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अब महिलाएं चलाएंगी पिंक ऑटो:पुरुष ड्राइवर बोले- महिलाएं बैठने से डरती हैं, उन्हें लोहे की जालियां सेफ कम पिंजरा ज्यादा लगती हैं

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: दीप्ति मिश्रा
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दिल्ली से सटे नोएडा और गाजियाबाद में पीले-हरे रंग के ऑटो के बीच पिंक ऑटो फर्राटे भर रहे हैं, लेकिन अब इनकी स्टेयरिंग महिलाओं के हाथ होगी। दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार के मिशन शक्ति के तीसरे चरण में डिविजनल ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी, गाजियाबाद ने पिंक ऑटो परमिट के लिए महिलाओं से 20 नवंबर तक आवेदन मांगे हैं। सवाल ये है कि आखिर पिछले 5 साल के दौरान महिलाओं को परमिट क्यों नहीं दिए गए?

इससे पहले साल 2016 में जारी परमिट पर दौड़ रहे पिंक ऑटो की अब क्या स्थिति है? परमिट जारी करते वक्त अब क्या सावधानियां बरती जा रही हैं? पढ़िए, भास्कर वुमन की पिंक ऑटो को लेकर की गई पड़ताल...

भास्कर वुमन की टीम सुबह 10 बजे नोएडा के सेक्टर-62 पहुंची तो वहां कई पिंक ऑटो चालक सवारियां बैठाकर अपनी-अपनी ​मंजिल की ओर निकल रहे थे। दफ्तर जाने वाले जल्दी में थे, इसलिए ऑटो वाले रुककर बात करने को तैयार नहीं हुए। गौर करने वाली बात ये थी कि सभी पिंक ऑटो चालक और उसमें बैठीं सवारियां पुरुष थे।

टीम ने अपने सवालों के जवाब टटोलने के लिए नोएडा सेक्टर-71 में सीएनजी लेने के लिए लाइन में खड़े पिंक ऑटो के चालक राजू शर्मा से बात की। यूपी के संभल जिले के राजू बताते हैं कि वे रोजी-रोटी की तलाश में साल 2015 में नोएडा आए। यहां ऑटो किराए पर लेकर चलाने लगे। दो साल पहले एक सेकेंड हैंड पिंक ऑटो और परमिट खरीदा।

राजू कहते हैं कि 2016 के बाद से परिवहन विभाग ने पिंक ऑटो के परमिट जारी करना बंद कर दिया था, ऐसे में नया परमिट मिलना मुश्किल था। ऑटो लोहे की जाली से पैक था, इसलिए सवारियां जल्दी नहीं बैठती थीं। जब से जाली हटवा दीं, तब से सवारियां बैठने लगीं। अब 700 से 1000 रुपए तक रोजाना की कमाई हो जाती है।

नोएडा सेक्टर-62 से सवारियां बैठाकर ले जाता एक पिंक ऑटो चालक।
नोएडा सेक्टर-62 से सवारियां बैठाकर ले जाता एक पिंक ऑटो चालक।

कैद में होने जैसा अहसास कराती है पिंक ऑटो की जाली
महिला सवारियां कहती हैं कि ऑटो में बैठने के बाद चारों ओर से पैक हो जाते थे। उसमें लगी लोहे की जाली जेल में होने का अहसास कराती है। सुरक्षित होने का अहसास कम, खौफ ज्यादा हावी होता था। एक अन्य महिला का कहना है कि पिंजरे में कैद होने जैसा लगता था। इसलिए वे जाली वाले पिंक ऑटो में नहीं बैठती थीं।

प्रायोरिटी में हैं महिला सवारी, पुरुषों को भी बैठा सकते हैं
नोएडा सेक्टर-22 में सवारी के इंतजार में खड़े पिंक ऑटो चालक अशोक चौहान बताते हैं कि वे साल 2011 में नोएडा आए थे, तभी से ऑटो चला रहे हैं। साल 2016 में जब पिंक ऑटो के परमिट जारी किए गए, तब उन्होंने भी आवेदन किया और उन्हें परमिट मिल गया। हालांकि यह महिला ड्राइवर के लिए था। महिला चालक तो दूर, यहां कई-कई घंटों तक इंतजार करने के बाद भी गिनी-चुनी महिला सवारी ही मिलती थीं।

चौहान कहते हैं- अगर पुरुष सवारी को बैठा लेते तो ट्रैफिक पुलिस वाले चालान काट देते थे। दिनभर में 300 रुपए की कमाई होती, उससे परिवार का गुजारा नहीं चलता। थक कर तीन-चार महीने के लिए ऑटो खड़ा कर दिया। उसके बाद प्रशासन का आदेश आया कि पुरुष सवारी ​बैठा सकते हैं, लेकिन महिला सवारियों को प्रायोरिटी देनी होगी।

