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अफगानिस्तान:तालिबान ने छीनी महिला खिलाड़ियों की आजादी, 20 साल में गंवाया खेल मैदान

नई दिल्ली7 दिन पहलेलेखक: वरुण शैलेश
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महिला आजादी पर बंदिश - Dainik Bhaskar
महिला आजादी पर बंदिश
  • तालिबान ने महिलाओं के खेलने पर लगा दी पाबंदी
  • अफगान महिलाओं में तालिबान के खिलाफ गुस्सा
  • महिलाओं ने दुनिया से लगाई सामने आने की गुहार

अफगानिस्तान की सेदिक सिद्दीकी के लिए साइकिलिंग, स्कूल जाना और मर्जी के कपड़े पहनना आजादी का दूसरा नाम है। लेकिन अब वे खुद को ठगा महसूस कर रही हैं, क्योंकि अफगान महिलाओं ने पिछले 20 वर्षों में जो कुछ भी हासिल किया था, उसे वे चंद पलों में गंवा बैठीं। 2013 से 2018 तक बामियान महिला साइकिलिंग टीम की कप्तान रहीं सेदिका सिद्दीकी कहती हैं, जब स्कूल टाइम में उन्होंने साइकिल चलाना शुरू किया था तब उन्हें अपने भाई का कुर्ता पहनना पड़ता था ताकि उन्हें कोई पहचान न ले। इसी साइकिलिंग ने एक दिन उन्हें स्कार्फ और लंबे कपड़े पहनने की जगह स्पोर्ट्स गियर पहनने की ताकत दी।

सेदिका सिद्दीकी को इस खबर से तनिक भी हैरानी नहीं हुई कि तालिबान ने महिलाओं के खेलने पर पाबंदी लगा दी है। ऑस्ट्रेलियाई ब्रॉडकॉस्टर एसबीएस के साथ एक इंटरव्यू में तालिबान के कल्चरल कमीशन के डिप्टी चीफ अहमदुल्ला वासीक ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि महिलाओं को क्रिकेट खेलने की इजाजत होगी, क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि महिलाएं क्रिकेट खेलें। क्रिकेट में, उन्हें ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, जहां उनका चेहरा और शरीर ढंका नहीं होगा। इस्लाम महिलाओं को इस तरह देखने की इजाजत नहीं देता है। यह मीडिया का युग है, और इसमें तस्वीरें और वीडियो प्रसारित होंगे, और फिर लोग इसे देखेंगे। इस्लाम और इस्लामिक अमीरात अफगानिस्तान में महिलाओं को क्रिकेट खेलने या उस तरह के खेलों को खेलने की इजाजत नहीं देते हैं, जिनमें उनके शरीर का कोई हिस्सा दिखता हो।”

अफगानिस्तान में महिलाओं के खेलने पर लगी बंदिश से 21 साल की सेदिका सिद्दीकी हैरान नहीं हैं, लेकिन वह इससे दुखी जरूर हैं। न्यूज वेबसाइट 'द लिलि' से बातचीत में वह कहती हैं, उन्होंने घर से दूर बने स्कूल जाने के लिए साइकिल सीखी थी। साइकिल चलाने से उन्हें अपने पर भरोसा करने की ताकत मिली और उन्होंने अन्य लड़कियों को भी स्पोर्ट्स में आने के लिए मोटिवेट किया। उन्होंने कई लड़कियों को साइकिल चलाना सिखाया। सेदिका सिद्दीकी बताती हैं, जब उन्होंने पहली बार साइकिल चलाना और अन्य लड़कियों को इसे सिखाना शुरू किया तो कई पुरुष उन पर पत्थर मारते या उस दौरान उनके हाथ में जो भी होता, उसे दे मारते। मगर पिछले साल, जब वह घर पर थीं तो उन्होंने देखा कि लड़कियां साइकिल चलाने में पूरी तरह कम्फर्ट फील कर रही हैं, और आम लोगों ने भी लड़कियों की साइकिलिंग को एक्सेप्ट कर लिया है। वह बताती हैं कि जब उन्होंने काबुल में राष्ट्रीय स्तर की रेस जीती और वापस घर लौटीं तो उनके समुदाय के लोगों ने फूल माला से उनका स्वागत किया और उनकी जीत का जश्न मनाया। लेकिन अब वह निराशा से घिरी हैं, उन्हें आशंका है कि अब सब कुछ 20 साल पहले की तरह हो जाएगा।

