• Hindi News
  • Women
  • The Corporate World Is Also Aware Of The Parenting Skills Of The Employees, This Learning Will Save The Child From Becoming A Criminal.

कॉन्शियस पेरेंटिंग:कॉर्पोरेट जगत भी इम्प्लॉइज की पेरेंटिंग स्किल को लेकर सजग, बच्चे को क्रिमिनल बनने से बचाएगी यह लर्निंग

नई दिल्ली6 दिन पहलेलेखक: निशा सिन्हा
  • कॉपी लिंक
  • बड़ी कंपिनयां करा रही हैं इस तरह की पेरेंटिंग वर्कशॉप
  • वर्कशॉप में अपनी गलतियों पर रो पड़ते हैं पेरेंट्स
  • स्वाति सिन्हा है भारत में कोष वेलनेस की तीन कोच में से एक

साल 2020 में वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने बच्चों की साइकोलॉजिकल हेल्थ को लेकर अध्ययन किया। इस अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि लॉकडाउन के दौरान पेरेंट्स पर अपने काम के साथ-साथ बच्चों की स्टडी और देखभाल का एक्स्ट्रा प्रेशर आया।

कोविड के दाैरान नौकरी चले जाने, सैलेरी कट होने और प्रियजनों को खो देने का बुरा असर पेरेंट्स और बच्चों दोनों पर पड़ा। इन स्थितियों ने कॉन्शियस पेरेंटिंग कोच स्वाति सिन्हा और प्रिया धरोद को पेरेंटिंग समस्याओं को समझने और उनका हल तलाशने के लिए इंस्पायर किया। इसी जरूरत को समझते हुए दोनाें ने ‘कोष वेलनेस’ की नींव रखी, जो न्यू स्टाइल पेरेंटिंग पर जोर देती है।

जबरदस्ती खिलाना यानी ट्रेडिशनल पेरेंटिंग
जबरदस्ती खिलाना यानी ट्रेडिशनल पेरेंटिंग

न्यू स्टाइल पेरेंटिंग के तौर-तरीके
कई बार सुनते हैं कि पॉलिटिशियन के बेटे ने मर्डर कर दिया, कभी सुनते हैं कि फिल्मस्टार के बेटे ने किसी पर कार चढ़ा दी। साइकोलॉजिस्ट ऐसे मामलों के लिए ‘फॉल्टी पेरेंटिंग’ यानी गलत परवरिश को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके अनुसार ऐसे बच्चों को बचपन में ही यह पता चल जाता है कि अगर उनसे गलती हुई, तो भी पेरेंट्स उनका साथ नहीं छोड़ेगे। कुछ पेरेंट्स स्कूल में टीचर के सामने बच्चे की गलतियों पर पर्दा डालकर उनको बचाते हैं। पेरेंट्स के बार-बार ऐसा करने से बच्चों में गलती को लेकर एक गलत आत्मविश्वास बन जाता है। कॉन्शियस पेरेंटिंग ऐसे ही परेशानियों को सुलझाने में माता-पिता की मदद करती है। साथ ही बच्चों को इंटेलिजेंट बनाने के नए तरीके सिखाती है।

कोविड ने बढ़ाया पेरेंट्स पर प्रेशर
कोविड ने बढ़ाया पेरेंट्स पर प्रेशर

ट्रेडिशनल पेरेंटिंग को क्या बाय कहने का वक्त आ गया है?
एक कंपनी के 100 से भी अधिक कर्मचारियों को कॉन्शियस पेरेंटिंग के नुस्खे बताए जा रहे थे। कॉन्शियस पेरेंटिंग कोच ने एक मां से पूछा, “आपका बच्चा जब लगातार कई घंटों तक पढ़ता है, तो आप क्या करती हैं।” मां का जवाब था, “किताब-कॉपी बंद करके आराम करने को कहती हूं।” इस पर वहां मौजूद कोच ने इसे गलत ठहराया और इस तरीके को ट्रेडिशनल पेरेंटिंग की टेक्नीक बताया।

माइंड योर इमोशन्स की राइटर प्रिया धरोद कहती हैं कि जब बच्चा मन लगाकर घंटों पढ़ रहा है, इसका मतलब है कि स्टडी में उसका मन लग रहा है। इस काम में उसे थकान महसूस नहीं हो रही है। घंटों किताबों में डूब रहने के बावजूद वह ऊब नहीं रहा है। नई पेरेंटिंग स्किल के अनुसार ऐसी स्थिति में उसे टोकने से वह हतोत्साहित होगा। ऐसे मेहनती या अपने लक्ष्य के प्रति सचेत बच्चों के लिए ‘बेचारा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना भी गलत है। इस तरह के शब्द बच्चे को अहसास कराते हैं कि वह बहुत ज्यादा मेहनत कर रहा है, वह बोझ से दबा जा रहा है जबकि वह खुशी से पढ़ाई को एंजॉय कर रहा है, तो उसे दया का पात्र न बनाएं। उसकी मेहनत की तारीफ करें, उसे प्रोत्साहित करें और जब पढ़ कर उठे, तो उसकी पीठ थपथपाएं।

