैं कि कानून के मुताबिक, फ्रिज, मोबाइल, कूलर, एसी समेत अन्य पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान और गैजेट्स को उनके स्टोर पर जाकर बेच सकते हैं, जहां कंपनी रीसाइकल कर लेगी। वहीं कस्टमर को खराब सामान का भी कुछ पेमेंट मिल जाएगा।

प्लास्टिक की जगह चुने ये विकल्प

  • सामान लेने जाएं तो घर थैला लेकर जाएं।
  • स्टील या कॉपर की पानी बोतल इस्तेमाल करें।
  • पैकेट बंद दूध की जगह बूथ वाला दूध अपने बर्तन में लाएं।
  • किचन में स्टील के डिब्बे यूज करें।
  • प्लास्टिक की जगह वुड से बना टूथब्रश खरीदें।
  • सरकार जगह-जगह पानी के पानी व्यवस्था करे।

पैकेट खोलें तो कॉनर अलग न करें
रिसर्चर अंजली गुप्ता का कहना है, जब भी घर में पैकेट बंद फूड, दूध, चिप्स, नमकीन, साबुन, डिटर्जेंट पाउडर या चॉकलेट लाएं तो उसे उसे फाड़े कि प्लास्टिक का टुकड़ा अलग न हो। जब भी पैकेट खोलते वक्त हम कॉर्नर काटकर अलग कर देते हैं तो फिर वह न रीसाइक्लिंग के लिए कलेक्ट हो पाता है। अगर रीसाइकल बूथ तक पहुंच भी गया, तब भी रीसाइकल नहीं हो पाता, ऐसे में उसे डंप करना पड़ता है, जोकि पर्यावरण के लिए खतरनाक है। रीचरखा और इकोकारी जैसी कई संस्थाएं हैं, जो प्लास्टिक वेस्ट को इस्तेमला कर बेस्ट प्रोडक्ट बना रही हैं तो आप उन तक भी प्लास्टिक कचरा पहुंचा सकते हैं।

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