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जब पहली बार देश में बदला रेप का कानून:न्याय के रक्षकों ने भक्षक बन पुलिसथाने में छीनी 16 साल की लड़की की आबरू, देशभर में छिड़ा आंदोलन

नई दिल्ली3 महीने पहलेलेखक: सुनाक्षी गुप्ता
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16 साल की लड़की प्यार में पड़ती है। लड़की का भाई पुलिस थाने पहुंचता है। लड़की को पूछताछ के लिए थाने बुलाया जाता है। जहां उसका दो पुलिसवाले रेप करते हैं। वह भी तब जब लड़की के परिवारवाले थाने के बाहर खड़े होते हैं। लड़की मामले को कोर्ट तक ले जाती है। निचली अदालत से इंसाफ न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है।

कोर्ट लड़की के ही चरित्र को सवालों के घेरे में रख देता है। उच्चतम न्यायलय में कहा जाता है कि लड़की वर्जिन नहीं है, उसे तो सेक्स की आदत थी इसलिए भला उसका रेप कैसे हो सकता है। यह कहानी है उस लड़की की जिसे मीडिया ने ‘मथुरा’ नाम दिया। जिसे इंसाफ दिलाने के लिए महिलाएं सड़कों पर निकल आईं। आंदोलन का इतना असर हुआ कि रेप संबंधी कानून में बदलाव करने पड़े। पढ़िए महाराष्ट्र के चर्चित मथुरा रेप केस की पूरी कहानी...

आइए पहले मथुरा रेप केस का पूरा घटनाक्रम बताते हैं
बात है साल 1970 में महाराष्ट्र के गढ़चिरोली जिले की। लड़की के माता-पिता नहीं थे तो भाइयों ने ही पाला। स्कूल जाने का उसे कभी मौका नहीं मिला। पेट पालने के लिए भाई मजदूरी करते थे। मथुरा भी जब 14 वर्ष की हुई तो लोगों के घरों में काम करने लगी। काम करने नुशी नाम की एक महिला के साथ जाती थी। नुशी का भांजा था अशोक। मथुरा की अशोक से दोस्ती हुई और दोनों में प्यार हो गया। शादी कर जिंदगी भर साथ रहने का फैसला लिया, मगर बीच में आ गए मथुरा के भाई। उन्हें यह रिश्ता मंजूर नहीं था।

भाइयों के खिलाफ जाकर मथुरा ने अशोक साथ रहने लगे। भाइयों को पता लगा तो उन्होंने अशोक और उसके परिवार के खिलाफ पुलिस में बहन के अपहरण की शिकायत दर्ज कराई। 26 मार्च 1972 को पुलिस ने मथुरा और अशोक को ढूंढ निकाला। परिवार समेत उन्हें पूछताछ के लिए देसाईगंज पुलिस थाने लेकर आए। पूछताछ के बाद अशोक और उसके परिवार को घर भेज दिया गया, मगर मथुरा को देर रात थाने में रुकने को कहा गया। अशोक और उसके परिवार ने आवाज उठाई लेकिन उनकी एक न चली।

उस वक्त थाने में हवलदार तुकाराम और गणपत की ड्यूटी लगी थी। दोनों ही शराब के नशे में धुत्त थे। दोनों ने थाने को अंदर से बंद किया। मथुरा को जमीन पर धक्का मारकर गिराया। पहले गणपत ने मथुरा का रेप किया। फिर तुकाराम ने भी यही करने की कोशिश की मगर शराब के नशे में धुत्त होने के कारण वह इसमें कामयाब नहीं हो सका।

मथुरा रेप केस को लेकर देश में आंदोलन उठ खड़ा हुआ। हर कोने से संसद के बाहर धरना-प्रदर्शन करने महिलाएं पहुंची थीं।
मथुरा रेप केस को लेकर देश में आंदोलन उठ खड़ा हुआ। हर कोने से संसद के बाहर धरना-प्रदर्शन करने महिलाएं पहुंची थीं।

यह पूरी घटना चलती रही और मथुरा के भाई और अशोक का परिवार थाने के बाहर उसकी राह देखता रहा। थाने की लाइट बंद हुई तो परिवार को शक हुआ। लेकिन पुलिस माई-बाप थी और पीड़ित कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाए। थोड़ी देर में परिवार के अन्य रिश्तेदार और जान-पहचान के लोग भी थाने के बाहर इकट्ठे हुए।