हायर स्टडीज के लिए भारत में रह रहीं सेदिका सिद्दीकी अकेली लड़की नहीं हैं जो यह महसूस कर रही हैं कि पिछले 20 वर्षों में हासिल आजादी चंद दिनों में छीन ली गई। अफगान महिला राष्ट्रीय फ़ुटबॉल टीम की पूर्व गोलकीपर विदा जेमराई, अफगान फुटबॉल टीम की पूर्व खिलाड़ी मरियम रुहिन जैसी कई महिला खिलाड़ी हैं जो तालिबान की वादाखिलाफी से निराश हैं। तालिबान ने महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने की बात कही थी लेकिन उनके कैबिनेट में कोई महिला नहीं है।

वादे से मुकरा तालिबान

असल में, अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से सबसे ज्यादा महिलाएं प्रभावित हुई हैं। 1996 से 2001 तक अपने पहले क्रूर और दमनकारी शासन के लिए कुख्यात तालिबान ने इस बार ऐसी सरकार बनाने का वादा किया था, जिसमें महिलाओं सहित समाज के सभी तबकों का प्रतिनिधित्व हो। फिलहाल, सरकार के सभी टॉप पदों पर तालिबान और हक्कानी नेटवर्क के प्रमुख नेता पैबस्त हो चुके हैं, और महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने का वादा झूठ का पुलिंदा बनकर रह गया है। काबुल पर काबिज होने के साथ महिलाओं की आजादी को लेकर तालिबान के मंसूबे जगजाहिर होने लगे हैं।

तालिबान का पुराना शासन रहा है खौफनाक

तालिबान ने 1996 से 2001 के अपने शासन के दौरान सभी खेलों, संगीत कार्यक्रमों, फोटोग्राफी, टेलीविजन और सांकृतिक कार्यक्रमों पर प्रतिबंध लगा दिया था। लड़कियों को पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं था। महिलाओं को घर से बाहर काम करने, खेलने या पुरुष के साथ के बगैर घर से बाहर निकलने की मनाही थी। अफगान महिलाओं के लिए 2001 तक खेल गतिविधियों में शामिल होने की सख्त मनाही थी, और जिन्होंने उस दौरान खेलने की कोशिश की, उन्हें अपनी जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी।

अफगानिस्तान में 752 महिला नेशनल खिलाड़ी हैं

मगर 2001 में अफगानिस्तान में अमेरिकी हमले और तालिबान शासन के खात्मे के बाद नई शासन व्यवस्था में महिलाओं को धीरे-धीरे अधिकार दिए जाने लगे और महिलाओं ने इंटरनेशनल लेवल तक के आयोजनों में हिस्सा लिया। अफगानिस्तान एनालिस्ट्स नेटवर्क (एएएन) के रिसर्चर रोहुल्लाह सोरौश बताते हैं कि खेल में शामिल अफ़ग़ान महिलाएं और लड़कियां, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलाव की प्रतीक बन गई हैं। marca.com से बातचीत में वह कहते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि खेल उन क्षेत्रों में से एक है, जिसमें पिछले एक दशक के दौरान अफगान महिलाओं ने बेहतरीन प्रदर्शन किया है। अफगानिस्तान के फिजिकल एजुकेशन और खेल महानिदेशालय के अनुसार, ओलंपिक और गैर-ओलंपिक खेलों के लिए नेशनल टीम के 3,662 सदस्यों में से 752 महिलाएं हैं, जो कि लगभग 21% हैं। काबुल और हेरात जैसे प्रमुख शहरों में लड़कियां और महिलाएं स्थानीय क्लबों में शामिल होती हैं, जिम जाती हैं या कमोबेश बड़े समूहों में मोबाइल फोन की मदद से ट्रेनिंग भी लेती हैं। लेकिन धमकी और हमले जैसी घटनाएं अब महिला एथलीटों को हतोत्साहित करेंगी या परिजन ही लड़कियों को खेलने से मना करने लगेंगे।

