• Hindi News
  • Women
  • The Air Becomes Poisonous, Hormones Will Tell How Old Age Will Be

बाल से 100 गुना बारीक कण से मरे 15 लाख:हवा हुई जहरीली, हॉर्मोन बताएगा बुढ़ापा कैसा होगा

नई दिल्ली20 दिन पहले
  • कॉपी लिंक

नमस्कार,

आज हम आपके और आपके परिवार की सेहत का ध्यान रखते हुए ‘वीकली हेल्थ ब्रीफ’ लेकर आए हैं। इसमें आपको देश और दुनिया की हेल्थ अपडेट्स, महत्वपूर्ण रिसर्च से जुड़े आंकड़े और डॉक्टरों की रेलेवेंट सलाह मिलेंगी। महज 2 मिनट में पढ़कर ही आपको सेहत से जुड़ी हफ्ते भर की जरूरी जानकारियां मिलेंगी और आप परिवार का बेहतर ख्याल रख पाएंगी।

हॉर्मोन बताएगा आप बुढ़ापे में बीमार होंगे या नहीं

आपकी सेहत बुढ़ापे में कैसी रहेगी, इसका पता लगाना अब आसान हो गया है। ब्रिटेन की नाटिंघम यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में बताया गया है कि बुढ़ापे में सेहत कैसी रहेगा, इसका अंदाजा लगाना मुमकिन है।

शोध के मुताबिक ब्लड में पाया जाने वाला एक नया इंसुलिन-पेप्टाइड 3 (आइएनएलएस 3) नाम का एक हाॅर्मोन है। जिससे हम बुढ़ापे की सेहत के राज का पता लगा सकते हैं। अध्ययन में यूरोपियन मेल एजिंग स्टडी के डेटा की मदद ली गई। ब्रिटेन समेत यूरोप के 40 से 79 वर्ष की उम्र के 3,369 पुरुषों पर 5 साल तक सर्वे किया गया।

ब्लड में पाये जाने वाले एक नये इंसुलिन-पेप्टाइड 3 (आइएनएलएस 3) नाम के हॉर्मोन से बुढ़ापे की सेहत के राज का पता लगा सकते हैं।
ब्लड में पाये जाने वाले एक नये इंसुलिन-पेप्टाइड 3 (आइएनएलएस 3) नाम के हॉर्मोन से बुढ़ापे की सेहत के राज का पता लगा सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने बताया कि शुरुआत और अंत में लिए गए ब्लड सैंपल में इंसुलिन-पेप्टाइड 3 के लेवल में खास संबंध हैं। इस हॉर्मोन की तुलना टेस्टोस्टेराॅन जैसे हाॅर्मोंस से की गई। इसमें उम्र, स्मोकिंग और क्लीनिकल मापदंडों का ध्यान रखा गया।

अध्ययन में पाया कि इस हॉर्मोन का स्तर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में अलग होता है। उनका संबंध बढ़ती उम्र के साथ कार्डियोवस्कुलर डिजीज, डायबिटीज, यौन शक्ति में कमी और हड्डियों की कमजोरी से है। जिन पुरुषों में आइएनएलएस 3 का स्तर ज्यादा था, उसके बीमार होने की आशंका कम थी। जबकि जिनमें आइएनएलएस 3 का स्तर कम था, उनमें बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियां होने का डर अधिक था।

रात में ज्यादा देर तक बल्ब या ट्यूबलाइट की रोशनी में रहने से डायबिटीज का खतरा

अगर आप रात में ज्यादा देर तक ट्यूबलाइट, बल्ब या ऐसी ही किसी इलेक्ट्रिक लाइट में रहेंगे तो डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाएगा। यह बात यूरोपियन एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ डायबिटीज के जर्नल डायबेटोलोजिया में प्रकाशित हुई है।

एक शोध के मुताबिक आप रात में ज्यादा देर तक ट्यूबलाइट, बल्ब या ऐसी ही किसी इलेक्ट्रिक लाइट में रहेंगे तो डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाएगा।
एक शोध के मुताबिक आप रात में ज्यादा देर तक ट्यूबलाइट, बल्ब या ऐसी ही किसी इलेक्ट्रिक लाइट में रहेंगे तो डायबिटीज होने का खतरा बढ़ जाएगा।

डॉ. यू जू और उनके सहयोगियों ने अध्ययन में पाया कि रात में आर्टिफीशियल रोशनी (लैन) ब्लड शुगर और डायबिटीज के खतरे जुड़ा है। अध्ययन में अनुमान लगाया गया कि चीन में ट्यूबलाइट, बल्ब जैसी रोशनी में रहने वाले 90 लाख से अधिक लोगों में डायबिटीज का खतरा ज्यादा पाया गया।

इसके लिए चीन में करीब 1 एक लाख पुरुषों और महिलाओं पर सर्वे किया गया। जो अंधेरा होने पर आर्टिफिशियल रोशनी के संपर्क में आते थे। ऐसे लोगों में डायबिटीज होने की आशंका 28 प्रतिशत अधिक थी।

रोज ग्रीन टी पीते हैं तो अल्जाइमर से बचे रहेंगे, दिल भी रहेगा दुरुस्त

रोज ग्रीन टी और कभी-कभी एक गिलास रेड वाइन पीने से ब्रेन की न्यूरल सेल्स में प्लेक्स यानी एक तरह की गांठ नहीं बनती हैं। इससे अल्जाइमर के मरीजों को फायदा मिलता है। यह शोध अमेरिका में टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स ने किया, जो ‘फ्री रेडिकल बायोलॉजी एंड मेडिसिन’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