उन्होंने मथुरा का नाम पुकारना शुरू किया लेकिन काफी देर तक अंदर से कोई जवाब नहीं मिला। थाने का फाटक खुलवाने के लिए शोर मचाया, दरवाजा खटखटाया मगर कोई निकलकर बाहर नहीं आया। अंत में जब भीड़ ने थाने में आग लगाने की धमकी दी तब जाकर थाने के दरवाजे खोले गए। गेट खुलते ही मथुरा भागते हुए बाहर आई और भीड़ में मौजूद अपने परिवारवालों के पास पहुंची, उन्हें आपबीती सुनाई। इतना सुनने के बाद थाने के बाहर हंगामा खड़ा हो गया। दबाव में आकर पुलिस ने बड़ी मुश्किल से मथुरा की शिकायत पर पंचनामा लिखा। मगर संघर्ष वहीं खत्म नहीं हुआ।

रेप के बाद जो हुआ वो शर्मनाक था
गरीब परिवार की पीड़िता मथुरा वकीलों की फीस देने में सक्षम नहीं थी। तब पुणे की एक युवा महिला वकील डॉ. वसुधा धगमवार ने बिना फीस के मथुरा का केस लड़ने का फैसला किया। इसके बाद शुरू हुई इंसाफ की लड़ाई। पहले सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में लंबी लड़ाई लड़ी। जहां अदालतों में फैसलों और दलीलों ने रेप पीड़िता के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया। उसे कोर्ट में शर्मसार किया गया।

महाराष्ट्र के इसी देसाईगंज पुलिसथाने में मथुरा का साल 1972 में रेप हुआ था। बाद में इस प्रॉपर्टी को एक परिवार ने खरीदकर मकान बनाया।
महाराष्ट्र के इसी देसाईगंज पुलिसथाने में मथुरा का साल 1972 में रेप हुआ था। बाद में इस प्रॉपर्टी को एक परिवार ने खरीदकर मकान बनाया।

अब बताते हैं आखिर कोर्ट-कोर्ट कैसे घूमता रहा मथुरा का केस...

सेशन कोर्ट ने कहा था-सब कुछ मथुरा की मर्जी से हुआ है, यह रेप नहीं है

1 जून 1974 घटना के दो साल बाद पहली बार सेशन कोर्ट में मथुरा के केस पर सुनवाई हुई। दोनों आरोपी पुलिसकर्मियों को कोर्ट ने न सिर्फ बरी किया। बल्कि इस घटना का पूरा ठीकरा मथुरा के सिर पर ही फोड़ दिया गया। यहां तक कि कहा गया कि सबकुछ मथुरा की मर्जी से हुआ है, यह रेप नहीं है।

हाईकोर्ट-'डर के चलते औरत अपना शरीर सरेंडर कर दे, इसका मतलब यह नहीं कि उसने सहमति दे दी है'

मामला बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के पास पहुंचा। हाईकोर्ट ने सेशन कोर्ट के फैसले को पलट दिया और दोनों आरोपियों को एक धारा में पांच और एक दूसरी धारा में एक साल की सजा सुनाई। नागपुर बेंच ने अपने फैसले में कहा कि 'डर के मारे कोई औरत अपना शरीर सरेंडर कर दे, इसका मतलब यह नहीं कि उसने सहमति दे दी है।'

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब खत्म हो गई थी न्याय की उम्मीद

साल 1979 सितंबर में तुकाराम v/s स्टेट ऑफ महाराष्ट्र केस में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने अपना फैसला सुनाया। इस केस में जस्टिस जसवंत सिंह, जस्टिस कैलाशम और जस्टिस कौशल ने सुनवाई की। दोनों तरफ की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने जो फैसला सुनाया वह और भी हैरान करने वाला था। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आरोपियों को एक बार फिर बरी कर दिया। उस दौरान अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा-

  • मथुरा रेप के दौरान चुप रही, उसने किसी भी तरह की आवाज कर विरोध नहीं जताया।
  • मथुरा के शरीर पर कोई निशान नहीं थे। यानी उसने किसी भी तरह का शारीरिक प्रतिरोध नहीं किया।
  • मथुरा वर्जिन नहीं है, यानी उसने शादी से पहले भी सेक्शुअल इंटरकोर्स किया है। इसका मतलब की उसे सेक्स की आदत है