मोबाइल छुड़ाना चाहते हैं, तो न्यू पेरेंटिंग टेक्नीक अपनाएं
मोबाइल छुड़ाना चाहते हैं, तो न्यू पेरेंटिंग टेक्नीक अपनाएं

माइंडफुल पेरेंटिंग है कॉन्शियस पेरेंटिंग
ट्रेडिशनल पेरेंटिंग में पेरेंट्स अपनी सोच को बच्चे पर थोपते हैं। कई मांएं अपने बच्चे को जबरदस्ती खाना यह सोचकर खिलाती हैं कि उसे न्यूट्रिशन मिलेगा जबकि बच्चे का मन नहीं होता। बच्चे को भूख लगी है या नहीं, उसकी इच्छा खाने की है या नहीं, यह जानने की कोशिश नहीं की जाती। कॉन्शियस पेरेंटिंग कहती है कि बच्चे की इच्छा होगी, तो वह खुद मां से खाना मांगेगा।

कॉर्पोरेट जगत के पेरेंट्स को समझाई जा रही लालन-पालन की यह स्किल
कॉर्पोरेट जगत के पेरेंट्स को समझाई जा रही लालन-पालन की यह स्किल

ट्रेडिशनल पेरेंटिंग में लोचा कहां?
साइकोलॉजिस्ट प्रिया धरोद का कहना है कि कोई बच्चा बहुत देर से मोबाइल देख रहा है, तो ट्रेडिशनल पेरेंट्स गुस्सा करेंगे और सजा के तौर पर उससे मोबाइल छीन लेंगे, लेकिन कुछ घंटे बाद फिर वही शुरू हो जाता है। यहां पेरेंट्स से दो गलतियां होती हैं, पहली- मोबाइल छीनकर वह छीनने या जोर-जबरदस्ती करने का गलत संदेश देते हैं। जिससे भविष्य में बच्चे भी ऐसा करेंगे। दूसरी- पेरेंट्स इस बात को समझने की कोशिश नहीं करते कि बच्चा मोबाइल क्या और क्यों देख रहा है?

पेरेंट्स को टीचर को समझने की जरूरत
पेरेंट्स को टीचर को समझने की जरूरत

कॉन्शियस पेरेंटिंग कोच स्वाति सिन्हा के अनुसार, “माइंडफुल पेरेंटिग कहती है कि पेरेंट़स को सोचना चाहिए कि बच्चा बार-बार मोबाइल क्यों उठा रहा है। बच्चा मोबाइल के साथ समय इसलिए बिता रहा है क्योंकि पेरेंट्स बच्चे के कामों में रुचि नहीं ले रहे, उनकी जरूरतों को नहीं समझ रहे, उन्हें समय नहीं दे रहे हैं।

माइंडफुल पेरेंटिंग कहती हैं कि बच्चे को मोबाइल से दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है कि पेरेंट्स उनकी रुचियों के विषयों पर बातचीत करें। अगर वह क्रिकेट का शौकीन है, तो आप भी क्रिकेट के बारे में बातें करें। खेल डिस्कस करें। जरूरत पड़ने पर थोड़ी जानकारियां इकट्‌ठा करके उससे शेअर करें। पेरेंट्स खुद कम बोलें और बच्चे की बात ज्यादा सुनें। बच्चे को बोलने का मौका दें।

पापा अभी भी पुराने मोड में
पापा अभी भी पुराने मोड में

कॉर्पोरेट के सोचने का भी नजरिया बदला
कुछ कॉर्पोरेट कंपनियां इम्प्लाॅइज को अपने परिवार के साथ पिकनिक मनाने के लिए छुट्‌टी देती हैं, खास मौकों पर पार्टियां करती हैं, जिसमें परिवार भी शामिल होते हैं, लेकिन अब इसमें बदलाव आया है। कोच प्रिया धरोद बताती हैं कि अब कंपनियां इम्प्लाॅइज के बच्चे पर फोकस कर रही हैं। उन्हें पता है कि पेरेंट्स के लिए बच्चे सबसे ज्यादा अहमियत रखते हैं। प्रिया और स्वाति दोनों कई जानी-मानी मल्टीनेशनल और आईटी कंपनियों में कॉन्शियस​​​ पेरेंटिंग स्किल्स की वर्कशॉप करती हैं।

पॉजिटिव बदलाव की ओर
पॉजिटिव बदलाव की ओर

बदलाव का वक्त आया
ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों के लिए वही पेरेंटिंग रूल्स बनाते हैं, जो बचपन में उन पर लागू किए गए थे। कॉन्शियस पेरेंटिंग के अनुसार दोनों जेनरेशन के बैकग्राउंड में बहुत अंतर आ चुका है इसलिए पेरेंटिंग स्किल्स का वक्त के साथ बदलना जरूरी है। पेरेंट्स को न्यू पेरेंटिंग स्किल्स को समझने की जरूरत है।