नोएडा सेक्टर-22 में सवारी का इंतजार करते पिंक ऑटो चालक अशोक चौहान।
नोएडा सेक्टर-22 में सवारी का इंतजार करते पिंक ऑटो चालक अशोक चौहान।

सड़कों पर क्यों उतारे गए पिंक ऑटो ?
निर्भया गैंगरेप के बाद देश भर के कई शहरों में महिलाओं के सफर को सुरक्षित बनाने के लिए पिंक ऑटो और बस चलाने की पहल की गई। पिंक ऑटो यानी पूरी तरह गुलाबी या फिर उनकी छत गुलाबी रंग की होती है। इनमें पैनिक बटन और जीपीएस ट्रैकिंग सिस्टम जैसे खास फीचर की व्यवस्था की गई। इसकी शुरुआत सबसे पहले 2013 में झारखंड की राजधानी रांची में हुई। इसके बाद दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में पिंक ऑटो चलाए गए।

इन शहरों में महिलाएं चला रहीं पिंक ऑटो
भास्कर की पड़ताल में पता चला कि मुंबई और रांची को छोड़कर ज्यादातर शहरों की सड़कों से पिंक ऑटो या तो नदारद हैं या फिर नॉर्मल ऑटो बन चुके हैं। झारखंड प्रदेश डीजल ऑटो चालक महासंघ के अध्यक्ष दिनेश सोनी कहते हैं कि करीब 9 साल से महिलाएं पिंक ऑटो चला रही हैं। फिलहाल शहर में 40 से 45 पिंक ऑटो चल रहे हैं। हालांकि अब कुछ महिला ड्राइवर पुरुष सवारियां भी बैठाने लगी हैं।

पुरुष को ​बैठाने पर महिला चालकों में असुरक्षा का भाव आता है क्या? इस पर रांची में महिलाओं को पिंक ऑटो चलाने की ट्रेनिंग दिलवाने वाली आरती बोहरा कहती हैं कि नहीं। महिला चालकों के मन में असुरक्षा या डर जैसा कोई भाव नहीं आता है। हालांकि वे सावधानी बरतती हैं।

रांची की पिंक ऑटो महिला सर्विस। (फाइल फोटो)
रांची की पिंक ऑटो महिला सर्विस। (फाइल फोटो)

स्टैच्यू ऑफ यूनिटी अथॉरिटी की पहल
गुजरात में दुनिया की सबसे ऊंची स्मारक स्टैच्यू ऑफ यूनिटी का प्रबंधन संभालने वाली अथॉरिटी ने पिंक ऑटो चलाने की पहल की है। केवड़िया निवासी जैनिस प्रजापति ने बताया कि पिंक ऑटो प्रोजेक्ट के लिए स्थानीय प्रशासन ने आदिवासी महिलाओं को चुना है। उन्हें प्रशिक्षित कर उनका ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया। फिलहाल केवड़िया में 10 पिंक ऑटो चल रहे हैं।

...ताकि सही हाथों में पहुंचे पिंक ऑटो
परिवहन प्राधिकरण सचिव अरुण वार्ष्णेय ने बताया कि पांच साल बाद मेरठ मंडल के कमिश्नर सुरेंद्र सिंह की ओर से जरूरतमंद महिलाओं को रोजगार देने के लिए परमिट जारी करने की पहल की गई है। परमिट जिम्मेदार महिलाओं को ही मिले, इसके लिए ड्राइविंग लाइसेंस समेत सभी जरूरी डॉक्युमेंट्स और पिता या पति का नाम जैसी कई जानकारियां मांगी गई हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए ऑटो में कैमरा, जीपीएस, पैनिक बटन, हेल्पलाइन नंबर और बीएलडीडी जैसे कई फीचर अपडेट किए गए हैं।

'पिंक का सफर सेफ है' ख्याल सच बनाने पर काम जारी
अरुण वार्ष्णेय ने बताया कि शुरुआत में 250 से 300 परमिट जारी किए जाएंगे। ट्रायल के बाद पिंक रिवोल्यूशन लाने के लिए तेजी से काम किया जाएगा। ​ताकि लोगों के मन में 'पिंक का सफर सेफ है' ख्याल रहे और सारा डर काफूर हो जाए। जिन महिलाओं ने आवेदन किया है, उनका ड्राइविंग टेस्ट लिया जाएगा। टेस्ट में पास होने वाली महिलाओं को ही परमिट मिलेगा।