नियमित रूप से ग्रीन टी पीने से ब्रेन में गांठें नहीं बनेंगी, साथ ही वजन घटाने में मदद मिलेगी। डायबिटीज, दिल की बीमारी और कैंसर सहित कई बीमारियों का खतरा कम भी होता है।
नियमित रूप से ग्रीन टी पीने से ब्रेन में गांठें नहीं बनेंगी, साथ ही वजन घटाने में मदद मिलेगी। डायबिटीज, दिल की बीमारी और कैंसर सहित कई बीमारियों का खतरा कम भी होता है।

रिसर्चर्स ने ग्रीन टी, रेड वाइन और खानपान की दूसरी चीजों में पाए जाने वाले दो कंपाउंड का पता लगाया, जिसे कैटेचिंस और रिसवेराट्रॉल कहा जाता है। ये दोनों कंपाउंड बिना किसी साइड इफेक्ट के न्यूरल सेल्स में गांठें नहीं बनने देते।

रिसर्चरों ने अल्जाइमर से जुड़े ऐसे 21 कंपाउंड की जांच की। इन कंपाउंड्स को सख्त बीटा एमाइलॉयड प्लेक्स यानी गांठों की बढ़ोतरी पर परखा गया। ये प्लेक्स अल्जाइमार पीड़ितों के ब्रेन सेल्स में बनते हैं।

अध्ययन के प्रमुख डॉ. डाना केर्न्स का कहना है कि नियमित रूप से ग्रीन टी पीने से ब्रेन में गांठें नहीं बनेंगी, साथ ही वजन घटाने में मदद मिलेगी। डायबिटीज, दिल की बीमारी और कैंसर सहित कई बीमारियों का खतरा कम भी होता है। रिसर्चरों ने बताया कि हल्दी में पाया जाने वाला करक्यूमिन कंपाउंड ने भी गांठ बनने से रोकने का काम किया।

कैंसर, डायबिटीज जैसी जानलेवा बीमारियों की 384 दवाएं होंगी सस्ती

कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए अच्छी खबर है। केंद्र सरकार ने हार्ट डिजीज, कैंसर, डायबिटीज, न्यूरोलॉजिकल और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं की कीमत कम करने का आदेश दिया है।

इन जरूरी 384 दवाओं को राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (एनएलईएम) में शामिल किया गया है। केंद्र सरकार ने 384 जीवनरक्षक दवाओं की कीमत कम करने के आदेश दिए हैं।

सरकार ने 12 नवंबर को कहा कि सभी सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों को इन दवाओं का स्टॉक रखना आवश्यक है। इससे अस्पताल में इलाज कराने वाले रोगियों को मुफ्त में ये दवाएं मिल सकेंगी।

इनमें आंख, कैंसर, दर्दनिवारक, गठिया के इलाज की दवाएं और एनिस्थीसिया यानी सर्जरी के दौरान दी जाने वाली बेहोशी की दवाएं, न्यूरोलॉजिकल डिजीज और दिल की बीमारियों से जुड़ी दवाओं को शामिल किया है।

नशे की लत छुड़वाने वाली दवाएं जैसे बुप्रेनोरफिन, निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी, हृदय रोगों व स्ट्रोक में काम आने वाली डाबिगाट्रान और इंजेक्शन टेनेक्टे प्लस को भी शामिल किया गया।

इंसान के बाल से 100 गुना बारीक पॉल्यूशन पार्टिकल, हर साल 15 लाख लोगों की ले रहा जान

एक रिसर्च में पॉल्यूशन के छोटे-छोटे पार्टिकल के बारे में हैरान करने वाली नई जानकारी सामने आई है। जिन्हें पीएम 2.5 कहा जाता है। ये पार्टिकल ज्यादा घातक हैं। जिससे दुनियाभर में हर साल 15 लाख से ज्यादा मौतें हो रही हैं।

छोटे-छोटे पार्टिकल ज्यादा घातक हैं, इनसे दुनियाभर में हर साल 15 लाख से ज्यादा मौतें हो रही हैं।
छोटे-छोटे पार्टिकल ज्यादा घातक हैं, इनसे दुनियाभर में हर साल 15 लाख से ज्यादा मौतें हो रही हैं।

हवा में कई तरह के पार्टिकल्स यानी कण पाए जाते हैं। इन पार्टिकल्स में पीएम 10 की मात्रा अधिक होती है, जिनका व्यास 10 माइक्रोन से कम होता है। जबकि पीएम 2.5 का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से कम होता है। पीएम 2.5 के कण बेहद बारीक होते हैं। ये इंसान के बालों से 25 से 100 गुना बारीक होते हैं।

रिसर्चर्स ने कनाडा के पिछले 25 वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें कनाडा के 70 लाख लोगों की सेहत और मृत्यु दर के आंकड़े शामिल हैं। रिसर्च में पाया गया कि हवा में PM2.5 का स्तर पिछले 25 सालों में बना हुआ है।

कनाडा को रिसर्च के लिए इसलिए चुना गया क्योंकि वो ऐसा देश है जहां पीएम2.5 का स्तर बेहद कम रहता है। रिसर्च में यह जांच की गई की PM2.5 स्तर के घटने-बढ़ने का मृत्युदर पर क्या असर पड़ता है।यह अध्ययन साइंस एडवांसेज जर्नल में प्रकाशित हुआ है। इसके मुताबिक पीएम2.5 से जान गंवाने वालों की संख्या पहले के मुकाबले बढ़ी है।

आप इस हेल्थ ब्रीफ को शेयर भी कर सकती हैं…