सुप्रीम कोर्ट ने लिखा था-लड़की 'हैबिच्यूएटिड टू सेक्शुअल इंटरकोर्स' थी। उस वक्त दोनों पुलिसवाले शराब के नशे में थे। लड़की ने ही मौके का फायदा उठाया और दोनों को सेक्स के लिए उकसाया। यह भी कहा कि लड़की ने लोगों के सामने मासूम बनने का नाटक करते हुए दोनों पुलिसकर्मियों पर रेप का आरोप लगाया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद लगा जैसे मथुरा को इंसाफ मिलने की उम्मीद खत्म हो गई।

यह तस्वीर 1980 की जब मुंबई फोर्ट के बाहर रेप के कानून में संशोधन की मांग करते हुए महिलाएं प्रदर्शन कर रही थीं।
यह तस्वीर 1980 की जब मुंबई फोर्ट के बाहर रेप के कानून में संशोधन की मांग करते हुए महिलाएं प्रदर्शन कर रही थीं।

सुप्रीम फैसले के खिलाफ उठी आवाज, पहली बार रेप में 'कंसेंट' शब्द पर हुई बात
मुमकिन था कि मथुरा का केस भी दफन हो जाता। मगर तभी इस मामले पर उस समय की जानी-मानी सोशल एक्टिविस्ट और वकील लतिका सरकार की नजर पड़ी। वह देश की पहली ऐसी महिला थीं जिन्होंने लॉ कॉलेज में कानून की पढ़ाई कराना शुरू किया। मथुरा का केस आने पर लतिका ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाई। लतिका के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के लॉ प्रोफेसर उपेंद्र बक्शी, रघुनाथ केलकर और मथुरा की वकील वसुधा धगमवार ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट के नाम एक ओपन लेटर लिखा।

पीड़िता को डरा धमकाकर उसे राजी करना ‘कंसेंट’ लेने या हामी भरने के बराबर नहीं है

इस ओपन लेटर में पूछा गया कि क्या शादी से पूर्व सेक्स का टैबू इस कदर ताकतवर हो चुका है कि कोर्ट भारतीय पुलिस को युवा लड़कियों का रेप करने की आजादी दे रहा है। पत्र में लिखा- 'क्या सुप्रीम कोर्ट एक 16 साल की लड़की से अपेक्षा करता है कि वह दो-दो वयस्क पुलिसवालों के कब्जे में होते हुए मदद की आवाज दे, क्या बिना चोट के निशान के रेप होना असंभव है?'

मथुरा अपनी मर्जी से इसके लिए राजी नहीं हुई। एक नाबालिग के सामने दो पुरुष खड़े हों और इस बीच अगर उसने मदद की आवाज लगाई भी होगी तो उसे चुप करा दिया गया होगा। ‘पैसिव सबमिशन’ यानी पीड़िता को डरा धमकाकर उसे राजी करना ‘कंसेंट’ लेने या हामी भरने के बराबर नहीं है।

संसद के बाहर इंसाफ की गुहार, महिलाओं के आगे झुकी सरकार
सुप्रीम कोर्ट ने तो इस फैसले पर दोबारा सुनवाई से इंकार कर दिया था। लेकिन देश के महिला संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया। तमाम नारीवादी संगठन सड़कों पर उतर आए और एक स्वर में मथुरा के लिए इंसाफ की मांग उठाते हुए बड़ा आंदोलन शुरू किया।

महिलाओं को आजादी की मुहिम में मुंबई में सब-ग्रुप बनाकर राष्ट्रीय सम्मेलन हुए। इसमें रेप के कानून को बदलने की उठी मांग। दिसंबर 1980 की यह तस्वीर उसी एक सब ग्रुप की है।
महिलाओं को आजादी की मुहिम में मुंबई में सब-ग्रुप बनाकर राष्ट्रीय सम्मेलन हुए। इसमें रेप के कानून को बदलने की उठी मांग। दिसंबर 1980 की यह तस्वीर उसी एक सब ग्रुप की है।

इसमें सबसे बड़ा संगठन था 'फोरम एगेंस्ट रेप'। यह देश का पहला नारीवादी संगठन था जोकि रेप के खिलाफ आवाज उठाने के लिए बना था। इसे लतिका सरकार ने अपने साथियों के साथ मिलकर बनाया था। बाद में इसी संगठन का नाम Forum Against Oppression of Women (FAOW) रखा गया।

महिलाओं के मुद्दों पर आवाज बुलंद करने वाली पहली महिला संगठन की संस्थापक सीमा साहेकर ने विरोध प्रदर्शन किया। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और नागपुर आदि क्षेत्रों से महिलाएं सड़कों पर उतरीं। संसद के बाहर महिलाओं की मानव चेन बनाई गई, धरने प्रदर्शन किए गए। केंद्र सरकार को रेप के कानून में बदलाव करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

