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दीदी-दीदी करके चैंपियन बने हैं प्रज्ञानानंद:बड़ी बहन वैशाली भी शतरंज की दुनिया में मचा चुकी हैं तहलका, पहले उनसे सीखा-अब सिखाते भी हैं

नई दिल्लीएक महीने पहले
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भारत के ग्रैंडमास्टर रमेशबाबू प्रज्ञानानंद चेसेबल मास्टर्स फाइनल में पहुंच गए हैं। अब उनका सामना वर्ल्ड नंबर-2 चीन के डिंग लिरेन से होगा। प्रज्ञानानंद चेसेबल मास्टर्स के फाइनल में पहुंचने वाले पहले भारतीय बन गए हैं।

महज 12 साल की उम्र में ग्रैंडमास्टर का टाइटल हासिल करने वाले प्रज्ञानानंद ने अपने से हाई रेटिंग वाले डच ग्रैंडमास्टर अनीश गिरि को सेमीफाइनल मुकाबले में टाई ब्रेकर में 3.5-2.5 से हराया। इससे पहले चार गेम का मुकाबला 2-2 की बराबरी पर रहा था। प्रज्ञानानंद ने वर्ल्ड चैम्पियन कार्लसन को भी हराया था। रमेश बाबू बहन आर वैशाली को अपनी प्रेरणा बताते हैं।

प्रज्ञानानंद के इस समय 11वीं क्लास के एग्जाम भी चल रहे हैं। वह मैच के बाद परीक्षा देने जाते हैं।
प्रज्ञानानंद के इस समय 11वीं क्लास के एग्जाम भी चल रहे हैं। वह मैच के बाद परीक्षा देने जाते हैं।

घर के लोग भी देते हैं पूरा साथ
आर वैशाली के परिवार में शतरंज खेलना काफी पसंद किया जाता है। उनका 15 साल का भाई आर प्रज्ञानानंद दुनिया के सबसे कम उम्र के ग्रैंडमास्टर में से एक हैं। 19 साल की बड़ी बहन आर वैशाली वीमेन्स ग्रैंड मास्टर हैं। दोनों भाई बहनों ने बहुत कम उम्र से शतरंज खेलना शुरू कर दिया था। वैशाली ने अपने करियर की शुरुआत में ही साल 2012 में अंडर-11 और अंडर-13 नैशनल चैम्पियनशिप जीत कर बड़ी कामयाबी हासिल की। उसी साल उन्होंने कोलंबो में अंडर-12 श्रेणी में एशियाई चैम्पियनशिप और स्लोवेनिया में यूथ चेस चैम्पियनशिप अपने नाम की।

वैशाली ने पैसे न होने की नजह से किताबें पढ़कर ही चेस के गुर सीखे। बाद में कंप्यूटर होने से वह खेल में बाकी चीजें सीख सकीं।
वैशाली ने पैसे न होने की नजह से किताबें पढ़कर ही चेस के गुर सीखे। बाद में कंप्यूटर होने से वह खेल में बाकी चीजें सीख सकीं।

शुरुआती दौर की परेशानी
वैशाली बताती हैं कि उन्हें शुरुआत में आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा था क्योंकि ट्रेनिंग और यात्राओं की वजह से उन्हें यह खेल महंगा पड़ रहा था। ट्रेनिंग के शुरुआती दिनों में उनके पास कंप्यूटर नहीं था और वो अपनी मौलिक जानकारियों के लिए किताबों पर ही निर्भर थीं। स्लोवेनिया में 2012 में वर्ल्ड यूथ चैम्पियनशिप जीतने के बाद वैशाली को स्पॉन्सरशिप के जरिए लैपटॉप मिला।

अब भाई भी करता है बहन की मदद

इसके बाद वैशाली और उनके भाई ने स्पॉन्सर्स का ध्यान अपनी ओर खींचना शुरू किया। वैशाली कहती हैं कि उनके माता-पिता ने हमेशा उनका साथ दिया। हर टूर्नामेंट के दौरान मां और पिता साथ होते थे। वैशाली कहती हैं कि दुनिया की सबसे कम उम्र की ग्रैंड मास्टर्स में से एक बनने की वजह से भी उनके लिए चीजें बाद में आसान हुईं। दोनों भाई-बहन प्रैक्टिस के साथ-साथ रणनीति पर बातचीत करने पर बहुत वक्त एक साथ बिताते हैं। उनके भाई प्रज्ञानानंद ने कई अहम सलाह देकर कई टूर्नामेंट की तैयारियों में वैशाली की मदद की है।

महिला और पुरुष खिलाड़ियों के बीच भेदभाव
वैशाली के करियर में अहम पड़ाव उस वक्त आया जब जून 2020 में उन्होंने पूर्व विश्व चैंपियन एंटोनिटा स्टेफानोवा को FIDE chess.com वीमेन्स स्पीड चेस चैम्पियनशिप में हराया। उन्होंने इस जीत के साथ शतरंज की दुनिया में तहलका मचा दिया।

महिला खिलाड़ियों को मिलता है कम सम्मान
वैशाली कहती हैं कि लगातार मिलती कामयाबी और तारीफों की वजह से उन्हें और कड़ी मेहनत करने की प्रेरणा मिलती है। उनका मकसद अब वीमेन्स इंटरनेशनल मास्टर्स का ख़िताब हासिल करना है। उसके बाद ग्रैंड मास्टर पर उनकी नजर रहती है। वे कहती हैं कि महिला खिलाड़ियों की उपलब्धि को पुरुष खिलाड़ियों की उपलब्धि की तरह नहीं देखा जाता है। महिलाओं और पुरुषों को मिलने वाली पुरस्कार राशि में यह फर्क आप देख सकते हैं।

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