महिला खिलाड़ी को मिल रही धमकी

काबुल पर तालिबान के कब्जा होने का नतीजा रहा कि ताइक्वांडो एथलीट जकिया खुदादादी टोक्यो 2020 पैरालिंपिक में अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली महिला बनकर इतिहास रचने से वंचित हो गईं। अफगान पैरालिंपिक प्रतिनिधिमंडल की चीफ एरियन सादिकी ने दुनियाभर से अफगानिस्तान की महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए आगे आने का आह्वान किया है। इस साल ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में अफगानिस्तान का झंडा लहराया गया था और एथलीट किमिया यूसेफी ने एक मार्मिक संदेश भी दिया था। टोक्यो 2020 ओलंपिक में अफगानिस्तान का झंडा लेकर चलने वालीं किमिया यूसेफी ने कहा था कि शायद ओलंपिक में अपने देश का झंडा लेकर चलने वालीं वो पहली और आखिरी महिला खिलाड़ी होंगी। उन्होंने अफगान लड़कियों की सुरक्षा की गुहार लगाई। अफगानिस्तान में क्रिकेट के साथ फुटबॉल काफी लोकप्रिय है। लेकिन महिला फुटबॉल का भविष्य संकट में है। 2007 में पहली अफगान महिला राष्ट्रीय टीम बनाने वालीं खालिदा पोपल को जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं। वह 2016 से डेनमार्क में शरणार्थी हैं।

अफगानिस्तान में कौन-कौन से होते हैं खेल

अफगानिस्तान के दो सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट और फुटबॉल हैं। अफगानिस्तान का जियोग्राफिकल एनवॉयरमेंट भी खेलों के अनुकूल है। लेकिन अफगान लोगों का पारंपरिक खेल बुजकशी कहलाता है। अगर आपने हॉलीवुड फिल्म रैम्बो देखी है तो अभिनेता सिल्वेस्टर स्टलोन को अफगान लड़ाकों के साथ बुजकशी खेलते हुए देखा होगा। इसे घोड़े पर सवार पुरुष खेलते हैं। अफगानिस्तान में मुक्केबाजी, बास्केटबॉल और ताइक्वांडो जैसे अन्य खेल भी हैं। लेकिन फुटबॉल ऐसा खेल है जिसमें अफगान बेहतर प्रदर्शन करते हैं। तालिबान के शासन में खेल पर हमेशा ही पाबंदी रही है। लेकिन अमेरिकी समर्थित शासन में अफगानिस्तान में खेल फिर से लोकप्रिय हो गया था। तालिबान के फिर कब्जे से महिलाओं के खेलों में शामिल होने पर बंदिश लग चुकी है। अफगान लोगों के पास फुटबॉल मैच के लिए सिर्फ काबुल का गाजी स्टेडियम है। इसे 1912 में राजा अमानुल्लाह खान के शासनकाल के दौरान बनाया गया था, और 2011 में इसका पुनर्निर्माण किया गया। हालांकि, काबुल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तालिबान के प्रवक्ता ने भरोसा दिलाया था कि महिलाओं के अधिकारों का सम्मान किया जाएगा, लेकिन यह सब "इस्लामी कानून के तहत होगा। उन्होंने यह भी कहा था कि महिलाओं को हर समय हिजाब पहनना चाहिए।