कानून में हुए संशोधन, ‘ना’ का मतलब ‘ना’ ही है

  • 25 दिसंबर 1983 इंडियन एविडेंस एक्स के सेक्शन 114(A) में वैधानिक (स्टेट्यूटरी) प्रावधान जोड़ा गया। जिसमें कहा गया कि अगर पीड़िता कहती है कि उसने सेक्स के लिए सहमति नहीं दी है तो अदालत को मानना होगा।
  • अगर कोई महिला ‘ना’ कहती है तो इसका मतलब ‘ना’ ही है, और उसकी चुप्पी का मतलब भी ‘हां’ नहीं है।
  • आईपीसी के सेक्शन 376 (रेप) में चार नए सेक्शन ए,बी,सी और डी जोड़े गए। जिनके तहत तय हुआ कि अगर कोई भी पुलिसकर्मी, सरकारी कर्मचारी, या महिला/बाल संस्था या हॉस्पिटल का मालिक उनकी हिफाजत में आई किसी भी महिला का रेप करता है तो उसे 10 साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा होगी।
  • ‘बर्डन ऑफ प्रूफ’ के प्रावधान में बदलाव किया गया। इससे पहले ‘बर्डन ऑफ प्रूफ’ यानी रेप की घटना को साबित करने की जिम्मेदारी सिर्फ पीड़िता पर होती थी। मथुरा केस के बाद बर्डन ऑफ प्रूफ अपराधी के ऊपर डाला गया।
  • रेप केस में कैमरा ट्रायल्स शामिल किया गया।
  • पीड़िता की पहचान को सुरक्षित रखने का प्रवाधान। रेप और सेक्शुअल एब्यूज की पीड़िता को सामाजिक बहिष्कार से बचाने के लिए उसकी पहचान को छुपाए रखने के लिए सजा का प्रावधान रखा गया। आईपीसी के सेक्शन 228A के तहत अगर कोई भी रेप पीड़िता की पहचान बताता, उजागर करता है तो उसे दो साल तक की सजा हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक रैली में एक्टिविस्ट सीमा सखारे़ पहुंची थीं। एक पुस्तिका में यह तस्वीर प्रकाशित हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एक रैली में एक्टिविस्ट सीमा सखारे़ पहुंची थीं। एक पुस्तिका में यह तस्वीर प्रकाशित हुई थी।

अंत में बताते हैं क्या है IPC की धारा 376 के सेक्शन 376 a,b,c और d
कानून में आईपीसी की धारा 375 के तहत रेप की परिभाषा को बताया गया है। सेक्शन 376 के तहत रेप के जुर्म में सजा तय की गई है। मथुरा रेप केस के बाद धारा 376 में संशोधन किए गए और 376 (A),376(B),376(C) और 376(D) को जोड़ा गया। इन धाराओं के तहत जो भी अपराधी दोषी पाया जाएगा उसे 7 साल से लेकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई जाएगी। दोषी के ऊपर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

376(A) - इस धारा में उस पुलिस अधिकारी को रेप के लिए दोषी माना जाएगा। जो उस पुलिस स्टेशन में अपराध को अंजाम देता है जहां उसकी ड्यूटी लगाई गई है, या किसी भी पुलिस थाने में अपराध को अंजाम देता है। अगर महिला पुलिस ऑफिसर की कस्टडी में है या उस महिला की सुरक्षा की जिम्मेदारी उस अधिकारी के अधीन है।

376(B) - कोई भी पब्लिक सर्वेंट यानी सरकारी कर्मचारी अगर किसी महिला का सरकारी कार्यालय में बलात्कार करता है। लोक सेवा से जुड़ा अधिकारी अगर कस्टडी में मौजूद महिला का रेप करता है।

376(C) - किसी भी सुरक्षा बल जैसे की सेना में काम करने वाला कर्मचारी या सैनिक जिसे केंद्र या राज्य सरकार द्वारा उस क्षेत्र की सुरक्षा के लिए ड्यूटी पर तैनात किया गया है। वह उस क्षेत्र की महिला का रेप करता है।

376(D) - जेल में हिरासत में ली गई महिला या रिमांड रूम में कार्रवाई के लिए मौजूद महिला के साथ जेल में काम करने वाला कोई भी स्टाफ या अधिकारी बलात्कार करता है। या जेल के बाकी कैदियों द्वारा महिला का रेप किया जाता है।

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